Sunday, 30 July 2023

शिवलिङ्ग बिषय भ्रांति का भ्रमोछेदन



शब्द अर्थों के प्रतिपादक होते है शब्दों के कारण ही हमे अर्थ (बिषय) का बोध होता है   शब्दो के मूल अर्थ का त्याग कर यदि हम मनमाना अर्थ ग्रहण करने लगे  तो अतिव्यापति  दोष लगेगा जिससे शब्दार्थ मर्यादा भी भंग हो और हम किसी निश्चित बिषय पर एकमत होंने से रहे ।

जन समुदाय में आज शिवलिङ्ग बिषय को लेकर जो भ्रांतियां वयाप्त हुई हैं वह शब्द के मूल अर्थों का त्याग कर मनमाना अर्थ ग्रहण करने के कारण ही हुआ है ।


●लिङ्ग शब्द का अर्थ संस्कृत शब्दकोश में चिन्ह प्रतीक,लक्षण ही लिया गया है 

यदि जिज्ञासा का भाव हो तो आप संस्कृत हिंदी शब्दकोश पर जाकर स्वयं ही इस तथ्य की पुष्टि कर सकते है ।

 मैं अपनी ओर से  संस्कृत हिंदी शब्दकोष का लिंक भी दे रहा हूँ चाहे तो वहाँ सर्च कर देख ले ।


https://sanskritdictionary.com/?iencoding=iast&q=%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97&lang=sans&action=Search


अस्तु न्याया,वैशेषिक, सांख्य,मीमांसादी  सिद्धांत में सभी के सभी आचार्यो ने  लिङ्ग का अर्थ चिन्ह रूप में ही ग्रहण किया यथा धूम्र अग्नि का लिंग है तो

 इच्छा,द्वेष,प्रयत्न, सुख,दुख,ज्ञान  आत्मा का लिंग ।

इंद्रियों के अपने अपने बिषयों से जो सम्बन्ध है एवं उससे भिन्न ज्ञान की उत्पति मन का लिङ्ग (लक्षण) है ।

निष्क्रमण और प्रवेश यह आकाश का लिङ्ग (लक्षण)है 


●इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गम् (न्याय दर्शन)

●युगपत्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ।(न्याय दर्शन )

●निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ।( वैशेषिक-२,१.२० )

●अव्यक्तं त्रिगुणाल्लिङ्गात् । (सांख्यसूत्र-१.१३६)


  लिङ्ग शब्द से लोकप्रसिद्ध मांसचर्ममय  शिश्न यदि ग्रहण करें तो अर्थ का अनर्थ ही होगा 

और तद्वत  बिषयों की सिद्धि भी न हो ।


 

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शिवमहापुराण में शिवलिङ्ग को अव्यक्त अगोचर कहा गया है जो तत्वबिषय इन्द्रिय प्रमाण का बिषय ही नही उस तत्वबिशेष को पंचभौतिक मांसचर्ममय स्थूल शिश्न मानना ही मूढ़ता का परिचायक है ! 


●अनिर्देश्यं च तद्रूपमनाम कर्मवर्जितम् ।।

अलिंगं लिंगतां प्राप्तं ध्यानमार्गेप्यगोचरम् ।।(रुद्रसंहिता ७/६६)


●तो प्रश  उठता है कि शिवलिंग आखिर है क्या ?


जिससे इस सम्पूर्ण चराचरात्मक जगत् उत्पन्न होता है एवं 

जिसमे यह समस्त निखिल जगत् का लय हो जाता है वही लिंग पद वाच्य है ।


●लिंगेप्रसूतिकर्तारं (विद्येश्वर संहिता १६/१०६)

●लयनाल्लिंगमित्युक्तं तत्रैव निखिलं जगत् ।।(रुद्रसंहिता १०/ ३८ ।।)

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 पुराणों  में जहां भी शिवलिङ्ग विषय पर व्यक्तरूप से वर्णन आया है वहाँ वहाँ  ज्योतिर्मय अग्निस्वरूपा ही ग्रहण किया गया है ।

जिसकी तेजोमयी शक्ति तिनोलोको को भस्मीभूत करने वाला कहा गया है ।


●ज्योतिर्लिंगे महादिव्ये वर्णिते ते महामुने।। (शतरुद्र संहिता ४२/२१)

●गौतमस्य प्रार्थनया ज्योतिर्लिंग स्वरूपतः (शतरुद्रसंहिता ४२/३४)


●तल्लिंगेनाखिलं दग्धं भुवनं सचराचरम् (रु०सं० सतीखण्ड २९/२४)


शिवमहापुराण के विद्येश्वरसंहिता  खण्ड में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठतम होने का विवाद होने लगा तो उन दोनों के मध्य तेजोमय महाग्नि स्तम्भ प्रकट हुआ ।


●महानलस्तंभविभीषणाकृतिर्बभूव तन्मध्यतले स निष्कलः ।

ते अस्त्रे चापि सज्वाले लोकसंहरणक्षमे ।

निपतेतुः क्षणे नैव ह्याविर्भूते महानले (विद्येश्वर संहिता ७/११-१२)


ब्रह्मा विष्णु के मध्य प्रकट हुए महाग्नि स्तम्भ को देख आश्चर्यचकित हो ब्रह्मा विष्णु ने कहा यह इन्द्रिय अगोचर अग्निरूपा क्या उठा जो अनादि है 


●अतींद्रि यमिदं स्तंभमग्निरूपं किमुत्थितम् (विद्येश्वर संहिता ७/१३)

●अनाद्यंतमिदं स्तंभम (विद्येश्वर संहिता ९/१९)


 ब्रह्मा विष्णु जैसे देवता भी उस अव्यक्त अगोचर महाग्निरूपा स्तम्भ को समझने में अस्क्य रहे तो हम जैसे क्षुद्र बुद्धि वाले मनुष्यो की क्या औकात जो उस तत्वबिषय को समझ पाए !

