Monday, 22 October 2018

रावण वध एवं श्रीराम राज्यभिषेख

महाभारत में जिस प्रकार पाण्डवो का 13 वर्ष वनवास अधिक मास को लेकर जोड़ा गया था यह बिराट पर्व के भीष्मवाक्य से सिद्ध है इसी तरह श्रीरामचन्द्र जी का 14 वर्ष का वनवास भी अधिकमास को लेकर ही पूरा हुआ था इस तरह अमान्त मान से कृष्णचतुर्दशी में पुर्णिमान्त मान से कार्तिक कृष्ण षष्ठी में १४ वर्षो की पूर्ति होती है अन्यथा चैत्रमास की शुक्ल दशमी के आरम्भ होकर १४ वर्ष की समाप्ति षष्ठी को नही रह सकती थी पतन्तु अधिकमास की गड़ना से ११ दिन कम छः मास की वृद्धि हो जाती तभी १४ वर्ष की पूर्ति षष्ठी को हो सकती है अतः १२ वर्ष के पूरे होने पर १३ वे वर्ष के कुछ समय बीतने पर फाल्गुन अष्टमी को सीता हरण हुआ था १४ वे वर्ष के कुछ दिन बीतने पर श्रीराम जी लङ्का के समीप पहुंचे  थे|

#वर्तते_दशमो_मासो_द्वौ_तु_शेषौ_प्लवङ्गम (वा0 रा0 ५/३७/८)

दर्शयामास वैदेह्याः स्वरूपमरिमर्दनः(वा0रा ५/३७/३३)

इस सितोक्ति के अनुसार सावन मान से सव्हरण दिन से १० मास बीत चुकने पर सीता हनुमान का सम्वाद हुआ था #पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता
इस रामोक्ति के अनुसार पौष शुक्ल के चतुर्दशी या पूर्णिमा को श्रीरामजी त्रिकुट के शिखर पर आयें थे |

हनुमान का लङ्का में प्रवेश काल :-

हिमव्यपायेन च शितरश्मीरभ्युत्थितो नैकसहस्त्ररश्मि:(वा0रा ५/१६/३१)
द्वौ मासो रक्षितव्यौ मे योSवाधिस्ते मया कृत: (वा0 रा0 ५/२०/८)
इन वाक्यो से प्रतीत होता है कि हनुमान जब लङ्का में प्रवेश किया था तब शरद ऋतु का आगमन हो चुका था मार्गशीर्ष दशमी के बाद ही हनुमान का लङ्का मे प्रवेश का स्पष्ट प्रमाण है
अन्यत्र मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को राम को प्रस्थान कहा गया है पौषपूर्णिमा को राम त्रिकुट आये थे उसके १५ दिन सेनानिवेस दूतप्रेषण आदि में बीत गयें तब युद्ध आरम्भ हुआ तब से लेकर श्रावण अभय अमान्त पर्यंत लङ्कापुर के बाहर दोनों दोनों सेनाओ का युद्ध हुआ ।
इंद्रजीत वध अनन्तर यह कहा गया है की तुम आज कृष्पक्ष चतुर्दशी अभ्युत्थान करके अमावस्या में ही शत्रुबिजय के लिए गमन करो ।
इंद्रजीत का वध तीन दिनों में हुआ था दशमी के चौथे प्रहर से लेकर त्रयोदशी के चौथे प्रहर के अवधि में इंद्रजीत का वध हुआ था |
रावण का निर्गमन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था
उसके बाद ही रावण वध और इसके अनन्तर आदित्य को स्थिरप्रभ होना कहा गया है इससे प्रतीत होता है कि रावण का वध दिन में ही हुआ

इसी पक्ष का समर्थन कालिका पुराण से होता है ।

रामस्यानुग्रहार्थाय रावणस्य वधाय च।।

रात्रावेव महादेवी ब्रह्मणा बोधिता पुरा।
ततस्तु त्यक्तनिद्रा सा नन्दायामाश्विने सिते।।

जगाम नगरीं लङ्कां यत्रासीद्राघवः पुरा।
तत्र गत्वा महादेवी तदा तौ रामरावणौ।।

युद्धं नियोजयामास स्वयमन्तर्हिताम्बिका।
रक्षसां वानराणां च जग्ध्वा सा मांसशोणिते ।।

रामरावणयोर्युद्धं सप्ताहं सा न्ययोजयत्।
व्यतीते सप्तमे रात्रौ नव्यां रावणं ततः।।

रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी।
यावत्तयोः स्वयं देवी युद्धकेलिमुदैक्षत।।

