Friday, 28 June 2024

बालविवाह

 ■-- बालविवाह


सनातन वैदिक धर्म मे ऐसा कोई भी कुप्रथा नही जो सम्पूर्ण भूतसमुदाय के लिए अपकल्याणकारक  हो सनातन धर्म में तो मनुष्य ,पशु,पक्षी,पिपीलिका बृक्षलता आदी तक मे उसी परमेश्वर की कल्पना करने का जो आदेश दिया है वह विश्व के किसी और धर्मशास्त्रों के दृष्टिगोचर नही होता ।


■-सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छान्दोग्य उपनिषद)

■-सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो (गीता)


जिस संस्कृति में समस्त भुसमुदाय में ईश्वर की कल्पना की गई हो वह संस्कृति कैसे किसी मानवी हितों के लिए अपकल्याणकारक हो सकता है 

सनातन धर्म से इतर अन्य मत मजहब पन्थ रिलीजन में आये हुए कुरीतियों को अध्यरोपित सनातन धर्म मे नही किया जा सकता


बालविवाह के नाम पर सनातन धर्म के प्रति वामपन्थियों ,सेक्युलरवादियों, मिशनिरिज द्वारा जो मिथ्या प्रचार प्रसार किया गया वह अप्रमाणिक होने के कारण अग्राह्य है ।।


सनातन संस्कृति व संस्कार  ईश्वरमूला होने से सद्मूला है, चिद्मूला है, आनन्दमूला है,


संस्कार का अर्थ है सजाना-संवारना, पूर्णता प्रदान करना।  इसके लिए उसके अन्दर दिव्य गुणों का आधान किया जाता है। 

 इसमें मुख्य 16 संस्कार हैं जिसके द्वारा मानव के मूल दिव्य, परिपूर्ण स्वरूप को प्रकट करने की चेष्टा की जाती है इन 16 संस्कारों में एक संस्कार है पाणिग्रहण का है पाणिग्रहण संस्कार को लेकर सनातन धर्म शास्त्र क्या है यह जानना भी आवश्यक है जिन्हें तद्वत बिषयों का ज्ञान नही वे ही सनातनधर्म संस्कारो पर घात किया करते है ।।


श्रुति कहता है कि मनु ने जो कहा वह भैषज (औषधि) है  और भैषज होने से समस्त मानवजाति के लिए ग्राह्य है 

■-यद् वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम् | ( तैत्तिरीय सं०२/२/१०/२) 

■-मनु र्वै यत् किञ्चावदत् तत् भेषज्यायै | (- ताण्ड्य-महाब्रा०२३/१६/१७)


तो महर्षि मनु ने पाणिग्रहण संस्कार के बिषय में क्या कहा ?


■--त्रिणि वर्षाण्युदिक्षेत कुमार्यार्तुमति सती |

ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देता सदृशं पतिम् ||(मनुस्मृति  ९/९० )

ऋतुमती होने के तीन वर्ष तक प्रतीक्षा करें उसके पश्चात समान योग्य वर को वरण करें ठीक यही कथन महर्षि मनु  श्लोक संख्या ९३ में भी कहता है कि जब कन्या ऋतुमती हो जाय तभी उसका वरण करना चाहिए ।।

#कन्यां_ऋतुमतीं_हरन् (९/९३)और यदि न किया तो पाप के भागी होंगे  


महर्षि मनुप्रोक्त इस बिधान की पुष्टि बौधायन धर्मसूत्र वशिष्ठधर्म संहिता एवं महाभारत भी करता है 


■-त्रीणि वर्षाण्य् ऋतुमतीं यः कन्यां न प्रयच्छति ।(बौधायन धर्मसूत्र ४/१/१२)

■-कुमार्य्यृतुमती त्रिवर्षाण्युपासीतोर्द्धं (वशिष्ठ संहिता )


■-त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कन्या ऋतुमती सती (महाभारत अनुशासन पर्व ४४/१६)


जिन बिषयों पर समस्त धर्माचार्य का मतैक्य  हो उस बिषय की प्रमाणिकता पर सन्देह कहाँ ?


सनातंधर्मसंस्कृति आर्यावर्त देशीय होने के कारण यह आचरण सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए मानवहितों को देखते हुए कल्याणकारी है क्यो की भारत मे एक कन्या का ऋतुगमन (पीरियड्स) 13 वर्ष के पश्चात ही देखा जाता है ऋतुगमन होने के तीन वर्ष पश्चात ही सनातनधर्म शास्त्रों ने विवाह का आदेश दिया है 13+3 अर्थात 16 वर्ष तक कि आयु सनातन धर्मशास्त्र निश्चित करता है 

बाल विवाह को लेकर सनातन धर्म शास्त्र में एक भी प्रमाण दृष्टिगोचर नही होता ।


शैलेन्द्र सिंह

Friday, 31 May 2024

- भगवन् विष्णु और वृंदा कथा भ्रमोच्छेदन ।।



■--पुराणे ही कथा दिव्या (महाभारत आदिपर्व ५/१)


पुराणों की कथाएं दिव्य है अतः परम्पराप्राप्त आचार्यो  की सानिध्यता न प्राप्त होने   के कारण पुराणादि में आये हुए दिव्य कथाओं  को लेकर भ्रम उतपन्न होना स्वाभाविक है क्यो की पुराणों की जो दिव्यता है वह सर्वसाधारण नही जिस कारण अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रान्तवादियो का मत इन दिव्य कथाओं को लेकर भ्रमित रहता है क्यो की 

■--अक्षरग्रहणादि परम्परोपजायमान वाक्यार्थज्ञानार्थमध्ययनं विधीयते

ततस्तस्य विचारमन्तरेणाSसम्भवाध्ययनविधिनैवाSर्थाद्विचारो विहित इति गुरुगृह एवावस्थाय विचारयितव्यों धर्म: इस न्याय से गुरुमोखोच्चारणानुच्चारण सानिध्यता न प्राप्त होना ही कारण है ।


अब आते है विष्णु वृंदा कथा प्रसङ्ग पर 

इस प्रसङ्ग के दो भेद है 

■--प्रथम स्वयं वृंदा ने श्रीकृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया था जिसका फल उन्हें मिला 

■--द्वितीय :-- शङ्खचुड़ के आतंक से त्रस्त हो कर एवं माता पार्वती के पतिव्रत धर्म को नष्ट करने के कारण अवध्य शङ्खचुड़ (जलन्धर) का वध हुआ 

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प्रथम प्रसङ्ग :-- 


वृंदा कौन ? थी यह जानना भी अत्यंत आवश्यक है जितना कि आवश्यक यह बिषय 

वृंदा पूर्वजन्म में तुलसी नामक गोपिका थी जो स्वयं श्रीकृष्ण की अनुचरी उनकी अंशस्वरूपा थी 