जो अनादि अनन्त है उस ब्रह्मतत्त्व को पूर्णरूप से जानने में भला कौन सम्सर्थ ??

 जिसका आदि और अंत न तो ब्रह्मा ही पा सके और न ही विष्णु ।उस तत्व बिषय को लेकर अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रान्तवादियो का कहना है कि 

शिवलिङ्ग  पंचभौतिक मांसमय स्थूल शिश्न है  ।


अस्तु चिन्मय आदिपुरुष ही शिवलिङ्ग है समस्त पीठ अम्बामय है भगवन शङ्कर कहते है कि जो संसार के मूलकारण महाचैतन्य को और लोक को लिङ्गात्मक जानकर पूजन करता है वही मेरा प्रिय है ।

लिङ्ग चिन्ह है सर्वस्वरूप की पूजा कैसे हो इसलिए लिङ्ग की कल्पना है आदि एवं अंत मे जगत् अण्डाकृति ही रहता है अतएव ब्रह्माण्ड की आकृति ही शिवलिङ्ग है यज्ञिको के यहाँ वेदी की स्त्रीरूप, में कुण्ड को योनि रूप में , और अग्नि रुद्र की लिङ्ग रूप में उपासना होती है ।

शिवलिङ्ग में विश्व प्रसूता की दृष्टि से अर्चना करनी चाहिए क्यो की सम्पूर्ण जगत् में किसी भी प्रकार के गुण,कर्म,द्रव्य - लिङ्ग ,और योनि (कारण) के बिना सम्भव ही नही ।

जो जगत् के सृष्टि, स्थिति,लय, के कारण है उस तत्व विशेष को पाञ्चभौतिक मांसचर्ममय शिश्न मानना  मूर्खता की पराकाष्ठा ही है ।


#शैलेन्द्र_सिंह

Tuesday, 15 November 2022

बिकाश दिब्यकीर्ति मत भञ्जन



आखिर बिकास दिब्यकीर्ति ने श्रीमद्वाल्मीकी रामायण से  उन प्रसङ्गो को उपदिष्ट क्यो नही किया ?

महाभारत में आये हुए रामोख्यान पर्व से ही क्यो किया ?

स्वान  की दृष्टि जूठन पर ही रहती ,और बिकाश दिब्यकीर्ति ने भी अपनी मानसिकता से स्वान होने का ही परिचय दिया ।


वामपंथी गिरोह को यदि सबसे ज्यादा चिढ़ है तो  मर्यादा पुरुषोत्तम राम से जो भारतीय संस्कृति के रोम रोम में बसता है  वही राम जो साक्षात धर्म स्वरूप है वही राम जिनकी यशोगान की गाथा युगों युगों से प्रवाहमान है यह पहली बार नही हुआ है हर कालखण्डन में ऐसे दूषण माता सीता की पवित्रता और श्रीरामचन्द्र की मर्यादाओं को तार तार करने का भरपूर प्रयास किया है ।

जिस प्रकार समस्त प्राणियों को आह्लादित करने वाला सूर्य चमगादड़ो और उल्लुओं को नही रुचता ठीक उसी प्रकार मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र धर्मदूषको को नही रुचता क्यो की धर्मदूषको को दण्ड देने का ही कार्य भगवन् श्रीरामचन्द्र ने किया था ।

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■● रावण वध के पश्चात   जनकनन्दिनी जब श्रीरामचन्द्र के समक्ष उपस्थित हुई तो ।

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी ने सीता को ग्रहण करने से मना कर दिया

ठीक यही वृतान्त महाभारत के रामोपख्यान पर्व में आया है 

श्रीमद्वाल्मीकी रामायण और महाभारत में तद्वत बिषयों को लेकर व्याख्यान करने की शैली भी भिन्न भिन्न है इस लिए स्वाध्यायादी अल्पता के कारण लोगो मे तद्वत बिषयों को लेकर भ्रम होना भी स्वाभाविक है ।


श्रुतियों का मत है कि जिस मंत्र बिषय आदि के द्रष्टा जो ऋषि है वही उस बिषय में प्रामाणिक माने जाएंगे ।

अतः महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण ही श्रीरामचन्द्र माता सीता दसरथ आदि के बिषय में भी प्रामाणिक माने जाएंगे क्यो की चतुर्मुखी ब्रह्मा के अनुग्रह से ही श्रीरामचन्द्र माता सीता के गुप्त और प्रकट चरित्र का ज्ञान महर्षि वाल्मीकि को हुआ था ।


वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् ।

रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥

रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः ।

वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ।। (वा० रा०बालकाण्ड २/३३/३४)


 फिर हम भला तद्गत बिषयों के लिए अन्य का अनुगमन क्यो करें ?

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श्रीरामचन्द्र साक्षात धर्म स्वरूप है #रामो_विग्रहवान्_धर्मः


 उनका एक एक आचरण धर्मानुकूल होने से ग्राह्य है महाभारत में ही स्वयं श्रीरामचन्द्र के धर्मसम्मत निर्णय को ऋषिमुनि देवगण प्रसंसा करते है ।


■● पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि। (महाभारत०रामोपख्यान पर्व    २९१/३०)


श्रीरामचन्द्र ने ऐसा क्यो किया ??