तावत् तु सप्तरात्राणि सैव देवैः सुपूजिता।

निहते रावणे वीरे नवम्यां सकलैः सुरैः।।
विशेषपूजां दुर्गायाश्चक्रे लोकपितामहः।

राम के अनुग्रहार्थ और रावण के वधार्थ ब्रह्मा द्वारा प्रबोधित देवी लङ्का में आयी और सात दिन तक राम रावण का युद्ध हुआ नवमी के दिन राम ने रावण का वध किया सब देवताओ तथा ब्रह्मा द्वारा ८ दिन तक दुर्गा पाठ होती रही ।
ऐसे रावण का वध का स्पष्ट प्रमाण इतिहास पुराणादि में आश्विन मास के शुक्लपक्ष नवमी ही ठहरता है न कि फाल्गुन मास ??
सर्ग १२३ के अंत मे पुष्पक द्वारा अयोध्या के पास पहुंचने का उल्लेख किया गया है किन्तु सर्ग १२४ में वनवास की समाप्ति पर श्रीरामचन्द्र का भारद्वाज मुनि के आश्रम में पहुचने का उल्लेख है
पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः ।
भरद्वाजश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ।।

 लङ्का में राम  ने बीभीषण से दुर्गम मार्ग का उल्लेख किया था भारद्वाज आश्रम में राम ने मुनि से यह वरदान मांगा था कि मार्ग में सभी बृक्ष अकाल मे फलदार हो यहाँ श्रीरामचन्द्र जी को यह वरदान वानरों के लिए मांगा था
आक्षेपकर्ता के अनुसार यदि पदयात्र होती तो लङ्का से अयोध्या पहुंचने में कम से कम एक मास का समय अपेक्षित होता इस प्रसंग में स्पष्ट ही पुष्पक यात्रा की संगति होती है ||
वनवास की अवधि पूर्ण होने पर भारद्वाज मुनि के आश्रम में ही कपिश्रेष्ठ हनुमान को आज्ञा देते है कि वानरराज हनुमान तुम अतिशिघ्र अयोध्या का समाचार लो कि वहाँ सब कुशल मंगल तो है न और वहाँ राजा भरत को मेरे आगमन की सूचना दो ।
श्रीरामचन्द्र जी का अयोध्या आगमन कार्तिक मास ही ठहरता है चैत्र मास नही ।

Wednesday, 19 September 2018

पञ्चरात्र आगम

-------------------- #पञ्चरात्र_आगम ------------------------

भारतीय संस्कृति निगमागम मूलक है इस संस्कृति का आधार जिस तरह निगम है उसी तरह आगम भी है ! अनादि सम्प्रदाय सिद्ध गुरु शिष्य परम्परा क्रमागत शास्त्र सन्दर्भ आगम शब्द से अभिहित होता है पदवाक्य प्रमाणज्ञ भगवान भर्तुहरी ने महाभाष्य पष्पाशाह्रिक में निर्दिष्ट आगम:खल्वपि  इस प्रतीक की व्यख्या करते हुए उस आगम को श्रुति लक्षण तथा स्मृति लक्षण होना कहा है वाचस्पति मिश्र के अनुसार

 #आगच्छन्ति_बुद्धिमारोहन्ति_यस्मात् #अभ्युदयनि:#श्रेयसोपाया: #स: #आगम
अर्थात :- जिससे अभ्युदय (लौकिक कल्याण )तथा नि:श्रेयस (मोक्ष) के उपाय बुद्धि में आते हो उसे आगम कहते है निष्कर्ष रूप में अभ्युद तथा निःश्रेयस के उपायों का प्रतिपादित शास्त्र आगमशास्त्र है ।इस साधना के अंतर्गत क्रिया प्रधान अनुष्ठानों का स्थान महत्वपूर्ण होता है वराहितन्त्र में अधोलिखित रूप में आगम का लक्षण निर्देश किया है ।

#सृष्टिश्च_प्रलयश्चैव_देवतानां_यथार्चनम
साधनं चैव सर्वेषां पुरश्चरणमेव च
षट्कर्मसाधनं चैव ध्यानयोगश्चतुर्विध
सप्तभीलक्षणैयुक्तमागम तद्विदुर्बुधा:
अर्थात जिस शास्त्र में यह सात बिषय प्रतिपादित हो उसे आगम शास्त्र कहते है |
कई ऐसे तथाकथित विद्वान भी है जो यह कहते है कि पञ्चरात्र  अवैदिक मत है
पञ्चरात्र आगम को अवैदिक कहने वाले कम से कम शास्त्रमर्यादा का भी ख्याल रख लेते तो यूँ आक्षेप न लगाते इतिहास ,पुराणादि अयाख्यानों में पञ्चरात्र सिद्धांत को वेदोक्त धर्म ही माना है न कि उसे अवैदिक कहा ??

