Saturday, 18 April 2026

यज्ञोपवीत और शूद्र

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यज्ञोपवीत


■ प्रश्न:--यज्ञोपवीत में किन किन वर्णो का अधिकार है  और इसका महत्व क्या है ?

■ उत्तर:-- ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य ये ही तीनो द्विज के अधिकारी है यज्ञोपवीत ही वह सूत्र है जिससे द्विजो को वेदादि शास्त्रो का अध्ययन में अधिकारी बनाता है बिना यज्ञोपवीत के ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य इन तीनो में से किसी को भी वेदादि में अधिकार नही ।

■ प्रश्न :--- तब तो शुद्र के साथ अन्याय हुआ उन्हें वेदादि ज्ञान से दूर रखा गया |

■ उत्तर:--- जिनका यज्ञोपवीत संस्कार न हो उसको  इतिहास पुराण आदि शास्त्रो में अधिकार है इतिहास पुराण आदि को ही पञ्चम वेद की संज्ञा प्राप्त है इतिहास पुराणादि वेदो का ही उपबृंहण (व्याख्या) है जिसको सुनने से वही ज्ञान प्राप्त होता है जो वेदो के अध्ययन से !

 वेदो का अध्ययन    दुरूह कष्टसाध्य है तो वहीं पुराण सरल और माधुर्य जिस ज्ञान को आप सरलता से पा सकते है ।

 वही कठोर नियमादि से तो सभी प्राणी बचना चाहता है ऐसे में भगवन ने आप के लिए सरलतम मार्ग और द्विजो के लिए कठिन मार्ग का बिधान किया   |

और रह गई अन्याय की बात तो शास्त्रो में शुद्र को दण्डरहित कहा गया है और ब्राह्मणो को 64 गुना दण्ड का प्रावधान है ,जहाँ शुद्रौ को खान पान आचरण आदि में स्वतंत्रता प्रदान की है वही ब्राह्मणो के लिए खानपान पहनावा,आचरण आदि पर कड़ा प्रावधान है

 ऐसे में यदि मैं पूछूँ की ब्राह्मण ही क्यो 64 गुणा दण्ड के अधिकारी है शुद्र क्यो दण्ड रहित ? आखिर क्यों शुद्रौ को स्वतंत्रता प्रदान की और ब्राह्मणो के प्रति कठोर नियम  ऐसा क्यो भाई ?

प्रश्नकर्ता मौन 😶😶

वेदादि अध्ययन में स्त्रियों का अधिकार

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शंका:-- स्त्रियों को वेदाध्ययन में अधिकार क्यो नही ?जबकि गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी कई विदुषियां हुई हैं जो स्वयं वेदो के मन्त्रद्रष्टा भी रह चुकी है ऐसे में स्त्रियों को वेदाध्ययन में अनाधिकार क्यो?

■-समाधान :--  मन्त्रद्रष्टा वे है जो यमनियम आदि का आचरण कर  अपने तपःपूत के बल पर मन्त्रो का साक्षात्कार करते है

ऋषिर्मन्त्रद्रष्टा ॥ गत्यर्थत्वात् ऋषेर्ज्ञानार्थत्वात् मन्त्रं दृष्टवन्तः ऋषयः ॥' ( श्वेतवनवासिरचितवृत्तौ उणादिसूत्रं ४॥१२९ द्रष्टव्यम्)

वेद कहता है तपस्या से ब्रह्म को जानो क्योंकि तप ही ब्रह्म है – तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व| तपो ब्रह्मेति| – तैत्तिरीयोपनिषत् / भृगुवल्ली / ०

इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत्। बिभेत्यल्प श्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।। अर्थात् इतिहास पुराण से ही वेद को समझना चाहिए। इनको नहीं जानने वाले से वेद भी डरता है कि यह मेरी हत्या कर देगा।

स्त्रियों के लिए स्वधर्मपालन पतिशुश्रूषा ही तप है यज्ञ है

नास्ति यज्ञः स्त्रियाः कश्चिन्न श्राद्धं नोप्रवासकम्।
धर्मः स्वभर्तृशुश्रूषा तया स्वर्गं जयन्त्युत।।(महाभारत अनुशाशन पर्व ४६/१३)

स्त्रीभिरनायासं पतिशुश्रूषयैव हि ।।(विष्णु पुराण ६-२-३५ )

नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् ।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते । (मनुस्मृति ५/१५५)

