Saturday, 27 June 2026

यज्ञोपवीत बिषय निराकरण

 वरुण पाण्डेय जी का भ्रमोच्छेदन


वरुण पाण्डेय जी का यज्ञोपवीत बिषय पर  अशास्त्रीय सम्मत बिचार अग्रहणीय अनादर योग्य है ।

यजुर्वेद की तैत्तरीय आरणक्यम् का जो प्रसङ्ग आया है पाण्डेय जी ने उन प्रसङ्गो को न दर्शा कर केवल अपने मनोरथ को सिद्ध करने हेतु चेष्टा कर रहे है जो अनर्थकारी है ।


अस्तु शास्त्रो के अर्थो का अनर्थ करने वाला चोर है ऐसा महर्षि मनु का कथन है ।

पाण्डेय जी ने अपने पोस्ट में जिन मुख्य बिषयों को उद्धृत किया है वह समस्त विद्जनो के लिए विचारणीय है ।


● नम्बर १-- तैत्तरीय आरणक्यम् प्रसङ्ग 

●नम्बर २-- इच्छानुकूल यज्ञोपवीत को धारण करना त्याग करना 

●नम्बर  ३-- स्त्रियों का उपनयन संस्कार

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●नम्बर १-- तैत्तरीय आरण्यक्यम्  प्रसङ्ग

यजुर्वेद के तैत्तरीय आरणक्यम्  जिस प्रसङ्ग को पाण्डेय जी ने उल्लेखित किया हैं वह प्रसङ्ग देवताओं और असुरों द्वारा प्रतिपादित यज्ञ विषयक प्रसङ्ग है ।

देवता और असुर दोनों यज्ञ का सम्पादन करते है असुरों का यज्ञ निष्फल और स्वर्ग से पराभूत हुए क्यो की असुर अनुपवित थे ।

इस प्रसङ्ग से यह प्रमाणित होता है अनुपवित ब्यक्ति यज्ञयाग के लिए अनधिकृत है और यदि वे करते भी है तो निष्फल है ।

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●नम्बर २-- उपनयन प्रसङ्ग 

 श्रुतिस्मृति इतिहासपुराण मीमांसादी ऐसा कोई भी शास्त्र नही जहाँ यज्ञोपवीत बिषय पर आर्यो को स्वेच्छाचारी कहा गया हो अस्तु समस्त त्रैवर्णिको के बिषय में समस्त धर्मशास्त्र एक स्वर में घोषणा करते है कि

अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ,एकादशवर्षं राजन्यं , द्वादशवर्षं वैश्यम्


  ब्राह्मणकुलोतपन्न बटुक बालक का उपनयन संस्कार ८ वर्षो में क्षत्रीयकुलोद्भव बाकल का 11 वर्ष में और वैश्य कुलोद्भव बालक का 12 वर्ष में  हो जाना चाहिए ।

यदि उपनयन बिषय पर स्वतंत्रता होती तो आयु का निर्धारण तद् तद् शास्त्रो में उपदिष्ट न किया होता ।

 पोस्टकर्ता ने जिस आपस्तम्ब धर्म सूत्र का आश्रय ग्रहण कर अपने मत की सिद्धि  करने की चेष्टा कर रहा है वही आपस्तम्ब धर्म सूत्र उपनयन बिषय पर स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि ब्राह्मण बालक का यज्ञोपवीत अष्टवर्ष में करें ।


गर्भाष्टमेषु ब्राह्मणं गर्भैकादशेषु राजन्यं गर्भद्वादशेषु वैश्य (आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/१/१९)


आपस्तम्ब धर्म सूत्रकार आगे यह भी कहता है कि जिनका स्मयानुकूल यज्ञोपवीत न हुआ हो वह व्रात्य है उन्हें प्रायश्चित करना चाहिए ।


प्रतिपूरुसं संख्याय संवत्सरान्यावन्तोऽनुपेताः स्युः (आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/२/१

पता नही  पोस्टकर्ता ने किस हेतु से यह बात कही की द्विज यज्ञोपवीत सदैव धारण  नही करते थे यह समझ से परे ।

विद्जन इस पर बिचार करें 

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●नम्बर ३ -- स्त्रियों का उपनयन संस्कार प्रसङ्ग


अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत “,“,एकादशवर्षं राजन्यं , द्वादशवर्षं वैश्यम् ,— आठ वर्ष के ब्राह्मण का उपनयन करे   इसी प्रकार 11वर्ष के क्षत्रियऔर 12वर्ष के वैश्य का उपनयन करके उन्हें पढ़ाये । किसका उपनयन कब हो ? –इसे भी बताया गया है –मीमांसा के प्रौढविद्वान् शास्त्रदीपिकाकार ” पार्थसारथि मिश्र ” सप्रमाण लिखते हैं–” वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत,ग्रीष्मे राजन्यं शरदि वैश्यम् ” इति द्वितीयानिर्देशादुपनयनसंस्कृतास्त्रैवर्णिकाः –अध्याय1,पाद1,अधिकरण1,सूत्र1, वसन्त काल में ब्राह्मण का उपनयन करे ,ग्रीष्म में क्षत्रिय और शरद् ऋतु में वैश्य का ।भगवान् वेद के इन वचनों में सर्वत्र “ब्राह्मणम्,राजन्यं , वैश्यम् ” इस प्रकार द्वितीयान्त पुल्लिंग का ही प्रयोग हुआ है ,स्त्रीलिंग का नही । अतः उपनयन पुरुषों का ही होगा ,स्त्रियों का नहीं –यही भगवती श्रुति का डिमडिम घोष है । यह बात सामान्य व्याकरण– अध्येता को भी ज्ञात है कि पुंस्त्व की विवक्षा में पुल्लिंग और स्त्रीत्व की विवक्षा होने पर टाप् ,ड़ीप् आदि प्रत्यय होकर टाबन्त ड़ीबन्त अजा,ब्राह्मणी,क्षत्रिया,वैश्या आदि शब्दों का प्रयोग होता है ।जब घोड़ा मगाना होगा तब ” अश्वमानय ” ही बोला जायेगा । और घोड़ी मगाना होगा तो ” अश्वामानय ” ही बोलेंगे । इन तथ्यों को ध्यान में रखकर देखें कि उपनयन शास्त्रवचनों से किसका कहा जा रहा है ? पुरुष का या स्त्री का ? ” पशुना यजेत ” इत्यादि स्थलों में पुंस्त्वआदि की विवक्षा है ;क्योंकि महर्षि पाणिनि जैसे सूत्रकार ने ” तस्माच्छसो नः पुंसि , स्त्रियाम् , अजाद्यतस्टाप्, स्वमोर्नपुंसकात् ,–जैसे सूत्रों द्वारा पुल्लिंग में अकारान्त शब्दों से परे शस् के स् को न् ,स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् आदि तथा नपुंसक लिंग में अदन्तभिन्न शब्दों से परे सु और अम् विभक्ति का लोपकहा है । अतः इन तथ्यों को मानकर ही अर्थ करना चाहिए ।” तथा लिंगम् ” –पूर्वमीमांसा–4/1/8/16,सूत्र से महर्षि जैमिनिने 5000वर्ष पूर्व ही इस तथ्य की पुष्टि कर दी थी । महर्षि पाणिनि के पहले भी शाकटायन, आदि अनेक वैयाकरण हो चुके हैं । वेदों की आनुपूर्वी में प्रवाहनित्यता मानें या और कुछ, उसमें परिवर्तन ईश्वर भीनही करता । तात्पर्य यह कि समयानुसार वेद नही बदलते हैं ढुलमिल नेताओं की तरह । वेद से भिन्न जो स्मृतियां हैं उनका प्रामाण्य वेदमलकत्वेन ही है ,वेदविरुद्धहोने पर वे अप्रमाण की कोटि में चली जाती हैं –ये दोनो सिद्धान्त क्रमशः” स्मृत्यधिकरण “– 1/3/1/2, ” विरोधाधिकरण “–1/3/1/3–4, पूर्वमीमांसासे सर्वमान्य हैं ।" विरोधे त्वनपेक्ष्यं स्यादसति ह्यनुमानम् ” –1/3/1/3 सूत्र तो इस विषय में अति प्रसिद्ध है ।अतः अपौरुषेय वेद–वसन्ते ब्राह्मणमपनयीत,ग्रीष्मे राजन्यं , शरदि वैश्यम् ” से विरुद्ध ” पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते ” स्मृति सर्वथाअप्रामाणिक है । इससे वेदप्रतिपादित सिद्धान्त को सञ्कुचित नही किया जा सकता । अतः स्त्रियों का उपनयन किसी भी कल्प में नही होता है । और सभी कल्पों में पुंस्त्वविशिष्टों का ही उपनयन वैदिक सिद्धात है ।

आज भी कर्मकाणड में देवताओं को यज्ञोपवीत चढ़ाया जाता है देवियों– गौरी आदिको नहीं –इसका मूल नारियों के उपनयन का अभाव ही है ।

इससे वेदप्रतिपादित सिद्धान्त को सञ्कुचित नही किया जा सकता । अतः स्त्रियों का उपनयन किसी भी कल्प में नही होता है । और सभी कल्पों में पुंस्त्वविशिष्टों का ही उपनयन वैदिक सिद्धात है । इससे यह भी सिद्ध होता है कि जब उनका उपनयन ही नही तब वेदाधिकार न होने से वेदमन्त्रसाध्य यज्ञादि कर्मों के आचार्यत्व का वे निर्वहन भी नही कर सकतीं । हां पति के साथ वे प्रत्येक कार्य का सम्पादन करेंगी । पत्नी के विना पति किसी यज्ञादि कर्म का अनुष्ठान नही कर सकता ;क्योंकि आज्यावेक्षणजैसे कर्म यदि नही हुए तो अंगवैकल्य से कर्म फलप्रद नही हो सकता ।–यह तथ्य पूर्वमीमांसा में –6/1/4/8से 20वें सूत्र तक विस्तार से वर्णित है

शैलेन्द्र सिंह

Monday, 11 May 2026

सत्यकाम जाबाल



सत्यकाम जबाला को लेकर जो भ्रांतियां फैलाई गई है वह निराधार तथा समाज को दिग्भ्रमित करनेवाला है ।

वे तथाकथित बुद्धिजीवी बिषयो का अध्ययन न तो तन्मयता से ही करते है न हीं पूर्णरूपेण और इन्ही आधे अधूरे अध्ययन के बल पर कुतर्क करते फिरते है ।

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●पूर्वपक्ष :-- सत्यकाम का पुत्र जबाला एक दासी पुत्र था  सत्य काम ब्राह्मणो की परिचर्या करती थी और परिचर्या का अधिकार शूद्रों का है अतः जबाला शुद्र हुए 


●उत्तर पक्ष :-- परिचर्या शब्द से यह अर्थ लेना न्याय संगत नही की जो परिचर्या करे वह शुद्र ही हो ब्राह्मणो के परिचर्या का अधिकार समस्त वर्णो को प्राप्त है ।


●नम्बर •१:-- कठ उपनिषद में बटुक बालक नचिकेता का परिचर्या स्वयं यमराज ने की तो क्या यमराज शुद्र हो गए ?


●नम्बर •२:-- भगवन श्री कृष्ण (जिनका आविर्भाव क्षत्रिय कुल में हुआ था)  उन्होंने स्वयं ब्राह्मणश्रेष्ठ सुदामा जि की परिचर्या की तो क्या श्रीकृष्ण जी शुद्र हुए ?


●नम्बर •३ :-- सूर्यवंशी कुल शिरोमणि भगवन श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण जी ने विश्वामित्र ऋषि के सेवार्थ लिए उपस्थित हुए थे क्या वे शुद्र थे ?


●नम्बर• ४:--- माता कुन्ती एक क्षत्राणी होते हुए भी दुर्वाशा ऋषि की परिचर्या की थी क्या वे शुद्रा थी ?


यहाँ तक तो यह स्प्ष्ट हो गया कि ब्राह्मणो की परिचर्या का अधिकार समस्त वर्णो का है ।

अब आते है उनके वर्ण बिषय पर 

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ऋषिगण पूर्णप्रज्ञ भूतभविष्य के द्रष्टा  समस्त ज्ञान उनके हस्तामलक होते थे   ऋषि स्वयं दिब्य होते है जो दिब्य हो उनपर लेश मात्र भी शङ्का करना श्रुतियों पर सन्देह करना होगा ऐसे में श्रुतियों की नित्यता भी बाधित हो जाएगी  ऐतरेय ब्राह्मण में स्प्ष्ट कहा गया है 


■--: ऋषयो देव्या (ऐतरेय ब्राह्मण २/२७)


जो स्वयं दिब्य हो उनकी वाणी भी दिब्यता से ओत प्रोत होती है वे कभी भी न तो मिथ्या आचरण ही करते है और न ही उनके कथनों में मिथ्याभास ही होता है ऋग्वेद की यह ऋचा स्प्ष्ट कहती है कि पूर्व में जितने भी ऋषि हुए वे मिथ्या आचरण अथवा मिथ्या भाषण नही करते 


■--: ये चि॒द्धि पूर्व॑ ऋत॒साप॒ आस॑न्त्सा॒कं दे॒वेभि॒रव॑दन्नृ॒तानि॑ ।(ऋ १/१७९/२)


फिर छनदोग्य उपनिषद में महर्षि गौतम के वचनों पर सन्देह उतपन्न करना श्रुतियों के आज्ञाओ का भंग करना होगा  

छनदोग्य उपनिषद में महर्षि गौतम ने जबाला के बिषय में स्प्ष्ट कहा है 


■--:नैतदब्राह्मणो  तमुपनीय (छा०उ०४/४/५)  


(हे ब्राह्मण आओ मैं तुम्हारा उपनयन संस्कार करवाता हूँ ।)


महर्षि गौतम ने जबाला को स्प्ष्ट रुप से ब्राह्मण कहा है   और कुछ अल्पज्ञ अल्पश्रुत  बस तर्को के माध्यम से अपना मनोरथ सिद्ध करने की कुचेष्टा करते है ।

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आजकल निज मत मतान्तरों से सनातन धर्म शास्त्रों का अर्थ किया जा रहा यह दुर्भाग्य पूर्ण है जब कि वेदों का शंखध्वनि है ।


वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।

नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]


सदैव वेदादि शाश्त्रो के विद्वान आचार्यो से पूछ का ही सत्य असत्य का निर्णय आचरण करना चाहिए ।

■--शैलेन्द्र सिंह

Sunday, 10 May 2026

माता सीता_के_विषय_में_अज्ञता



वरुण पाण्डेय शिवाय जी के इस पोस्ट पर कुल 51 लोगो ने सहमति जताई है जिसका हमने स्क्रीनशॉट लगाया है ।


शिष्ट पुरुषों का लक्षण है कि धर्मादि बिषयों पर सप्रमाण अपने कथनों को रखा जाय तो वह सम्मानीय होता है पाण्डेय जी ने जिन मुख्य बिषयों के ओर संकेत किया है वह मुझे युक्तियुक्त जान नही पड़ते यदि कोई युक्तियुक्त प्रमाण हो तो पाण्डेय जी प्रकाशित किये हुए अपने प्रतिज्ञा वाक्य को सिद्ध करें 

नम्बर एक (१) माता सीता का जन्म यज्ञ योग्य क्षेत्रमण्डल का हल से कर्षण करने से उनका प्रकाट्य नही हुआ था 

नम्बर (२) यदि माता सीता भूमिजा नही थी तो इसका स्पष्ट अर्थ निकलता है कि माता सीता साधारण स्त्रियों की भांति योनिज थी। 

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वाल्मीकि रामायण के विरुद्ध जितने भी वृत्तांत है वह अनादर योग्य है 

इतिहासो में वाल्मीकि रामायण श्रेष्ठ है 

■--नास्ति रामायणात् परम् (स्कंद पुराण उत्तर खण्ड रा०आ० ५/२१)

क्यो की 

■--रामायणमादिकाव्य सर्वेदार्थ सम्मतं (स्कंद पुराण उत्तर खण्ड रा०आ० ५/६४)

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■--धर्मस्य_सूक्ष्मतवाद्_गतिं (महाभारत)

धर्म की गति अति सूक्ष्म है अतः हम जैसे अल्पज्ञ अल्पश्रुतो में भ्रम होना स्वाभाविक भी है ।

इस लिए श्रुतियों ने स्पष्ट घोषणा की है 


■-वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।


नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]


■-आचार्यवान् पुरुषो  वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)


■--तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् ) 

अतः धर्मादि बिषयों पर निज मतमतान्तर के वशीभूत हो बिषयों के अर्थ का अनर्थ करना शास्त्रो की हत्या करने जैसा बीभत्स पाप का कारण होता है ।

■--बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति (महाभारत आदिपर्व)


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माता जानकी का आविर्भाव साधारण स्त्रियों की भांति नही हुआ   वे तो  अयोनिजा है 

जो भगवती देवी जगत् जननी है जो शक्ति स्वरूपा महामाया है जो समस्त जगत् की प्रसूता है उनकी प्रसूता भला कौन हो ??