#त्रयीसांख्यवेदांतयोगाः #पुराणं_तथा_पञ्चरात्रं_प्रभो_धर्मशास्त्रम्  (स्कंद पुराण वैष्णव खण्ड)

पुराणादि से लेकर महाभारत तक ऐतिहासिक ग्रन्थो ने भी पञ्चरात्र को वेदोक्त धर्म ही माना है |
ऋक यजु साम की तरह पञ्चरात्र भी  नारायण के श्रीमुख से ही उद्गीत हुआ है ।

#इदंमहोपनिषदंचतुर्वेदसमन्वितम्।
#सांख्ययोगकृतंतेन_पञ्चरात्रानुशब्दितम्।।
#नारायंणमुखोदीतं (महाभारत मोक्षधर्मपर्व )

#पाञ्चरात्रस्य_कृत्स्नस्य_वक्ता_तु_भगवान्स्वयम् (महाभारत शांतिपर्व ३५९/६८)

पञ्चरात्र सिद्धान्त का प्रचार प्रसार स्वयं देवऋषि नारद,  शाण्डिल्य ऋषि से लेकर पाण्डवो ने किया

#श्रुत्वैतदाख्यानवरं_धर्मराड्‌जनमेजय।
#भ्रातरश्चास्य_ते_सर्वे_नारायणपराभवन्।।(महाभारत मोक्षधर्म पर्व)

क्षत्रियशिरोमणि उपरिचर नरेश सम्पूर्ण ऐश्वर्य से युक्त थे  उनके शाशनकाल में नित यज्ञ का प्रयोजन होता था जिस कारण उनके घर पर पञ्चरात्र शास्त्र के मुख्य विद्वान सदा निवास करते थे ।

#काम्यनैमित्तिका राजन्यज्ञियाः परमक्रियाः।
सर्वाः सात्वतमास्थाय विधिं चक्रे समाहितः।।
पाञ्चरात्रविदो मुख्यास्तस्य गेहे महात्मनः। (महाभारत मोक्षधर्म पर्व)

ऐसे में पञ्चरात्र आगम को अवैदिक कहने का साहस वही कर सकते है जिन्होंने श्रुति ,इतिहास,पुराणादि का मुख तक देखा न हो |
पञ्चरात्र सिद्धान्त का प्रचार सम्पूर्ण भारतवर्ष में वयाप्त था इसका प्रमाण स्वयं महाभारत ही करता है ।

#सात्वतो_धर्मोव्याप्य_लोकानवस्थित: (महाभारत मोक्षधर्म पर्व )

भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य ने श्रीभाष्य में उक्त कथन (पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य )को उद्भूत करते हुए पञ्चरात्र वक्ता नारायण का परिचय इस प्रकार दिया है #वेदवेद्यश्च परब्रह्मभूतो नारायण....अतो वेदान्तवेद्य परब्रह्म भूतो नारायण:स्वयमेव  पञ्चरात्रस्य वक्तेति तत्स्वरूपतदुपासनाभिधायी ततंत्रमिति च तस्मिन्नितरतंत्र समान्यम न केनचिद्भावयितुं शक्यं (श्रीभाष्य)

-----#श्रीनारायण_हरि:--------

Thursday, 5 April 2018

महर्षि वाल्मीकि जन्मना ब्राह्मण थे

#महर्षि_वाल्मीकि_जयंती_बिशेष
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मैकाले के अनौरस सन्तान वामपंथियों ने महर्षि वाल्मीकि को किरात,भील,मल्लाह,शुद्र तक बना डाला मिथ्या प्रचार कर लोगो मे भ्रम उतपन्न किया है जबकि यह असत्य और शास्त्र विरुद्ध है ।
महर्षि वाल्मीकि को सास्त्रो में आदिकवि बताया गया है महर्षि वाल्मीकि ने श्रीमद्वाल्मीकिरामायण  में अपना परिचय देते हुए कहते है कि मैं भृगुकुल वंश उतपन्न ब्राह्मण हुँ

सन्निबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विशत्सहस्रकम् ।
उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ।। ७.९४.२६ ।।
इस महाकाब्य में इलोपख्यान २४ सहस्त्र श्लोक है और सौ उपाख्यान है जिसे भृगुवंशीय महर्षि वाल्मीकि जी ने बनाया है ।

महाभारत में भी वाल्मीकि को भार्गव (भृगुकुलोद्भव )
कहा गया है और यही रामायण के रचनाकार है ।

श्लोकद्वयं पुरा गीतं भार्गवेण महात्मना।
आख्याते राजचरिते नृपतिं प्रति भारत।।(महा० शान्तिपर्व १२/५६/४०)

शिवपुराण में यद्यपि उन्हें जन्मांतर का चौर्य बृती करनेवाला बताया तथापि वे भार्गवकुलोतपन्न थे भार्गववंश में लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण थे उन्ही का दूसरा नाम ऋक्ष था ब्राह्मण हो कर भी चौर्य आदि का काम करते थे और श्रीनारद जी की सद्प्रेरणा  पुनः तप के द्वारा महर्षि हो गये  !
इसके अलावा विष्णुपुराण में भी इन्हें भृगुकुलोद्भव ऋक्ष हुए जो  वाल्मीकि कहलाये ।