लोकापवाद के भय से यदि ऐसा न करते तो उन्हें ब्यभिचारी पुरुष होने का कलङ्क लगता जो युगों युगों से चले आरहे इक्ष्वाकु वंश के कीर्ति को ध्वस्त करता जिसका मार्जन भी न हो पाए 

श्रीमद्वाल्मीकी रामायण में इसी बिषयों को स्पष्टता से दर्शाया है ।


■●-जनवादभयाद्राज्ञो बभूव हृदयं द्विधा | (वा०रा युद्ध काण्ड ११५/११)

●-लोकापवाद के भय से श्रीरामचन्द्र का हृदय विदीर्ण हो रहा था 


० वही महारत में इसी बिषय को भिन्न शैली में दर्शाया गया है 


■● रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कितः (महाभारत रामोपख्यान २९१/१०)

●- श्रीरामचन्द्र जी को जनकनन्दिनी में सन्देश हुआ कि पर पुरुष के स्पर्श से सीता अपवित्र तो न हो गयी ?


इस लिए श्रीरामचन्द्र ने ऐसा वचन कहा  धर्म सिद्धांत को जानने वाला कोई भी पुरुष दूसरे के हाथ मे पड़ी हुई नारी को मुहूर्तभर के लिए भी कैसे ग्रहण कर सकता है तुम्हारा आचनर बिचार शुद्ध रह गया हो अथवा असुद्ध अब मैं तुम्हे अपने उपयोग में नही ले सकता ठीक उसी तरह जैसे कुत्ते के द्वारा चाटे गए पवित्र हविष्य को कोई ग्रहण नही करता ।


■●-कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन्धर्मविनिश्चयम्।

परहस्तगतां नारीं मुहूर्तमपि धारयेत् ।।(महाभारत रामोपख्यान २९१ १२)

सुवृत्तामसुवृत्तां वाऽप्यहं त्वामद्य मैथिलि।

■●-नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ।।(महाभारत रामोपख्यान २९१/१३)


पूर्व और पश्चात में आये हुए श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीरामचन्द्र का कथन धर्म सम्मत था जिसके बिषय में दिब्यकीर्ति ने उपदिष्ट न कर केवल एक ही श्लोक की कुटिलता पूर्वक व्यख्या कर लोगो मे भ्रामकता फैलाया ।


■●-पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि। (महाभारत०रामोपख्यान पर्व    २९१/३०)


●-हे राम तुम राजऋषियो के धर्म पर चलने वाले हो अतः तुममें ऐसा सद्विचार होना आश्चर्य की बात नही ।


श्रीमद्वाल्मीकी रामायण में माता सीता स्वयं की पवित्रता का प्रमाण समस्त लोगो के सामने अग्निपरीक्षा दे कर की वही महाभारत में माता सीता के शुद्धि के बिषय में समस्त देवताओं स्वीकार किया और श्रीरामचन्द्र से माता जानकी को ग्रहण करने को कहा ।

(महाभारत रामोपख्यान पर्व अध्याय २९१)

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बिकाश दिब्यकीर्ति जैसे धूर्त सम्पूर्ण प्रसङ्ग को न दर्शा कर केवल एक श्लोक के माध्यम से अपनी अपने मनोरथ को सिद्ध करने की जो कुचेष्टा की इससे उसके विक्षिप्त मानसिकता का ही प्रकाशन होता है 

और कुछ नही ।

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एक ही बिषय को ऋषिमुनिगण भिन्न भिन्न शैली में व्याख्यान करते है जिससे भ्रम उतपन्न होना स्वभाविक है इस लिए श्रुतियाँ बार बार घोषणा करती है


■● वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।


नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]


■●आचार्यवान् पुरुषो हि वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)


■● तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् ) 


शैलेन्द्र सिंह

Wednesday, 11 May 2022

माता सीता अयोनिजा थी

 #माता_सीता_के_विषय_में_अज्ञता


वरुण पाण्डेय शिवाय जी के इस पोस्ट पर कुल 51 लोगो ने सहमति जताई है जिसका हमने स्क्रीनशॉट लगाया है ।



शिष्ट पुरुषों का लक्षण है कि धर्मादि बिषयों पर सप्रमाण आपने कथनों को रखा जाय तो वह सम्मानीय होता है पाण्डेय जी ने जिन मुख्य बिषयों के ओर संकेत किया है वह मुझे युक्तियुक्त जान नही पड़ते यदि कोई युक्तियुक्त प्रमाण हो तो पाण्डेय जी प्रकाशित कर अपने प्रतिज्ञा वाक्य को सिद्ध करें 

नम्बर एक (१) माता सीता का जन्म यज्ञ योग्य क्षेत्रमण्डल का हल से कर्षण करने से उनका प्रकाट्य नही हुआ था 

नम्बर (२) यदि माता सीता भूमिजा नही थी तो इसका स्पष्ट अर्थ निकलता है कि माता सीता साधारण स्त्रियों की भांति योनिज है ।

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वाल्मीकि रामायण के विरुद्ध जितने भी वृत्तांत है वह अनादर्णीय है ।


इतिहासो में वाल्मीकि रामायण श्रेष्ठ है 

■--नास्ति रामायणात् परम् (स्कंद पुराण उत्तर खण्ड रा०आ० ५/२१)