इस लिए शास्त्रो में उस जगत् जननी को अयोनिजा होने का दिग्दर्शन भी कराता है तिमिर रोग से ग्रसित व्यक्ति को समस्त बिषयों में ही खोंट दिखे तो इसमें भला शास्त्र का क्या दोष ??


■---अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छद्विचिन्तयन् (वा०रा०२/११८/ )


■--वीर्य शुल्का इति मे कन्या स्थापिता इयम् अयोनिजा (वा०रा १/६६/१४)


माता जानकी के अयोनिजा होने की घोषणा केवल मात्र वाल्मीकि कृत रामायण ही नही अपितु विष्णुधर्मोत्तर पुराण भी करता है 


■---भूय सीता समुत्पन्ना जनकस्य महात्मनः ।। 

अयोनिजा महाभागा कर्षतो यज्ञमेदिनीम् (विष्णु धर्मोत्तर पुराण )

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जो जगत् जननी दिव्य स्वरूपा है उनका आविर्भाव भी दिव्य ही होगा 

न कि साधारण स्त्रियों की भांति ??


माता जानकी जब देवी अनुसूया के मध्य सम्वाद होता है तो माता सीता कहती है ।


■--तस्य लाङ्गलहस्तस्य कर्षत: क्षेत्रमण्डलम् । 

अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपते: सुता (वा०रा० २/११८/२८)


महाराज जनक यज्ञ के योग्य क्षेत्र को हाथ मे हल लेकर जोत रहे थे उसी समय मैं भूमि से बाहर प्रकट हुई ।


माता सीता द्वारा  ठीक यही वृतान्त अग्नि परीक्षण के प्रसङ्ग में भी कहा गया है 


■--उत्थिता मेदिनीं भित्वा क्षेत्रे हलमुखक्षते |

पद्मरेणुनिभैः कीर्णा शुभैः केदारपांसुभिः॥ (रामायण सुन्दर काण्ड सर्ग १८)

केवल वाल्मीकि रामायण ही क्यो वेदव्यास कृत पद्मपुराण में भी यही कथा देखने को मिलता है ।


■--अथ लोकेश्वरी लक्ष्मीर्जनकस्य निवेशने ।

शुभक्षेत्रे हलोद्धाते सुनासीरे शुभेक्षणे ॥ (पद्मपुराण ६/२४२/१००)

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माता जानकी के बिषय में मिथिला नरेश जनक महर्षि विश्वामित्र से कहते है 


■--अथ मे कृषतः क्षेत्रम् लांगलात् उत्थिता मम ॥

क्षेत्रम् शोधयता लब्ध्वा नाम्ना सीता इति विश्रुता ।

भू तलात् उत्थिता सा तु व्यवर्धत मम आत्मजा ॥ (वा०रा०१/६६/१३-१४)


राजा जनक के बिषय में श्री हरि: स्वयं घोषणा करते है 


■-कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः (गीता)


अतः मिथिला नरेश स्वप्न में भी मिथ्या भाषण न किया होगा फिर तो भूत भविष्य के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र के समक्ष मिथ्या भाषण कैसे करते ??

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माता जानकी के बिषय में वरुण पाण्डेय द्वारा अपुष्ट अप्रामाणिक कथनों के बिषय में विद्वजन बिचार करें ।।

यदि मुझसे  कोई त्रुटि हो तो विद्जनो से अनुरोध है कि विनम्रता पूर्वक उन त्रुटियों को रेखांकित करें धन्यवाद 


■--शैलेन्द्र_सिंह

Saturday, 18 April 2026

यज्ञोपवीत और शूद्र

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यज्ञोपवीत


■ प्रश्न:--यज्ञोपवीत में किन किन वर्णो का अधिकार है  और इसका महत्व क्या है ?

■ उत्तर:-- ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य ये ही तीनो द्विज के अधिकारी है यज्ञोपवीत ही वह सूत्र है जिससे द्विजो को वेदादि शास्त्रो का अध्ययन में अधिकारी बनाता है बिना यज्ञोपवीत के ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य इन तीनो में से किसी को भी वेदादि में अधिकार नही ।

■ प्रश्न :--- तब तो शुद्र के साथ अन्याय हुआ उन्हें वेदादि ज्ञान से दूर रखा गया |

■ उत्तर:--- जिनका यज्ञोपवीत संस्कार न हो उसको  इतिहास पुराण आदि शास्त्रो में अधिकार है इतिहास पुराण आदि को ही पञ्चम वेद की संज्ञा प्राप्त है इतिहास पुराणादि वेदो का ही उपबृंहण (व्याख्या) है जिसको सुनने से वही ज्ञान प्राप्त होता है जो वेदो के अध्ययन से !

 वेदो का अध्ययन    दुरूह कष्टसाध्य है तो वहीं पुराण सरल और माधुर्य जिस ज्ञान को आप सरलता से पा सकते है ।

 वही कठोर नियमादि से तो सभी प्राणी बचना चाहता है ऐसे में भगवन ने आप के लिए सरलतम मार्ग और द्विजो के लिए कठिन मार्ग का बिधान किया   |

और रह गई अन्याय की बात तो शास्त्रो में शुद्र को दण्डरहित कहा गया है और ब्राह्मणो को 64 गुना दण्ड का प्रावधान है ,जहाँ शुद्रौ को खान पान आचरण आदि में स्वतंत्रता प्रदान की है वही ब्राह्मणो के लिए खानपान पहनावा,आचरण आदि पर कड़ा प्रावधान है

 ऐसे में यदि मैं पूछूँ की ब्राह्मण ही क्यो 64 गुणा दण्ड के अधिकारी है शुद्र क्यो दण्ड रहित ? आखिर क्यों शुद्रौ को स्वतंत्रता प्रदान की और ब्राह्मणो के प्रति कठोर नियम  ऐसा क्यो भाई ?

प्रश्नकर्ता मौन 😶😶

वेदादि अध्ययन में स्त्रियों का अधिकार

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शंका:-- स्त्रियों को वेदाध्ययन में अधिकार क्यो नही ?जबकि गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी कई विदुषियां हुई हैं जो स्वयं वेदो के मन्त्रद्रष्टा भी रह चुकी है ऐसे में स्त्रियों को वेदाध्ययन में अनाधिकार क्यो?

■-समाधान :--  मन्त्रद्रष्टा वे है जो यमनियम आदि का आचरण कर  अपने तपःपूत के बल पर मन्त्रो का साक्षात्कार करते है

ऋषिर्मन्त्रद्रष्टा ॥ गत्यर्थत्वात् ऋषेर्ज्ञानार्थत्वात् मन्त्रं दृष्टवन्तः ऋषयः ॥' ( श्वेतवनवासिरचितवृत्तौ उणादिसूत्रं ४॥१२९ द्रष्टव्यम्)

वेद कहता है तपस्या से ब्रह्म को जानो क्योंकि तप ही ब्रह्म है – तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व| तपो ब्रह्मेति| – तैत्तिरीयोपनिषत् / भृगुवल्ली / ०

इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत्। बिभेत्यल्प श्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।। अर्थात् इतिहास पुराण से ही वेद को समझना चाहिए। इनको नहीं जानने वाले से वेद भी डरता है कि यह मेरी हत्या कर देगा।

स्त्रियों के लिए स्वधर्मपालन पतिशुश्रूषा ही तप है यज्ञ है

नास्ति यज्ञः स्त्रियाः कश्चिन्न श्राद्धं नोप्रवासकम्।
धर्मः स्वभर्तृशुश्रूषा तया स्वर्गं जयन्त्युत।।(महाभारत अनुशाशन पर्व ४६/१३)

स्त्रीभिरनायासं पतिशुश्रूषयैव हि ।।(विष्णु पुराण ६-२-३५ )

नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् ।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते । (मनुस्मृति ५/१५५)

धर्मशास्त्रों में स्प्ष्ट कहा है स्त्री तन ,मन ,धन से अपनी पति की सेवा करे वही उसका यज्ञ ,तप,व्रत है उसी से वे अनायास धर्म की सिद्धि प्राप्त कर लेती है   मन्वादि प्रबल शास्त्र प्रमाणों से सिद्ध है कि अपनी तपस्या से पूर्वकाल में स्त्रियां वेद मन्त्रो का साक्षात्कार कर लेती थी उनकी तपस्या क्या है ? स्वधर्म पर चलने से उनको वेद्य तत्त्व का ज्ञान हो जाता था वो तपस्या है स्वधर्मपालन, देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञों का पूजन , आर्जव , इन्द्रियों पर निग्रह , अहिंसा , इसी से वे स्त्रियाँ सिद्धि  को प्राप्त कर लेती थी ऐसे में यह सिद्ध नही होता कि स्त्रियी को वेदाध्यन में अधिकार हो क्यो की स्मृति, इतिहास ,पुराणादि समस्त धर्म शास्त्र में स्त्रियों को वेदाध्ययन का अनाधिकारी ही कहा क्यो की तमुपनिय (छा०उ०) श्रुतियों का स्प्ष्ट आज्ञा है वेदविद्या में प्रवेश करने के पूर्व उपनयन सँस्कार आवश्यक है बिना उपनयन के वेदविद्या में प्रवेश का अधिकार तो ब्राह्मणो तक को नही फिर जिनका उपनयन ही न हो उसको वेदविद्या में अधिकार कैसे ? स्त्रियों के उपनयन संस्कार के बिषय में इतिहास,पुराणादि शास्त्रो में अभाव है ।

अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणां आवृदशेषतः ।। (मनुस्मृति)

वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः (मनुस्मृति)

जिस कारण वेदाध्ययन का उन्हें अधिकारी नही माना गया है

वेदे पत्नीं वाचयति न स्तृणाति (शङ्खायन श्रौतसूत्रम् ८/१२/९)

स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा " ( श्रीमद्भागवत १.४.२५)

शैलेन्द्र सिंह

परशुराम और क्षत्रियकुल वंश कथा प्रसंग

 ■--भृगुकुलनन्दन परशुराम और क्षत्रिय कुल नाश कथा प्रसंग 

●--देवेन्द्र सिकरवार मतभंजन 


जमदग्नि सूत परशुराम स्वयं हरि: के आवेशावतार है ऐसा इतिहासपुराण से सिद्ध  है ।

अवतार के बिषय में श्रुतिस्मृतिइतिहासपुरण  में जो कहा गया है वह विचारणीय है ।


■-एकं रूपं बहुधा यः करोति (क०उ० २/२/१२)

■-एको देवो बहुधा निविष्टः (तै 0आ0 ३/१४/१)

■-दिव्येन देहाभ्युदयेन युक्तः(वाल्मीकि रामायण ) 

■-ईश्वरस्योत्तमस्यैनां कर्मणां गहनां गतिम्।(महाभारत सभापर्व)

■-जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं (गीता)

भगवन के   कर्मो की गति बड़ी गहन है क्यो की उनका आविर्भाव और उनका कर्म ही दिव्य है वे पञ्चभौतिक तत्वो से परे दिव्य देह से युक्त होते है  ।

जिनका आविर्भाव ही दिव्य हो उनका एक एक कार्य दिव्यता का पोषक होता है ।

पुराणों में जो कथा आती है कि भगवन परशुराम 21 बार पृथ्वी से क्षत्रियोँ को विहीन किया था अस्तु यह बिषय भी विचारणीय जिसे हम इस लेख के माध्यम से प्रेषित करेंगे यदि कोई त्रुटि हो तो  विद्जन बिचार कर आगे का मार्गदर्शन कराएं ।।

■--पुराणे ही कथा दिव्य (महाभारत आदिपर्व 5/1)

■-आख्यानं पुराणेषु सुगोप्यक्म् (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

इस न्याय से पुराणाख्यान् में आये हुए कथाएँ दिव्य हैं, जिस कारण इन  दिव्य कथाओं को लेकर भ्रामकता उत्पन्न होना स्वाभाविक है ।

■--अक्षरग्रहादि परमोपजायमान वाक्यार्थज्ञानार्थमध्ययानं विधीयते

तत्सस्य विचारमन्तरेणासम्भवाध्यायन विधिनैवासार्थाद्विचारो विहित इति गुरुगृह एवस्थाय विचारयितव्यों धर्म: इस न्याय से गुरुमोखोच्चारणानुच्चारण सानिध्यता न प्राप्त होना ही मूल कारण है ।

अस्तु भगवन परशुराम के बिषय में महाभारत, स्कंद पुराणादि आयाख्यानों में जो यह कथा प्रसंग आया है उसे लेकर समाज मे जो भ्रांतियां उतपन्न हुआ है उसका मुख्य कारण ही है कि परम्पराप्राप्त आचार्यो की सानिध्यता न प्राप्त होना ।एक क्षण के लिए यदि हम ऐसा मान भी ले तो यद्वत प्रश्नों का निराकरण किस प्रकार होगा यह विचारणीय है  ।

21 बार सम्पूर्ण पृथ्वी से क्षत्रियो का समूल नाश करना ,यदि ऐसा ही था तो   इक्ष्वाकु वंश परम्परा ,जनकादि वंश परम्परा ,कैकई,कौशल्या,सुमित्रादि के पितामह आदि की वंशपरम्परा कैसे अक्षुण रही ?