धर्मशास्त्रों में स्प्ष्ट कहा है स्त्री तन ,मन ,धन से अपनी पति की सेवा करे वही उसका यज्ञ ,तप,व्रत है उसी से वे अनायास धर्म की सिद्धि प्राप्त कर लेती है   मन्वादि प्रबल शास्त्र प्रमाणों से सिद्ध है कि अपनी तपस्या से पूर्वकाल में स्त्रियां वेद मन्त्रो का साक्षात्कार कर लेती थी उनकी तपस्या क्या है ? स्वधर्म पर चलने से उनको वेद्य तत्त्व का ज्ञान हो जाता था वो तपस्या है स्वधर्मपालन, देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञों का पूजन , आर्जव , इन्द्रियों पर निग्रह , अहिंसा , इसी से वे स्त्रियाँ सिद्धि  को प्राप्त कर लेती थी ऐसे में यह सिद्ध नही होता कि स्त्रियी को वेदाध्यन में अधिकार हो क्यो की स्मृति, इतिहास ,पुराणादि समस्त धर्म शास्त्र में स्त्रियों को वेदाध्ययन का अनाधिकारी ही कहा क्यो की तमुपनिय (छा०उ०) श्रुतियों का स्प्ष्ट आज्ञा है वेदविद्या में प्रवेश करने के पूर्व उपनयन सँस्कार आवश्यक है बिना उपनयन के वेदविद्या में प्रवेश का अधिकार तो ब्राह्मणो तक को नही फिर जिनका उपनयन ही न हो उसको वेदविद्या में अधिकार कैसे ? स्त्रियों के उपनयन संस्कार के बिषय में इतिहास,पुराणादि शास्त्रो में अभाव है ।

अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणां आवृदशेषतः ।। (मनुस्मृति)

वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः (मनुस्मृति)

जिस कारण वेदाध्ययन का उन्हें अधिकारी नही माना गया है

वेदे पत्नीं वाचयति न स्तृणाति (शङ्खायन श्रौतसूत्रम् ८/१२/९)

स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा " ( श्रीमद्भागवत १.४.२५)

शैलेन्द्र सिंह

परशुराम और क्षत्रियकुल वंश कथा प्रसंग

 ■--भृगुकुलनन्दन परशुराम और क्षत्रिय कुल नाश कथा प्रसंग 

●--देवेन्द्र सिकरवार मतभंजन 


जमदग्नि सूत परशुराम स्वयं हरि: के आवेशावतार है ऐसा इतिहासपुराण से सिद्ध  है ।

अवतार के बिषय में श्रुतिस्मृतिइतिहासपुरण  में जो कहा गया है वह विचारणीय है ।


■-एकं रूपं बहुधा यः करोति (क०उ० २/२/१२)

■-एको देवो बहुधा निविष्टः (तै 0आ0 ३/१४/१)

■-दिव्येन देहाभ्युदयेन युक्तः(वाल्मीकि रामायण ) 

■-ईश्वरस्योत्तमस्यैनां कर्मणां गहनां गतिम्।(महाभारत सभापर्व)

■-जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं (गीता)

भगवन के   कर्मो की गति बड़ी गहन है क्यो की उनका आविर्भाव और उनका कर्म ही दिव्य है वे पञ्चभौतिक तत्वो से परे दिव्य देह से युक्त होते है  ।

जिनका आविर्भाव ही दिव्य हो उनका एक एक कार्य दिव्यता का पोषक होता है ।

पुराणों में जो कथा आती है कि भगवन परशुराम 21 बार पृथ्वी से क्षत्रियोँ को विहीन किया था अस्तु यह बिषय भी विचारणीय जिसे हम इस लेख के माध्यम से प्रेषित करेंगे यदि कोई त्रुटि हो तो  विद्जन बिचार कर आगे का मार्गदर्शन कराएं ।।

■--पुराणे ही कथा दिव्य (महाभारत आदिपर्व 5/1)

■-आख्यानं पुराणेषु सुगोप्यक्म् (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

इस न्याय से पुराणाख्यान् में आये हुए कथाएँ दिव्य हैं, जिस कारण इन  दिव्य कथाओं को लेकर भ्रामकता उत्पन्न होना स्वाभाविक है ।

■--अक्षरग्रहादि परमोपजायमान वाक्यार्थज्ञानार्थमध्ययानं विधीयते

तत्सस्य विचारमन्तरेणासम्भवाध्यायन विधिनैवासार्थाद्विचारो विहित इति गुरुगृह एवस्थाय विचारयितव्यों धर्म: इस न्याय से गुरुमोखोच्चारणानुच्चारण सानिध्यता न प्राप्त होना ही मूल कारण है ।