अहं तु तुलसी गोपी गोलोकेऽहं स्थिता पुरा ॥ 

■-कृष्णप्रिया किंकरी च तदंशा तत्सखी प्रिया ।(श्रीमद् देवी भागवतम् ९/१७)

राधा की  अंशस्वरूवा होने के कारण वृंदा का श्रीकृष्ण के प्रति  विशेष अनुराग उतपन्न होना स्वभाविक था इस लिए वृंदा मन ही मन श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने की इच्छा करती थी और  श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने की इच्छा से कठिन तप भी किया था 


■-सर्वैर्निषिद्धा तपसे जगाम बदरीवनम् ।

तत्र देवाब्दलक्षं च चकार परमं तपः ॥ 

मनसा नारायणः स्वामी भवितेति च निश्चिता ।(श्रीमद् देवी भागवतम् ९/१७/१३-१४-१५)

वृंदा की यह मनोदशा को देख कर रास की अधिष्ठात्री देवी राधिका ने तुलसी (वृंदा) को शाप देती है कि तू मानव योनि को प्राप्त हो उसके पश्चात  श्रीकृष्ण ने तुलसी(वृंदा ) से कहा की हे तुलसी (वृंदा) तू भारतवर्ष में जन्म लेकर घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी के वरदान से मेरे अंशस्वरूप चतुर्भुज विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करोगी ।

तुलसी(वृंदा) दूसरे जन्म में घोर तप के बल से ब्रह्मा को प्रसन्न करता है

और उनसे वर मांगता है ।

■--अहं नारायणं कान्तं शान्तं सुन्दरविग्रहम् ॥ 

■-साम्प्रतं तं पतिं लब्धुं वरये त्वं च देहि मे (श्रीमद् देवी भागवतम् ९/१७/२७ एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खण्ड १५/२८)

■-मदंशं त्वं चतुर्भुजम् ।।
लभिष्यसि तपस्तप्त्वा भारते ब्रह्मणो वरात् (ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खण्ड १५/२७)

ब्रह्मा जी वृंदा की मनोदशा जान कर  वरदान देता है कि इस जन्म में सुदामा (शङ्ख चुड़) की पत्नी बनोगी और बाद में शांतस्वरूप नारायण को पति रूप में वरण करोगी 


■-अधुना तस्य पत्‍नी त्वं सम्भविष्यसि शोभने ॥ 

पश्चान्नारायणं शान्तं कान्तमेव वरिष्यसि । (देवी भागवतम् ९/१७)

■-नारायणं तं सर्वेशं कान्तं प्राप्स्यसि निश्चितम् ।।
तपः कृतं यदर्थे च पुरा बदरिकाश्रमे ।। (ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृतिखण्ड १७/७१)


अतः यह दोषारोपण करना ही व्यर्थ है कि विष्णु ने वृंदा के साथ अनाचार किया अस्तु स्वयं वृंदा ही विष्णु को पतिरूप में पाने की इच्छा से घोर तप किया था जिसका फल भी वृंदा को प्राप्त हुआ उस पर भी भगवन् विष्णु अपने मायाशक्ति के बल से ही वृंदा में अपने तेज का आधान किया था यहाँ माया शब्द से पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर का कल्पना करना ही व्यर्थ है । 


■-तपस्त्वया कृतं साध्वि मदर्थे भारते चिरम् ।।
त्वदर्थे शङ्खचूडश्च चकार सुचिरं तपः ।। 
■-कृत्वा त्वां कामिनीं कामी विजहार च तत्फलात् ।।
अधुना दातुमुचितं तवैव तपसः फलम् ।।(ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृतिखण्ड २१/२९-३०)

■-गत्वा तस्यां मायया च वीर्याधानं चकार ह (श्रीमद् देवी भागवतम् ९/२३/१२)


श्रीहरि: के श्रीमुख से निकल हुआ यह वचन से यह प्रमाणित हो जाता है कि जो जो भक्त जिस जिस स्वरूप में भगवन् का चिन्तन करते है भगवन् उस उस रूप में उसको प्राप्त होता है 

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता)


अतः वृंदा ने जिस रूप में भगवन् का स्मरण कर तपस्या की थी वह फलीभूत हुई वृंदा का भगवन् विष्णु को पतिरूप में संकल्पना ही शङ्खचुड़ (जलन्धर) के वध का कारण बना ।


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दूसरा प्रसङ्ग :--


दैत्यराज शङ्खचुड़ देवताओं के साथ जो अन्याय किया उसका बखान दैत्यराज शङ्खचुड़ (जलन्धर)स्वयं अपने ही मुख से कहता है ।


■-अहमेव शङ्‌खचूडो देवविद्रावकारकः (श्रीमद्देवी भागवतम् ९/१८/६८)


★-देवताओं को संत्रस्त करनेवाला मैं ही शङ्खचुड़ हूँ । 


शङ्खचुड़ ने केवल देवताओं को संतप्त ही नही किया अपितु उनके अधिकार छीन कर उन्हें उनके राज्य से निष्कासित कर दर दर भिक्षुओं की भांति ठोकरे खाने के लिए मजबूर किया 


■-देवानामसुराणां च दानवानां च सन्ततम् ॥ 

गन्धर्वाणां किन्नराणां राक्षसानां च शान्तिदः ।

हृताधिकारा देवाश्च चरन्ति भिक्षुका यथा ॥ 

। (श्रीमद्देवी भागवतम् ९/१९/४४)


■-दैत्यराजेन तेनातिहन्यमानास्समंततः ।।

धैर्यं त्यक्त्वा पलायंत दिशो दश सवासवाः ।।(शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड )

दैत्यायुधैः समाविद्धदेहा देवास्सवासवाः ।।

■-रणाद्विदुद्रुवुस्सर्वे भयव्याकुलमानसाः ।।

पलायनपरान्दृष्ट्वा हृषीकेशस्सुरानथ ।। (शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड १७/१-२-)


★-इस भयवाह व्यकुलता से संतप्त हो समस्त देवगण कभी ब्रह्मा के सरण में जाते है तो कभी विष्णु के सरण में तो कभी शिव के सरण में ।

■-ते सर्वेऽतिविषण्णाश्च प्रजग्मुर्ब्रह्मणः सभाम् । (श्रीमद्देवी भागवतम् ९/१९/४४)

वैकुंठं प्रययुस्सर्वे पुरस्कृत्य प्रजापतिम् ।।

■-तुष्टुवुस्ते सुरा नत्वा सप्रजापतयोऽखिलाः ।।(शिवपुराण रुद्र०युद्ध० १६/२)

तस्योद्योगं तथा दृष्ट्वा गीर्वाणास्ते सवासवाः ।।

■-अलक्षितास्तदा जग्मुः कैलासं शंकरालयम् ।। (शिवपुराण रुद्र०युद्ध० २०/१४)