 माता जानकी के पाणिग्रहण संस्कार के समय मे राजऋषि जनक के दरबार मे देश विदेश से क्षत्रियकुल वंश कहाँ से आये थे ?

वाल्मीकि रामायण स्वयं  भृगुकुलनन्दन परशुराम को मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के समकालीन बता रहे है ।

ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम्।

भार्गवं जामदग्न्येयं राजा राजविमर्दनम् ॥(वाल्मीकि रामायण)

●-दशरथ ,जनकादि कुल परम्परा भृगुकुलनन्दन के कालखण्ड में ही पुष्पित पल्लवित हो रहे थे ।


और महाभारत में श्रीकृष्णचन्द्र युधिष्ठिर से कह रहे है कि ऐसी कथा हमने ऋषियों से सुन रखा है !


शृणु कौन्तेय रामस्य प्रभावो यो मया श्रुतः।

महर्षीणां कथयतां कारणं तस्य जन्म च।।(महाभारत शांतिपर्व)


●-महाभारत ,और स्कन्दपुराण अयाख्यान में केवल मात्र हैहयवंशीय क्षत्रियो के बिषय में ही यह प्रकरण आया है अन्यो का नही ।

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 भगवन परशुराम की शत्रुता हैहयवंशीय क्षत्रियो कुलो से था न कि सम्पूर्ण क्षत्रिय कुल से ?? हैहय वंशीय क्षत्रियो का ही समूल नाश किया था क्यो की कथा प्रसंग में केवल मात्र हैहयवंश का ही उल्लेख आया है कि सहस्त्रो बार हैहयवंशी क्षत्रियो का समुल नाश किया था ।उससे इतर किसी अन्य कुलो के बिषय में किसी भी प्रकार का कोई उल्लेख नही मिलता 


■-ततः स भृगुशार्दूलः कार्तवीर्यस्य वीर्यवान्।

विक्रम्य निजघानाशु पुत्रान्पौत्रांश्च सर्वशः।।

■-स हैहयसहस्राणि हत्वा परममन्युमान्।

महीं सागरपर्यन्तां चकार रुधिरोक्षिताम्।।

स तथा सुमहातेजाः कृत्वा निःक्षत्रियां महीम्।

कृपया परयाऽऽविष्टो वनमेव जगाम ह।।(महाभारत शांतिपर्व)

■-हैहयाधिपतेर्योधैः सार्धं देवासुरोपमैः ॥ 

ततस्ते हैहयाः सर्वे शरैराशीविषोपमैः ॥

■-अथ भग्नं बलं दृष्ट्वा हैहयाधिपतिः क्रुधा ॥(स्कन्दपुराण)


विश्वामित्र का पौत्र रेभ्यु भरी सभा मे परशुराम जी से कहते है ययाति के यज्ञ में आये हुए नृपगण क्या क्षत्रिय नही थे? आप की प्रतिज्ञा झूठा है कि आप ने सम्पूर्ण पृथ्वी को क्षत्रियो से विहीन कर दिया ।।


 ■--ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः।

      प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते।

■-मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि।(महाभारत शांतिपर्व)


अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि हैहयवंश से इतर सूर्यवंशी ,चन्द्रवंशी ,क्षत्रियकुल अविच्छिन रूप से पुष्पित पल्लवित हो रहे थे ।

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ब्रह्महत्या के तेज से पातक हुए सहस्त्रार्जुन एवं उनके सैनिकगण 

युद्ध मे पराक्रम दिखा पाने में अक्षम थे देवयोग के कारण ही शस्त्र उठाने में एवं वैदिक मंत्रों का विस्मृत होना यह दर्शाता है कि शाहस्त्रार्जुन के पाप कर्मों का ही परिणाम था ।


■--ब्रह्महत्यासमुत्थेन पातकेन ततश्च ते ॥

■--जाता निस्तेजसः सर्वे प्रपतंति धरातले ॥ 

■--न शस्त्रं शेकुरुद्धर्तुं दैवयोगात्कथंचन ॥

दिव्यास्त्राणां तथा सर्वे मन्त्रा विस्मृतिमागताः (स्कन्दपुराण)

जिस प्रकार कर्ण कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में वैदिक मंत्रों का विस्मरण कर चुके थे अपने पाप कर्मों के द्वारा ठीक वही स्थिति शाहस्त्रार्जुन के साथ हुआ था परशुराम के साथ युद्ध क्षेत्र में

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वामपन्थी विचारधारा से ग्रसित देवेन्द्र सिकरवार इस कथा प्रसंग को ले कर जो घृणा फैला रहा है ब्राह्मण क्षत्रिय के मध्य 

वह शास्त्रप्रतिकुल होने से अग्राह्य है ।

देवेन्द्र सिकरवार ने अपने लेख के माध्यम से यह कहा है कि गर्भ में पल रहे शिशुओं की भी हत्या परशुराम ने किया था जबकि महाभारत में ऐसा कहीं कोई प्रमाण दिख नही पड़ता ।

शैलेन्द्र सिंह


Tuesday, 7 April 2026

विष्णु वृंदा भ्रमोछेदन भग 2

 


■-वृंदा विष्णु कथाप्रसंग

■--पुराणे ही कथा दिव्य (महाभारत आदिपर्व 5/1)

■-सुदुर्लभा कथा प्रोक्ता पुराणेषु (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

■-आख्यानं पुराणेषु सुगोप्यक्म् (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

पुराणों की कथाएँ दिव्य हैं, जिनके कारण पुराणादि में आए दिव्य कथाओं को लेकर भ्रामकता उत्पन्न होना स्वाभाविक है ।

■--अक्षरग्रहादि परमोपजायमान वाक्यार्थज्ञानार्थमध्ययानं विधीयते
तत्सस्य विचारमन्तरेणासम्भवाध्यायन विधिनैवासार्थाद्विचारो विहित इति गुरुगृह एवस्थाय विचारयितव्यों धर्म: इस न्याय से गुरुमोखोच्चारणानुच्चारण सानिध्यता न प्राप्त होना ही मूल कारण है।

विष्णु वृन्दा.कथा की दिव्यता भी इसी प्रकार की है।

वृंदा माता लक्ष्मी स्वरूपा हैं तो शङ्खचूड़ भगवान विष्णु का,
अंशांशी होने के कारण उनमें भेद दृष्टि ही मूर्खता का द्योतक है।

■--अंशांशिनोर्न भेदश्च ब्राह्मणवाह्निस्फुलिङ्गवत (ब्रह्मवैवर्त ब्रह्मखंड 17/37)

●--श्रीभगवानुवाच ।।

■- लक्ष्मी त्वं कल्याण गच्छ धर्मध्वजगृहं शुभे।।

अयोनिसम्भवा भूमौ तस्य कन्या भविष्यसि।।

■-तत्रैव दैवदोषेन वृक्षत्वं च लभिष्यसि।।

मदनस्यासुरस्यैव शङ्खचूडस्य कामिनी।। (ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृतिखंड 6/45-46)

हे शुभूति लक्ष्मी तुम अपने अंश से पृथ्वी पर धर्मध्वज के घर अयोनिज कन्या के रूप में प्रकट हो जाओ
वहाँ मेरे अंश से उतपन्न होने वाले शंखचूड़ की कामिनी  बनोगी जो दैववश तुलसी का रूप धारण करोगी

●-और यही बात श्रीमद्देवीभागवत पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी बताई गई है।

■--अहं च तुलसी गोपी गोलोकेऽहं स्थित पुरा।।

कृष्णप्रिया किङकारी च तदंशा तत्सखी प्रिया।।

■--सुदामा नाम गोपश्च श्रीकृष्णाङ्गसमुद्भवः।।

तदंशश्चातितेजस्वी चल्भज्जन्म भारते।।

संप्राप्तं राधाशापद्दनुवंशसमुद्भवः।।

शङ्खचूड़ इति तख्यस्त्रैलाक्ये न च तत्परः।।

(प्रकृतिखंड 16/24 एवं 30-31 श्रीमद्भागवत पुराण 9/17)

जिस कथा प्रसंग में व्याभिचार का गंध तक नहीं, उसी कथा के बिषय में भ्रांतवादी, वामपंथी, समाजी अपनी कुबुद्धि से भगवान विष्णु पर दोषारोपण करते हैं।

स्वयं अपनी पत्नी में ही रमाना किस दृष्टि से व्यभिचार हुआ ??

इस लिए भगवन् कहते है ।

■--जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं (गीता)

भगवान के दिव्य कर्मों को सर्वसाधारण लोगों के समझ से परे है।

इसके लिए तो शास्त्र बार बार की घोषणा की गई है

■-तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्। (मुंडकोपनिषद्) 

■-आचार्यवान् पुरुषो वेदः(छान्दोग्य उपनिषद)

शैलेन्द्र सिंह

Thursday, 26 February 2026

कठ कपिष्ठल साखा


 कठ, कपिष्ठल ,काठक ,आदि शाखाओं का मूल वेद ही है ।

शाखा शब्द अपने आप मे ही इस बिषय पर प्रमाण है 

शाखा पुष्पितपल्लवित तभी होता है जब उसका मूल कोई जड़ हो अतः जड़ की प्रधानता तो माननी होगी अन्यथा शाखा भी पुष्पितपल्लवीत न हो ।

कठ काठक कपिष्ठल आदि ऋषयो ने वेद बिषयों को विशिष्ट रूप से प्रचारित प्रसारित किया इस लिए वे वे शाखाएं उनके नाम से जुड़ी है कठ काठक कपिष्ठल  शाखा के प्रवचनकर्ता  ऋषयो को भी यह बोध था कि वेद अपौरुषेय है तभी वे वे ऋषिगण वेद विद्या को प्रचारित प्रसारित किया ।

महर्षि जैमनी इस बिषय को लेकर स्पष्ट रूप से अपने सूत्रों में दर्शा दिया है 

■-उक्तं तू शब्दपूर्वत्वम (जैमिनी सूत्र)

■-आख्या प्रवचनात् (जैमिनी सूत्र)

यहाँ पूर्व शब्द स्वयं वेदों की नित्यता का घोषणा कर देता है 

तथा 

■-वाचा विरूपनित्यता ------इस श्रुति से भी वेदों की नित्या सिद्ध है काठक आदि समाख्या तो प्रवचन से ही बनी है रचना से नही 

अतः जो यह कह रहे हो कि ये विद्या हमने दिया वह वेदों पर ही घात कर रहा है क्यो की उस विद्या का तो वेद स्पष्ट रूप प्रकाशित कर ही दिया है अतः उन विद्याओं को लोगो के मध्य पहुचाने अथवा उसका प्रकाशन करने  के कारण ऋषिगण आचार्यगण वंदनीय तो अवश्य है परन्तु तद्वत विद्याओं के कर्ता नही ।


शैलेन्द्र सिंह

Sunday, 22 December 2024

राम ने बाली को धोखे से मारा :--

 


इस प्रकार के राग अलापने वाले कम्युनिष्ट वामपन्थी बिचारधारा से ग्रसित लोगो का एक ही लक्ष्य होता है ब्यभिचारी पुरुष एवं अपराधियो का पालनपोषण कर उसे पुष्ट बनाना JNU आज इसका जीत जागता उदाहरण है ।

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त्रेतायुग में श्रीरामचन्द्र के समकालीन प्रत्यक्षघटना के जो साक्षी बने वे वे मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के बिषय में क्या कहते है  वह विचारणीय तथ्य है ।


●-महाराज दशरथ ---

■-अनुजातो हि मां सर्वैर्गुणैः श्रेष्ठो ममात्मजः (वा ०रा०बालकाण्ड)

■-तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम्।(वा०रा०बालकाण्ड )


●- अयोध्या जनपद के प्रजागण 


■-गुणान् गुणवतो देव देवकल्पस्य धीमतः।

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः।

क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः॥ 

मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः।

प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः॥ (वा०रा०बालकाण्ड)


●-मायावी मारीच 


■-रामो विग्रहवान् धर्मः (वा० रा०अरण्यकाण्ड) 


●-माता जनकननन्दिनी 

■-मर्यादानां च लोकस्य कर्ता (३५/११)


■-धर्मात्मा भुवि विश्रुतः।     कुलीनो नयशास्त्रवित् (वा०रा०युद्धकाण्ड)


●- राक्षसराज रावण 

■--तं मन्ये राघवं वीरं नारायणमनामयम्॥(युद्धकाण्ड ७२/११)

●मंदोदरी 

रामो न मानुषः (युद्धकाण्ड १११/१६)


★स्वयं बाली श्रीरामचन्द्र के बिषय में क्या कहते है यह और भी महत्वपूर्ण है


■--रामः करुणवेदी च प्रजानां च हिते रतः(किष्किंधा काण्ड १७/१७)

■--क्षत्रियकुले जातः श्रुतवान् (किष्किंधा काण्ड १७/२७)

■-त्वं राघवकुले जातो धर्मवानिति विश्रुतः।(किष्किंधा काण्ड १७/२८)

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एक न्यायप्रिय राजा वही है जो देशकाल अनुरूप वेद विद्या में निष्णात, न्यायविद्या  धर्माधर्मानुरूप प्राणियों पर अनुग्रह निग्रह करता है ऐसा श्रुतिस्मृति से सिद्ध है 


■-सोऽरज्यत ततो राजन्योऽजायत (अथर्ववेद १५/८/१)


■-दमः शमः क्षमा धर्मो धृतिः सत्यं पराक्रमः। पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥ (किष्किंधा काण्ड १७/१९)


■-तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।

यथार्हतः संप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु । ।(मनुस्मृति ७/१६)

समीक्ष्य स धृतः सम्यक्सर्वा रञ्जयति प्रजाः ।(मनुस्मृति७/१९)


■-आन्वीक्षिकीं त्रयीं वार्त्तां दण्डनीतिं च पार्थिवः ।

तद्विद्यैस्तत्‌क्रियोपैतैश्चिन्तयेद्विनयान्वितः 

■-आन्वीक्षिक्यार्थविज्ञानं धर्म्माधर्मौ त्रयीस्थितौ ।

अर्थानर्थौ तु वार्त्तायां दण्डनीत्यां नयानयौ ।।(अग्निपुराण २३८./८-९ )


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त्रेतायुग श्रीरामचन्द्र के समकालीनआचार्यगण,भूपति,प्रजागण असुरगण वानरादि प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा यह  सिद्ध होता है कि  श्रीरामचन्द्र  साक्षात धर्म स्वरूप, नीतिवान ,वेद विशारद, सर्वगुणसम्पन्न, देवताओ की भांति बुद्धि रखने वाला, धर्मात्मा न्यायशास्त्र का ज्ञाता गुणदोषानुरूप अनुग्रगन निग्रह करनेवाला समस्त प्रजाओ के हित करने वाला दयावान  स्वयं नारायण स्वरूप है 

इसके विपरीत 

अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रान्तवादी वामपंथिय तथाकथित हिन्दू जो उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी नही थे / है , वे आज तद्वत बिषयों को लेकर मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र पर दोषारोपण कर रहे है ।

की बाली को धोखे से मारा ।।

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अस्तु मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के शाशनकाल में बाली दुराचारी ब्यभिचारी  अपराधी  पुरुष था ,  भगवान राम को बाली के पाप का दण्ड देना था उससे युद्ध करना नही बाली अपराधी था प्रतिद्वंदी नही दण्ड विधान और युद्ध धर्म दोनों में भेद है छिप कर मारना युद्ध में अधर्म है पर दण्ड बिधान के लिए नही युद्ध धर्म में तो निशस्त्र को मारना अधर्म है पर दण्ड देते समय इसका कोई मूल्य नही यदि राजा अपने राज्य के अपराधी को बिना अस्त्र दिए मरवा दे तो क्या कहा जायेगा ?