अस्तु भगवन परशुराम के बिषय में महाभारत, स्कंद पुराणादि आयाख्यानों में जो यह कथा प्रसंग आया है उसे लेकर समाज मे जो भ्रांतियां उतपन्न हुआ है उसका मुख्य कारण ही है कि परम्पराप्राप्त आचार्यो की सानिध्यता न प्राप्त होना ।एक क्षण के लिए यदि हम ऐसा मान भी ले तो यद्वत प्रश्नों का निराकरण किस प्रकार होगा यह विचारणीय है  ।

21 बार सम्पूर्ण पृथ्वी से क्षत्रियो का समूल नाश करना ,यदि ऐसा ही था तो   इक्ष्वाकु वंश परम्परा ,जनकादि वंश परम्परा ,कैकई,कौशल्या,सुमित्रादि के पितामह आदि की वंशपरम्परा कैसे अक्षुण रही ?

 माता जानकी के पाणिग्रहण संस्कार के समय मे राजऋषि जनक के दरबार मे देश विदेश से क्षत्रियकुल वंश कहाँ से आये थे ?

वाल्मीकि रामायण स्वयं  भृगुकुलनन्दन परशुराम को मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के समकालीन बता रहे है ।

ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम्।

भार्गवं जामदग्न्येयं राजा राजविमर्दनम् ॥(वाल्मीकि रामायण)

●-दशरथ ,जनकादि कुल परम्परा भृगुकुलनन्दन के कालखण्ड में ही पुष्पित पल्लवित हो रहे थे ।


और महाभारत में श्रीकृष्णचन्द्र युधिष्ठिर से कह रहे है कि ऐसी कथा हमने ऋषियों से सुन रखा है !


शृणु कौन्तेय रामस्य प्रभावो यो मया श्रुतः।

महर्षीणां कथयतां कारणं तस्य जन्म च।।(महाभारत शांतिपर्व)


●-महाभारत ,और स्कन्दपुराण अयाख्यान में केवल मात्र हैहयवंशीय क्षत्रियो के बिषय में ही यह प्रकरण आया है अन्यो का नही ।

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 भगवन परशुराम की शत्रुता हैहयवंशीय क्षत्रियो कुलो से था न कि सम्पूर्ण क्षत्रिय कुल से ?? हैहय वंशीय क्षत्रियो का ही समूल नाश किया था क्यो की कथा प्रसंग में केवल मात्र हैहयवंश का ही उल्लेख आया है कि सहस्त्रो बार हैहयवंशी क्षत्रियो का समुल नाश किया था ।उससे इतर किसी अन्य कुलो के बिषय में किसी भी प्रकार का कोई उल्लेख नही मिलता 


■-ततः स भृगुशार्दूलः कार्तवीर्यस्य वीर्यवान्।

विक्रम्य निजघानाशु पुत्रान्पौत्रांश्च सर्वशः।।

■-स हैहयसहस्राणि हत्वा परममन्युमान्।

महीं सागरपर्यन्तां चकार रुधिरोक्षिताम्।।

स तथा सुमहातेजाः कृत्वा निःक्षत्रियां महीम्।

कृपया परयाऽऽविष्टो वनमेव जगाम ह।।(महाभारत शांतिपर्व)

■-हैहयाधिपतेर्योधैः सार्धं देवासुरोपमैः ॥ 

ततस्ते हैहयाः सर्वे शरैराशीविषोपमैः ॥

■-अथ भग्नं बलं दृष्ट्वा हैहयाधिपतिः क्रुधा ॥(स्कन्दपुराण)


विश्वामित्र का पौत्र रेभ्यु भरी सभा मे परशुराम जी से कहते है ययाति के यज्ञ में आये हुए नृपगण क्या क्षत्रिय नही थे? आप की प्रतिज्ञा झूठा है कि आप ने सम्पूर्ण पृथ्वी को क्षत्रियो से विहीन कर दिया ।।


 ■--ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः।

      प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते।

■-मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि।(महाभारत शांतिपर्व)


अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि हैहयवंश से इतर सूर्यवंशी ,चन्द्रवंशी ,क्षत्रियकुल अविच्छिन रूप से पुष्पित पल्लवित हो रहे थे ।