क्यो की 

■--रामायणमादिकाव्य सर्वेदार्थ सम्मतं (स्कंद पुराण उत्तर खण्ड रा०आ० ५/६४)

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■--धर्मस्य_सूक्ष्मतवाद्_गतिं (महाभारत)

धर्म की गति अति सूक्ष्म है अतः हम जैसे अल्पज्ञ अल्पश्रुतो में भ्रम होना स्वाभाविक भी है ।

इस लिए श्रुतियों ने स्पष्ट घोषणा की है 


■-वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।


नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]


■-आचार्यवान् पुरुषो  वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)


■--तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् ) 

अतः धर्मादि बिषयों पर निज मतमतान्तर के वशीभूत हो बिषयों के अर्थ का अनर्थ करना शास्त्रो की हत्या करने जैसा बीभत्स पाप का कारण होता है ।

■--बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति (महाभारत आदिपर्व)


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माता जानकी का आविर्भाव साधारण स्त्रियों की भांति नही हुआ   वे तो  अयोनिजा है 

जो भगवती देवी जगत् जननी है जो शक्ति स्वरूपा महामाया है जो समस्त जगत् की प्रसूता है उनकी प्रसूता भला कौन हो ??

इस लिए शास्त्रो में उस जगत् जननी को अयोनिजा होने का दिग्दर्शन भी कराता है तिमिर रोग से ग्रसित व्यक्ति को समस्त बिषयों में ही खोंट दिखे तो इसमें भला शास्त्र का क्या दोष ??


■---अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छद्विचिन्तयन् (वा०रा०२/११८/ )


■--वीर्य शुल्का इति मे कन्या स्थापिता इयम् अयोनिजा (वा०रा १/६६/१४)


माता जानकी के अयोनिजा होने की घोषणा केवल मात्र वाल्मीकि कृत रामायण ही नही अपितु विष्णुधर्मोत्तर पुराण भी करता है 


■---भूय सीता समुत्पन्ना जनकस्य महात्मनः ।। 

अयोनिजा महाभागा कर्षतो यज्ञमेदिनीम् (विष्णु धर्मोत्तर पुराण )

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जो जगत् जननी दिव्य स्वरूपा है उनका आविर्भाव भी दिव्य ही होगा 

न कि साधारण स्त्रियों की भांति ??


माता जानकी जब देवी अनुसूया के मध्य सम्वाद होता है तो माता सीता कहती है ।


■--तस्य लाङ्गलहस्तस्य कर्षत: क्षेत्रमण्डलम् । 

अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपते: सुता (वा०रा० २/११८/२८)


महाराज जनक यज्ञ के योग्य क्षेत्र को हाथ मे हल लेकर जोत रहे थे उसी समय मैं भूमि से बाहर प्रकट हुई ।


माता सीता द्वारा  ठीक यही वृतान्त अग्नि परीक्षण के प्रसङ्ग में भी कहा गया है 


■--उत्थिता मेदिनीं भित्वा क्षेत्रे हलमुखक्षते |

पद्मरेणुनिभैः कीर्णा शुभैः केदारपांसुभिः॥ (रामायण सुन्दर काण्ड सर्ग १८)

केवल वाल्मीकि रामायण ही क्यो वेदव्यास कृत पद्मपुराण में भी यही कथा देखने को मिलता है ।


■--अथ लोकेश्वरी लक्ष्मीर्जनकस्य निवेशने ।

शुभक्षेत्रे हलोद्धाते सुनासीरे शुभेक्षणे ॥ (पद्मपुराण ६/२४२/१००)

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माता जानकी के बिषय में मिथिला नरेश जनक महर्षि विश्वामित्र से कहते है 


■--अथ मे कृषतः क्षेत्रम् लांगलात् उत्थिता मम ॥

क्षेत्रम् शोधयता लब्ध्वा नाम्ना सीता इति विश्रुता ।

भू तलात् उत्थिता सा तु व्यवर्धत मम आत्मजा ॥ (वा०रा०१/६६/१३-१४)


राजा जनक के बिषय में श्री हरि: स्वयं घोषणा करते है 


कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः (गीता)


अतः मिथिला नरेश स्वप्न में भी मिथ्या भाषण न किया होगा फिर तो भूत भविष्य के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र के समक्ष मिथ्या भाषण कैसे करते ??

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माता जानकी के बिषय में वरुण पाण्डेय द्वारा अपुष्ट अप्रामाणिक कथनों के बिषय में विद्वजन बिचार करें ।।

यदि मुझसे  कोई त्रुटि हो तो विद्जनो से अनुरोध है कि विनम्रता पूर्वक उन त्रुटियों को रेखांकित करें धन्यवाद 


#शैलेन्द्र_सिंह

Monday, 14 March 2022

गौतम बुद्ध के गृहत्याग का सच









सिद्धार्थ गौतम  के गृहत्याग के बिषय में जो कथाएं प्रचलित है वह यह है 

एक दिन जब वह भ्रमण पर निकले तो उन्होंने एक वृद्ध को देखा जिसकी कमर झुकी हुई थी और वह लगातार खांसता हुआ लाठी के सहारे चला जा रहा था। थोड़ी आगे एक मरीज को कष्ट से कराहते देख उनका मन बेचैन हो उठा। उसके बाद उन्होंने एक मृतक की अर्थी देखी, जिसके पीछे उसके परिजन विलाप करते जा रहे थे।


ये सभी दृश्य देख उनका मन क्षोभ और वितृष्णा से भर उठा, और गृहत्याग कर   परिव्रज्या ग्रहण किया  जब सिद्धार्थ गौतम ने परिव्रज्या ग्रहण किया तब उनकी आयु 29 वर्ष की थी । 

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■-सिद्धार्थ गौतम ने 29 वर्ष की आयु होने पर ही  एक बृद्ध ,रोगी और मृत व्यक्ति को पहली बार देखा होगा  यह व्याख्या तर्क की कसौटी पर कसने पर खरी उतरती प्रतीत नहीं होती. त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में भी गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख तक नहीं है.

