कठ, कपिष्ठल ,काठक ,आदि शाखाओं का मूल वेद ही है ।
शाखा शब्द अपने आप मे ही इस बिषय पर प्रमाण है
शाखा पुष्पितपल्लवित तभी होता है जब उसका मूल कोई जड़ हो अतः जड़ की प्रधानता तो माननी होगी अन्यथा शाखा भी पुष्पितपल्लवीत न हो ।
कठ काठक कपिष्ठल आदि ऋषयो ने वेद बिषयों को विशिष्ट रूप से प्रचारित प्रसारित किया इस लिए वे वे शाखाएं उनके नाम से जुड़ी है कठ काठक कपिष्ठल शाखा के प्रवचनकर्ता ऋषयो को भी यह बोध था कि वेद अपौरुषेय है तभी वे वे ऋषिगण वेद विद्या को प्रचारित प्रसारित किया ।
महर्षि जैमनी इस बिषय को लेकर स्पष्ट रूप से अपने सूत्रों में दर्शा दिया है
■-उक्तं तू शब्दपूर्वत्वम (जैमिनी सूत्र)
■-आख्या प्रवचनात् (जैमिनी सूत्र)
यहाँ पूर्व शब्द स्वयं वेदों की नित्यता का घोषणा कर देता है
तथा
■-वाचा विरूपनित्यता ------इस श्रुति से भी वेदों की नित्या सिद्ध है काठक आदि समाख्या तो प्रवचन से ही बनी है रचना से नही
अतः जो यह कह रहे हो कि ये विद्या हमने दिया वह वेदों पर ही घात कर रहा है क्यो की उस विद्या का तो वेद स्पष्ट रूप प्रकाशित कर ही दिया है अतः उन विद्याओं को लोगो के मध्य पहुचाने अथवा उसका प्रकाशन करने के कारण ऋषिगण आचार्यगण वंदनीय तो अवश्य है परन्तु तद्वत विद्याओं के कर्ता नही ।
शैलेन्द्र सिंह

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