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ब्रह्महत्या के तेज से पातक हुए सहस्त्रार्जुन एवं उनके सैनिकगण 

युद्ध मे पराक्रम दिखा पाने में अक्षम थे देवयोग के कारण ही शस्त्र उठाने में एवं वैदिक मंत्रों का विस्मृत होना यह दर्शाता है कि शाहस्त्रार्जुन के पाप कर्मों का ही परिणाम था ।


■--ब्रह्महत्यासमुत्थेन पातकेन ततश्च ते ॥

■--जाता निस्तेजसः सर्वे प्रपतंति धरातले ॥ 

■--न शस्त्रं शेकुरुद्धर्तुं दैवयोगात्कथंचन ॥

दिव्यास्त्राणां तथा सर्वे मन्त्रा विस्मृतिमागताः (स्कन्दपुराण)

जिस प्रकार कर्ण कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में वैदिक मंत्रों का विस्मरण कर चुके थे अपने पाप कर्मों के द्वारा ठीक वही स्थिति शाहस्त्रार्जुन के साथ हुआ था परशुराम के साथ युद्ध क्षेत्र में

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वामपन्थी विचारधारा से ग्रसित देवेन्द्र सिकरवार इस कथा प्रसंग को ले कर जो घृणा फैला रहा है ब्राह्मण क्षत्रिय के मध्य 

वह शास्त्रप्रतिकुल होने से अग्राह्य है ।

देवेन्द्र सिकरवार ने अपने लेख के माध्यम से यह कहा है कि गर्भ में पल रहे शिशुओं की भी हत्या परशुराम ने किया था जबकि महाभारत में ऐसा कहीं कोई प्रमाण दिख नही पड़ता ।

शैलेन्द्र सिंह


Tuesday, 7 April 2026

विष्णु वृंदा भ्रमोछेदन भग 2

 


■-वृंदा विष्णु कथाप्रसंग

■--पुराणे ही कथा दिव्य (महाभारत आदिपर्व 5/1)

■-सुदुर्लभा कथा प्रोक्ता पुराणेषु (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

■-आख्यानं पुराणेषु सुगोप्यक्म् (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

पुराणों की कथाएँ दिव्य हैं, जिनके कारण पुराणादि में आए दिव्य कथाओं को लेकर भ्रामकता उत्पन्न होना स्वाभाविक है ।

■--अक्षरग्रहादि परमोपजायमान वाक्यार्थज्ञानार्थमध्ययानं विधीयते
तत्सस्य विचारमन्तरेणासम्भवाध्यायन विधिनैवासार्थाद्विचारो विहित इति गुरुगृह एवस्थाय विचारयितव्यों धर्म: इस न्याय से गुरुमोखोच्चारणानुच्चारण सानिध्यता न प्राप्त होना ही मूल कारण है।

विष्णु वृन्दा.कथा की दिव्यता भी इसी प्रकार की है।

वृंदा माता लक्ष्मी स्वरूपा हैं तो शङ्खचूड़ भगवान विष्णु का,
अंशांशी होने के कारण उनमें भेद दृष्टि ही मूर्खता का द्योतक है।

■--अंशांशिनोर्न भेदश्च ब्राह्मणवाह्निस्फुलिङ्गवत (ब्रह्मवैवर्त ब्रह्मखंड 17/37)

●--श्रीभगवानुवाच ।।

■- लक्ष्मी त्वं कल्याण गच्छ धर्मध्वजगृहं शुभे।।

अयोनिसम्भवा भूमौ तस्य कन्या भविष्यसि।।

■-तत्रैव दैवदोषेन वृक्षत्वं च लभिष्यसि।।

मदनस्यासुरस्यैव शङ्खचूडस्य कामिनी।। (ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृतिखंड 6/45-46)

हे शुभूति लक्ष्मी तुम अपने अंश से पृथ्वी पर धर्मध्वज के घर अयोनिज कन्या के रूप में प्रकट हो जाओ
वहाँ मेरे अंश से उतपन्न होने वाले शंखचूड़ की कामिनी  बनोगी जो दैववश तुलसी का रूप धारण करोगी

●-और यही बात श्रीमद्देवीभागवत पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी बताई गई है।