■-पुनश्च प्रश्न उठेगा की फिर उनके परिव्रज्या की कथाओं का श्रोत क्या है और किसने उसे लिखा ??

सिद्धार्थ गौतम के मृत्यु के 1000 वर्ष पश्चात भदन्त बुद्धघोष इन कथाओं का सृजन किया और उसे प्रचारित प्रसारित किया ।

■--सिद्धार्थ गौतम ने परिव्रज्या के बिषय में सुतनिपात के खुद्दक निकाय में स्वयं कहते है ।

मुझे शस्त्र धारण करना भयावह लगा यह जनता कैसे झगड़ती है देखो मुझमे संवेग कैसे उतपन्न हुआ यह मैं बताता हूँ अपर्याप्त पानी मे जैसे मछलियां छटपटाती है वैसे एक दूसरे के बिरोध करके छपटाने वाली प्रजा को देख कर मेरे अन्तःकरण में भय उतपन्न हुआ चारो ओर का जगत् असार दिखाई देने लगा सभी दिशाएं कांप रही है ऐसा लग एयर उसमे आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नही मिला क्यो की अंत तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध देख कर मेरा जी ऊब गया ।


संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ 

फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।

अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥

समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।

इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।(खुद्दक निकाय )

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■--सिद्धार्थ गौतम के गृहत्याग के पीछे का सच ---

शाक्यो की राजधानी का नाम कपिलवस्तु था जहाँ सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ था ।

शाक्यो का अपना संघ हुआ करता था और इस संघ से जुड़े हुए व्यक्ति को संघ के नीतियों आदर्शो एवं शाक्यो के रक्षण हेतु प्रतिबद्ध होना पड़ता था । इस संघ के सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु  20 वर्ष  का था  संघ में दीक्षित होने के पूर्व संघ के नीतियों आदर्शो से  परिचय कराया जाता था उन नीति आदर्शो के रक्षण के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होना पड़ता था उसके पश्चात जनमत संग्रह के द्वारा यह सुनिश्चित होता था कि अमुक व्यक्ति संघ से जुड़ सकता है अथवा नही ।

सिद्धार्थ गौतम को अपने वर्णाश्रम धर्म अनुसार वेद वेदाङ्ग एवं क्षात्र धर्म अनुरूप शिक्षण दिक्षण हुआ था सिद्धार्थ गौतम जब 20 वर्ष के हुए तब संघ से जुड़ने के लिए आमंत्रण भेजा गया सिद्धार्थ गौतम ने उस आमंत्रण को स्वीकार कर संघ में जुड़ने के इच्छुक हुए ।

संघ के सेनानायक ने संघ के नीतियों आदर्शो को सिद्धार्थ गौतम के समक्ष प्रेसित किया सिद्धार्थ गौतम संघ के नीति आदर्शो को पढ़ कर पूर्ण रूप से संतुष्ट हुए एवं भरी सभा मे प्रतिज्ञा ली कि मैं संघ के नीतियों आदर्शो का पालन अक्षरसः रूप से करूँगा यदि किसी भी प्रकार से मैं दोषी पाया जाता हूँ तो संघ अपने नीतियों के अनुरूप मुझे दण्ड का भागी भी बना सकता है ।

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संघ से जुड़े सिद्धार्थ गौतम को अब 8 से 9 वर्ष बीत चुके थे यही वह समय था जब सिद्धार्थ गौतम के जीवन मे वह घटनाएं घटती है फलस्वरूप उन्हें मजबूरन गृहत्याग करना पड़ा ।

शाक्यो के राज्य से सटा हुआ कोलियों का राज्य था रोहिणी नदी दोनों राज्यो के विभाजक रेखा थी ।

शाक्यो और कोलियों दोनों ही अपने राज्य में सिंचाई के लिए रोहिणी नदी के ऊपर दोनों राज्य निर्भर था ।

पानी को लेकर ही शाक्यो और कोलियों के मध्य झगड़ा हुआ और बात यहाँ तक आ पहुची की दोनों के मध्य युद्ध का माहौल बना ।

इस बिषय को लेकर शाक्यो ने संघ का अधिवेशन बुलाया और उस सभा मे सभी ने अपने अपने पक्ष का प्रस्ताव रखा ।

संघ के सेनानायक युद्ध के पक्ष में था और सिद्धार्थ गौतम युद्ध के विरुद्ध अपना मत दिया की युद्ध समस्या का हल नही है ।

इस बिषय को लेकर पुनः जनमत संग्रह हुआ ।

जनमत संग्रह में संघ के सेनानायक को ही प्रधानता मिली और सिद्धार्थ गौतम का पक्ष बहुत बड़े बहुमत से अमान्य सिद्ध हुआ 