राजा ने धोखे से मरवा दिया ? 

बाली का जो अपराध था वह अति निंदनीय और समाज मे ब्यभिचार उतपन्न करने वाला था इस लिए श्रीरामचन्द्र ने उनको इस अतिनिन्दनीय कर्म  का दण्ड शास्त्रानुकूल ही दिया ।।


विद्वान राजा धर्म से भ्रष्ट हुए पुरुषों को दण्ड देता है और धर्मात्मा पुरुष का धर्मपूर्वक पालन करते हुए कामासक्त स्वेच्छाचारी पुरुषों के निग्रह में तत्पर रहते है ।

धर्म और काम तत्व को जानने वाले दुष्टों पर निग्रह और साधु पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिए तत्पर रहते है ।


■-गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन्

 भरतः कामयुक्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः।। (वा०रा०४/१८/२४)


■-धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रतः॥(वा०रा०४/१८/७)


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श्रीरामचन्द्र के बाणों से बिंध जाने के पश्चात बाली श्रीरामचन्द्र से यह पूछता है कि 

हे राम आप ने यहाँ मेरा वध करके कौन सा गुण प्राप्त किया किस महान यश का उपार्जन किया ? 


■-कोऽत्र प्राप्तस्त्वया गुणः। यदहं युद्धसंरब्धस्त्वत्कृते निधनं गतः॥(किष्किंधा काण्ड १७/१६)


बाली के प्रश्नों को सुनकर मर्यादापुरुषोत्तम बाली के गुणदोषों को दर्शाते हैं ।


■--त्वं तु संक्लिष्टधर्मश्च कर्मणा च विगर्हितः।(वा०रा०४/१८/१२)

तदेतत् कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः। भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्॥

अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः। रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत्॥  तद् व्यतीतस्य ते धर्मात् कामवृत्तस्य वानर। भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन् दण्डोऽयं प्रतिपादितः॥

नहि लोकविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः। दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप॥  (वा०रा०४/१८/-१८१९-२०-२१)


बाली तुम्हारा कर्म सदा ही धर्म मे बाधा पहुँचानेवाला रहा तुम्हारे बुरे कर्म के कारण सत्पुरुषों में निन्दा का पात्र हुआ ।

बाली मैंने तुम्हें क्यो मारा इसका कारण सुनो और समझो तुम सनातन धर्म का त्याग करके अपने छोटे भाई की स्त्री से सहवास करते हो इस महामना सुग्रीव के जीते जी इसकी पत्नी रूमा का जो तुम्हारी पुत्रवधु के समान है कामवस उपभोग करते हो इस लिए तुम पापाचारी हो इस तरह तुम धर्मभ्रष्ट हो स्वेच्छाचारी हो गए हो और अपने छोटे भाई की स्त्री को गले लगाते हो तुम्हारे इसी अपराध के कारण तुम्हे दण्ड दिया गया ।जो लोकाचार से भ्रष्ट हो लोकविरुद्ध आचरण करता हो उसे रोकने और रास्ते पर लाने के लिए मैं दण्ड के सिवाय और कोई राह नही देखता ।


■-औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः॥ 

 प्रचरेत नरः कामात् तस्य दण्डो वधः स्मृतः (वा०रा०४/१८/२२)


जो पुरुष अपनी कन्या बहन अथवा छोटे भाई के स्त्री के पास काम भावना से जाता है उसका वध करने ही उपयुक्त दण्ड माना गया है ।


●बाली दुराचारी ब्यभिचारी पाप कर्मों में सदा लिप्त  रहता था ऐसा 


बुद्धि के आठो अंगों से अलंकृत हनुमान कहता है कि बाली 

क्रूरकर्मा निर्दयी पापाचारी है 


■-तं क्रूरदर्शनं क्रूरं नेह पश्यामि वालिनम्॥  (कि०काण्ड २/१५)

पापकर्मणः (कि०काण्ड२/१६)

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दण्ड के यथोचित उपयोग प्रयोग से लोक में सत्य की प्रतिष्ठा होती है सत्य की प्रतिष्ठा से धर्म का उत्कर्ष होता है ।

लौकिक और वैदिक मर्यादाओं के संरक्षक तथा वर्णसंकर्ता एवं कर्मसंकर्ता के निरोधक मात्स्यन्यायका अवरोधक उपवीत सुशिक्षित अभिसिक्त अराजको के दमन तथा सज्जनों के संरक्षण में दक्ष विनयी शाशक ही राजा मान्य है ।


शैलेन्द्र सिंह

Friday, 28 June 2024

बालविवाह

 ■-- बालविवाह


सनातन वैदिक धर्म मे ऐसा कोई भी कुप्रथा नही जो सम्पूर्ण भूतसमुदाय के लिए अपकल्याणकारक  हो सनातन धर्म में तो मनुष्य ,पशु,पक्षी,पिपीलिका बृक्षलता आदी तक मे उसी परमेश्वर की कल्पना करने का जो आदेश दिया है वह विश्व के किसी और धर्मशास्त्रों के दृष्टिगोचर नही होता ।


■-सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छान्दोग्य उपनिषद)

■-सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो (गीता)


जिस संस्कृति में समस्त भुसमुदाय में ईश्वर की कल्पना की गई हो वह संस्कृति कैसे किसी मानवी हितों के लिए अपकल्याणकारक हो सकता है 

सनातन धर्म से इतर अन्य मत मजहब पन्थ रिलीजन में आये हुए कुरीतियों को अध्यरोपित सनातन धर्म मे नही किया जा सकता


बालविवाह के नाम पर सनातन धर्म के प्रति वामपन्थियों ,सेक्युलरवादियों, मिशनिरिज द्वारा जो मिथ्या प्रचार प्रसार किया गया वह अप्रमाणिक होने के कारण अग्राह्य है ।।


सनातन संस्कृति व संस्कार  ईश्वरमूला होने से सद्मूला है, चिद्मूला है, आनन्दमूला है,


संस्कार का अर्थ है सजाना-संवारना, पूर्णता प्रदान करना।  इसके लिए उसके अन्दर दिव्य गुणों का आधान किया जाता है। 

 इसमें मुख्य 16 संस्कार हैं जिसके द्वारा मानव के मूल दिव्य, परिपूर्ण स्वरूप को प्रकट करने की चेष्टा की जाती है इन 16 संस्कारों में एक संस्कार है पाणिग्रहण का है पाणिग्रहण संस्कार को लेकर सनातन धर्म शास्त्र क्या है यह जानना भी आवश्यक है जिन्हें तद्वत बिषयों का ज्ञान नही वे ही सनातनधर्म संस्कारो पर घात किया करते है ।।


श्रुति कहता है कि मनु ने जो कहा वह भैषज (औषधि) है  और भैषज होने से समस्त मानवजाति के लिए ग्राह्य है 

■-यद् वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम् | ( तैत्तिरीय सं०२/२/१०/२) 

■-मनु र्वै यत् किञ्चावदत् तत् भेषज्यायै | (- ताण्ड्य-महाब्रा०२३/१६/१७)


तो महर्षि मनु ने पाणिग्रहण संस्कार के बिषय में क्या कहा ?


■--त्रिणि वर्षाण्युदिक्षेत कुमार्यार्तुमति सती |

ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देता सदृशं पतिम् ||(मनुस्मृति  ९/९० )

ऋतुमती होने के तीन वर्ष तक प्रतीक्षा करें उसके पश्चात समान योग्य वर को वरण करें ठीक यही कथन महर्षि मनु  श्लोक संख्या ९३ में भी कहता है कि जब कन्या ऋतुमती हो जाय तभी उसका वरण करना चाहिए ।।

#कन्यां_ऋतुमतीं_हरन् (९/९३)और यदि न किया तो पाप के भागी होंगे  


महर्षि मनुप्रोक्त इस बिधान की पुष्टि बौधायन धर्मसूत्र वशिष्ठधर्म संहिता एवं महाभारत भी करता है 


■-त्रीणि वर्षाण्य् ऋतुमतीं यः कन्यां न प्रयच्छति ।(बौधायन धर्मसूत्र ४/१/१२)

■-कुमार्य्यृतुमती त्रिवर्षाण्युपासीतोर्द्धं (वशिष्ठ संहिता )


■-त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कन्या ऋतुमती सती (महाभारत अनुशासन पर्व ४४/१६)


जिन बिषयों पर समस्त धर्माचार्य का मतैक्य  हो उस बिषय की प्रमाणिकता पर सन्देह कहाँ ?


सनातंधर्मसंस्कृति आर्यावर्त देशीय होने के कारण यह आचरण सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए मानवहितों को देखते हुए कल्याणकारी है क्यो की भारत मे एक कन्या का ऋतुगमन (पीरियड्स) 13 वर्ष के पश्चात ही देखा जाता है ऋतुगमन होने के तीन वर्ष पश्चात ही सनातनधर्म शास्त्रों ने विवाह का आदेश दिया है 13+3 अर्थात 16 वर्ष तक कि आयु सनातन धर्मशास्त्र निश्चित करता है 

बाल विवाह को लेकर सनातन धर्म शास्त्र में एक भी प्रमाण दृष्टिगोचर नही होता ।


शैलेन्द्र सिंह

Friday, 31 May 2024

- भगवन् विष्णु और वृंदा कथा भ्रमोच्छेदन ।।



■--पुराणे ही कथा दिव्या (महाभारत आदिपर्व ५/१)


पुराणों की कथाएं दिव्य है अतः परम्पराप्राप्त आचार्यो  की सानिध्यता न प्राप्त होने   के कारण पुराणादि में आये हुए दिव्य कथाओं  को लेकर भ्रम उतपन्न होना स्वाभाविक है क्यो की पुराणों की जो दिव्यता है वह सर्वसाधारण नही जिस कारण अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रान्तवादियो का मत इन दिव्य कथाओं को लेकर भ्रमित रहता है क्यो की 

■--अक्षरग्रहणादि परम्परोपजायमान वाक्यार्थज्ञानार्थमध्ययनं विधीयते

ततस्तस्य विचारमन्तरेणाSसम्भवाध्ययनविधिनैवाSर्थाद्विचारो विहित इति गुरुगृह एवावस्थाय विचारयितव्यों धर्म: इस न्याय से गुरुमोखोच्चारणानुच्चारण सानिध्यता न प्राप्त होना ही कारण है ।


अब आते है विष्णु वृंदा कथा प्रसङ्ग पर 

इस प्रसङ्ग के दो भेद है 

■--प्रथम स्वयं वृंदा ने श्रीकृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया था जिसका फल उन्हें मिला 

■--द्वितीय :-- शङ्खचुड़ के आतंक से त्रस्त हो कर एवं माता पार्वती के पतिव्रत धर्म को नष्ट करने के कारण अवध्य शङ्खचुड़ (जलन्धर) का वध हुआ 

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प्रथम प्रसङ्ग :-- 


वृंदा कौन ? थी यह जानना भी अत्यंत आवश्यक है जितना कि आवश्यक यह बिषय 

वृंदा पूर्वजन्म में तुलसी नामक गोपिका थी जो स्वयं श्रीकृष्ण की अनुचरी उनकी अंशस्वरूपा थी 

अहं तु तुलसी गोपी गोलोकेऽहं स्थिता पुरा ॥ 

■-कृष्णप्रिया किंकरी च तदंशा तत्सखी प्रिया ।(श्रीमद् देवी भागवतम् ९/१७)

राधा की  अंशस्वरूवा होने के कारण वृंदा का श्रीकृष्ण के प्रति  विशेष अनुराग उतपन्न होना स्वभाविक था इस लिए वृंदा मन ही मन श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने की इच्छा करती थी और  श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने की इच्छा से कठिन तप भी किया था 


■-सर्वैर्निषिद्धा तपसे जगाम बदरीवनम् ।

तत्र देवाब्दलक्षं च चकार परमं तपः ॥ 

मनसा नारायणः स्वामी भवितेति च निश्चिता ।(श्रीमद् देवी भागवतम् ९/१७/१३-१४-१५)

वृंदा की यह मनोदशा को देख कर रास की अधिष्ठात्री देवी राधिका ने तुलसी (वृंदा) को शाप देती है कि तू मानव योनि को प्राप्त हो उसके पश्चात  श्रीकृष्ण ने तुलसी(वृंदा ) से कहा की हे तुलसी (वृंदा) तू भारतवर्ष में जन्म लेकर घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी के वरदान से मेरे अंशस्वरूप चतुर्भुज विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करोगी ।

तुलसी(वृंदा) दूसरे जन्म में घोर तप के बल से ब्रह्मा को प्रसन्न करता है

और उनसे वर मांगता है ।

■--अहं नारायणं कान्तं शान्तं सुन्दरविग्रहम् ॥ 

■-साम्प्रतं तं पतिं लब्धुं वरये त्वं च देहि मे (श्रीमद् देवी भागवतम् ९/१७/२७ एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खण्ड १५/२८)

■-मदंशं त्वं चतुर्भुजम् ।।
लभिष्यसि तपस्तप्त्वा भारते ब्रह्मणो वरात् (ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खण्ड १५/२७)

ब्रह्मा जी वृंदा की मनोदशा जान कर  वरदान देता है कि इस जन्म में सुदामा (शङ्ख चुड़) की पत्नी बनोगी और बाद में शांतस्वरूप नारायण को पति रूप में वरण करोगी 


■-अधुना तस्य पत्‍नी त्वं सम्भविष्यसि शोभने ॥ 

पश्चान्नारायणं शान्तं कान्तमेव वरिष्यसि । (देवी भागवतम् ९/१७)