देवताओं के इस दीनता को को देख भगवन् शिव अपना दूत पुष्पदन्त को शङ्खचुड़ के पास भेजता है और विनम्रता से देवताओं के राज्य एवं उनका अधिकार वापस करने के लिए कहता है 


■-राज्यं देहि च देवानामधिकारं च साम्प्रतम् ॥ (श्रीमद्देवी भागवतम् ९/२०/२४ ॥)

★-भगवन् शङ्कर के दूत पुष्पदन्त ने शङ्खचुड़ से कहा कि 

देवताओं के राज्य तथा अधिकार उन्हें लौटा दो ।


■-देहि राज्यं च देवानां मत्प्रीतिं रक्ष भूमिप ।

सुखं स्वराज्ये त्वं तिष्ठ देवास्तिष्ठन्तु वै पदे ॥ 

॥(श्रीमद्देवी भागवतम् ९/२१/- ४२ )


हे राजन तुम देवताओं के राज्य वापस कर दो और मेरी प्रीति की रक्षा करो तुम अपने राज्य में सुख पूर्वक रहो और देवता अपने स्थान पर रहे प्राणियों में परस्पर विरोध नही होना चाहिए ।

यहाँ भगवन् शिव की विनम्रता।तो देखिए कि भगवन् शिव शङ्खचुड़ को उसके दुष्कृत्यो को सहन कर दैत्यराज के सामने विनम्र प्रार्थना कर रहे है कि देवताओं के राज्य एवं उनके अधिकार को वापस कर दो  परन्तु दैत्यराज तो दैत्यराज है अपने अहंकार मद में चूर कहाँ किसी की सुनने वाले दैत्यराज के मना करने पर भगवन् शिव और दैत्यराज शङ्खचुड़ के साथ घोर संग्राम हुआ जहाँ शङ्खचुड़ अजेय रहे उनके अजेय रहने का मुख्य कारण वृंदा का पतिव्रतधर्म का प्रभाव ही रहा जिस कारण वह अजेय बना रहा । और उसी रक्षा आवरण के बल पर देवताओं को संतप्त करता रहा ।


●- पतिव्रत धर्म के बिषय में 

माता पार्वती कहती है कि पतिव्रत धर्म से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नही 


■-पातिव्रतसमो नान्यो धर्मोऽस्ति पृथिवीतले  (शिवमहापुराण रुद्र०युद्ध० २२/५२)


इसी पतिव्रत धर्म के प्रभाव के कारण माता सीता रावण को भस्मीभूत करने के लिए सावधान करता है इसी पतिव्रता धर्म के बल पर माता सीता के कहने पर अग्नि अपने उग्र प्रभाव को न दिखा कर  हनुमान को शीतलता का अनुभव करता है ।


यहाँ तक तो सब ठीक था दैत्यराज द्वारा देवताओं के अधिकार छीन लेने के पश्चात भी  कल्याणकारी शङ्कर शांतचित्त रह शंखचूड़ को देवताओं के अधिकार वापस करने के लिए विनम्रता भी करता है 

परन्तु जब शङ्खचुड़ ने माता पार्वती पर कुदृष्टि डाली और उनका पतिव्रत धर्म नष्ट करने को उद्धत हुआ तब शङ्कर प्रलयंकर बन कर उभरा और विष्णु की सहायता से शङ्खचुड़ का वध किया यदि भगवन् विष्णु ने इस मार्ग को न अपनाता तो न जाने कितने ही स्त्रियों पर अपनी कुदृष्टिडाल उनका पतिव्रत धर्म नष्ट किया होता ।


जलांधर भगवती का रूपस्मरण कर काम ज्वर से पीड़ित हो मोहित हुआ 


■-तद्रूपश्रवणादासीदनंगज्वरपीडितः ।।(शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड १९/२)

 

शङ्खचुड़ ने  अपने दूत से कहा कि कैलाशपर्वत पर जाओ और शङ्कर से कहो ।

इस भुवन के भूपति स्वामी जब विद्यमान है तो तुम्हे स्त्रिरत्न जाया को हमे दे दो क्यो की रत्नभोगी हम है त्रिलोकी में जितने रत्न है वह सब मेरे यहाँ विद्यमान है चर अचर सब जगत् को तुम मेरे अधीन जानो 

इस लिए हे जटाधारी तुम अपनी स्त्री रत्न को मेरे निमित प्रदान करो ।


■-मन्नाथे भुवने योगिन्नोचिता गतिरीदृशी ।।

जायारत्नमतस्त्वं मे देहि रत्नभुजे निजम् ।।

यानियानि सुरत्नानि त्रैलोक्ये तानि संति मे ।।

मदधीनं जगत्सर्वं विद्धि त्वं सचराचरम् ।। (शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड १९/९-१०)

■-एवं योगीन्द्र रत्नानि सर्वाणि विलसंति मे ।।(शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड १९/१५)


जलन्धर कामवेग से तप्त हो कर वह अपनी मायाशक्ति के बल से दशभुजा तीन नेत्र जटाधारी रूप धारण कर महाबृषभ पर चढ़ कर साक्षात् रुद्र रूप में माता पार्वती के समक्ष उपस्थित हुआ ।


■-कामतस्स जगामाशु यत्र गौरी स्थिताऽभवत्।। ३७

दशदोर्दण्डपंचास्यस्त्रिनेत्रश्च जटाधरः ।।३८।।

महावृषभमारूढस्सर्वथा रुद्रसंनिभः ।।

■-आसुर्य्या मायया व्यास स बभूव जलंधरः । (शिवपुराण रुद्रसंहिता युद्धखण्ड २२/३७-३८-३९)


माता पार्वती को जब जलन्धर के इस दुष्कृत्यों का बोध हुआ तो वे भगवन् विष्णु को मन से स्मरण किया और विष्णु को अपने समीप पाया भगवन् विष्णु माता पार्वती से कहते है कि हे माते मुझे आप की कृपा से जलांधर का दुष्कृत्य का बोध हुआ आप आज्ञा दे मुझे क्या करना है 

 माता पार्वती कहती है  जलांधर ने मेरा पतिधर्म नष्ट करने का दुष्कृत्य किया है जलन्धर ने जिस मार्ग को खोल दिया है उसी का अनुसरण उचित है मेरी आज्ञा से उसका पतिव्रत धर्म नष्ट करो इसमें अब दोष न होगा अन्यथा वह दैत्य मारा न जाएगा ।


■-हृषीकेशं जगन्माता धर्मनीतिं सुशिक्षयन् ।। 

पार्वत्युवाच ।।

तेनैव दर्शितः पन्था बुध्यस्व त्वं तथैव हि ।।

तत्स्त्रीपातिव्रतं धर्मं भ्रष्टं कुरु मदाज्ञया ।।

■-नान्यथा स महादैत्यो भवेद्वध्यो रमेश्वर।। (शिवपुराण रुद्र० युद्ध० २२/४९-५०-५१)