दूसरे दिन सेनानायक ने संघ की पुनः सभा बुलाई ।

जब सिद्धार्थ गौतम ने देखा कि जनमत संग्रह में उसे पराजय का मुह देखना पड़ा तब सभा को सम्बोधित करते हुए सिद्धार्थ गौतम ने कहा मैत्रो आप जो चाहो कर सकते हो आप के साथ जनमत संग्रह है लेकिन मुझे खेद के साथ यह कहना पड़ रहा है कि मैं आप सभी के मत का बिरोध करता हूँ मैं किसी भी प्रकार से युद्ध मे भाग नही लूंगा 

तब संघ के सेनानायक ने सिद्धार्थ गौतम को सम्बोधन करते हुए कहा सिद्धार्थ उस शपथ को तुम याद करो जब संघ के सदस्य बनते समय ग्रहण किया था ।

यदि तुम अपने वचनों का पालन न करोगे तो तुम दण्ड का भागी भी बन सकते हो ।

संघ अपनी आज्ञा की अवहेलना करने वाले को फांसी की सजा अथवा देशनिकाला घोषित भी किया जा सकता है ।

केवल इतना ही नही संघ तुम्हारे परिवार को सामाजिक बहिष्कार भी कर सकता है ।

इस लिए इन तीनो में से एक का चुनाव तुम कर सकते हो

(१) सेना में भर्ती हो युद्ध मे भाग लो 

(२) फांसी पर लटकना अथवा देशनिकाला स्वीकार करो 

(३) अपने परिवार का सामाजिक बहिष्कार एवं खेतो की जब्ती 


सेनानायक के इन वचनों को सुन कर सिद्धार्थ गौतम ने कहा कृपया मेरे परिवार को दण्डित न करे उसका सामाजिक बहिष्कार न करें वे निर्दोष है मैं अपराधी हूँ ।

इस लिए दण्ड का पात्र भी मैं ही हूँ ।

इस लिए मैंने एक आसान रास्ता चुना है  की मैं परिव्राजक बन देश से बाहर चला जाऊं ।

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सिद्धार्थ गौतम संघ के नीतियों के विरुद्ध गया फलस्वरूप वे दण्ड के पात्र भी बने और देश निकाला घोषित किया गया जिसे परिव्रज्या के नाम से प्रचारित प्रसारित किया गया ।

मैंने अपने प्रमाण में जिन लेखों का उद्धरण दिया है उस पुस्तक का स्क्रीन शॉट भी प्रेसित कर रहा हूँ ताकि लोग यह न समझे कि मैंने अपने मतों की पुष्टि के लिए केवल कपोलकल्पित शब्दो का सहारा लिया ।

पुस्तक के लेखक :--बौद्धाचार्य भदन्त आनन्द कौशल्यायन 

एवं श्रीमान भीमराव अंबेडकर जी है ।

इनके लेखों को अब तक बौद्ध मत के किसी भी सम्प्रदाय ने खण्डन नही किया क्यो की वे भी जानते है कि बुद्ध के परिव्रज्या ग्रहण के बिषय में त्रिपिटिक आदि ग्रन्थों में कोई उल्लेख नही है ।


#शैलेन्द्र_सिंह

Friday, 11 March 2022

देवराज इंद्र को महर्षि गौतम का शाप देना



एक महाशय ये भी है #Shailesh_k_yadav


जो महर्षि गौतम पर आक्षेप लगा रहे  है कि अहिल्या को ही शाप दिया इंद्र को क्यो नही ।

 हिन्दुओ की सबसे बड़ी दुर्दशा तो यह है कि वे अपने अधिकार अनुरूप शास्त्रो का अध्ययन नही करते ।वामपन्थियों ,ईशाइयो ,इस्लामिक ,एवं तथाकथित बुद्धिजीवियो द्वरा प्रचारित ,प्रसारित बिषयों को तो पढ़ लेते है परन्तु बिषयों के मूल शास्त्रो को नही पढ़ते  , जिस कारण आज यह स्थिति बन पड़ी है धर्मद्रोही दुष्टों द्वरा प्रचारित बिषयों को ही सत्य मान कर उसे स्वीकार भी लेते है और हीन भावना से ग्रसित भी रहते ही ।

जिस कारण इन जैसे धर्मदूषको का बाजार भी चलता है ।

यदि #शैलेश_के_यादव जी  विशुद्ध हिन्दू होते तो वे अपने मुलशास्त्रो का ही अध्ययन किये होते ।

ऐसा न करने का एक कारण वर्णसंकरता भी हो सकता है ।


इसने जो आक्षेप लगाया है वह वाल्मीकि रामायण में स्प्ष्ट दर्शया गया है कि इंद्र द्वरा छल करने पर महर्षि गौतम ने इंद्र शाप दिया था ।

जब महर्षि गौतम इंद्र को शाप दे ही दिए तो भला श्रीरामचन्द्र पुनः उसे दण्ड क्यो दे ??