■-नारायणं तं सर्वेशं कान्तं प्राप्स्यसि निश्चितम् ।।
तपः कृतं यदर्थे च पुरा बदरिकाश्रमे ।। (ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृतिखण्ड १७/७१)


अतः यह दोषारोपण करना ही व्यर्थ है कि विष्णु ने वृंदा के साथ अनाचार किया अस्तु स्वयं वृंदा ही विष्णु को पतिरूप में पाने की इच्छा से घोर तप किया था जिसका फल भी वृंदा को प्राप्त हुआ उस पर भी भगवन् विष्णु अपने मायाशक्ति के बल से ही वृंदा में अपने तेज का आधान किया था यहाँ माया शब्द से पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर का कल्पना करना ही व्यर्थ है । 


■-तपस्त्वया कृतं साध्वि मदर्थे भारते चिरम् ।।
त्वदर्थे शङ्खचूडश्च चकार सुचिरं तपः ।। 
■-कृत्वा त्वां कामिनीं कामी विजहार च तत्फलात् ।।
अधुना दातुमुचितं तवैव तपसः फलम् ।।(ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृतिखण्ड २१/२९-३०)

■-गत्वा तस्यां मायया च वीर्याधानं चकार ह (श्रीमद् देवी भागवतम् ९/२३/१२)


श्रीहरि: के श्रीमुख से निकल हुआ यह वचन से यह प्रमाणित हो जाता है कि जो जो भक्त जिस जिस स्वरूप में भगवन् का चिन्तन करते है भगवन् उस उस रूप में उसको प्राप्त होता है 

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता)


अतः वृंदा ने जिस रूप में भगवन् का स्मरण कर तपस्या की थी वह फलीभूत हुई वृंदा का भगवन् विष्णु को पतिरूप में संकल्पना ही शङ्खचुड़ (जलन्धर) के वध का कारण बना ।


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दूसरा प्रसङ्ग :--


दैत्यराज शङ्खचुड़ देवताओं के साथ जो अन्याय किया उसका बखान दैत्यराज शङ्खचुड़ (जलन्धर)स्वयं अपने ही मुख से कहता है ।


■-अहमेव शङ्‌खचूडो देवविद्रावकारकः (श्रीमद्देवी भागवतम् ९/१८/६८)


★-देवताओं को संत्रस्त करनेवाला मैं ही शङ्खचुड़ हूँ । 


शङ्खचुड़ ने केवल देवताओं को संतप्त ही नही किया अपितु उनके अधिकार छीन कर उन्हें उनके राज्य से निष्कासित कर दर दर भिक्षुओं की भांति ठोकरे खाने के लिए मजबूर किया 


■-देवानामसुराणां च दानवानां च सन्ततम् ॥ 

गन्धर्वाणां किन्नराणां राक्षसानां च शान्तिदः ।

हृताधिकारा देवाश्च चरन्ति भिक्षुका यथा ॥ 

। (श्रीमद्देवी भागवतम् ९/१९/४४)


■-दैत्यराजेन तेनातिहन्यमानास्समंततः ।।

धैर्यं त्यक्त्वा पलायंत दिशो दश सवासवाः ।।(शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड )

दैत्यायुधैः समाविद्धदेहा देवास्सवासवाः ।।

■-रणाद्विदुद्रुवुस्सर्वे भयव्याकुलमानसाः ।।

पलायनपरान्दृष्ट्वा हृषीकेशस्सुरानथ ।। (शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड १७/१-२-)


★-इस भयवाह व्यकुलता से संतप्त हो समस्त देवगण कभी ब्रह्मा के सरण में जाते है तो कभी विष्णु के सरण में तो कभी शिव के सरण में ।

■-ते सर्वेऽतिविषण्णाश्च प्रजग्मुर्ब्रह्मणः सभाम् । (श्रीमद्देवी भागवतम् ९/१९/४४)

वैकुंठं प्रययुस्सर्वे पुरस्कृत्य प्रजापतिम् ।।

■-तुष्टुवुस्ते सुरा नत्वा सप्रजापतयोऽखिलाः ।।(शिवपुराण रुद्र०युद्ध० १६/२)

तस्योद्योगं तथा दृष्ट्वा गीर्वाणास्ते सवासवाः ।।

■-अलक्षितास्तदा जग्मुः कैलासं शंकरालयम् ।। (शिवपुराण रुद्र०युद्ध० २०/१४)


देवताओं के इस दीनता को को देख भगवन् शिव अपना दूत पुष्पदन्त को शङ्खचुड़ के पास भेजता है और विनम्रता से देवताओं के राज्य एवं उनका अधिकार वापस करने के लिए कहता है 


■-राज्यं देहि च देवानामधिकारं च साम्प्रतम् ॥ (श्रीमद्देवी भागवतम् ९/२०/२४ ॥)

★-भगवन् शङ्कर के दूत पुष्पदन्त ने शङ्खचुड़ से कहा कि 

देवताओं के राज्य तथा अधिकार उन्हें लौटा दो ।


■-देहि राज्यं च देवानां मत्प्रीतिं रक्ष भूमिप ।

सुखं स्वराज्ये त्वं तिष्ठ देवास्तिष्ठन्तु वै पदे ॥ 

॥(श्रीमद्देवी भागवतम् ९/२१/- ४२ )


हे राजन तुम देवताओं के राज्य वापस कर दो और मेरी प्रीति की रक्षा करो तुम अपने राज्य में सुख पूर्वक रहो और देवता अपने स्थान पर रहे प्राणियों में परस्पर विरोध नही होना चाहिए ।

यहाँ भगवन् शिव की विनम्रता।तो देखिए कि भगवन् शिव शङ्खचुड़ को उसके दुष्कृत्यो को सहन कर दैत्यराज के सामने विनम्र प्रार्थना कर रहे है कि देवताओं के राज्य एवं उनके अधिकार को वापस कर दो  परन्तु दैत्यराज तो दैत्यराज है अपने अहंकार मद में चूर कहाँ किसी की सुनने वाले दैत्यराज के मना करने पर भगवन् शिव और दैत्यराज शङ्खचुड़ के साथ घोर संग्राम हुआ जहाँ शङ्खचुड़ अजेय रहे उनके अजेय रहने का मुख्य कारण वृंदा का पतिव्रतधर्म का प्रभाव ही रहा जिस कारण वह अजेय बना रहा । और उसी रक्षा आवरण के बल पर देवताओं को संतप्त करता रहा ।


●- पतिव्रत धर्म के बिषय में 

माता पार्वती कहती है कि पतिव्रत धर्म से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नही 


■-पातिव्रतसमो नान्यो धर्मोऽस्ति पृथिवीतले  (शिवमहापुराण रुद्र०युद्ध० २२/५२)


इसी पतिव्रत धर्म के प्रभाव के कारण माता सीता रावण को भस्मीभूत करने के लिए सावधान करता है इसी पतिव्रता धर्म के बल पर माता सीता के कहने पर अग्नि अपने उग्र प्रभाव को न दिखा कर  हनुमान को शीतलता का अनुभव करता है ।


यहाँ तक तो सब ठीक था दैत्यराज द्वारा देवताओं के अधिकार छीन लेने के पश्चात भी  कल्याणकारी शङ्कर शांतचित्त रह शंखचूड़ को देवताओं के अधिकार वापस करने के लिए विनम्रता भी करता है 

परन्तु जब शङ्खचुड़ ने माता पार्वती पर कुदृष्टि डाली और उनका पतिव्रत धर्म नष्ट करने को उद्धत हुआ तब शङ्कर प्रलयंकर बन कर उभरा और विष्णु की सहायता से शङ्खचुड़ का वध किया यदि भगवन् विष्णु ने इस मार्ग को न अपनाता तो न जाने कितने ही स्त्रियों पर अपनी कुदृष्टिडाल उनका पतिव्रत धर्म नष्ट किया होता ।


जलांधर भगवती का रूपस्मरण कर काम ज्वर से पीड़ित हो मोहित हुआ 


■-तद्रूपश्रवणादासीदनंगज्वरपीडितः ।।(शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड १९/२)

 

शङ्खचुड़ ने  अपने दूत से कहा कि कैलाशपर्वत पर जाओ और शङ्कर से कहो ।

इस भुवन के भूपति स्वामी जब विद्यमान है तो तुम्हे स्त्रिरत्न जाया को हमे दे दो क्यो की रत्नभोगी हम है त्रिलोकी में जितने रत्न है वह सब मेरे यहाँ विद्यमान है चर अचर सब जगत् को तुम मेरे अधीन जानो 

इस लिए हे जटाधारी तुम अपनी स्त्री रत्न को मेरे निमित प्रदान करो ।


■-मन्नाथे भुवने योगिन्नोचिता गतिरीदृशी ।।

जायारत्नमतस्त्वं मे देहि रत्नभुजे निजम् ।।

यानियानि सुरत्नानि त्रैलोक्ये तानि संति मे ।।

मदधीनं जगत्सर्वं विद्धि त्वं सचराचरम् ।। (शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड १९/९-१०)

■-एवं योगीन्द्र रत्नानि सर्वाणि विलसंति मे ।।(शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड १९/१५)


जलन्धर कामवेग से तप्त हो कर वह अपनी मायाशक्ति के बल से दशभुजा तीन नेत्र जटाधारी रूप धारण कर महाबृषभ पर चढ़ कर साक्षात् रुद्र रूप में माता पार्वती के समक्ष उपस्थित हुआ ।


■-कामतस्स जगामाशु यत्र गौरी स्थिताऽभवत्।। ३७

दशदोर्दण्डपंचास्यस्त्रिनेत्रश्च जटाधरः ।।३८।।

महावृषभमारूढस्सर्वथा रुद्रसंनिभः ।।

■-आसुर्य्या मायया व्यास स बभूव जलंधरः । (शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड २२/३७-३८-३९)


माता पार्वती को जब जलन्धर के इस दुष्कृत्यों का बोध हुआ तो वे भगवन् विष्णु को मन से स्मरण किया और विष्णु को अपने समीप पाया भगवन् विष्णु माता पार्वती से कहते है कि हे माते मुझे आप की कृपा से जलांधर का दुष्कृत्य का बोध हुआ आप आज्ञा दे मुझे क्या करना है 

 माता पार्वती कहती है  जलांधर ने मेरा पतिधर्म नष्ट करने का दुष्कृत्य किया है जलन्धर ने जिस मार्ग को खोल दिया है उसी का अनुसरण उचित है मेरी आज्ञा से उसका पतिव्रत धर्म नष्ट करो इसमें अब दोष न होगा अन्यथा वह दैत्य मारा न जाएगा ।


■-हृषीकेशं जगन्माता धर्मनीतिं सुशिक्षयन् ।। 

पार्वत्युवाच ।।

तेनैव दर्शितः पन्था बुध्यस्व त्वं तथैव हि ।।

तत्स्त्रीपातिव्रतं धर्मं भ्रष्टं कुरु मदाज्ञया ।।

■-नान्यथा स महादैत्यो भवेद्वध्यो रमेश्वर।। (शिवपुराण रुद्र० युद्ध० २२/४९-५०-५१)


जगन्माता पार्वती धर्मनीति सिखाती हुई विष्णु से बोली जो मार्ग दैत्य ने खोल दिये है उसी मार्ग का अनुकरण करो और वृंदा का पतिव्रत धर्म नष्ट करो इसमें कोई दोष नही  तभी यह दैत्यराज का वध होगा भगवन् विष्णु के सहयोग से ही भगवन् शङ्कर जलांधर के वध करने में सफल हुए ।


●-(विशेष- यहाँ प्रथम प्रसङ्ग के कथाओं को स्मरण कर लेना भी आवश्यक है वृंदा ने स्वयं विष्णु को पति रूप में पाने के लिए कामना की थी और उसके लिए घोर तपस्चर्या भी किया था और वृंदा की कामना ही इस हेतु का कारण बना )


माता पार्वती की यह धर्मनीति भी श्रुतिस्मृति से प्रमाणित है 


■--यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः (तैत्तरीय उपनिषद) 

■--यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्य: स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः ।

मायाचारो मायया वर्तितव्य; साध्वाचार साधुना प्रत्युदय (महाभारत उद्योग पर्व)


इस श्रुतिस्मृति न्याय से सिद्ध है कि जो जैसा आचरण करता है उनके साथ वैसा ही आचरण न्यायिक है ।  


शैलेन्द्र सिंह

Thursday, 22 February 2024

माता सीता और श्रीरामचन्द्र विवाह शंका समाधान



धर्मद्रोही वामपन्थी पँचमक्कार गैंग माता सीता की आयु पर प्रश्नचिन्ह तो खड़ा करते है परन्तु श्रीरामचन्द्र के आयु बिषय पर मौन हो जाते है इसे ही अर्धकुकूट न्याय कहा जाता है 

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अरण्यकाण्ड का का वह प्रसङ्ग जिस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जाता है ।


■●-उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने। भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥ तत्र त्रयोदशे वर्षे राजाऽमन्त्रयत प्रभुः। अभिषेचयितुं रामं समेतो राजमन्त्रिभिः (वा०रा०अरण्यकाण्ड ४७/४-५)

■●-मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः॥ 

 अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।( वा०रा०अरण्यकाण्ड ४७/१०)

विवाह के पश्चात  बारह वर्षों तक इक्क्षवाकु वंशी महाराज दशरथ के महल में रह कर मैंने अपने पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे  मैं वहाँ सदा मनोवांच्छित सुख सुविधाओं से सम्पन्न रही हूं ।

वनगमन के समय मेरे महातेजस्वी पति की आयु पच्चीस वर्ष की थी और उस समय मेरा जन्मकाल से लेकर वनगमन काल तक मेरी अवस्था वर्षगड़ना के अनुसार अठारह वर्ष की थी  !