ऋक्षोऽभूद्भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽबिधीयते ।(विष्णु पुराण ३/३/१८)

श्रीमदवाल्मीकि रामायण में वाल्मीकि अपना परिचय देते हुए कहते है

प्रचेतसो ऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन ।।(वा० रा ७.९६.१९ ।)
मैं प्रचेतस का दसवां पुत्र वाल्मीकि हुँ ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है

कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टुः सृष्टि विधौ पुनः ।।
यः पुत्रश्चेतसो धातुर्बभूव मुनिपुंगवः ।।
तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामहः ।।१/२२/ १-३ ।।

अर्थात कल्पनान्तरो के बीतने पर सृष्टा के नवीन सृष्टि विधान में ब्रह्मा के चेतस से जो पुत्र उतपन्न हुआ उसे ही ब्रह्मा के प्रकृष्ट चित से उतपन्न होने के कारण प्रचेता कहा गया ।
इस लिए ब्रह्मा के चेत से उतपन्न दस पुत्रो में वाल्मीकि प्रचेतस प्रसिद्ध हुए ।
मनुस्मृति में वर्णन है ब्रह्मा जी ने प्रचेता आदि दस पुत्र उतपन्न किये ।

अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ।
पतीन्प्रजानां असृजं महर्षीनादितो दश । । १.३४ । ।
मरीचिं अत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदं एव च । । १.३५ । ।

भगवन जन्मांतर से ही ब्राह्मण थे शुद्र नही

गुरु लक्षण

#गुरु_लक्षण

एतद्‍देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
    स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा:॥(मनुस्मृति)
जो अग्रजन्मा है उसी से पृथ्वी के सभी मानव अपना आचार बिचार सीखें ।

ब्राह्मण सभी वर्णो में।अग्रजन्मा है
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् (ऋग्वेद)
उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्येष्ठ्याद्ब्रह्मणश्चैव धारणात् ।
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १.९३ )

वेदादि शास्त्रो में ब्राह्मण को मुख कहा गया है !
वाक् और बुद्धि  ही अंग प्रत्यंग से लेकर साम्राज्य तक का शाशन करता है यह दृष्टान्त जगत में देखा जाता है जिस कारण किस वर्ण का क्या आचरण है यह ब्राह्मण से ही जानना चाहिए क्यो ?
क्योकि
वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १०.३ )
उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।(मनुस्मृति )
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यां अधिजायते ।(मनुस्मृति)
पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः।।(महाभारत -- आदिपर्व ८१/२०)

ब्राह्मण स्वयं धर्म स्वरूप है ।
जिस कारण श्रुतिस्मृति आदि ग्रन्थों में ब्राह्मण के सानिध्य में ही  अध्ययन अध्यापन और आचार बिचार की शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया गया है

गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः(महाभारत आदिपर्व १/२८/३५)
अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः ।
प्रब्रूयाद्ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः । ।
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्त्युपायान्यथाविधि ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् । । (मनुस्मृति १०/१-२)
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् (श्रीमद्भागवतगीता १८- ४२ )
वृत्त्यर्थं याजयेदज्वान्यानन्यानध्यापयेत् तथा ।
कुर्यात् प्रतिग्रहादानं गुर्वर्थं न्यायतो द्रिजः (विष्णु पुराण ३/२३ )
सास्त्रज्ञा नित्य है और सास्त्रज्ञा मानने वाला ही ईश्वर का आराधना करता है सास्त्र द्रोही नही विष्णुपुराण का उद्घोष है अब उसे न मान मनमाना आचरण को ही धर्म मान ले तो उससे बड़ी और मूर्खता क्या ।

वर्णास्वमेषु ये धर्माः शास्त्रोक्ता नृपसत्तम ।
तेषु तिष्ठन् नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ।(विष्णु पुराण ३/ १९ )