और वहाँ दण्ड देने का भी अधिकार महर्षि गौतम का था सो महर्षि गौतम ने दोनों को दण्ड दिया ।


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वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग ४८ श्लोक संख्या -२८-२९


अकर्तव्यम् इदम् यस्मात् विफलः त्वम् भविष्यति ॥

गौतमेन एवम् उक्तस्य स रोषेण महात्मना ।

पेततुः वृषणौ भूमौ सहस्राक्षस्य तत् क्षणात् ॥


इससे बड़ा और दण्ड किसी के लिए क्या हो सकता है । 

कलिकाल में ऐसे लोग ही असुर है जो हमारे संस्कृतियों पर घात करते है जैसे त्रेता युग मे महर्षि विश्वामित्र को यज्ञादि कर्मकाण्ड में असुरगण बाधा देते थे वैसे ही आजकल ये लोग भी असुरगण ही है ।


#बिशेष:-- इतना ही कहूंगा कि अपने अपने वर्णाश्रमधर्मानुसार अध्ययन करते रहे तभी बिषयों के गूढ़ रहस्य को समझ पाएंगे और धर्मदूषको को उसका उत्तर दे पाएंगे ।


शैलेन्द्र सिंह

Thursday, 17 February 2022

दयानंद सरस्वती मुखमर्दन

 #स्वामी_दयानंद_मुख_मर्दन


स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से समाज मे ब्यभिचार फैलाने की कुचेष्टा की ताकि सनातन धर्म मे वर्णसंकरता को आसानी से फैलाया जा सके नियोग के माध्यम से , जिस भारत भूमि में सती सावित्री ,माता अनुसूया ,माता सीता के पवित्रता का गुणगान आज भी घर घर गाय जाता रहा है उसी भारत भूमि में बालिकाओं और स्त्रियों के चरित्रहनन का पाठ पढ़ाया जा रहा है सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से  |

स्वामी दयानन्द सरस्वती जानते थे कि हिन्दुओ में वेदो के प्रति अटूट श्रद्धा है हिन्दुओ की आस्था जितनी ईश्वर में है उससे भी कहीं ज्यादा आस्था वेदो के प्रति है इस लिए नियोग को सिद्ध करने के लिए वैदिक के दिब्य ऋचाओ को अपने कुबुद्धि द्वरा अनर्थ कर लोगो के मध्य  प्रचारित प्रसारित   किया ।

भले ही मन्त्रो के वास्तविक अर्थ को विकृत कर लोगो के समक्ष क्यो न परोसा जाय ,स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ऋग्वेद के १० वे मण्डल के १० वां सूक्त के मन्त्र को आधार बनाया ,और मन्त्र को विकृत रूप से भाष्य कर प्रचारित किया ||  ताकि सामाजिक रूप से नियोग को मान्यता प्राप्त हो और कर्मणा जातिवाद को बढ़ावा मिले । स्वामी दयानन्द सरस्वती ने जिस मन्त्र को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया वह मन्त्र भी अधूरा है और अपने कथनों को सिद्ध कर पाए इसके लिए दयानन्द ने मन्त्रो को कांटछांट कर उसकी व्याख्या भी कर दी जो यह है 


अन्यमि॑च्छस्व सुभगे॒ पतिं॒ मत् ॥ (ऋग्वेद १०/१०) 


दयानन्द भाष्यार्थ :-जब पति सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ होवे तब अपनी स्त्री को आज्ञा दे हे सुभगे सौभाग्य की इच्छा करने हारी स्त्री तू मुझसे अन्य दूसरे पति की इच्छा कर क्यो की  अब मुझसे सन्तानोत्पत्ति न हो सकेगी तब स्त्री दूसरे से सम्बन्ध बना कर सन्तानोतप्ति करे ।

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अब आते है मूल बिषय पर :-- स्वामी दयानन्द सरस्वती ने जिस मन्त्र को कांट छांट कर व्याख्या की वह मन्त्र पूरा का पूरा यहाँ दिखलाया जा रहा है आप सब भी अवलोकन करें 


आ घा॒ ता ग॑च्छा॒नुत्त॑रा यु॒गानि॒ यत्र॑ जा॒मयः॑ कृ॒णव॒न्नजा॑मि ।


उप॑ बर्बृहि वृष॒भाय॑ बा॒हुम॒न्यमि॑च्छस्व सुभगे॒ पतिं॒ मत् ॥(ऋग्वेद १०/१०/१०)


भाष्यार्थ :-- यम अपने बहन यमी से कहता है 

(ता उत्तरा युगानी घा आगच्छान्) वह युग भविष्य में आ जाएंगे  (यत्र) जिसमे (जामयः) भगिनियां (अजामी कृणवन् ) बंधुत्व के बिहीन भ्राता को पति बनावेगी इसलिए हे (सुभगे) सुन्दरी 

(मत् अन्यं पतिं इच्छस्व) मुझसे भिन्न अन्य सुयोग्य वर को पति बनाने की इच्छा कर (बृषभाय बाहुं उप बर्बृहि ) बीर्य सेवन करने में समर्थ बाहु का आश्रय ले  ।


स्वामी दयानन्द ने भाई बहन के मध्य हुए सम्वाद को  पति पत्नी का सम्वाद बना डाला और लोगो के मध्य भ्रामकता का प्रचार किया की ( मैं सन्तानोतप्ति करने में असमर्थ हूँ इस लिए सन्तानोपत्ति के लिए तू किसी अन्य पुरुष से सम्बन्ध बना)


  किसी को यहाँ शंका हो सकती है कि यह भाई बहन का सम्वाद कैसे ??