जगन्माता पार्वती धर्मनीति सिखाती हुई विष्णु से बोली जो मार्ग दैत्य ने खोल दिये है उसी मार्ग का अनुकरण करो और वृंदा का पतिव्रत धर्म नष्ट करो इसमें कोई दोष नही  तभी यह दैत्यराज का वध होगा भगवन् विष्णु के सहयोग से ही भगवन् शङ्कर जलांधर के वध करने में सफल हुए ।


●-(विशेष- यहाँ प्रथम प्रसङ्ग के कथाओं को स्मरण कर लेना भी आवश्यक है वृंदा ने स्वयं विष्णु को पति रूप में पाने के लिए कामना की थी और उसके लिए घोर तपस्चर्या भी किया था और वृंदा की कामना ही इस हेतु का कारण बना )


माता पार्वती की यह धर्मनीति भी श्रुतिस्मृति से प्रमाणित है 


■--यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः (तैत्तरीय उपनिषद) 

■--यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्य: स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः ।

मायाचारो मायया वर्तितव्य; साध्वाचार साधुना प्रत्युदय (महाभारत उद्योग पर्व)


इस श्रुतिस्मृति न्याय से सिद्ध है कि जो जैसा आचरण करता है उनके साथ वैसा ही आचरण न्यायिक है ।  


शैलेन्द्र सिंह

Thursday, 22 February 2024

माता सीता और श्रीरामचन्द्र विवाह शंका समाधान



धर्मद्रोही वामपन्थी पँचमक्कार गैंग माता सीता की आयु पर प्रश्नचिन्ह तो खड़ा करते है परन्तु श्रीरामचन्द्र के आयु बिषय पर मौन हो जाते है इसे ही अर्धकुकूट न्याय कहा जाता है 

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अरण्यकाण्ड का का वह प्रसङ्ग जिस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जाता है ।


■●-उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने। भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥ तत्र त्रयोदशे वर्षे राजाऽमन्त्रयत प्रभुः। अभिषेचयितुं रामं समेतो राजमन्त्रिभिः (वा०रा०अरण्यकाण्ड ४७/४-५)

■●-मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः॥ 

 अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।( वा०रा०अरण्यकाण्ड ४७/१०)

विवाह के पश्चात  बारह वर्षों तक इक्क्षवाकु वंशी महाराज दशरथ के महल में रह कर मैंने अपने पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे  मैं वहाँ सदा मनोवांच्छित सुख सुविधाओं से सम्पन्न रही हूं ।

वनगमन के समय मेरे महातेजस्वी पति की आयु पच्चीस वर्ष की थी और उस समय मेरा जन्मकाल से लेकर वनगमन काल तक मेरी अवस्था वर्षगड़ना के अनुसार अठारह वर्ष की थी  !


■-- इन प्रसङ्गो से स्पष्ट प्रमाणित होता है कि जनकनन्दिनी का जब विवाह हुआ था तब उनकी आयु मात्र 6 वर्ष रही थी ।

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अब आते है जनकनन्दिनी माता सीता और मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र की विवाह सम्बन्धी विषयो पर ।

★-महर्षि विश्वामित्र सिद्धियां प्राप्त करने हेतु  यज्ञ का सम्पादन कर रहे थे और उस  यज्ञ को असुरों से रक्षण के लिए  महाराज दशरथ के राजमहल में गए और  श्रीरामचन्द्र को अपने साथ ले जाने को उद्धत हुए उस समय श्रीरामचन्द्र की आयु क्या थी यह महाराज दशरथ अपने श्रीमुख से कहते है ।


●- हे महर्षे मेरा यह कमलनयन श्रीरामचन्द्र  अभी पूरे १६ वर्ष का भी नही हुआ मैं इनमें राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता भी नही देखता अतः आप मुझे ले चलिए एक बालक को नही 


■●-ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः ।

बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम् । (वा०रा० १/२०/२ & ७)


यहाँ महाराज दशरथ श्रीरामचन्द्र के आयु पर संकेत मात्र करते है कि श्रीरामचन्द्र अभी किशोरोवस्था तक भी नही पंहुचा है ।

तो प्रश्न उठता है कि श्रीरामचन्द्र की आयु क्या थी जब उनका माता जानकी के साथ जब विवाह हुआ था ।

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माता जानकी युद्धकाण्ड में कहती है कि 


■●--बालां बालेन सम्प्राप्तां भार्यां मां सहचारिणीम्॥(युद्धकाण्ड ३२/ २०


आप बाल्यकाल में ही मुझे पत्नी रूप में प्राप्त किया था तब मेरी भी अवस्था बाल्य रूप ही था ।


अतः जब माता जानकी का मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के साथ पाणिग्रहण संस्कार हुआ था तब दोनों ही बालक बालिका थे ।

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●-मारीच श्रीरामचन्द्र से रावण के बिषय में कहते है ।


■-- श्रीरामचन्द्र जी जब विश्वामित्र के यज्ञ सिद्धि हेतु उनके यज्ञो की रक्षा हेतु धनुषबाण लिए खड़े थे उस समय श्रीरामचन्द्र के जवानी के लक्षण (चिन्ह) प्रकट नही हुए थे वे शोभाशाली बालक के रूप में दिखाई देते थे उस समय श्रीरामचन्द्र का उदीप्त तेज उस दण्डकारण्य की शोभा बढ़ाते हुए नवोदित बालचंद्र के समान दिख पड़ते थे ।


■●--अजातव्यञ्जनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः (अरण्यकाण्ड )

■●-- रामो बालचन्द्र इवोदितः॥ (अरण्यकाण्ड ३८/१४-१५)

■●--बालोऽयमिति राघवम्। (अरण्यकाण्ड  ३८/१८)


यहाँ मारीच स्पष्ट रूप से कह रहे है कि जब दण्डकारण्य में श्रीरामचन्द्र विश्वामित्र के कार्यसिद्धि हेतु धनुषबाण लिए खड़े थे तब उनकी अवस्था नवोदितबालचन्द्र के सामान था ।

ठीक इसी अध्य्याय के श्लोक संख्या ६ में तो श्रीरामचन्द्र जी के स्पष्टरूप से  आयु का ही व्याखान किया है 


■●--ऊनद्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघवः॥ (अरण्यकाण्ड ३८/६)


मारीच :-- रघुकुलनंदन श्रीराम की आयु अभी बारह वर्ष से भी कम है 


अब यहाँ यह तो यह सिद्ध हो गया कि जब जनकनन्दिनी जानकी के साथ श्रीरामचन्द्र के साथ पाणिग्रहण संस्कार हुआ था तब श्रीरामचन्द्र की  आयु १२ वर्ष से भी कम था ।