Thursday, 6 April 2017

यजीदी yazidi

-----------         यज़ीदी Yazidi        -------------------
                           

सम्भवतः किसी और नृवंश ने यज़ीदी लोगो जैसा संत्रास नही है ईरान में अलकायदा ने उन्हें काफ़िर घोषित कर संपूर्ण नरसंहार की अनुमति दे दी 2007 में सुनियोजित ढंग से कार बमो की सृंखला ने उनमे से लगभग 800 लोगो की हत्या कर दी ।
इस्लामिक स्टेट ने 2014 में यज़ीदी नगरों और गाँवो के बिनाश का एक अभियान आरम्भ किया और इसने उनमे से लगभग 3000 लोगो की हत्या कर दी 6500 का अपहरण किया और 4500 यज़ीदी महिलाओं और लड़कियों को यौन दासत्व हेतु बेच दिया बहुत से अपहृत लड़कियों ने आत्महत्या कर ली ।
यज़ीदी मुख्यतः उतरी ईराक में रहने वाले कुर्दिश भाषी लोग है ।सदियों से अपने मुस्लिम ईसाई पड़ोसियों द्वारा घृणित इन लोगो ने 70 से ज्यादा नरसंहार का सामना किया जिनमे 2 करोड़ से ऊपर यज़ीदियों की मृत्यु का अनुमान है । और इनमें से अधिकाँश अपनी संस्कृति का त्याग करने के लिए बाध्य कर दिए गए है । यूरोप में शरण लिए हुए 150000 यज़ीदियों की संख्या मिलाकर आज लगभग 800000 वे स्वयं सच्चे ईश्वर में आस्था रखने वाले बताते है और वे मयूर देवदूत "ताऊस मेलेके" की आराधना करते है जो अनन्त ईश्वर का रूप (अवतार) है छः दूसरे देवदूत ताऊस मेलेके के सहयोगी है और वे सृष्टि के सात दिनों से सम्बन्ध है जिसमे से रविवार ताऊस मेलेके का दिन है यज़ीदियों के मंदिर और पूजा गृह तथा दूसरे स्थानों की सज्जा मोर के चित्रांकन से की जाती है उन पर हो रहे आक्रमण ईसाइयो और मुसलमानों के इस बिस्वास का परिणाम है कि मयूर दूत इब्लीस यत् शैतान है ।
यज़ीदी पंथ एक रहस्य वादी परम्परा है जिसके प्रार्थना गीत कव्वालों की तरह गाया जाता है परम्परा के कुछ अंश अब दो पुस्तको में संग्रहित किये गए है जिन्हें किताब अल जिल्वा और मिशेफ रेश कहा जाता है यजीदी अपनी उतप्ति भारत में होने का दावा करते है और मोर के प्रति उनका श्रद्धाभाव  इस मूल की स्मृति हो सकता है भारत में मोर शिवपुत्र कार्तिकेय (मुरुगन) देव् का वाहन है कृष्ण भी अपनी केशो में या मुकुट में मोरपंख पहनते थे आदिम इंद्रधनुष में उपजे सात रंगों में नीला रंग ताऊस मेलेके से सम्बंधित है जो कृष्ण का भी रंग है ।
यज़ीदि सूर्यउन्मुख हो कर प्राथना करते है भारतीय परंपरा जैसे पुनर्जन्म में बिश्वाश करते है और उनकी मान्यता यह है कि ताऊस मेलेके के अतिरिक्त अन्य सभी देवदूत धरती पर संतो और पवित्रआत्मा के रूप में अवतरित होते है । हिन्दुओ की तरह वे पुनर्जन्म के लिए वस्त्र बदलने के रूपक का प्रयोग करते है दूसरी भारोपीय संस्कृति की तरह यज़ीदी समुदाय तीनो वर्गो में बिभाजित है शेख (पुजारी) पिर (वयोबृद्ध) मुरीद ( जनसामान्य)  और वे विवाह सम्बन्ध अपनी समूह में ही करते है यज़ीदियों में पंथ परिवर्तन करने का विधान नही है वंश आधारित प्रशाशनिक प्रमुख मीर (राजकुमार) होता है जबकि बाबा शेख धार्मिक पद के प्रमुख होते है यज़ीदी अपने आप को दासेनी कहते है