वरुण पाण्डेय जी का भ्रमोच्छेदन
वरुण पाण्डेय जी का यज्ञोपवीत बिषय पर अशास्त्रीय सम्मत बिचार अग्रहणीय अनादर योग्य है ।
यजुर्वेद की तैत्तरीय आरणक्यम् का जो प्रसङ्ग आया है पाण्डेय जी ने उन प्रसङ्गो को न दर्शा कर केवल अपने मनोरथ को सिद्ध करने हेतु चेष्टा कर रहे है जो अनर्थकारी है ।
अस्तु शास्त्रो के अर्थो का अनर्थ करने वाला चोर है ऐसा महर्षि मनु का कथन है ।
पाण्डेय जी ने अपने पोस्ट में जिन मुख्य बिषयों को उद्धृत किया है वह समस्त विद्जनो के लिए विचारणीय है ।
● नम्बर १-- तैत्तरीय आरणक्यम् प्रसङ्ग
●नम्बर २-- इच्छानुकूल यज्ञोपवीत को धारण करना त्याग करना
●नम्बर ३-- स्त्रियों का उपनयन संस्कार
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●नम्बर १-- तैत्तरीय आरण्यक्यम् प्रसङ्ग
यजुर्वेद के तैत्तरीय आरणक्यम् जिस प्रसङ्ग को पाण्डेय जी ने उल्लेखित किया हैं वह प्रसङ्ग देवताओं और असुरों द्वारा प्रतिपादित यज्ञ विषयक प्रसङ्ग है ।
देवता और असुर दोनों यज्ञ का सम्पादन करते है असुरों का यज्ञ निष्फल और स्वर्ग से पराभूत हुए क्यो की असुर अनुपवित थे ।
इस प्रसङ्ग से यह प्रमाणित होता है अनुपवित ब्यक्ति यज्ञयाग के लिए अनधिकृत है और यदि वे करते भी है तो निष्फल है ।
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●नम्बर २-- उपनयन प्रसङ्ग
श्रुतिस्मृति इतिहासपुराण मीमांसादी ऐसा कोई भी शास्त्र नही जहाँ यज्ञोपवीत बिषय पर आर्यो को स्वेच्छाचारी कहा गया हो अस्तु समस्त त्रैवर्णिको के बिषय में समस्त धर्मशास्त्र एक स्वर में घोषणा करते है कि
अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ,एकादशवर्षं राजन्यं , द्वादशवर्षं वैश्यम्
ब्राह्मणकुलोतपन्न बटुक बालक का उपनयन संस्कार ८ वर्षो में क्षत्रीयकुलोद्भव बाकल का 11 वर्ष में और वैश्य कुलोद्भव बालक का 12 वर्ष में हो जाना चाहिए ।
यदि उपनयन बिषय पर स्वतंत्रता होती तो आयु का निर्धारण तद् तद् शास्त्रो में उपदिष्ट न किया होता ।
पोस्टकर्ता ने जिस आपस्तम्ब धर्म सूत्र का आश्रय ग्रहण कर अपने मत की सिद्धि करने की चेष्टा कर रहा है वही आपस्तम्ब धर्म सूत्र उपनयन बिषय पर स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि ब्राह्मण बालक का यज्ञोपवीत अष्टवर्ष में करें ।
गर्भाष्टमेषु ब्राह्मणं गर्भैकादशेषु राजन्यं गर्भद्वादशेषु वैश्य (आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/१/१९)
आपस्तम्ब धर्म सूत्रकार आगे यह भी कहता है कि जिनका स्मयानुकूल यज्ञोपवीत न हुआ हो वह व्रात्य है उन्हें प्रायश्चित करना चाहिए ।
प्रतिपूरुसं संख्याय संवत्सरान्यावन्तोऽनुपेताः स्युः (आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/२/१
पता नही पोस्टकर्ता ने किस हेतु से यह बात कही की द्विज यज्ञोपवीत सदैव धारण नही करते थे यह समझ से परे ।
विद्जन इस पर बिचार करें
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●नम्बर ३ -- स्त्रियों का उपनयन संस्कार प्रसङ्ग
अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत “,“,एकादशवर्षं राजन्यं , द्वादशवर्षं वैश्यम् ,— आठ वर्ष के ब्राह्मण का उपनयन करे इसी प्रकार 11वर्ष के क्षत्रियऔर 12वर्ष के वैश्य का उपनयन करके उन्हें पढ़ाये । किसका उपनयन कब हो ? –इसे भी बताया गया है –मीमांसा के प्रौढविद्वान् शास्त्रदीपिकाकार ” पार्थसारथि मिश्र ” सप्रमाण लिखते हैं–” वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत,ग्रीष्मे राजन्यं शरदि वैश्यम् ” इति द्वितीयानिर्देशादुपनयनसंस्कृतास्त्रैवर्णिकाः –अध्याय1,पाद1,अधिकरण1,सूत्र1, वसन्त काल में ब्राह्मण का उपनयन करे ,ग्रीष्म में क्षत्रिय और शरद् ऋतु में वैश्य का ।