इस बिषय की सिद्धि अरण्यकाण्ड के उस प्रसङ्ग से भी प्रमाणित हो जाता है जहाँ माता जानकी कहती है विवाह के पश्चात १२ वर्षो तक महाराज दसरथ के महल में समस्त मानवोचित भोग भोगे और तेरहवे वर्ष में महाराज दशरथ ने श्रीरामचन्द्र का राज्यभिषेख करने का निर्णय लिया  यहाँ १२+१३ का योग करें तो २५ वर्ष का योग निकलता है जब श्रीरामचन्द्र का दण्डकारण्य मिला था ।


और माता सीता भी ठीक यही बात कह रही है कि 


■●-मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः(अरण्यकाण्ड ४७/१०)


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■--विशेष

उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने 

 भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी(अरण्यकाण्ड४७/४-५)


अरण्यकाण्ड के इस श्लोक को लेकर वामपंथियों के पेट मे।सबसे ज्यादा दर्द उठता है अस्तु उनके कुमातो का खण्डन 


■●--बालां बालेन सम्प्राप्तां भार्यां (युद्धकाण्ड)


■●--अजातव्यञ्जनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः (अरण्यकाण्ड)


■●--बालोऽयमिति राघवम्। (अरण्यकाण्ड  )


श्लोक से हो जाता है   बालक ,बालिकाओं में कामदेव की जागृति किशोरोवस्था के पश्चात ही होता है ।

अस्तु बालक बालिकाओं में काम वासना ढूढ़ना मूर्खता नही तो और क्या है ?  बिचार करे ।


#भुञ्जाना_मानुषान्_भोगान्_सर्वकामसमृद्धिनी  


से वही अर्थ ग्राह्य है जो समयानुकूल हो एक बालक ,बालिका को बाल्यकाल में क्या चाहिए ?? 

 बालक बालिका खिलौने गुड्डे गुड़िया ,पाकर ही स्वयं को धन्य समझने लगते है इस लिए तो यहाँ माता जानकी कहती है


 #भुञ्जाना_मानुषान्_भोगान्_सर्वकामसमृद्धिनी 


लेकिन वामपंथियों को क्या कहे नाम ही है वाम ,पन्थ अर्थात उल्टे रास्ते चलने वाला तो यहाँ भी वामपन्थी उल्टा अर्थ ही ग्रहण करता है 


एक बालक बालिका में सख्य सखा भाव का सम्बंध होता है काम पिपासा का नही जहाँ काम का वेग ही नही वहाँ काम का बिकार उतपन्न कैसे हो ??

उसका भी तो हेतु चाहिए न कि केवल मात्र दोषारोपण से ही बिषयों की सिद्धि हो जाय ??

यदि दोषारोपण मात्र से ही बिषयों की सिद्धि हो जाय तब तो न्यायिक व्यवस्था में ही दोष उतपन्न हो जाय जिसका परिहार सम्भव ही नही ।


इस लिए श्रुतिस्मृति का घोषवाक्य है ।


■●-आचार्यवान् पुरुषो  वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)


■●--तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्  (मुंडकोपनिषद् ) 

■●-तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः (गीता)


वामपंथियों द्वारा उठाये गए प्रश्नों से विचलित न हो परम्पराप्राप्त आचार्यो के सानिध्य ग्रहण करें ।


उल्टे राह चलने वाले वामपन्थी आप को उल्टा मार्ग ही बतलायेंगे ।

आचार्यो के सानिध्य न प्राप्त होना एवं स्वाध्यायआदि अल्पता के कारण लोगो मे तद्वत बिषयों को लेकर भ्रम उतपन्न होना स्वाभाविक है ।


शैलेन्द्र सिंह

Monday, 12 February 2024

गौतम बुद्ध के गृहत्याग का सच भाग --२

 


सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध ) के बिषय में गृहत्याग की जो कथाएं प्रचलित है वह बौद्ध भिक्षु अश्वघोष कृत बुद्ध चरित्र से है अश्वघोष प्रथम शताब्दी के अंत एवं द्वितीय शताब्दी के आरंभ में हुए थे ऐसा माना जाता है 


 अश्वघोष ने अपनी  बुद्ध चरित्र की  रचना महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण ,का अनुकरण कर किया रामोपख्यान का  इंडोनेशिया ,थाईलैंड,मोरिशश ,म्यंमार,सहित समस्त एशियाई देशों में गहरा प्रभाव रहा है भारत मे तो श्रीराम भारतीयों के रोम रोम में बसते है जिस कारण अश्वघोष भी इससे अछूता न रहा ,

इसी प्रभाव के कारण ही अश्वघोष ने बुद्ध चरित्र में , रामोपाख्यान  का  अनुकरण किया ताकि भविष्य में बुद्ध की भी प्रसिद्धि श्रीरामचन्द्र की भांति ख्यापित किया जा सके  सिद्धार्थ गौतम को श्रीरामचन्द्र की भांति ख्यापित करने के पीछे अश्वघोष की उत्कट अभिलाषा ही सिद्धार्थ गौतम के मूल इतिहास को मिटा डाला और एक काल्पनिक गाथा रच डाला जो कालक्रम के प्रवाह में सत्य की भांति ख्यापित भी हुआ ।

बुद्ध के गृहत्याग बिषय पर मैं सदा से संसयशील रहा हूँ हो सकता है आप सब मेरे बिचारो से सहमत न हो परन्तु तद्गत बिषयों को लेकर मन्थन अवश्य किया जा सकता है ।


सिद्धार्थ गौतम के गृहत्याग के बिषय में जो कथाएं प्रचलित है मुझे वे निराधार लगते है ।

जरा जन्म मरण जैसे बिषयों के लेकर द्रवित हो गृह का त्याग कर तपस्या के लिए चल पड़े और निर्वाण को प्राप्त हुए ।

सिद्धार्थ गौतम के जीवनी पर लिखी गयी सबसे प्राचिन पुस्तक बुद्ध चरित्र है जो लगभग प्रथम शताब्दी में बौद्ध भिक्षु  अश्वघोष द्वारा रची गयी थी। 


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अश्वघोष कृत बुद्ध चरित्र में आये हुए प्रसङ्ग विचारणीय है 


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■-प्रसङ्ग संख्या ●--१


■--वयश्च कौमारमतीत्य मध्यं सम्प्राप्य बालः स हि राजसूनुः । अल्पैरहोभिर्बहुवर्षगम्या जग्राह विद्याः स्वकुलानुरूपाः ॥( २।२४)


■--नाध्यैष्ट दुःखाय परस्य विद्यां ज्ञानं शिवं यत्तु तदध्यगीष्ट । स्वाभ्यः प्रजाभ्यो हि यथा तथैव सर्वप्रजाभ्यः शिवमाशशंसे ॥ (२।३५)