जो देवयास्नी ( संस्कृत देवयज्ञी ) देवपूजक से उद्भूत है यजीदी शब्द यजाता से व्युत्पन्न है जो प्राचीन पारशी और कश्मीर में यजात कहलाता है प्राचीन पारशी में देव को देवा कहते है प्राचीन भारत ईरान और पश्चिम एशिया में देव् पूजको को देवयज्ञी या देवयस्नी कहा जाता था जिसके समानार्थी सनातन वैदिक धर्म है पारशी अपने पन्थ को माज्दायास्ना ( संस्कृत -: मेघा यज्ञ ) या अहुर माज्दा (संस्कृत-  असुर मेघा -मेघा के देव्) का पंथ कहते है भारत में देव् यास्ना के प्रसार के सबसे प्रबल संभावना  हड़प्पा संस्कृति के क्षय के पश्चात लगभग 1900 ईशा पूर्व की बनती है  अफ़ग़ानिस्तान के समीप उत्तर पूर्व ईरान क्षेत्र थे देवपूजक समुदायों को भारत स्थित समुदायों से विखण्डित कर दिया यज़ीदियों का 4000 वर्ष पूर्व भारत से लौटने का मेल खाता है । प्रसङ्गवश यह रोचक की अरस्तू को यह विश्वास था की यहूदियों का मूल भूमि भारत ही था । इसके अतिरिक्त स्वयं को एकेश्वरवादी (अल -मुवहिहदून) अरबी भाषा कहने वाला ड्रुज समुदाय भी पूर्वजन्म में बिश्वाश रखता है और उसके पवित्र धर्मग्रन्थ में रसाईल -अल हिन्द (भारतीय पत्रावली) भी सम्मलित है ।
पारशि पंथ के उदय के पश्चात पश्चिमी एशिया देवयास्नी पन्थ लंबे समय तक बना रहा उसके बने रहने का प्रमाण ईरानी सम्राट (xerxes _486-465)  ईशा पूर्व के देव् या दैव अभिलेख मिलते है जिसमे देवयास्नी बिद्रोह का सीधा उल्लेख मिलता है
【जैरजैस घोषणा करता है और इन क्षेत्रों में एक स्थान ऐसा है जहाँ देव् पूजे जाते थे तदोपरान्त अहुरमज्द की कृपा से मैंने देव् स्थान को नष्ट कर दिया  और मैंने घोषणा की देव् नही पूजे जाएंगे 】
यह लगभग 2500 वर्ष पहले यज़ीदियों के देवयास्नी पूर्वजो के द्वारा झेले गये दमन का एक पुराना लिखित प्रमाण है यज़ीदी पञ्चाङ्ग 4750 ईशा पूर्व जाता है जोकी यवन (ग्रीक) इतिहासकार एरियन (Arrian) द्वारा सिकन्दर अभियान के वर्णन में उल्लेखित ,भारत के 6676  ईशा पूर्व में उदित हुए पुराने सप्तऋषि पञ्चाङ्ग से सम्बंधित प्रतीत होता है ।
यज़ीदियों की आध्यात्मिक परम्परा समृद्ध है और उसकी वर्तमान संस्कृति परम्परा 12 वी सदी के शेख आदि (देहांत 1162) ई: से प्राम्भ होती है जो चौथे उमय्यद ख़लीफ़ा मर्वान प्रथम के वंशज थे शेख आदि की मकबरा उत्तरी इराक के लालिश में है जो यज़ीदी तीर्थयात्रा के मुख्य केंद्र बिन्दु है नववर्ष उत्सव में  कांस्य मयूर आरती दीपो जैसे ही मयूर गढ़े हुए कांस्य दिप संजक एक शोभा यात्रा में कव्वालों के द्वारा मीर के आवाश से लेकर यज़ीदी गांव में घुमाये जाते है मान्यता है कि संजक भारत से आये थे और सात पवित्र देवदूतों के प्रतीक के रूप में मूलतः उनकी संख्या सात थी जिनमे से पांच तुर्को द्वारा छीन लिए गये अब मात्र दो ही बचे है यज़ीदी लोग मानवता के अदम्य संकल्पशक्ति के एक प्रतीक है संसार में सर्वाधिक दमित और प्रताड़ित जन में से एक यज़ीदी समुदाय चरम बिपरीत परिस्थियों में भी अपने साहस और बीरता के लिए प्रशंसा सहयोग और समर्थ। के पात्र है ।