■-- इन प्रसङ्गो से स्पष्ट प्रमाणित होता है कि जनकनन्दिनी का जब विवाह हुआ था तब उनकी आयु मात्र 6 वर्ष रही थी ।

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अब आते है जनकनन्दिनी माता सीता और मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र की विवाह सम्बन्धी विषयो पर ।

★-महर्षि विश्वामित्र सिद्धियां प्राप्त करने हेतु  यज्ञ का सम्पादन कर रहे थे और उस  यज्ञ को असुरों से रक्षण के लिए  महाराज दशरथ के राजमहल में गए और  श्रीरामचन्द्र को अपने साथ ले जाने को उद्धत हुए उस समय श्रीरामचन्द्र की आयु क्या थी यह महाराज दशरथ अपने श्रीमुख से कहते है ।


●- हे महर्षे मेरा यह कमलनयन श्रीरामचन्द्र  अभी पूरे १६ वर्ष का भी नही हुआ मैं इनमें राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता भी नही देखता अतः आप मुझे ले चलिए एक बालक को नही 


■●-ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः ।

बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम् । (वा०रा० १/२०/२ & ७)


यहाँ महाराज दशरथ श्रीरामचन्द्र के आयु पर संकेत मात्र करते है कि श्रीरामचन्द्र अभी किशोरोवस्था तक भी नही पंहुचा है ।

तो प्रश्न उठता है कि श्रीरामचन्द्र की आयु क्या थी जब उनका माता जानकी के साथ जब विवाह हुआ था ।

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माता जानकी युद्धकाण्ड में कहती है कि 


■●--बालां बालेन सम्प्राप्तां भार्यां मां सहचारिणीम्॥(युद्धकाण्ड ३२/ २०


आप बाल्यकाल में ही मुझे पत्नी रूप में प्राप्त किया था तब मेरी भी अवस्था बाल्य रूप ही था ।


अतः जब माता जानकी का मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के साथ पाणिग्रहण संस्कार हुआ था तब दोनों ही बालक बालिका थे ।

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●-मारीच श्रीरामचन्द्र से रावण के बिषय में कहते है ।


■-- श्रीरामचन्द्र जी जब विश्वामित्र के यज्ञ सिद्धि हेतु उनके यज्ञो की रक्षा हेतु धनुषबाण लिए खड़े थे उस समय श्रीरामचन्द्र के जवानी के लक्षण (चिन्ह) प्रकट नही हुए थे वे शोभाशाली बालक के रूप में दिखाई देते थे उस समय श्रीरामचन्द्र का उदीप्त तेज उस दण्डकारण्य की शोभा बढ़ाते हुए नवोदित बालचंद्र के समान दिख पड़ते थे ।


■●--अजातव्यञ्जनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः (अरण्यकाण्ड )

■●-- रामो बालचन्द्र इवोदितः॥ (अरण्यकाण्ड ३८/१४-१५)

■●--बालोऽयमिति राघवम्। (अरण्यकाण्ड  ३८/१८)


यहाँ मारीच स्पष्ट रूप से कह रहे है कि जब दण्डकारण्य में श्रीरामचन्द्र विश्वामित्र के कार्यसिद्धि हेतु धनुषबाण लिए खड़े थे तब उनकी अवस्था नवोदितबालचन्द्र के सामान था ।

ठीक इसी अध्य्याय के श्लोक संख्या ६ में तो श्रीरामचन्द्र जी के स्पष्टरूप से  आयु का ही व्याखान किया है 


■●--ऊनद्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघवः॥ (अरण्यकाण्ड ३८/६)


मारीच :-- रघुकुलनंदन श्रीराम की आयु अभी बारह वर्ष से भी कम है 


अब यहाँ यह तो यह सिद्ध हो गया कि जब जनकनन्दिनी जानकी के साथ श्रीरामचन्द्र के साथ पाणिग्रहण संस्कार हुआ था तब श्रीरामचन्द्र की  आयु १२ वर्ष से भी कम था ।


इस बिषय की सिद्धि अरण्यकाण्ड के उस प्रसङ्ग से भी प्रमाणित हो जाता है जहाँ माता जानकी कहती है विवाह के पश्चात १२ वर्षो तक महाराज दसरथ के महल में समस्त मानवोचित भोग भोगे और तेरहवे वर्ष में महाराज दशरथ ने श्रीरामचन्द्र का राज्यभिषेख करने का निर्णय लिया  यहाँ १२+१३ का योग करें तो २५ वर्ष का योग निकलता है जब श्रीरामचन्द्र का दण्डकारण्य मिला था ।


और माता सीता भी ठीक यही बात कह रही है कि 


■●-मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः(अरण्यकाण्ड ४७/१०)


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■--विशेष

उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने 

 भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी(अरण्यकाण्ड४७/४-५)


अरण्यकाण्ड के इस श्लोक को लेकर वामपंथियों के पेट मे।सबसे ज्यादा दर्द उठता है अस्तु उनके कुमातो का खण्डन 


■●--बालां बालेन सम्प्राप्तां भार्यां (युद्धकाण्ड)


■●--अजातव्यञ्जनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः (अरण्यकाण्ड)


■●--बालोऽयमिति राघवम्। (अरण्यकाण्ड  )


श्लोक से हो जाता है   बालक ,बालिकाओं में कामदेव की जागृति किशोरोवस्था के पश्चात ही होता है ।

अस्तु बालक बालिकाओं में काम वासना ढूढ़ना मूर्खता नही तो और क्या है ?  बिचार करे ।


#भुञ्जाना_मानुषान्_भोगान्_सर्वकामसमृद्धिनी  


से वही अर्थ ग्राह्य है जो समयानुकूल हो एक बालक ,बालिका को बाल्यकाल में क्या चाहिए ?? 

 बालक बालिका खिलौने गुड्डे गुड़िया ,पाकर ही स्वयं को धन्य समझने लगते है इस लिए तो यहाँ माता जानकी कहती है


 #भुञ्जाना_मानुषान्_भोगान्_सर्वकामसमृद्धिनी 


लेकिन वामपंथियों को क्या कहे नाम ही है वाम ,पन्थ अर्थात उल्टे रास्ते चलने वाला तो यहाँ भी वामपन्थी उल्टा अर्थ ही ग्रहण करता है 


एक बालक बालिका में सख्य सखा भाव का सम्बंध होता है काम पिपासा का नही जहाँ काम का वेग ही नही वहाँ काम का बिकार उतपन्न कैसे हो ??

उसका भी तो हेतु चाहिए न कि केवल मात्र दोषारोपण से ही बिषयों की सिद्धि हो जाय ??

यदि दोषारोपण मात्र से ही बिषयों की सिद्धि हो जाय तब तो न्यायिक व्यवस्था में ही दोष उतपन्न हो जाय जिसका परिहार सम्भव ही नही ।


इस लिए श्रुतिस्मृति का घोषवाक्य है ।


■●-आचार्यवान् पुरुषो  वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)


■●--तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्  (मुंडकोपनिषद् ) 

■●-तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः (गीता)


वामपंथियों द्वारा उठाये गए प्रश्नों से विचलित न हो परम्पराप्राप्त आचार्यो के सानिध्य ग्रहण करें ।


उल्टे राह चलने वाले वामपन्थी आप को उल्टा मार्ग ही बतलायेंगे ।

आचार्यो के सानिध्य न प्राप्त होना एवं स्वाध्यायआदि अल्पता के कारण लोगो मे तद्वत बिषयों को लेकर भ्रम उतपन्न होना स्वाभाविक है ।


शैलेन्द्र सिंह

Monday, 12 February 2024

गौतम बुद्ध के गृहत्याग का सच भाग --२

 


सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध ) के बिषय में गृहत्याग की जो कथाएं प्रचलित है वह बौद्ध भिक्षु अश्वघोष कृत बुद्ध चरित्र से है अश्वघोष प्रथम शताब्दी के अंत एवं द्वितीय शताब्दी के आरंभ में हुए थे ऐसा माना जाता है 


 अश्वघोष ने अपनी  बुद्ध चरित्र की  रचना महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण ,का अनुकरण कर किया रामोपख्यान का  इंडोनेशिया ,थाईलैंड,मोरिशश ,म्यंमार,सहित समस्त एशियाई देशों में गहरा प्रभाव रहा है भारत मे तो श्रीराम भारतीयों के रोम रोम में बसते है जिस कारण अश्वघोष भी इससे अछूता न रहा ,

इसी प्रभाव के कारण ही अश्वघोष ने बुद्ध चरित्र में , रामोपाख्यान  का  अनुकरण किया ताकि भविष्य में बुद्ध की भी प्रसिद्धि श्रीरामचन्द्र की भांति ख्यापित किया जा सके  सिद्धार्थ गौतम को श्रीरामचन्द्र की भांति ख्यापित करने के पीछे अश्वघोष की उत्कट अभिलाषा ही सिद्धार्थ गौतम के मूल इतिहास को मिटा डाला और एक काल्पनिक गाथा रच डाला जो कालक्रम के प्रवाह में सत्य की भांति ख्यापित भी हुआ ।

बुद्ध के गृहत्याग बिषय पर मैं सदा से संसयशील रहा हूँ हो सकता है आप सब मेरे बिचारो से सहमत न हो परन्तु तद्गत बिषयों को लेकर मन्थन अवश्य किया जा सकता है ।


सिद्धार्थ गौतम के गृहत्याग के बिषय में जो कथाएं प्रचलित है मुझे वे निराधार लगते है ।

जरा जन्म मरण जैसे बिषयों के लेकर द्रवित हो गृह का त्याग कर तपस्या के लिए चल पड़े और निर्वाण को प्राप्त हुए ।

सिद्धार्थ गौतम के जीवनी पर लिखी गयी सबसे प्राचिन पुस्तक बुद्ध चरित्र है जो लगभग प्रथम शताब्दी में बौद्ध भिक्षु  अश्वघोष द्वारा रची गयी थी। 


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अश्वघोष कृत बुद्ध चरित्र में आये हुए प्रसङ्ग विचारणीय है 


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■-प्रसङ्ग संख्या ●--१


■--वयश्च कौमारमतीत्य मध्यं सम्प्राप्य बालः स हि राजसूनुः । अल्पैरहोभिर्बहुवर्षगम्या जग्राह विद्याः स्वकुलानुरूपाः ॥( २।२४)


■--नाध्यैष्ट दुःखाय परस्य विद्यां ज्ञानं शिवं यत्तु तदध्यगीष्ट । स्वाभ्यः प्रजाभ्यो हि यथा तथैव सर्वप्रजाभ्यः शिवमाशशंसे ॥ (२।३५)


■--आर्षाण्यचारीत्परमव्रतानि (२/४३)


सिद्धार्थ गैतम ने सास्त्रनुकूल समय पर उपनयन संस्कार से संकरित हो अपने कुल परम्परा के अनुरूप विद्या आदि का अध्यय किया था एवं ऋषियों सम्बंधित समस्त व्रत और तपो का भी पालन किया था कुशाग्र बुद्धि होने के कारण अल्पकाल में ही समस्त विद्याओं का अध्ययन पूर्ण कर चुका था ।

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■-प्रसङ्ग संख्या ●--२


अश्वघोष कृत बुद्ध चरित्र के  तृतीय सर्ग   श्लोक संख्या २८ से लेकर श्लोक संख्या ६० तक महत्वपूर्ण है  जहाँ किस हेतु से सिद्धार्थ गौतम ने गृहत्याग किया था ।


■●--सिद्धार्थ गौतम ने  बृद्ध ,रोग से ग्रसित रोगी ,एवं मृत ब्यक्ति को देख ब्याकुल हो उठा और गृह त्याग कर वन की ओर चल पड़ा ।

गौतम बुद्ध ने जब गृह त्याग किया था उस वक़्त तक उनका विवाह हो चुका था और एक पुत्र लाभ भी हुआ था अतः स्पष्ट है कि उनकी आयु अब लगभग 30 वर्ष की हो चली होगी ।


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समीक्षा :-- सिद्धार्थ गौतम का समयानुकूल उपनयन संस्कार होना ये दर्शाता है की वे उस कुल में जन्मे थे जो विशुद्ध वैदिक धर्मी थे ,अनादिकाल से आरही वंश परम्परा कुल परम्परा के अनुकूल ही सिद्धार्थ गौतम का संस्कार एवं अध्ययनादि हुआ था बड़े ही अल्पकाल में सिद्धार्थ गौतम अध्ययनादि को पूर्ण कर लिया था अश्वघोष ने द्वितीय सर्ग के  श्लोक संख्या २४ में  #अल्पैरहोभिर्बहुवर्षगम्याजग्राह विद्याः स्वकुलानुरूपाः

लिख कर स्पष्ट किया है साथ ही साथ द्वितीय सर्ग के श्लोक संख्या ४३ में पुनः इसकी पुष्टि की है ।

अब आगे आते है 

आत्म तत्व ,जन्म मृत्यु  ,जड़ चेतन आदि  बिषय को लेकर जितना बिषद उल्लेख वैदिक धर्म मे हुआ उतना उल्लेख विश्व के किसी भी साहित्य में नही है । अतः ऐसा सम्भव ही नही की सिद्धार्थ गौतम के अध्ययन काल मे इन जैसे प्रश्नों अथवा बिषयों का उल्लेख न हुआ हो अथवा उस कालखण्ड में किस बृद्ध अथवा रोगी अथवा मृत ब्यक्ति को न देखा हो ।

 श्रुतिस्मृति इतिहासपुराणादि षड्दर्शन जैसे समुच्चय ग्रन्थ आत्मतत्व का विवेचन करता है श्रुतियों में नचिकेता जैसा बालक भी यमराज से मृत्यु का रहस्य पूछता है मृत्यु के नाम से द्रवित नही होता तो पुराण जैसे अयाख्यानों में प्रह्लाद जैसा दृढ़भक्त बालक भी मृत्यु के नाम से विचलित न हो होलिका के  गोद मे बैठ जाता है अतः जिन बिषयों को लेकर बाल्यकाल में अध्ययन के समय होना चाहिए था वही संशय  युवास्था में होना और उससे द्रवित होकर गृहत्याग करना हास्यस्पद लगता है ।


शैलेन्द्र सिंह

Friday, 12 January 2024

■--मंदिर प्रसाद एक शास्त्रीय दृष्टिकोण

 ■-- मन्दिर प्रसाद एक शास्त्रीय दृष्टिकोण 



■-शिरस्त्वण्डं निगदितं कलशं मूर्धजं स्मृतं ॥

कण्ठं कण्ठमिति ज्ञेयं स्कन्धं वेदी निगद्येते ।

पायूपस्थे प्रणाले तु त्वक्सुधा परिकीर्तिता ॥

■-मुखं द्वारं भवेदस्य प्रतिमा जीव उच्यते ।

तच्छक्तिं पिण्डिकां विद्धि प्रकृतिं च तदाकृतिं ॥

निश्चलत्वञ्च गर्भोस्या अधिष्ठाता तु केशवः ।

■-एवमेव हरिः साक्षात्प्रासादत्वेन संस्थितः ॥(अग्निपुराण ६१/२३-२६)


मन्दिर का गुम्बज भाग ही देव् विग्रह का सिर है और कलश ही मन्दिर में प्रतिष्ठित देव् विग्रह  के बाल है मन्दिर का कण्ठ ही देव् विग्रह का कण्ठ है ,वेदी ही मंदिर में प्रतिष्ठित देव् विग्रह के स्कंध है नालियां ही देव् विग्रह के पायु और उपस्थ है मन्दिर का चूना ही मन्दिर में प्रतिष्ठित देव् विग्रह का चर्म है मन्दिर का द्वार ही देव् विग्रह का मुख है तथा मन्दिर की प्रतिमा ही मन्दिर प्रसाद का जीव है उसकी पिण्डिका ही शक्ति समझो तथा मन्दिर की आकृति ही मन्दिर की प्रकृति है निश्चलता ही उसका गर्भ होता है और उसके अधिष्ठाता भगवान केशव है इस तरह से भगवान श्रीहरि: स्वयं मन्दिर के रूप में स्थित होते है ।


