■--भृगुकुलनन्दन परशुराम और क्षत्रिय कुल नाश कथा प्रसंग
●--देवेन्द्र सिकरवार मतभंजन
जमदग्नि सूत परशुराम स्वयं हरि: के आवेशावतार है ऐसा इतिहासपुराण से सिद्ध है ।
अवतार के बिषय में श्रुतिस्मृतिइतिहासपुरण में जो कहा गया है वह विचारणीय है ।
■-एकं रूपं बहुधा यः करोति (क०उ० २/२/१२)
■-एको देवो बहुधा निविष्टः (तै 0आ0 ३/१४/१)
■-दिव्येन देहाभ्युदयेन युक्तः(वाल्मीकि रामायण )
■-ईश्वरस्योत्तमस्यैनां कर्मणां गहनां गतिम्।(महाभारत सभापर्व)
■-जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं (गीता)
भगवन के कर्मो की गति बड़ी गहन है क्यो की उनका आविर्भाव और उनका कर्म ही दिव्य है वे पञ्चभौतिक तत्वो से परे दिव्य देह से युक्त होते है ।
जिनका आविर्भाव ही दिव्य हो उनका एक एक कार्य दिव्यता का पोषक होता है ।
पुराणों में जो कथा आती है कि भगवन परशुराम 21 बार पृथ्वी से क्षत्रियोँ को विहीन किया था अस्तु यह बिषय भी विचारणीय जिसे हम इस लेख के माध्यम से प्रेषित करेंगे यदि कोई त्रुटि हो तो विद्जन बिचार कर आगे का मार्गदर्शन कराएं ।।
■--पुराणे ही कथा दिव्य (महाभारत आदिपर्व 5/1)
■-आख्यानं पुराणेषु सुगोप्यक्म् (ब्रह्मवैवर्तपुराण)
इस न्याय से पुराणाख्यान् में आये हुए कथाएँ दिव्य हैं, जिस कारण इन दिव्य कथाओं को लेकर भ्रामकता उत्पन्न होना स्वाभाविक है ।
■--अक्षरग्रहादि परमोपजायमान वाक्यार्थज्ञानार्थमध्ययानं विधीयते
तत्सस्य विचारमन्तरेणासम्भवाध्यायन विधिनैवासार्थाद्विचारो विहित इति गुरुगृह एवस्थाय विचारयितव्यों धर्म: इस न्याय से गुरुमोखोच्चारणानुच्चारण सानिध्यता न प्राप्त होना ही मूल कारण है ।
अस्तु भगवन परशुराम के बिषय में महाभारत, स्कंद पुराणादि आयाख्यानों में जो यह कथा प्रसंग आया है उसे लेकर समाज मे जो भ्रांतियां उतपन्न हुआ है उसका मुख्य कारण ही है कि परम्पराप्राप्त आचार्यो की सानिध्यता न प्राप्त होना ।एक क्षण के लिए यदि हम ऐसा मान भी ले तो यद्वत प्रश्नों का निराकरण किस प्रकार होगा यह विचारणीय है ।
21 बार सम्पूर्ण पृथ्वी से क्षत्रियो का समूल नाश करना ,यदि ऐसा ही था तो इक्ष्वाकु वंश परम्परा ,जनकादि वंश परम्परा ,कैकई,कौशल्या,सुमित्रादि के पितामह आदि की वंशपरम्परा कैसे अक्षुण रही ?
माता जानकी के पाणिग्रहण संस्कार के समय मे राजऋषि जनक के दरबार मे देश विदेश से क्षत्रियकुल वंश कहाँ से आये थे ?
वाल्मीकि रामायण स्वयं भृगुकुलनन्दन परशुराम को मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के समकालीन बता रहे है ।
ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम्।
भार्गवं जामदग्न्येयं राजा राजविमर्दनम् ॥(वाल्मीकि रामायण)
●-दशरथ ,जनकादि कुल परम्परा भृगुकुलनन्दन के कालखण्ड में ही पुष्पित पल्लवित हो रहे थे ।
और महाभारत में श्रीकृष्णचन्द्र युधिष्ठिर से कह रहे है कि ऐसी कथा हमने ऋषियों से सुन रखा है !