Wednesday, 5 April 2017

*~ संस्कृत भाषा का जादू ~*

*~ संस्कृत भाषा का जादू ~*
संस्कृत में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं जो उसे अन्य सभी भाषाओं से उत्कृष्ट और विशिष्ट बनाती हैं:-
१.अनुस्वार (अं )
२.विसर्ग(अ:)
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग।
-पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं,
यथा= राम: बालक: हरि: भानु: आदि,
-नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं,
यथा= जलं वनं फलं पुष्पं आदि।
अब जरा ध्यान दें, तो पता चलेगा कि विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण होगा, उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाएगा, जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।
उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है। भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भौंरे की तरह गुंजन करना होता है, और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जावेगा।
कपालभाति और भ्रामरी प्राणायामों से क्या लाभ है? यह बताने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि स्वामी रामदेव जी जैसे संतों ने सिद्ध करके सभी को बता दिया है। मैं तो केवल यह बताना चाहता हूँ कि संस्कृत बोलने मात्र से उक्त प्राणायाम अपने आप होते रहते हैं।
जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- ''राम फल खाता है",
इसको संस्कृत में बोला जायेगा- ''राम: फलं खादति",
राम फल खाता है, यह कहने से काम तो चल जायेगा, किन्तु 'राम: फलं खादति' कहने से भ्रामरी (अनुस्वार) और कपालभाति (विसर्ग) रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है।
संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् बोल-चाल योग साधना करना।
*शब्द-रूप*
संस्कृत की दूसरी विशेषता है, शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 (मुलधातु सहित) रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार २५ रूप बनते हैं।
यथा:- रम् (मूल धातु),
राम:, रामौ, रामा:,
रामं, रामौ, रामान्,
रामेण, रामाभ्यां, रामै:,
रामाय, रामाभ्यां, रामेभ्य:,
रामात्, रामाभ्यां, रामेभ्य:,
रामस्य, रामयो:, रामाणां,
रामे, रामयो:, रामेषु,
हे राम!, हेरामौ!, हे रामा:!,
ये २५ रूप सांख्य दर्शन के २५ तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है। और इन २५ तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ (संस्कृत बोलने वाले) को प्राप्त होने लगती है।
सांख्य दर्शन के २५ तत्व निम्नानुसार हैं:-
आत्मा= पुरुष,
अंत:करण= मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार,(कुल चार)
ज्ञानेन्द्रियाँ = नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण,(कुल पांच)
कर्मेन्द्रियाँ = पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक्,(कुल पांच)
तन्मात्रायें = गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द,(कुल पांच)
महाभूत = पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश,(कुल पांच)
*द्विवचन*
संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है।
जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।
*संधि*
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।
''इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है,
यथा:- १. इत्यहं जानामि,
२.अहमिति जानामि,
३.जानाम्यहमिति,
४.जानामीत्यहम्,
इन सभी उच्चारणों में विशेष अभ्यांतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फलस्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं निरोगी हो जाता है।
इन तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा और अमृतवाणी कहा जाता हैं।
अतः हम सबको नित्यप्रति कुछ श्लोक याद कर चलते फिरते समय बोलते रहना चाहिये।
*यदा-यदा हि धर्मस्य.
ग्लानिर्भवति भारत
.........अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम् ।
*.....परित्राणाय साधूनाम्
विनाशाय च दुष्कृताम्....
धर्मसंस्थापनार्थाय
.....सम्भवामि युगे-युगे...।