■--अहं च तुलसी गोपी गोलोकेऽहं स्थित पुरा।।

कृष्णप्रिया किङकारी च तदंशा तत्सखी प्रिया।।

■--सुदामा नाम गोपश्च श्रीकृष्णाङ्गसमुद्भवः।।

तदंशश्चातितेजस्वी चल्भज्जन्म भारते।।

संप्राप्तं राधाशापद्दनुवंशसमुद्भवः।।

शङ्खचूड़ इति तख्यस्त्रैलाक्ये न च तत्परः।।

(प्रकृतिखंड 16/24 एवं 30-31 श्रीमद्भागवत पुराण 9/17)

जिस कथा प्रसंग में व्याभिचार का गंध तक नहीं, उसी कथा के बिषय में भ्रांतवादी, वामपंथी, समाजी अपनी कुबुद्धि से भगवान विष्णु पर दोषारोपण करते हैं।

स्वयं अपनी पत्नी में ही रमाना किस दृष्टि से व्यभिचार हुआ ??

इस लिए भगवन् कहते है ।

■--जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं (गीता)

भगवान के दिव्य कर्मों को सर्वसाधारण लोगों के समझ से परे है।

इसके लिए तो शास्त्र बार बार की घोषणा की गई है

■-तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्। (मुंडकोपनिषद्) 

■-आचार्यवान् पुरुषो वेदः(छान्दोग्य उपनिषद)

शैलेन्द्र सिंह

Thursday, 26 February 2026

कठ कपिष्ठल साखा


 कठ, कपिष्ठल ,काठक ,आदि शाखाओं का मूल वेद ही है ।

शाखा शब्द अपने आप मे ही इस बिषय पर प्रमाण है 

शाखा पुष्पितपल्लवित तभी होता है जब उसका मूल कोई जड़ हो अतः जड़ की प्रधानता तो माननी होगी अन्यथा शाखा भी पुष्पितपल्लवीत न हो ।

कठ काठक कपिष्ठल आदि ऋषयो ने वेद बिषयों को विशिष्ट रूप से प्रचारित प्रसारित किया इस लिए वे वे शाखाएं उनके नाम से जुड़ी है कठ काठक कपिष्ठल  शाखा के प्रवचनकर्ता  ऋषयो को भी यह बोध था कि वेद अपौरुषेय है तभी वे वे ऋषिगण वेद विद्या को प्रचारित प्रसारित किया ।

महर्षि जैमनी इस बिषय को लेकर स्पष्ट रूप से अपने सूत्रों में दर्शा दिया है 

■-उक्तं तू शब्दपूर्वत्वम (जैमिनी सूत्र)

■-आख्या प्रवचनात् (जैमिनी सूत्र)

यहाँ पूर्व शब्द स्वयं वेदों की नित्यता का घोषणा कर देता है 

तथा 

■-वाचा विरूपनित्यता ------इस श्रुति से भी वेदों की नित्या सिद्ध है काठक आदि समाख्या तो प्रवचन से ही बनी है रचना से नही 

अतः जो यह कह रहे हो कि ये विद्या हमने दिया वह वेदों पर ही घात कर रहा है क्यो की उस विद्या का तो वेद स्पष्ट रूप प्रकाशित कर ही दिया है अतः उन विद्याओं को लोगो के मध्य पहुचाने अथवा उसका प्रकाशन करने  के कारण ऋषिगण आचार्यगण वंदनीय तो अवश्य है परन्तु तद्वत विद्याओं के कर्ता नही ।


शैलेन्द्र सिंह

Sunday, 22 December 2024

राम ने बाली को धोखे से मारा :--

 


इस प्रकार के राग अलापने वाले कम्युनिष्ट वामपन्थी बिचारधारा से ग्रसित लोगो का एक ही लक्ष्य होता है ब्यभिचारी पुरुष एवं अपराधियो का पालनपोषण कर उसे पुष्ट बनाना JNU आज इसका जीत जागता उदाहरण है ।

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त्रेतायुग में श्रीरामचन्द्र के समकालीन प्रत्यक्षघटना के जो साक्षी बने वे वे मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के बिषय में क्या कहते है  वह विचारणीय तथ्य है ।


●-महाराज दशरथ ---

■-अनुजातो हि मां सर्वैर्गुणैः श्रेष्ठो ममात्मजः (वा ०रा०बालकाण्ड)

■-तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम्।(वा०रा०बालकाण्ड )


●- अयोध्या जनपद के प्रजागण 


■-गुणान् गुणवतो देव देवकल्पस्य धीमतः।

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः।

क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः॥ 

मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः।

प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः॥ (वा०रा०बालकाण्ड)