■--आर्षाण्यचारीत्परमव्रतानि (२/४३)


सिद्धार्थ गैतम ने सास्त्रनुकूल समय पर उपनयन संस्कार से संकरित हो अपने कुल परम्परा के अनुरूप विद्या आदि का अध्यय किया था एवं ऋषियों सम्बंधित समस्त व्रत और तपो का भी पालन किया था कुशाग्र बुद्धि होने के कारण अल्पकाल में ही समस्त विद्याओं का अध्ययन पूर्ण कर चुका था ।

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■-प्रसङ्ग संख्या ●--२


अश्वघोष कृत बुद्ध चरित्र के  तृतीय सर्ग   श्लोक संख्या २८ से लेकर श्लोक संख्या ६० तक महत्वपूर्ण है  जहाँ किस हेतु से सिद्धार्थ गौतम ने गृहत्याग किया था ।


■●--सिद्धार्थ गौतम ने  बृद्ध ,रोग से ग्रसित रोगी ,एवं मृत ब्यक्ति को देख ब्याकुल हो उठा और गृह त्याग कर वन की ओर चल पड़ा ।

गौतम बुद्ध ने जब गृह त्याग किया था उस वक़्त तक उनका विवाह हो चुका था और एक पुत्र लाभ भी हुआ था अतः स्पष्ट है कि उनकी आयु अब लगभग 30 वर्ष की हो चली होगी ।


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समीक्षा :-- सिद्धार्थ गौतम का समयानुकूल उपनयन संस्कार होना ये दर्शाता है की वे उस कुल में जन्मे थे जो विशुद्ध वैदिक धर्मी थे ,अनादिकाल से आरही वंश परम्परा कुल परम्परा के अनुकूल ही सिद्धार्थ गौतम का संस्कार एवं अध्ययनादि हुआ था बड़े ही अल्पकाल में सिद्धार्थ गौतम अध्ययनादि को पूर्ण कर लिया था अश्वघोष ने द्वितीय सर्ग के  श्लोक संख्या २४ में  #अल्पैरहोभिर्बहुवर्षगम्याजग्राह विद्याः स्वकुलानुरूपाः

लिख कर स्पष्ट किया है साथ ही साथ द्वितीय सर्ग के श्लोक संख्या ४३ में पुनः इसकी पुष्टि की है ।

अब आगे आते है 

आत्म तत्व ,जन्म मृत्यु  ,जड़ चेतन आदि  बिषय को लेकर जितना बिषद उल्लेख वैदिक धर्म मे हुआ उतना उल्लेख विश्व के किसी भी साहित्य में नही है । अतः ऐसा सम्भव ही नही की सिद्धार्थ गौतम के अध्ययन काल मे इन जैसे प्रश्नों अथवा बिषयों का उल्लेख न हुआ हो अथवा उस कालखण्ड में किस बृद्ध अथवा रोगी अथवा मृत ब्यक्ति को न देखा हो ।

 श्रुतिस्मृति इतिहासपुराणादि षड्दर्शन जैसे समुच्चय ग्रन्थ आत्मतत्व का विवेचन करता है श्रुतियों में नचिकेता जैसा बालक भी यमराज से मृत्यु का रहस्य पूछता है मृत्यु के नाम से द्रवित नही होता तो पुराण जैसे अयाख्यानों में प्रह्लाद जैसा दृढ़भक्त बालक भी मृत्यु के नाम से विचलित न हो होलिका के  गोद मे बैठ जाता है अतः जिन बिषयों को लेकर बाल्यकाल में अध्ययन के समय होना चाहिए था वही संशय  युवास्था में होना और उससे द्रवित होकर गृहत्याग करना हास्यस्पद लगता है ।


शैलेन्द्र सिंह

Friday, 12 January 2024

■--मंदिर प्रसाद एक शास्त्रीय दृष्टिकोण

 ■-- मन्दिर प्रसाद एक शास्त्रीय दृष्टिकोण 



■-शिरस्त्वण्डं निगदितं कलशं मूर्धजं स्मृतं ॥

कण्ठं कण्ठमिति ज्ञेयं स्कन्धं वेदी निगद्येते ।

पायूपस्थे प्रणाले तु त्वक्सुधा परिकीर्तिता ॥

■-मुखं द्वारं भवेदस्य प्रतिमा जीव उच्यते ।

तच्छक्तिं पिण्डिकां विद्धि प्रकृतिं च तदाकृतिं ॥

निश्चलत्वञ्च गर्भोस्या अधिष्ठाता तु केशवः ।

■-एवमेव हरिः साक्षात्प्रासादत्वेन संस्थितः ॥(अग्निपुराण ६१/२३-२६)


मन्दिर का गुम्बज भाग ही देव् विग्रह का सिर है और कलश ही मन्दिर में प्रतिष्ठित देव् विग्रह  के बाल है मन्दिर का कण्ठ ही देव् विग्रह का कण्ठ है ,वेदी ही मंदिर में प्रतिष्ठित देव् विग्रह के स्कंध है नालियां ही देव् विग्रह के पायु और उपस्थ है मन्दिर का चूना ही मन्दिर में प्रतिष्ठित देव् विग्रह का चर्म है मन्दिर का द्वार ही देव् विग्रह का मुख है तथा मन्दिर की प्रतिमा ही मन्दिर प्रसाद का जीव है उसकी पिण्डिका ही शक्ति समझो तथा मन्दिर की आकृति ही मन्दिर की प्रकृति है निश्चलता ही उसका गर्भ होता है और उसके अधिष्ठाता भगवान केशव है इस तरह से भगवान श्रीहरि: स्वयं मन्दिर के रूप में स्थित होते है ।


शैलेन्द्र सिंह

Sunday, 30 July 2023

शिवलिङ्ग बिषय भ्रांति का भ्रमोछेदन



शब्द अर्थों के प्रतिपादक होते है शब्दों के कारण ही हमे अर्थ (बिषय) का बोध होता है   शब्दो के मूल अर्थ का त्याग कर यदि हम मनमाना अर्थ ग्रहण करने लगे  तो अतिव्यापति  दोष लगेगा जिससे शब्दार्थ मर्यादा भी भंग हो और हम किसी निश्चित बिषय पर एकमत होंने से रहे ।

जन समुदाय में आज शिवलिङ्ग बिषय को लेकर जो भ्रांतियां वयाप्त हुई हैं वह शब्द के मूल अर्थों का त्याग कर मनमाना अर्थ ग्रहण करने के कारण ही हुआ है ।


●लिङ्ग शब्द का अर्थ संस्कृत शब्दकोश में चिन्ह प्रतीक,लक्षण ही लिया गया है 

यदि जिज्ञासा का भाव हो तो आप संस्कृत हिंदी शब्दकोश पर जाकर स्वयं ही इस तथ्य की पुष्टि कर सकते है ।