किसी भी बिषय पर व्याख्या करने से पहले पूर्व में आये हुए प्रसंग का बिचार कर पश्चात आये हुए बिषयों की व्याख्या होती है दसवे मण्डल के पूरा का पूरा दसवां सूक्त सहोदरता की पुष्टि करता है ।  ऋग्वेद के दसवां मण्डल यम यमी सूक्त के नाम से जाना जाता है  यम यमी दोनों सहोदर (भाई बहन)  है यमी अपने भाई यम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है  यम अपने बहन यमी को यह कहते हुए प्रस्ताव को ठुकरा देता है  की जो भ्राता अपने भगिनी को पत्नी रूप में स्वीकार करता है  समाज मे लोग उसे पापी कहते है अतः तू  मुझसे भिन्न किसी दूसरे सुयोग्य वीर्यवान पुरुष को पति बना  ऐसा दिब्य सन्देश को स्वामी दयानन्द ने विकृत कर भाई बहन के मध्य हुए सम्वाद को पतिपत्नी बना डाला ।

वेदो का सन्देश दिब्य अलौकिक अपौरुषेय है वेदो का एक एक शब्द दिब्य ज्ञान को प्रकाशित करने वाला जिसकी समानता विश्व का कोई भी पौरुषेय (मानवी कृत) पुस्तक समानता नही कर सकता उसी दिब्य सन्देशो को दयानन्द सरस्वती ने विकृत कर सनातन धर्म ग्रन्थों पर घात किया है ।

स्मृतिकारों ने ठीक ही कहा है कि वेद अल्पश्रुत से डरता है कि कहीं वे मेरी हत्या न कर दे ।

केवल इतना ही नही दयानन्द सरस्वती ने इसी चतुर्थ समुल्लास में स्त्रियों को 11 -11 पुरुषों से सम्बन्ध  बनाने को कहा है जैसे इस्लाम मे हलाला प्रथा है ठीक उसी प्रथा के चलन का वकालत दयानन्द सरस्वती ने किया है अपने बिचारो के माध्यम से और लोक में ढोल पीटा जाता है कि दयानन्द सरस्वती ने वैदिक धर्म की रक्षा की , यह सब कितना सही है आप सभी विद्वतजन बिचार करें  ||

सनातन धर्म अपने आप मे पवित्रता का द्योतक है इसमें अपवित्र बिचारो का कोई स्थान नही ।

शैलेन्द्र सिंह


Wednesday, 16 February 2022

गुरु लक्षण और स्कूली शिक्षक भाग --3



तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।(गीता)


श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान्स्वधर्मे निविशेत वै । 

श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं अनुतिष्ठन्हि मानवः ।। (मनुस्मृति)


कार्याकार्यव्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत जितने भी संस्कार है उनमें शास्त्रो का स्पष्ट घन्टाघोष है की कैसे उसे आचरण में लाया जाए फिर वेदविद्या आदि तथा आचार्यो के प्रति शास्त्र मौन कैसे रहे ?

लौकिक तथा पारलौकिक कल्याण हेतु मोक्षरूपी विद्या प्रदान करने वाले गुरु अथवा आचार्य का लक्षण क्या है और कौन इसका अधिकारी है शाश्त्रो ने बृहदरूप से इस पर प्रकाश डाला है 


एतद्‍देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।

  स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा:॥(मनुस्मृति)

जो अग्रजन्मा है उसी से पृथ्वी के सभी मानव अपना आचार बिचार सीखें ।


ब्राह्मण सभी वर्णो में।अग्रजन्मा है 

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् (ऋग्वेद)

उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्येष्ठ्याद्ब्रह्मणश्चैव धारणात् ।

सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १.९३ )


वेदादि शास्त्रो में ब्राह्मण को मुख कहा गया है !

वाक् और बुद्धि  ही अंग प्रत्यंग से लेकर साम्राज्य तक का शाशन करता है यह दृष्टान्त जगत में देखा जाता है जिस कारण किस वर्ण का क्या आचरण है यह ब्राह्मण से ही जानना चाहिए क्यो ?

क्योकि 

वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १०.३ )

उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।(मनुस्मृति )

ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यां अधिजायते ।(मनुस्मृति)

पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः।।(महाभारत -- आदिपर्व ८१/२०)


ब्राह्मण स्वयं धर्म स्वरूप है । 

जिस कारण श्रुतिस्मृति आदि ग्रन्थों में ब्राह्मण के सानिध्य में ही  अध्ययन अध्यापन और आचार बिचार की शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया गया है 


गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः(महाभारत आदिपर्व १/२८/३५)

अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः ।

प्रब्रूयाद्ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः । । 

सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्त्युपायान्यथाविधि ।

प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् । । (मनुस्मृति १०/१-२)

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् (श्रीमद्भागवतगीता १८- ४२ )

वृत्त्यर्थं याजयेदज्वान्यानन्यानध्यापयेत् तथा ।

कुर्यात् प्रतिग्रहादानं गुर्वर्थं न्यायतो द्रिजः (विष्णु पुराण ३/२३ )

सास्त्रज्ञा नित्य है और सास्त्रज्ञा मानने वाला ही ईश्वर का आराधना करता है सास्त्र द्रोही नही विष्णुपुराण का उद्घोष है अब उसे न मान मनमाना आचरण को ही धर्म मान ले तो उससे बड़ी और मूर्खता क्या ।


वर्णास्वमेषु ये धर्माः शास्त्रोक्ता नृपसत्तम ।

तेषु तिष्ठन् नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ।(विष्णु पुराण ३/ १९ )

कहाँ श्रुतिस्मृति प्रोक्त वर्णाश्रमधर्म  आचरित गुरु तो कहाँ  भौतिक शिक्षा के बल पर प्राप्त किया हुआ संवैधानिक पद  अतः यह नीतान्त भ्रामक प्रचार है कि स्कूली शिक्षक और गुरु समतुल्य है 

शैलेन्द्र सिंह