●-मायावी मारीच 


■-रामो विग्रहवान् धर्मः (वा० रा०अरण्यकाण्ड) 


●-माता जनकननन्दिनी 

■-मर्यादानां च लोकस्य कर्ता (३५/११)


■-धर्मात्मा भुवि विश्रुतः।     कुलीनो नयशास्त्रवित् (वा०रा०युद्धकाण्ड)


●- राक्षसराज रावण 

■--तं मन्ये राघवं वीरं नारायणमनामयम्॥(युद्धकाण्ड ७२/११)

●मंदोदरी 

रामो न मानुषः (युद्धकाण्ड १११/१६)


★स्वयं बाली श्रीरामचन्द्र के बिषय में क्या कहते है यह और भी महत्वपूर्ण है


■--रामः करुणवेदी च प्रजानां च हिते रतः(किष्किंधा काण्ड १७/१७)

■--क्षत्रियकुले जातः श्रुतवान् (किष्किंधा काण्ड १७/२७)

■-त्वं राघवकुले जातो धर्मवानिति विश्रुतः।(किष्किंधा काण्ड १७/२८)

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एक न्यायप्रिय राजा वही है जो देशकाल अनुरूप वेद विद्या में निष्णात, न्यायविद्या  धर्माधर्मानुरूप प्राणियों पर अनुग्रह निग्रह करता है ऐसा श्रुतिस्मृति से सिद्ध है 


■-सोऽरज्यत ततो राजन्योऽजायत (अथर्ववेद १५/८/१)


■-दमः शमः क्षमा धर्मो धृतिः सत्यं पराक्रमः। पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥ (किष्किंधा काण्ड १७/१९)


■-तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।

यथार्हतः संप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु । ।(मनुस्मृति ७/१६)

समीक्ष्य स धृतः सम्यक्सर्वा रञ्जयति प्रजाः ।(मनुस्मृति७/१९)


■-आन्वीक्षिकीं त्रयीं वार्त्तां दण्डनीतिं च पार्थिवः ।

तद्विद्यैस्तत्‌क्रियोपैतैश्चिन्तयेद्विनयान्वितः 

■-आन्वीक्षिक्यार्थविज्ञानं धर्म्माधर्मौ त्रयीस्थितौ ।

अर्थानर्थौ तु वार्त्तायां दण्डनीत्यां नयानयौ ।।(अग्निपुराण २३८./८-९ )


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त्रेतायुग श्रीरामचन्द्र के समकालीनआचार्यगण,भूपति,प्रजागण असुरगण वानरादि प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा यह  सिद्ध होता है कि  श्रीरामचन्द्र  साक्षात धर्म स्वरूप, नीतिवान ,वेद विशारद, सर्वगुणसम्पन्न, देवताओ की भांति बुद्धि रखने वाला, धर्मात्मा न्यायशास्त्र का ज्ञाता गुणदोषानुरूप अनुग्रगन निग्रह करनेवाला समस्त प्रजाओ के हित करने वाला दयावान  स्वयं नारायण स्वरूप है 

इसके विपरीत 

अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रान्तवादी वामपंथिय तथाकथित हिन्दू जो उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी नही थे / है , वे आज तद्वत बिषयों को लेकर मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र पर दोषारोपण कर रहे है ।

की बाली को धोखे से मारा ।।

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अस्तु मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के शाशनकाल में बाली दुराचारी ब्यभिचारी  अपराधी  पुरुष था ,  भगवान राम को बाली के पाप का दण्ड देना था उससे युद्ध करना नही बाली अपराधी था प्रतिद्वंदी नही दण्ड विधान और युद्ध धर्म दोनों में भेद है छिप कर मारना युद्ध में अधर्म है पर दण्ड बिधान के लिए नही युद्ध धर्म में तो निशस्त्र को मारना अधर्म है पर दण्ड देते समय इसका कोई मूल्य नही यदि राजा अपने राज्य के अपराधी को बिना अस्त्र दिए मरवा दे तो क्या कहा जायेगा ?

राजा ने धोखे से मरवा दिया ? 