 मैं अपनी ओर से  संस्कृत हिंदी शब्दकोष का लिंक भी दे रहा हूँ चाहे तो वहाँ सर्च कर देख ले ।


https://sanskritdictionary.com/?iencoding=iast&q=%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97&lang=sans&action=Search


अस्तु न्याया,वैशेषिक, सांख्य,मीमांसादी  सिद्धांत में सभी के सभी आचार्यो ने  लिङ्ग का अर्थ चिन्ह रूप में ही ग्रहण किया यथा धूम्र अग्नि का लिंग है तो

 इच्छा,द्वेष,प्रयत्न, सुख,दुख,ज्ञान  आत्मा का लिंग ।

इंद्रियों के अपने अपने बिषयों से जो सम्बन्ध है एवं उससे भिन्न ज्ञान की उत्पति मन का लिङ्ग (लक्षण) है ।

निष्क्रमण और प्रवेश यह आकाश का लिङ्ग (लक्षण)है 


●इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गम् (न्याय दर्शन)

●युगपत्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ।(न्याय दर्शन )

●निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ।( वैशेषिक-२,१.२० )

●अव्यक्तं त्रिगुणाल्लिङ्गात् । (सांख्यसूत्र-१.१३६)


  लिङ्ग शब्द से लोकप्रसिद्ध मांसचर्ममय  शिश्न यदि ग्रहण करें तो अर्थ का अनर्थ ही होगा 

और तद्वत  बिषयों की सिद्धि भी न हो ।


 

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शिवमहापुराण में शिवलिङ्ग को अव्यक्त अगोचर कहा गया है जो तत्वबिषय इन्द्रिय प्रमाण का बिषय ही नही उस तत्वबिशेष को पंचभौतिक मांसचर्ममय स्थूल शिश्न मानना ही मूढ़ता का परिचायक है ! 


●अनिर्देश्यं च तद्रूपमनाम कर्मवर्जितम् ।।

अलिंगं लिंगतां प्राप्तं ध्यानमार्गेप्यगोचरम् ।।(रुद्रसंहिता ७/६६)


●तो प्रश  उठता है कि शिवलिंग आखिर है क्या ?


जिससे इस सम्पूर्ण चराचरात्मक जगत् उत्पन्न होता है एवं 

जिसमे यह समस्त निखिल जगत् का लय हो जाता है वही लिंग पद वाच्य है ।


●लिंगेप्रसूतिकर्तारं (विद्येश्वर संहिता १६/१०६)

●लयनाल्लिंगमित्युक्तं तत्रैव निखिलं जगत् ।।(रुद्रसंहिता १०/ ३८ ।।)

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 पुराणों  में जहां भी शिवलिङ्ग विषय पर व्यक्तरूप से वर्णन आया है वहाँ वहाँ  ज्योतिर्मय अग्निस्वरूपा ही ग्रहण किया गया है ।

जिसकी तेजोमयी शक्ति तिनोलोको को भस्मीभूत करने वाला कहा गया है ।


●ज्योतिर्लिंगे महादिव्ये वर्णिते ते महामुने।। (शतरुद्र संहिता ४२/२१)

●गौतमस्य प्रार्थनया ज्योतिर्लिंग स्वरूपतः (शतरुद्रसंहिता ४२/३४)


●तल्लिंगेनाखिलं दग्धं भुवनं सचराचरम् (रु०सं० सतीखण्ड २९/२४)


शिवमहापुराण के विद्येश्वरसंहिता  खण्ड में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठतम होने का विवाद होने लगा तो उन दोनों के मध्य तेजोमय महाग्नि स्तम्भ प्रकट हुआ ।


●महानलस्तंभविभीषणाकृतिर्बभूव तन्मध्यतले स निष्कलः ।

ते अस्त्रे चापि सज्वाले लोकसंहरणक्षमे ।

निपतेतुः क्षणे नैव ह्याविर्भूते महानले (विद्येश्वर संहिता ७/११-१२)


ब्रह्मा विष्णु के मध्य प्रकट हुए महाग्नि स्तम्भ को देख आश्चर्यचकित हो ब्रह्मा विष्णु ने कहा यह इन्द्रिय अगोचर अग्निरूपा क्या उठा जो अनादि है 


●अतींद्रि यमिदं स्तंभमग्निरूपं किमुत्थितम् (विद्येश्वर संहिता ७/१३)

●अनाद्यंतमिदं स्तंभम (विद्येश्वर संहिता ९/१९)


 ब्रह्मा विष्णु जैसे देवता भी उस अव्यक्त अगोचर महाग्निरूपा स्तम्भ को समझने में अस्क्य रहे तो हम जैसे क्षुद्र बुद्धि वाले मनुष्यो की क्या औकात जो उस तत्वबिषय को समझ पाए !

जो अनादि अनन्त है उस ब्रह्मतत्त्व को पूर्णरूप से जानने में भला कौन सम्सर्थ ??

 जिसका आदि और अंत न तो ब्रह्मा ही पा सके और न ही विष्णु ।उस तत्व बिषय को लेकर अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रान्तवादियो का कहना है कि 

शिवलिङ्ग  पंचभौतिक मांसमय स्थूल शिश्न है  ।


अस्तु चिन्मय आदिपुरुष ही शिवलिङ्ग है समस्त पीठ अम्बामय है भगवन शङ्कर कहते है कि जो संसार के मूलकारण महाचैतन्य को और लोक को लिङ्गात्मक जानकर पूजन करता है वही मेरा प्रिय है ।

लिङ्ग चिन्ह है सर्वस्वरूप की पूजा कैसे हो इसलिए लिङ्ग की कल्पना है आदि एवं अंत मे जगत् अण्डाकृति ही रहता है अतएव ब्रह्माण्ड की आकृति ही शिवलिङ्ग है यज्ञिको के यहाँ वेदी की स्त्रीरूप, में कुण्ड को योनि रूप में , और अग्नि रुद्र की लिङ्ग रूप में उपासना होती है ।

शिवलिङ्ग में विश्व प्रसूता की दृष्टि से अर्चना करनी चाहिए क्यो की सम्पूर्ण जगत् में किसी भी प्रकार के गुण,कर्म,द्रव्य - लिङ्ग ,और योनि (कारण) के बिना सम्भव ही नही ।

जो जगत् के सृष्टि, स्थिति,लय, के कारण है उस तत्व विशेष को पाञ्चभौतिक मांसचर्ममय शिश्न मानना  मूर्खता की पराकाष्ठा ही है ।


#शैलेन्द्र_सिंह

Tuesday, 15 November 2022

बिकाश दिब्यकीर्ति मत भञ्जन



आखिर बिकास दिब्यकीर्ति ने श्रीमद्वाल्मीकी रामायण से  उन प्रसङ्गो को उपदिष्ट क्यो नही किया ?

महाभारत में आये हुए रामोख्यान पर्व से ही क्यो किया ?