शैलेन्द्र सिंह

Sunday, 30 July 2023

शिवलिङ्ग बिषय भ्रांति का भ्रमोछेदन



शब्द अर्थों के प्रतिपादक होते है शब्दों के कारण ही हमे अर्थ (बिषय) का बोध होता है   शब्दो के मूल अर्थ का त्याग कर यदि हम मनमाना अर्थ ग्रहण करने लगे  तो अतिव्यापति  दोष लगेगा जिससे शब्दार्थ मर्यादा भी भंग हो और हम किसी निश्चित बिषय पर एकमत होंने से रहे ।

जन समुदाय में आज शिवलिङ्ग बिषय को लेकर जो भ्रांतियां वयाप्त हुई हैं वह शब्द के मूल अर्थों का त्याग कर मनमाना अर्थ ग्रहण करने के कारण ही हुआ है ।


●लिङ्ग शब्द का अर्थ संस्कृत शब्दकोश में चिन्ह प्रतीक,लक्षण ही लिया गया है 

यदि जिज्ञासा का भाव हो तो आप संस्कृत हिंदी शब्दकोश पर जाकर स्वयं ही इस तथ्य की पुष्टि कर सकते है ।

 मैं अपनी ओर से  संस्कृत हिंदी शब्दकोष का लिंक भी दे रहा हूँ चाहे तो वहाँ सर्च कर देख ले ।


https://sanskritdictionary.com/?iencoding=iast&q=%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97&lang=sans&action=Search


अस्तु न्याया,वैशेषिक, सांख्य,मीमांसादी  सिद्धांत में सभी के सभी आचार्यो ने  लिङ्ग का अर्थ चिन्ह रूप में ही ग्रहण किया यथा धूम्र अग्नि का लिंग है तो

 इच्छा,द्वेष,प्रयत्न, सुख,दुख,ज्ञान  आत्मा का लिंग ।

इंद्रियों के अपने अपने बिषयों से जो सम्बन्ध है एवं उससे भिन्न ज्ञान की उत्पति मन का लिङ्ग (लक्षण) है ।

निष्क्रमण और प्रवेश यह आकाश का लिङ्ग (लक्षण)है 


●इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गम् (न्याय दर्शन)

●युगपत्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ।(न्याय दर्शन )

●निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ।( वैशेषिक-२,१.२० )

●अव्यक्तं त्रिगुणाल्लिङ्गात् । (सांख्यसूत्र-१.१३६)


  लिङ्ग शब्द से लोकप्रसिद्ध मांसचर्ममय  शिश्न यदि ग्रहण करें तो अर्थ का अनर्थ ही होगा 

और तद्वत  बिषयों की सिद्धि भी न हो ।


 

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शिवमहापुराण में शिवलिङ्ग को अव्यक्त अगोचर कहा गया है जो तत्वबिषय इन्द्रिय प्रमाण का बिषय ही नही उस तत्वबिशेष को पंचभौतिक मांसचर्ममय स्थूल शिश्न मानना ही मूढ़ता का परिचायक है ! 


●अनिर्देश्यं च तद्रूपमनाम कर्मवर्जितम् ।।

अलिंगं लिंगतां प्राप्तं ध्यानमार्गेप्यगोचरम् ।।(रुद्रसंहिता ७/६६)


●तो प्रश  उठता है कि शिवलिंग आखिर है क्या ?


जिससे इस सम्पूर्ण चराचरात्मक जगत् उत्पन्न होता है एवं 

जिसमे यह समस्त निखिल जगत् का लय हो जाता है वही लिंग पद वाच्य है ।


●लिंगेप्रसूतिकर्तारं (विद्येश्वर संहिता १६/१०६)

●लयनाल्लिंगमित्युक्तं तत्रैव निखिलं जगत् ।।(रुद्रसंहिता १०/ ३८ ।।)

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 पुराणों  में जहां भी शिवलिङ्ग विषय पर व्यक्तरूप से वर्णन आया है वहाँ वहाँ  ज्योतिर्मय अग्निस्वरूपा ही ग्रहण किया गया है ।

जिसकी तेजोमयी शक्ति तिनोलोको को भस्मीभूत करने वाला कहा गया है ।


●ज्योतिर्लिंगे महादिव्ये वर्णिते ते महामुने।। (शतरुद्र संहिता ४२/२१)

●गौतमस्य प्रार्थनया ज्योतिर्लिंग स्वरूपतः (शतरुद्रसंहिता ४२/३४)


●तल्लिंगेनाखिलं दग्धं भुवनं सचराचरम् (रु०सं० सतीखण्ड २९/२४)


शिवमहापुराण के विद्येश्वरसंहिता  खण्ड में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठतम होने का विवाद होने लगा तो उन दोनों के मध्य तेजोमय महाग्नि स्तम्भ प्रकट हुआ ।


●महानलस्तंभविभीषणाकृतिर्बभूव तन्मध्यतले स निष्कलः ।

ते अस्त्रे चापि सज्वाले लोकसंहरणक्षमे ।

निपतेतुः क्षणे नैव ह्याविर्भूते महानले (विद्येश्वर संहिता ७/११-१२)


ब्रह्मा विष्णु के मध्य प्रकट हुए महाग्नि स्तम्भ को देख आश्चर्यचकित हो ब्रह्मा विष्णु ने कहा यह इन्द्रिय अगोचर अग्निरूपा क्या उठा जो अनादि है 


●अतींद्रि यमिदं स्तंभमग्निरूपं किमुत्थितम् (विद्येश्वर संहिता ७/१३)

●अनाद्यंतमिदं स्तंभम (विद्येश्वर संहिता ९/१९)


 ब्रह्मा विष्णु जैसे देवता भी उस अव्यक्त अगोचर महाग्निरूपा स्तम्भ को समझने में अस्क्य रहे तो हम जैसे क्षुद्र बुद्धि वाले मनुष्यो की क्या औकात जो उस तत्वबिषय को समझ पाए !

जो अनादि अनन्त है उस ब्रह्मतत्त्व को पूर्णरूप से जानने में भला कौन सम्सर्थ ??

 जिसका आदि और अंत न तो ब्रह्मा ही पा सके और न ही विष्णु ।उस तत्व बिषय को लेकर अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रान्तवादियो का कहना है कि 

शिवलिङ्ग  पंचभौतिक मांसमय स्थूल शिश्न है  ।


अस्तु चिन्मय आदिपुरुष ही शिवलिङ्ग है समस्त पीठ अम्बामय है भगवन शङ्कर कहते है कि जो संसार के मूलकारण महाचैतन्य को और लोक को लिङ्गात्मक जानकर पूजन करता है वही मेरा प्रिय है ।

लिङ्ग चिन्ह है सर्वस्वरूप की पूजा कैसे हो इसलिए लिङ्ग की कल्पना है आदि एवं अंत मे जगत् अण्डाकृति ही रहता है अतएव ब्रह्माण्ड की आकृति ही शिवलिङ्ग है यज्ञिको के यहाँ वेदी की स्त्रीरूप, में कुण्ड को योनि रूप में , और अग्नि रुद्र की लिङ्ग रूप में उपासना होती है ।

शिवलिङ्ग में विश्व प्रसूता की दृष्टि से अर्चना करनी चाहिए क्यो की सम्पूर्ण जगत् में किसी भी प्रकार के गुण,कर्म,द्रव्य - लिङ्ग ,और योनि (कारण) के बिना सम्भव ही नही ।

जो जगत् के सृष्टि, स्थिति,लय, के कारण है उस तत्व विशेष को पाञ्चभौतिक मांसचर्ममय शिश्न मानना  मूर्खता की पराकाष्ठा ही है ।


#शैलेन्द्र_सिंह

Tuesday, 15 November 2022

बिकाश दिब्यकीर्ति मत भञ्जन



आखिर बिकास दिब्यकीर्ति ने श्रीमद्वाल्मीकी रामायण से  उन प्रसङ्गो को उपदिष्ट क्यो नही किया ?

महाभारत में आये हुए रामोख्यान पर्व से ही क्यो किया ?

स्वान  की दृष्टि जूठन पर ही रहती ,और बिकाश दिब्यकीर्ति ने भी अपनी मानसिकता से स्वान होने का ही परिचय दिया ।


वामपंथी गिरोह को यदि सबसे ज्यादा चिढ़ है तो  मर्यादा पुरुषोत्तम राम से जो भारतीय संस्कृति के रोम रोम में बसता है  वही राम जो साक्षात धर्म स्वरूप है वही राम जिनकी यशोगान की गाथा युगों युगों से प्रवाहमान है यह पहली बार नही हुआ है हर कालखण्डन में ऐसे दूषण माता सीता की पवित्रता और श्रीरामचन्द्र की मर्यादाओं को तार तार करने का भरपूर प्रयास किया है ।

जिस प्रकार समस्त प्राणियों को आह्लादित करने वाला सूर्य चमगादड़ो और उल्लुओं को नही रुचता ठीक उसी प्रकार मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र धर्मदूषको को नही रुचता क्यो की धर्मदूषको को दण्ड देने का ही कार्य भगवन् श्रीरामचन्द्र ने किया था ।

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■● रावण वध के पश्चात   जनकनन्दिनी जब श्रीरामचन्द्र के समक्ष उपस्थित हुई तो ।

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी ने सीता को ग्रहण करने से मना कर दिया

ठीक यही वृतान्त महाभारत के रामोपख्यान पर्व में आया है 

श्रीमद्वाल्मीकी रामायण और महाभारत में तद्वत बिषयों को लेकर व्याख्यान करने की शैली भी भिन्न भिन्न है इस लिए स्वाध्यायादी अल्पता के कारण लोगो मे तद्वत बिषयों को लेकर भ्रम होना भी स्वाभाविक है ।


श्रुतियों का मत है कि जिस मंत्र बिषय आदि के द्रष्टा जो ऋषि है वही उस बिषय में प्रामाणिक माने जाएंगे ।

अतः महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण ही श्रीरामचन्द्र माता सीता दसरथ आदि के बिषय में भी प्रामाणिक माने जाएंगे क्यो की चतुर्मुखी ब्रह्मा के अनुग्रह से ही श्रीरामचन्द्र माता सीता के गुप्त और प्रकट चरित्र का ज्ञान महर्षि वाल्मीकि को हुआ था ।


वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् ।

रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥

रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः ।

वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ।। (वा० रा०बालकाण्ड २/३३/३४)


 फिर हम भला तद्गत बिषयों के लिए अन्य का अनुगमन क्यो करें ?

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श्रीरामचन्द्र साक्षात धर्म स्वरूप है #रामो_विग्रहवान्_धर्मः


 उनका एक एक आचरण धर्मानुकूल होने से ग्राह्य है महाभारत में ही स्वयं श्रीरामचन्द्र के धर्मसम्मत निर्णय को ऋषिमुनि देवगण प्रसंसा करते है ।


■● पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि। (महाभारत०रामोपख्यान पर्व    २९१/३०)


श्रीरामचन्द्र ने ऐसा क्यो किया ??

लोकापवाद के भय से यदि ऐसा न करते तो उन्हें ब्यभिचारी पुरुष होने का कलङ्क लगता जो युगों युगों से चले आरहे इक्ष्वाकु वंश के कीर्ति को ध्वस्त करता जिसका मार्जन भी न हो पाए 

श्रीमद्वाल्मीकी रामायण में इसी बिषयों को स्पष्टता से दर्शाया है ।


■●-जनवादभयाद्राज्ञो बभूव हृदयं द्विधा | (वा०रा युद्ध काण्ड ११५/११)

●-लोकापवाद के भय से श्रीरामचन्द्र का हृदय विदीर्ण हो रहा था 


० वही महारत में इसी बिषय को भिन्न शैली में दर्शाया गया है 


■● रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कितः (महाभारत रामोपख्यान २९१/१०)

●- श्रीरामचन्द्र जी को जनकनन्दिनी में सन्देश हुआ कि पर पुरुष के स्पर्श से सीता अपवित्र तो न हो गयी ?


इस लिए श्रीरामचन्द्र ने ऐसा वचन कहा  धर्म सिद्धांत को जानने वाला कोई भी पुरुष दूसरे के हाथ मे पड़ी हुई नारी को मुहूर्तभर के लिए भी कैसे ग्रहण कर सकता है तुम्हारा आचनर बिचार शुद्ध रह गया हो अथवा असुद्ध अब मैं तुम्हे अपने उपयोग में नही ले सकता ठीक उसी तरह जैसे कुत्ते के द्वारा चाटे गए पवित्र हविष्य को कोई ग्रहण नही करता ।


■●-कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन्धर्मविनिश्चयम्।

परहस्तगतां नारीं मुहूर्तमपि धारयेत् ।।(महाभारत रामोपख्यान २९१ १२)

सुवृत्तामसुवृत्तां वाऽप्यहं त्वामद्य मैथिलि।

■●-नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ।।(महाभारत रामोपख्यान २९१/१३)


पूर्व और पश्चात में आये हुए श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीरामचन्द्र का कथन धर्म सम्मत था जिसके बिषय में दिब्यकीर्ति ने उपदिष्ट न कर केवल एक ही श्लोक की कुटिलता पूर्वक व्यख्या कर लोगो मे भ्रामकता फैलाया ।


■●-पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि। (महाभारत०रामोपख्यान पर्व    २९१/३०)


●-हे राम तुम राजऋषियो के धर्म पर चलने वाले हो अतः तुममें ऐसा सद्विचार होना आश्चर्य की बात नही ।


श्रीमद्वाल्मीकी रामायण में माता सीता स्वयं की पवित्रता का प्रमाण समस्त लोगो के सामने अग्निपरीक्षा दे कर की वही महाभारत में माता सीता के शुद्धि के बिषय में समस्त देवताओं स्वीकार किया और श्रीरामचन्द्र से माता जानकी को ग्रहण करने को कहा ।

(महाभारत रामोपख्यान पर्व अध्याय २९१)

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बिकाश दिब्यकीर्ति जैसे धूर्त सम्पूर्ण प्रसङ्ग को न दर्शा कर केवल एक श्लोक के माध्यम से अपनी अपने मनोरथ को सिद्ध करने की जो कुचेष्टा की इससे उसके विक्षिप्त मानसिकता का ही प्रकाशन होता है 

और कुछ नही ।

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एक ही बिषय को ऋषिमुनिगण भिन्न भिन्न शैली में व्याख्यान करते है जिससे भ्रम उतपन्न होना स्वभाविक है इस लिए श्रुतियाँ बार बार घोषणा करती है


■● वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।


नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]


■●आचार्यवान् पुरुषो हि वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)


■● तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् ) 


शैलेन्द्र सिंह

Wednesday, 11 May 2022

माता सीता अयोनिजा थी

 #माता_सीता_के_विषय_में_अज्ञता


वरुण पाण्डेय शिवाय जी के इस पोस्ट पर कुल 51 लोगो ने सहमति जताई है जिसका हमने स्क्रीनशॉट लगाया है ।