बाली का जो अपराध था वह अति निंदनीय और समाज मे ब्यभिचार उतपन्न करने वाला था इस लिए श्रीरामचन्द्र ने उनको इस अतिनिन्दनीय कर्म  का दण्ड शास्त्रानुकूल ही दिया ।।


विद्वान राजा धर्म से भ्रष्ट हुए पुरुषों को दण्ड देता है और धर्मात्मा पुरुष का धर्मपूर्वक पालन करते हुए कामासक्त स्वेच्छाचारी पुरुषों के निग्रह में तत्पर रहते है ।

धर्म और काम तत्व को जानने वाले दुष्टों पर निग्रह और साधु पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिए तत्पर रहते है ।


■-गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन्

 भरतः कामयुक्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः।। (वा०रा०४/१८/२४)


■-धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रतः॥(वा०रा०४/१८/७)


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श्रीरामचन्द्र के बाणों से बिंध जाने के पश्चात बाली श्रीरामचन्द्र से यह पूछता है कि 

हे राम आप ने यहाँ मेरा वध करके कौन सा गुण प्राप्त किया किस महान यश का उपार्जन किया ? 


■-कोऽत्र प्राप्तस्त्वया गुणः। यदहं युद्धसंरब्धस्त्वत्कृते निधनं गतः॥(किष्किंधा काण्ड १७/१६)


बाली के प्रश्नों को सुनकर मर्यादापुरुषोत्तम बाली के गुणदोषों को दर्शाते हैं ।


■--त्वं तु संक्लिष्टधर्मश्च कर्मणा च विगर्हितः।(वा०रा०४/१८/१२)

तदेतत् कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः। भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्॥

अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः। रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत्॥  तद् व्यतीतस्य ते धर्मात् कामवृत्तस्य वानर। भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन् दण्डोऽयं प्रतिपादितः॥

नहि लोकविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः। दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप॥  (वा०रा०४/१८/-१८१९-२०-२१)


बाली तुम्हारा कर्म सदा ही धर्म मे बाधा पहुँचानेवाला रहा तुम्हारे बुरे कर्म के कारण सत्पुरुषों में निन्दा का पात्र हुआ ।

बाली मैंने तुम्हें क्यो मारा इसका कारण सुनो और समझो तुम सनातन धर्म का त्याग करके अपने छोटे भाई की स्त्री से सहवास करते हो इस महामना सुग्रीव के जीते जी इसकी पत्नी रूमा का जो तुम्हारी पुत्रवधु के समान है कामवस उपभोग करते हो इस लिए तुम पापाचारी हो इस तरह तुम धर्मभ्रष्ट हो स्वेच्छाचारी हो गए हो और अपने छोटे भाई की स्त्री को गले लगाते हो तुम्हारे इसी अपराध के कारण तुम्हे दण्ड दिया गया ।जो लोकाचार से भ्रष्ट हो लोकविरुद्ध आचरण करता हो उसे रोकने और रास्ते पर लाने के लिए मैं दण्ड के सिवाय और कोई राह नही देखता ।


■-औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः॥ 

 प्रचरेत नरः कामात् तस्य दण्डो वधः स्मृतः (वा०रा०४/१८/२२)


जो पुरुष अपनी कन्या बहन अथवा छोटे भाई के स्त्री के पास काम भावना से जाता है उसका वध करने ही उपयुक्त दण्ड माना गया है ।


●बाली दुराचारी ब्यभिचारी पाप कर्मों में सदा लिप्त  रहता था ऐसा 


बुद्धि के आठो अंगों से अलंकृत हनुमान कहता है कि बाली 

क्रूरकर्मा निर्दयी पापाचारी है 


■-तं क्रूरदर्शनं क्रूरं नेह पश्यामि वालिनम्॥  (कि०काण्ड २/१५)

पापकर्मणः (कि०काण्ड२/१६)

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दण्ड के यथोचित उपयोग प्रयोग से लोक में सत्य की प्रतिष्ठा होती है सत्य की प्रतिष्ठा से धर्म का उत्कर्ष होता है ।

लौकिक और वैदिक मर्यादाओं के संरक्षक तथा वर्णसंकर्ता एवं कर्मसंकर्ता के निरोधक मात्स्यन्यायका अवरोधक उपवीत सुशिक्षित अभिसिक्त अराजको के दमन तथा सज्जनों के संरक्षण में दक्ष विनयी शाशक ही राजा मान्य है ।


शैलेन्द्र सिंह

Friday, 28 June 2024

बालविवाह

 ■-- बालविवाह


सनातन वैदिक धर्म मे ऐसा कोई भी कुप्रथा नही जो सम्पूर्ण भूतसमुदाय के लिए अपकल्याणकारक  हो सनातन धर्म में तो मनुष्य ,पशु,पक्षी,पिपीलिका बृक्षलता आदी तक मे उसी परमेश्वर की कल्पना करने का जो आदेश दिया है वह विश्व के किसी और धर्मशास्त्रों के दृष्टिगोचर नही होता ।