शृणु कौन्तेय रामस्य प्रभावो यो मया श्रुतः।
महर्षीणां कथयतां कारणं तस्य जन्म च।।(महाभारत शांतिपर्व)
●-महाभारत ,और स्कन्दपुराण अयाख्यान में केवल मात्र हैहयवंशीय क्षत्रियो के बिषय में ही यह प्रकरण आया है अन्यो का नही ।
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भगवन परशुराम की शत्रुता हैहयवंशीय क्षत्रियो कुलो से था न कि सम्पूर्ण क्षत्रिय कुल से ?? हैहय वंशीय क्षत्रियो का ही समूल नाश किया था क्यो की कथा प्रसंग में केवल मात्र हैहयवंश का ही उल्लेख आया है कि सहस्त्रो बार हैहयवंशी क्षत्रियो का समुल नाश किया था ।उससे इतर किसी अन्य कुलो के बिषय में किसी भी प्रकार का कोई उल्लेख नही मिलता
■-ततः स भृगुशार्दूलः कार्तवीर्यस्य वीर्यवान्।
विक्रम्य निजघानाशु पुत्रान्पौत्रांश्च सर्वशः।।
■-स हैहयसहस्राणि हत्वा परममन्युमान्।
महीं सागरपर्यन्तां चकार रुधिरोक्षिताम्।।
स तथा सुमहातेजाः कृत्वा निःक्षत्रियां महीम्।
कृपया परयाऽऽविष्टो वनमेव जगाम ह।।(महाभारत शांतिपर्व)
■-हैहयाधिपतेर्योधैः सार्धं देवासुरोपमैः ॥
ततस्ते हैहयाः सर्वे शरैराशीविषोपमैः ॥
■-अथ भग्नं बलं दृष्ट्वा हैहयाधिपतिः क्रुधा ॥(स्कन्दपुराण)
विश्वामित्र का पौत्र रेभ्यु भरी सभा मे परशुराम जी से कहते है ययाति के यज्ञ में आये हुए नृपगण क्या क्षत्रिय नही थे? आप की प्रतिज्ञा झूठा है कि आप ने सम्पूर्ण पृथ्वी को क्षत्रियो से विहीन कर दिया ।।
■--ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः।
प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते।
■-मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि।(महाभारत शांतिपर्व)
अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि हैहयवंश से इतर सूर्यवंशी ,चन्द्रवंशी ,क्षत्रियकुल अविच्छिन रूप से पुष्पित पल्लवित हो रहे थे ।
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ब्रह्महत्या के तेज से पातक हुए सहस्त्रार्जुन एवं उनके सैनिकगण
युद्ध मे पराक्रम दिखा पाने में अक्षम थे देवयोग के कारण ही शस्त्र उठाने में एवं वैदिक मंत्रों का विस्मृत होना यह दर्शाता है कि शाहस्त्रार्जुन के पाप कर्मों का ही परिणाम था ।
■--ब्रह्महत्यासमुत्थेन पातकेन ततश्च ते ॥
■--जाता निस्तेजसः सर्वे प्रपतंति धरातले ॥
■--न शस्त्रं शेकुरुद्धर्तुं दैवयोगात्कथंचन ॥
दिव्यास्त्राणां तथा सर्वे मन्त्रा विस्मृतिमागताः (स्कन्दपुराण)
जिस प्रकार कर्ण कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में वैदिक मंत्रों का विस्मरण कर चुके थे अपने पाप कर्मों के द्वारा ठीक वही स्थिति शाहस्त्रार्जुन के साथ हुआ था परशुराम के साथ युद्ध क्षेत्र में
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वामपन्थी विचारधारा से ग्रसित देवेन्द्र सिकरवार इस कथा प्रसंग को ले कर जो घृणा फैला रहा है ब्राह्मण क्षत्रिय के मध्य
वह शास्त्रप्रतिकुल होने से अग्राह्य है ।
देवेन्द्र सिकरवार ने अपने लेख के माध्यम से यह कहा है कि गर्भ में पल रहे शिशुओं की भी हत्या परशुराम ने किया था जबकि महाभारत में ऐसा कहीं कोई प्रमाण दिख नही पड़ता ।
शैलेन्द्र सिंह

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