Tuesday, 6 December 2016

पाणिनि कालीन भारत

पाणिनि सूत्रों में पठित निश्चित स्थान नामो की सहायता से पाणिनि कालीन भौगोलिक बिस्तार का परिचय मिलता है उत्तर पश्चिम में कापिषी(४/२/६९) का उल्लेख मिलता है यह नगरी प्राचीन काल में अतिप्रसिद्ध राजधानी थी काबुल से लगभग ५० मिल उत्तर इसके प्राचीन अवशेष मिलते है यहाँ से प्राप्त एक शिलालेख में इसे कपिषा कहा गया है आजकल इसका नाम बेग्राम है कापिषि से भी और उत्तर में कम्बोज (४/१/१७५ पा ०सूत्र) जनपद था जहाँ इस समय मध्य एशिया का पामीर पठार है कम्बोज के पूर्व में तारिम नदी के समीप कूचा प्रदेश था जो सम्भवतः वहीँ है जिसे पाणिनि ने कुच वार (४/३/९४) में कहा है तक्षशिला के दक्षिण पूर्व में मद्र जनपद (४/२/१३१) था जिसकी राजधानी शाकल (बर्तमान) स्यालकोट थी मद्र के दक्षिण में उशीनर (४/२/११८) और शिबि जनपद थे बर्तमान पंजाब का उत्तर पूर्वी भाग जो चंबा से कांगड़ा तक फैला हुआ है प्राचीन त्रिगर्त देश था सतलुज,व्यास,और रावी,इन तीन नदियों की घाटियों के कारण इसका नाम त्रिगर्त पड़ा (पा०सूत्र ५/३/११६)दक्षिण पूर्व पंजाब में थानेश्वर कैथल करनाल पानीपत का भूभाग भरत जनपद था इसी का दूसरा नाम प्राच्य भरत (पा०सूत्र ४/२/११३) भी था क्यों की यहीं से देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो खण्डों की सीमाएं बंट जाती थी दिल्ली मेरठ का प्रदेश कुरु जनपद (४/१/१७२) कहलाता था उसकी राजधानी हस्तिनापुर था अष्टाध्यायी में उसका रूप हस्तिनापुर (४/२/१०१) है गंगा और रामगंगा के बीच में प्रत्यग्रथ  नामक जनपद(४/११७१) था जिसे पांचाल भी कहा जाता था मध्यप्रदेश में कोशल (४/१/१७१) और काशी (४/२/११६) जनपदों का नाम उल्लेख किया गया है इससे पूर्व में मगध (४/१/१७०) जनपद था पूर्वी समुद्र तट पर कलिंग देश था इस समय महानदी बहती है (४/१/१७०) में पाणिनि में सुरमस जनपद का नामोउल्लेख किया है इसकी पहचान असम प्रांत की सुरमा नदी की घाटी और गिरी प्रदेश से की जा सकती है इस प्रकार पश्चिम में कम्बोज (पामीर) से लेकर पूरब के कामरूप असम के छोर तक फैले हुए जनपदों का तांता अष्टध्य्यायी में पाया जाता है पश्चिम के समुद्रतटवर्ती कच्छ जनपद (४/२/१३३) और दक्षिणमे गोदावरी तटवर्ती अस्मक जनपद (४/१/१७३) का भी नामोउल्लेख था  अस्मक की राजधानी प्रतिष्ठान थी जो गोदावरी के बाएं किनारे बम्बई और हैदराबाद की सीमा पर बर्तमान पैठण है कलिंग और अस्मक एक ही अक्षांश रेखा पर थे उत्तर के पहाड़ में हिमालय का नाम हिमवत (४/४/११२) आया है पाणिनि को भारतीय समुद्रों का भी परिचय था  कर्क की अयनांश रेखा कच्छ भुज से अनार्ट अवंति जनपदों को पार करती हुई सुरमस तक चली गई है इसके दक्षिण में भारतवर्ष का भूभाग अंतरयन कहलाता था पाणिनि ने देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो भागो  का उल्लेख किया है इन दोनों के बीच भरत जनपद था जहाँ इस समय कुरुक्षेत्र है प्राच्य भरत पद पर पतञ्जलि ने लिखा है कि वस्तुतः प्राच्य देश भरत के पूरब से प्रारम्भ होता था पाणिनि ने शरावती नदी का उल्लेख (शारदीनां च ६/३/१२०)किया है नागेश के एक प्राचीन श्लोक का प्रमाण देते हुए लिखा है कि शरावती प्राच्य और उदीच्य देशों की बिच की सीमा थी अमरकोश से ज्ञात होता है कि गुप्त काल में भी शरावती उदीच्य और प्राच्य के बीच की सीमा मानी जाती थी और वही प्राची और उदीच्य की सीमा को अलग करती थी पाणिनि की दृष्टि में प्राच्य और उदीच्य दोनों प्रदेशो में बोली जाने वाली भाषा  शिष्टसम्मत थी उसके शब्द ब्याकरण के बिषय थे शब्दो के शुद्ध रूप जानने के लिए जिस लोक का प्रमाण दिया जाता था वह यही था गांधार और वाहीक दोनों मिलकर उदीच्य कहलाते थे सिंधु और शतद्रु तक का प्रदेश वाहीक था जिसके अंतर्गत मद्र उशीनर और त्रिगर्त थे तीन मुख्य भाग थे तक्षशिला से काबुल तक का प्रदेश गांधार कहलाता था पाणिनि की समकालीन संस्कृत भाषा  का क्षेत्र गांधार से प्राच्य तक फैला हुआ था पाणिनि लगभग पांचवी शताब्दी बिक्रम पूर्व में हुए थे उसके लगभग दो शती पीछे यवनों का और शको का आगमन इस देश में हुआ था शक और यवन के कारण बाल्हीक और गंधार प्रदेश भारतवर्ष के राजनैतिक सिमा से कुछ काल के लिए अलग हो गए थे और उसके साथ संस्कृत सम्बन्ध में ढील पड़ने लगे थे और इस लिए पतञ्जलि भाष्य में शक और यवनों के प्रदेश को आर्याव्रत को बाहर कहा और भाषा भेद के कारण उन्हें शिष्ट संस्कृत क्षेत्र से अलग समझा पतञ्जलि के दृष्टि में आर्याव्रत की शिष्टजनो की भाषा प्रतिमानित संस्कृत थी और तत्कालीन संकुचित आर्यवर्त हिमालय के दक्षिण परियात्र पर्वत के उत्तर आदर्श के पूर्व और कालक वन पश्चिम अवस्थित था आदर्श प्रायः आदर्शन या सरस्वती नदी को सुख जाने (विनशन) का प्रदेश समझाजाता है किन्तु काशिका में उसे एक जनपद के नाम से कहा गया है (४/२/१२४) और नागेश ने उसे कुरुक्षेत्र की पहाड़ी कहा है कालका वन पाली साहित्य के अनुसार साकेत एक भाग था इस प्रकार हम देखते है की राजनैतिक कारणों से पतञ्जलि के समय आर्याव्रत की सीमाएं काफी सिकुड़ गई थी पतञ्जलि ने शक यवन किष्किन्धा गब्दिक और सौर्यकौंच को आर्याव्रत को सीमा से बाहर कहा एक
किष्किन्धा गोरखपुर में था जिसे पाली साहित्य में खुखुन्दो कहा चंबा रियासत के गद्दी प्रदेश के प्राचीन नाम गाब्दिक था और वह पतञ्जलि के समय बाहर समझा जाता था किन्तु पाणिनि के समय गंधार से मगध तक संस्कृत भाषा का अखण्ड प्रवाह फैला हुआ था उसी समय प्राच्य और उदीच्य दो स्वाभाविक भाग माने जाते थे ।