■-सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छान्दोग्य उपनिषद)

■-सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो (गीता)


जिस संस्कृति में समस्त भुसमुदाय में ईश्वर की कल्पना की गई हो वह संस्कृति कैसे किसी मानवी हितों के लिए अपकल्याणकारक हो सकता है 

सनातन धर्म से इतर अन्य मत मजहब पन्थ रिलीजन में आये हुए कुरीतियों को अध्यरोपित सनातन धर्म मे नही किया जा सकता


बालविवाह के नाम पर सनातन धर्म के प्रति वामपन्थियों ,सेक्युलरवादियों, मिशनिरिज द्वारा जो मिथ्या प्रचार प्रसार किया गया वह अप्रमाणिक होने के कारण अग्राह्य है ।।


सनातन संस्कृति व संस्कार  ईश्वरमूला होने से सद्मूला है, चिद्मूला है, आनन्दमूला है,


संस्कार का अर्थ है सजाना-संवारना, पूर्णता प्रदान करना।  इसके लिए उसके अन्दर दिव्य गुणों का आधान किया जाता है। 

 इसमें मुख्य 16 संस्कार हैं जिसके द्वारा मानव के मूल दिव्य, परिपूर्ण स्वरूप को प्रकट करने की चेष्टा की जाती है इन 16 संस्कारों में एक संस्कार है पाणिग्रहण का है पाणिग्रहण संस्कार को लेकर सनातन धर्म शास्त्र क्या है यह जानना भी आवश्यक है जिन्हें तद्वत बिषयों का ज्ञान नही वे ही सनातनधर्म संस्कारो पर घात किया करते है ।।


श्रुति कहता है कि मनु ने जो कहा वह भैषज (औषधि) है  और भैषज होने से समस्त मानवजाति के लिए ग्राह्य है 

■-यद् वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम् | ( तैत्तिरीय सं०२/२/१०/२) 

■-मनु र्वै यत् किञ्चावदत् तत् भेषज्यायै | (- ताण्ड्य-महाब्रा०२३/१६/१७)


तो महर्षि मनु ने पाणिग्रहण संस्कार के बिषय में क्या कहा ?


■--त्रिणि वर्षाण्युदिक्षेत कुमार्यार्तुमति सती |

ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देता सदृशं पतिम् ||(मनुस्मृति  ९/९० )

ऋतुमती होने के तीन वर्ष तक प्रतीक्षा करें उसके पश्चात समान योग्य वर को वरण करें ठीक यही कथन महर्षि मनु  श्लोक संख्या ९३ में भी कहता है कि जब कन्या ऋतुमती हो जाय तभी उसका वरण करना चाहिए ।।

#कन्यां_ऋतुमतीं_हरन् (९/९३)और यदि न किया तो पाप के भागी होंगे  


महर्षि मनुप्रोक्त इस बिधान की पुष्टि बौधायन धर्मसूत्र वशिष्ठधर्म संहिता एवं महाभारत भी करता है 


■-त्रीणि वर्षाण्य् ऋतुमतीं यः कन्यां न प्रयच्छति ।(बौधायन धर्मसूत्र ४/१/१२)

■-कुमार्य्यृतुमती त्रिवर्षाण्युपासीतोर्द्धं (वशिष्ठ संहिता )


■-त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कन्या ऋतुमती सती (महाभारत अनुशासन पर्व ४४/१६)


जिन बिषयों पर समस्त धर्माचार्य का मतैक्य  हो उस बिषय की प्रमाणिकता पर सन्देह कहाँ ?


सनातंधर्मसंस्कृति आर्यावर्त देशीय होने के कारण यह आचरण सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए मानवहितों को देखते हुए कल्याणकारी है क्यो की भारत मे एक कन्या का ऋतुगमन (पीरियड्स) 13 वर्ष के पश्चात ही देखा जाता है ऋतुगमन होने के तीन वर्ष पश्चात ही सनातनधर्म शास्त्रों ने विवाह का आदेश दिया है 13+3 अर्थात 16 वर्ष तक कि आयु सनातन धर्मशास्त्र निश्चित करता है 

बाल विवाह को लेकर सनातन धर्म शास्त्र में एक भी प्रमाण दृष्टिगोचर नही होता ।


शैलेन्द्र सिंह