स्वान  की दृष्टि जूठन पर ही रहती ,और बिकाश दिब्यकीर्ति ने भी अपनी मानसिकता से स्वान होने का ही परिचय दिया ।


वामपंथी गिरोह को यदि सबसे ज्यादा चिढ़ है तो  मर्यादा पुरुषोत्तम राम से जो भारतीय संस्कृति के रोम रोम में बसता है  वही राम जो साक्षात धर्म स्वरूप है वही राम जिनकी यशोगान की गाथा युगों युगों से प्रवाहमान है यह पहली बार नही हुआ है हर कालखण्डन में ऐसे दूषण माता सीता की पवित्रता और श्रीरामचन्द्र की मर्यादाओं को तार तार करने का भरपूर प्रयास किया है ।

जिस प्रकार समस्त प्राणियों को आह्लादित करने वाला सूर्य चमगादड़ो और उल्लुओं को नही रुचता ठीक उसी प्रकार मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र धर्मदूषको को नही रुचता क्यो की धर्मदूषको को दण्ड देने का ही कार्य भगवन् श्रीरामचन्द्र ने किया था ।

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■● रावण वध के पश्चात   जनकनन्दिनी जब श्रीरामचन्द्र के समक्ष उपस्थित हुई तो ।

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी ने सीता को ग्रहण करने से मना कर दिया

ठीक यही वृतान्त महाभारत के रामोपख्यान पर्व में आया है 

श्रीमद्वाल्मीकी रामायण और महाभारत में तद्वत बिषयों को लेकर व्याख्यान करने की शैली भी भिन्न भिन्न है इस लिए स्वाध्यायादी अल्पता के कारण लोगो मे तद्वत बिषयों को लेकर भ्रम होना भी स्वाभाविक है ।


श्रुतियों का मत है कि जिस मंत्र बिषय आदि के द्रष्टा जो ऋषि है वही उस बिषय में प्रामाणिक माने जाएंगे ।

अतः महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण ही श्रीरामचन्द्र माता सीता दसरथ आदि के बिषय में भी प्रामाणिक माने जाएंगे क्यो की चतुर्मुखी ब्रह्मा के अनुग्रह से ही श्रीरामचन्द्र माता सीता के गुप्त और प्रकट चरित्र का ज्ञान महर्षि वाल्मीकि को हुआ था ।


वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् ।

रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥

रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः ।

वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ।। (वा० रा०बालकाण्ड २/३३/३४)


 फिर हम भला तद्गत बिषयों के लिए अन्य का अनुगमन क्यो करें ?

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श्रीरामचन्द्र साक्षात धर्म स्वरूप है #रामो_विग्रहवान्_धर्मः


 उनका एक एक आचरण धर्मानुकूल होने से ग्राह्य है महाभारत में ही स्वयं श्रीरामचन्द्र के धर्मसम्मत निर्णय को ऋषिमुनि देवगण प्रसंसा करते है ।


■● पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि। (महाभारत०रामोपख्यान पर्व    २९१/३०)


श्रीरामचन्द्र ने ऐसा क्यो किया ??

लोकापवाद के भय से यदि ऐसा न करते तो उन्हें ब्यभिचारी पुरुष होने का कलङ्क लगता जो युगों युगों से चले आरहे इक्ष्वाकु वंश के कीर्ति को ध्वस्त करता जिसका मार्जन भी न हो पाए 

श्रीमद्वाल्मीकी रामायण में इसी बिषयों को स्पष्टता से दर्शाया है ।


■●-जनवादभयाद्राज्ञो बभूव हृदयं द्विधा | (वा०रा युद्ध काण्ड ११५/११)

●-लोकापवाद के भय से श्रीरामचन्द्र का हृदय विदीर्ण हो रहा था 


० वही महारत में इसी बिषय को भिन्न शैली में दर्शाया गया है 


■● रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कितः (महाभारत रामोपख्यान २९१/१०)

●- श्रीरामचन्द्र जी को जनकनन्दिनी में सन्देश हुआ कि पर पुरुष के स्पर्श से सीता अपवित्र तो न हो गयी ?


इस लिए श्रीरामचन्द्र ने ऐसा वचन कहा  धर्म सिद्धांत को जानने वाला कोई भी पुरुष दूसरे के हाथ मे पड़ी हुई नारी को मुहूर्तभर के लिए भी कैसे ग्रहण कर सकता है तुम्हारा आचनर बिचार शुद्ध रह गया हो अथवा असुद्ध अब मैं तुम्हे अपने उपयोग में नही ले सकता ठीक उसी तरह जैसे कुत्ते के द्वारा चाटे गए पवित्र हविष्य को कोई ग्रहण नही करता ।


■●-कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन्धर्मविनिश्चयम्।

परहस्तगतां नारीं मुहूर्तमपि धारयेत् ।।(महाभारत रामोपख्यान २९१ १२)

सुवृत्तामसुवृत्तां वाऽप्यहं त्वामद्य मैथिलि।

■●-नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ।।(महाभारत रामोपख्यान २९१/१३)


पूर्व और पश्चात में आये हुए श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीरामचन्द्र का कथन धर्म सम्मत था जिसके बिषय में दिब्यकीर्ति ने उपदिष्ट न कर केवल एक ही श्लोक की कुटिलता पूर्वक व्यख्या कर लोगो मे भ्रामकता फैलाया ।


■●-पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि। (महाभारत०रामोपख्यान पर्व    २९१/३०)


●-हे राम तुम राजऋषियो के धर्म पर चलने वाले हो अतः तुममें ऐसा सद्विचार होना आश्चर्य की बात नही ।


श्रीमद्वाल्मीकी रामायण में माता सीता स्वयं की पवित्रता का प्रमाण समस्त लोगो के सामने अग्निपरीक्षा दे कर की वही महाभारत में माता सीता के शुद्धि के बिषय में समस्त देवताओं स्वीकार किया और श्रीरामचन्द्र से माता जानकी को ग्रहण करने को कहा ।

(महाभारत रामोपख्यान पर्व अध्याय २९१)

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बिकाश दिब्यकीर्ति जैसे धूर्त सम्पूर्ण प्रसङ्ग को न दर्शा कर केवल एक श्लोक के माध्यम से अपनी अपने मनोरथ को सिद्ध करने की जो कुचेष्टा की इससे उसके विक्षिप्त मानसिकता का ही प्रकाशन होता है 

और कुछ नही ।

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एक ही बिषय को ऋषिमुनिगण भिन्न भिन्न शैली में व्याख्यान करते है जिससे भ्रम उतपन्न होना स्वभाविक है इस लिए श्रुतियाँ बार बार घोषणा करती है


■● वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।


नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]


■●आचार्यवान् पुरुषो हि वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)


■● तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् ) 


शैलेन्द्र सिंह