भगवान् वेद के इन वचनों में सर्वत्र “ब्राह्मणम्,राजन्यं , वैश्यम् ” इस प्रकार द्वितीयान्त पुल्लिंग का ही प्रयोग हुआ है ,स्त्रीलिंग का नही । अतः उपनयन पुरुषों का ही होगा ,स्त्रियों का नहीं –यही भगवती श्रुति का डिमडिम घोष है । यह बात सामान्य व्याकरण– अध्येता को भी ज्ञात है कि पुंस्त्व की विवक्षा में पुल्लिंग और स्त्रीत्व की विवक्षा होने पर टाप् ,ड़ीप् आदि प्रत्यय होकर टाबन्त ड़ीबन्त अजा,ब्राह्मणी,क्षत्रिया,वैश्या आदि शब्दों का प्रयोग होता है ।जब घोड़ा मगाना होगा तब ” अश्वमानय ” ही बोला जायेगा । और घोड़ी मगाना होगा तो ” अश्वामानय ” ही बोलेंगे । इन तथ्यों को ध्यान में रखकर देखें कि उपनयन शास्त्रवचनों से किसका कहा जा रहा है ? पुरुष का या स्त्री का ? ” पशुना यजेत ” इत्यादि स्थलों में पुंस्त्वआदि की विवक्षा है ;क्योंकि महर्षि पाणिनि जैसे सूत्रकार ने ” तस्माच्छसो नः पुंसि , स्त्रियाम् , अजाद्यतस्टाप्, स्वमोर्नपुंसकात् ,–जैसे सूत्रों द्वारा पुल्लिंग में अकारान्त शब्दों से परे शस् के स् को न् ,स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् आदि तथा नपुंसक लिंग में अदन्तभिन्न शब्दों से परे सु और अम् विभक्ति का लोपकहा है । अतः इन तथ्यों को मानकर ही अर्थ करना चाहिए ।” तथा लिंगम् ” –पूर्वमीमांसा–4/1/8/16,सूत्र से महर्षि जैमिनिने 5000वर्ष पूर्व ही इस तथ्य की पुष्टि कर दी थी । महर्षि पाणिनि के पहले भी शाकटायन, आदि अनेक वैयाकरण हो चुके हैं । वेदों की आनुपूर्वी में प्रवाहनित्यता मानें या और कुछ, उसमें परिवर्तन ईश्वर भीनही करता । तात्पर्य यह कि समयानुसार वेद नही बदलते हैं ढुलमिल नेताओं की तरह । वेद से भिन्न जो स्मृतियां हैं उनका प्रामाण्य वेदमलकत्वेन ही है ,वेदविरुद्धहोने पर वे अप्रमाण की कोटि में चली जाती हैं –ये दोनो सिद्धान्त क्रमशः” स्मृत्यधिकरण “– 1/3/1/2, ” विरोधाधिकरण “–1/3/1/3–4, पूर्वमीमांसासे सर्वमान्य हैं ।" विरोधे त्वनपेक्ष्यं स्यादसति ह्यनुमानम् ” –1/3/1/3 सूत्र तो इस विषय में अति प्रसिद्ध है ।अतः अपौरुषेय वेद–वसन्ते ब्राह्मणमपनयीत,ग्रीष्मे राजन्यं , शरदि वैश्यम् ” से विरुद्ध ” पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते ” स्मृति सर्वथाअप्रामाणिक है । इससे वेदप्रतिपादित सिद्धान्त को सञ्कुचित नही किया जा सकता । अतः स्त्रियों का उपनयन किसी भी कल्प में नही होता है । और सभी कल्पों में पुंस्त्वविशिष्टों का ही उपनयन वैदिक सिद्धात है ।
आज भी कर्मकाणड में देवताओं को यज्ञोपवीत चढ़ाया जाता है देवियों– गौरी आदिको नहीं –इसका मूल नारियों के उपनयन का अभाव ही है ।
इससे वेदप्रतिपादित सिद्धान्त को सञ्कुचित नही किया जा सकता । अतः स्त्रियों का उपनयन किसी भी कल्प में नही होता है । और सभी कल्पों में पुंस्त्वविशिष्टों का ही उपनयन वैदिक सिद्धात है । इससे यह भी सिद्ध होता है कि जब उनका उपनयन ही नही तब वेदाधिकार न होने से वेदमन्त्रसाध्य यज्ञादि कर्मों के आचार्यत्व का वे निर्वहन भी नही कर सकतीं । हां पति के साथ वे प्रत्येक कार्य का सम्पादन करेंगी । पत्नी के विना पति किसी यज्ञादि कर्म का अनुष्ठान नही कर सकता ;क्योंकि आज्यावेक्षणजैसे कर्म यदि नही हुए तो अंगवैकल्य से कर्म फलप्रद नही हो सकता ।–यह तथ्य पूर्वमीमांसा में –6/1/4/8से 20वें सूत्र तक विस्तार से वर्णित है
शैलेन्द्र सिंह