शिष्ट पुरुषों का लक्षण है कि धर्मादि बिषयों पर सप्रमाण आपने कथनों को रखा जाय तो वह सम्मानीय होता है पाण्डेय जी ने जिन मुख्य बिषयों के ओर संकेत किया है वह मुझे युक्तियुक्त जान नही पड़ते यदि कोई युक्तियुक्त प्रमाण हो तो पाण्डेय जी प्रकाशित कर अपने प्रतिज्ञा वाक्य को सिद्ध करें 

नम्बर एक (१) माता सीता का जन्म यज्ञ योग्य क्षेत्रमण्डल का हल से कर्षण करने से उनका प्रकाट्य नही हुआ था 

नम्बर (२) यदि माता सीता भूमिजा नही थी तो इसका स्पष्ट अर्थ निकलता है कि माता सीता साधारण स्त्रियों की भांति योनिज है ।

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वाल्मीकि रामायण के विरुद्ध जितने भी वृत्तांत है वह अनादर्णीय है ।


इतिहासो में वाल्मीकि रामायण श्रेष्ठ है 

■--नास्ति रामायणात् परम् (स्कंद पुराण उत्तर खण्ड रा०आ० ५/२१)

क्यो की 

■--रामायणमादिकाव्य सर्वेदार्थ सम्मतं (स्कंद पुराण उत्तर खण्ड रा०आ० ५/६४)

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■--धर्मस्य_सूक्ष्मतवाद्_गतिं (महाभारत)

धर्म की गति अति सूक्ष्म है अतः हम जैसे अल्पज्ञ अल्पश्रुतो में भ्रम होना स्वाभाविक भी है ।

इस लिए श्रुतियों ने स्पष्ट घोषणा की है 


■-वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।


नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]


■-आचार्यवान् पुरुषो  वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)


■--तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् ) 

अतः धर्मादि बिषयों पर निज मतमतान्तर के वशीभूत हो बिषयों के अर्थ का अनर्थ करना शास्त्रो की हत्या करने जैसा बीभत्स पाप का कारण होता है ।

■--बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति (महाभारत आदिपर्व)


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माता जानकी का आविर्भाव साधारण स्त्रियों की भांति नही हुआ   वे तो  अयोनिजा है 

जो भगवती देवी जगत् जननी है जो शक्ति स्वरूपा महामाया है जो समस्त जगत् की प्रसूता है उनकी प्रसूता भला कौन हो ??

इस लिए शास्त्रो में उस जगत् जननी को अयोनिजा होने का दिग्दर्शन भी कराता है तिमिर रोग से ग्रसित व्यक्ति को समस्त बिषयों में ही खोंट दिखे तो इसमें भला शास्त्र का क्या दोष ??


■---अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छद्विचिन्तयन् (वा०रा०२/११८/ )


■--वीर्य शुल्का इति मे कन्या स्थापिता इयम् अयोनिजा (वा०रा १/६६/१४)


माता जानकी के अयोनिजा होने की घोषणा केवल मात्र वाल्मीकि कृत रामायण ही नही अपितु विष्णुधर्मोत्तर पुराण भी करता है 


■---भूय सीता समुत्पन्ना जनकस्य महात्मनः ।। 

अयोनिजा महाभागा कर्षतो यज्ञमेदिनीम् (विष्णु धर्मोत्तर पुराण )

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जो जगत् जननी दिव्य स्वरूपा है उनका आविर्भाव भी दिव्य ही होगा 

न कि साधारण स्त्रियों की भांति ??


माता जानकी जब देवी अनुसूया के मध्य सम्वाद होता है तो माता सीता कहती है ।


■--तस्य लाङ्गलहस्तस्य कर्षत: क्षेत्रमण्डलम् । 

अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपते: सुता (वा०रा० २/११८/२८)


महाराज जनक यज्ञ के योग्य क्षेत्र को हाथ मे हल लेकर जोत रहे थे उसी समय मैं भूमि से बाहर प्रकट हुई ।


माता सीता द्वारा  ठीक यही वृतान्त अग्नि परीक्षण के प्रसङ्ग में भी कहा गया है 


■--उत्थिता मेदिनीं भित्वा क्षेत्रे हलमुखक्षते |

पद्मरेणुनिभैः कीर्णा शुभैः केदारपांसुभिः॥ (रामायण सुन्दर काण्ड सर्ग १८)

केवल वाल्मीकि रामायण ही क्यो वेदव्यास कृत पद्मपुराण में भी यही कथा देखने को मिलता है ।


■--अथ लोकेश्वरी लक्ष्मीर्जनकस्य निवेशने ।

शुभक्षेत्रे हलोद्धाते सुनासीरे शुभेक्षणे ॥ (पद्मपुराण ६/२४२/१००)

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माता जानकी के बिषय में मिथिला नरेश जनक महर्षि विश्वामित्र से कहते है 


■--अथ मे कृषतः क्षेत्रम् लांगलात् उत्थिता मम ॥

क्षेत्रम् शोधयता लब्ध्वा नाम्ना सीता इति विश्रुता ।

भू तलात् उत्थिता सा तु व्यवर्धत मम आत्मजा ॥ (वा०रा०१/६६/१३-१४)


राजा जनक के बिषय में श्री हरि: स्वयं घोषणा करते है 


कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः (गीता)


अतः मिथिला नरेश स्वप्न में भी मिथ्या भाषण न किया होगा फिर तो भूत भविष्य के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र के समक्ष मिथ्या भाषण कैसे करते ??

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माता जानकी के बिषय में वरुण पाण्डेय द्वारा अपुष्ट अप्रामाणिक कथनों के बिषय में विद्वजन बिचार करें ।।

यदि मुझसे  कोई त्रुटि हो तो विद्जनो से अनुरोध है कि विनम्रता पूर्वक उन त्रुटियों को रेखांकित करें धन्यवाद 


#शैलेन्द्र_सिंह

Monday, 14 March 2022

गौतम बुद्ध के गृहत्याग का सच









सिद्धार्थ गौतम  के गृहत्याग के बिषय में जो कथाएं प्रचलित है वह यह है 

एक दिन जब वह भ्रमण पर निकले तो उन्होंने एक वृद्ध को देखा जिसकी कमर झुकी हुई थी और वह लगातार खांसता हुआ लाठी के सहारे चला जा रहा था। थोड़ी आगे एक मरीज को कष्ट से कराहते देख उनका मन बेचैन हो उठा। उसके बाद उन्होंने एक मृतक की अर्थी देखी, जिसके पीछे उसके परिजन विलाप करते जा रहे थे।


ये सभी दृश्य देख उनका मन क्षोभ और वितृष्णा से भर उठा, और गृहत्याग कर   परिव्रज्या ग्रहण किया  जब सिद्धार्थ गौतम ने परिव्रज्या ग्रहण किया तब उनकी आयु 29 वर्ष की थी । 

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■-सिद्धार्थ गौतम ने 29 वर्ष की आयु होने पर ही  एक बृद्ध ,रोगी और मृत व्यक्ति को पहली बार देखा होगा  यह व्याख्या तर्क की कसौटी पर कसने पर खरी उतरती प्रतीत नहीं होती. त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में भी गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख तक नहीं है.

■-पुनश्च प्रश्न उठेगा की फिर उनके परिव्रज्या की कथाओं का श्रोत क्या है और किसने उसे लिखा ??

सिद्धार्थ गौतम के मृत्यु के 1000 वर्ष पश्चात भदन्त बुद्धघोष इन कथाओं का सृजन किया और उसे प्रचारित प्रसारित किया ।

■--सिद्धार्थ गौतम ने परिव्रज्या के बिषय में सुतनिपात के खुद्दक निकाय में स्वयं कहते है ।

मुझे शस्त्र धारण करना भयावह लगा यह जनता कैसे झगड़ती है देखो मुझमे संवेग कैसे उतपन्न हुआ यह मैं बताता हूँ अपर्याप्त पानी मे जैसे मछलियां छटपटाती है वैसे एक दूसरे के बिरोध करके छपटाने वाली प्रजा को देख कर मेरे अन्तःकरण में भय उतपन्न हुआ चारो ओर का जगत् असार दिखाई देने लगा सभी दिशाएं कांप रही है ऐसा लग एयर उसमे आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नही मिला क्यो की अंत तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध देख कर मेरा जी ऊब गया ।


संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ 

फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।

अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥

समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।

इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।(खुद्दक निकाय )

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■--सिद्धार्थ गौतम के गृहत्याग के पीछे का सच ---

शाक्यो की राजधानी का नाम कपिलवस्तु था जहाँ सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ था ।

शाक्यो का अपना संघ हुआ करता था और इस संघ से जुड़े हुए व्यक्ति को संघ के नीतियों आदर्शो एवं शाक्यो के रक्षण हेतु प्रतिबद्ध होना पड़ता था । इस संघ के सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु  20 वर्ष  का था  संघ में दीक्षित होने के पूर्व संघ के नीतियों आदर्शो से  परिचय कराया जाता था उन नीति आदर्शो के रक्षण के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होना पड़ता था उसके पश्चात जनमत संग्रह के द्वारा यह सुनिश्चित होता था कि अमुक व्यक्ति संघ से जुड़ सकता है अथवा नही ।

सिद्धार्थ गौतम को अपने वर्णाश्रम धर्म अनुसार वेद वेदाङ्ग एवं क्षात्र धर्म अनुरूप शिक्षण दिक्षण हुआ था सिद्धार्थ गौतम जब 20 वर्ष के हुए तब संघ से जुड़ने के लिए आमंत्रण भेजा गया सिद्धार्थ गौतम ने उस आमंत्रण को स्वीकार कर संघ में जुड़ने के इच्छुक हुए ।

संघ के सेनानायक ने संघ के नीतियों आदर्शो को सिद्धार्थ गौतम के समक्ष प्रेसित किया सिद्धार्थ गौतम संघ के नीति आदर्शो को पढ़ कर पूर्ण रूप से संतुष्ट हुए एवं भरी सभा मे प्रतिज्ञा ली कि मैं संघ के नीतियों आदर्शो का पालन अक्षरसः रूप से करूँगा यदि किसी भी प्रकार से मैं दोषी पाया जाता हूँ तो संघ अपने नीतियों के अनुरूप मुझे दण्ड का भागी भी बना सकता है ।

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संघ से जुड़े सिद्धार्थ गौतम को अब 8 से 9 वर्ष बीत चुके थे यही वह समय था जब सिद्धार्थ गौतम के जीवन मे वह घटनाएं घटती है फलस्वरूप उन्हें मजबूरन गृहत्याग करना पड़ा ।

शाक्यो के राज्य से सटा हुआ कोलियों का राज्य था रोहिणी नदी दोनों राज्यो के विभाजक रेखा थी ।

शाक्यो और कोलियों दोनों ही अपने राज्य में सिंचाई के लिए रोहिणी नदी के ऊपर दोनों राज्य निर्भर था ।

पानी को लेकर ही शाक्यो और कोलियों के मध्य झगड़ा हुआ और बात यहाँ तक आ पहुची की दोनों के मध्य युद्ध का माहौल बना ।

इस बिषय को लेकर शाक्यो ने संघ का अधिवेशन बुलाया और उस सभा मे सभी ने अपने अपने पक्ष का प्रस्ताव रखा ।

संघ के सेनानायक युद्ध के पक्ष में था और सिद्धार्थ गौतम युद्ध के विरुद्ध अपना मत दिया की युद्ध समस्या का हल नही है ।

इस बिषय को लेकर पुनः जनमत संग्रह हुआ ।

जनमत संग्रह में संघ के सेनानायक को ही प्रधानता मिली और सिद्धार्थ गौतम का पक्ष बहुत बड़े बहुमत से अमान्य सिद्ध हुआ 

दूसरे दिन सेनानायक ने संघ की पुनः सभा बुलाई ।

जब सिद्धार्थ गौतम ने देखा कि जनमत संग्रह में उसे पराजय का मुह देखना पड़ा तब सभा को सम्बोधित करते हुए सिद्धार्थ गौतम ने कहा मैत्रो आप जो चाहो कर सकते हो आप के साथ जनमत संग्रह है लेकिन मुझे खेद के साथ यह कहना पड़ रहा है कि मैं आप सभी के मत का बिरोध करता हूँ मैं किसी भी प्रकार से युद्ध मे भाग नही लूंगा 

तब संघ के सेनानायक ने सिद्धार्थ गौतम को सम्बोधन करते हुए कहा सिद्धार्थ उस शपथ को तुम याद करो जब संघ के सदस्य बनते समय ग्रहण किया था ।

यदि तुम अपने वचनों का पालन न करोगे तो तुम दण्ड का भागी भी बन सकते हो ।

संघ अपनी आज्ञा की अवहेलना करने वाले को फांसी की सजा अथवा देशनिकाला घोषित भी किया जा सकता है ।

केवल इतना ही नही संघ तुम्हारे परिवार को सामाजिक बहिष्कार भी कर सकता है ।

इस लिए इन तीनो में से एक का चुनाव तुम कर सकते हो

(१) सेना में भर्ती हो युद्ध मे भाग लो 

(२) फांसी पर लटकना अथवा देशनिकाला स्वीकार करो 

(३) अपने परिवार का सामाजिक बहिष्कार एवं खेतो की जब्ती 


सेनानायक के इन वचनों को सुन कर सिद्धार्थ गौतम ने कहा कृपया मेरे परिवार को दण्डित न करे उसका सामाजिक बहिष्कार न करें वे निर्दोष है मैं अपराधी हूँ ।

इस लिए दण्ड का पात्र भी मैं ही हूँ ।

इस लिए मैंने एक आसान रास्ता चुना है  की मैं परिव्राजक बन देश से बाहर चला जाऊं ।

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सिद्धार्थ गौतम संघ के नीतियों के विरुद्ध गया फलस्वरूप वे दण्ड के पात्र भी बने और देश निकाला घोषित किया गया जिसे परिव्रज्या के नाम से प्रचारित प्रसारित किया गया ।

मैंने अपने प्रमाण में जिन लेखों का उद्धरण दिया है उस पुस्तक का स्क्रीन शॉट भी प्रेसित कर रहा हूँ ताकि लोग यह न समझे कि मैंने अपने मतों की पुष्टि के लिए केवल कपोलकल्पित शब्दो का सहारा लिया ।

पुस्तक के लेखक :--बौद्धाचार्य भदन्त आनन्द कौशल्यायन 

एवं श्रीमान भीमराव अंबेडकर जी है ।

इनके लेखों को अब तक बौद्ध मत के किसी भी सम्प्रदाय ने खण्डन नही किया क्यो की वे भी जानते है कि बुद्ध के परिव्रज्या ग्रहण के बिषय में त्रिपिटिक आदि ग्रन्थों में कोई उल्लेख नही है ।


#शैलेन्द्र_सिंह