श्रीकृष्ण और कुब्जा प्रसंग को लेकर समाजियो सहित वामकामी गैंग ने जो भसड़ मचाया हुआ है वह उनके अल्पज्ञता और अल्पश्रुत का ही प्रमाण है ,अस्तु धर्म रहस्य अतिगुढ होने से विद्वान पुरुष भी शब्दो के भंवर जाल में मोहित हो अर्थ का अनर्थ कर बैठते है फिर अल्पज्ञ अल्पश्रुत का कहना ही क्या ।
■--पुराणे ही कथा दिव्य (महाभारत आदिपर्व 5/1)
■-सुदुर्लभा कथा प्रोक्ता पुराणेषु (ब्रह्मवैवर्तपुराण)
■-आख्यानं पुराणेषु सुगोप्यक्म् (ब्रह्मवैवर्तपुराण)
पुराणों की कथा अतिदिव्य और गोपनीय होने से विमोह उतपन्न होना स्वाभविक है । इस अज्ञान का निराकरण श्रुति के इस आज्ञा से ही सम्भव है उससे भिन्न कोई और मार्ग नही ।
■-तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्। (मुंडकोपनिषद्)
■-आचार्यवान् पुरुषो वेदः(छान्दोग्य उपनिषद)
प्रथमतः तो इस बिषय पर श्रीभगवन का कुब्जा के प्रति क्या भाव है और कुब्जा का भगवन के प्रति ,शास्त्र स्पष्टरूप से इसकी व्यख्या करता है परन्तु वामी कामी ,समाजी गैंग को यह सब दिखे कैसे ?
क्यो की शास्त्रो के प्रति उनकी श्रद्धा ही नही और जहाँ श्रद्धा नही वहाँ ज्ञान कहाँ से हो ।
●--श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् (गीता)
श्रीभगवन सङ्कल्प लेते है कि माली ,दर्जी,और कुब्जा को मोक्ष प्रदान करना है कुब्जा की इच्छा जान उनके प्रिय करने हेतु घर गए और श्रीकृष्णचन्द्र ने अतिदुर्लभ दास्यपद प्रदान करने का वरदान दिया
■--मालाकारतंतुवायकुब्जिकानां च मोक्षणम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण )
■-श्रेयः ततस्ते न चिराद् भविष्यति (श्रीमद्भागवतं १०/४२/२)
■--प्रसन्नो भगवान् कुब्जां (श्रीमद्भागवतं)
■-प्रियमिच्छन् गृहं ययौ (श्रीमद्भागवतं)
■--कृष्णस्तस्मै वरं दत्तवा स्वदास्यमतिदुर्लभम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
◆तो कुब्जा का लक्ष्य था भगवद्भक्ति और भगवन के चरणरज को ग्रहण करने की व्यकुलता ।
■--कर्मणा मनसा वाचा चिन्तयन्ती हरेः पदम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
■--जिघ्रन्त्यनन्तचरणेन रुजो (श्रीमद्भागवतं)
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जहाँ सेव्य सेवक का भाव हो तथा जहाँ मोक्ष प्रदान कराने का सङ्कल्प हो वहाँ स्वान की भांति सूंघते हुए व्यभिचार खोज लेना
ज्ञान दरिद्रता है कि नही बिचार करिये ।
यह तो हो गया एक पक्ष
अब दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की यह बिषय
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■--श्रीकृष्णचन्द्र और बलराम के आयु पर बिचार
श्रीकृष्णचन्द्र और बलराम युवास्था को भी प्राप्त नही कर पाए थे मथुरा के नगरवासी जो प्रत्यक्षाद्रष्टा थे वह कह रहे है और यही पर श्रीकृष्णचन्द्र का कुब्जा के साथ मिलन होता है ।
रणसमरांगण में श्रीकृष्णचन्द्र के लीलापूर्वक कंस वध के पश्चात जब माता देवकी के पास जाते है तो माता देवकी और वासुदेव स्वयं श्रीकृष्णचन्द्र को गोद मे बिठाते है
■--बाला वयं (श्रीमद्भागवतं १०/४२/)
■--चातिसुकुमाराङ्गौ किशोरौ नाप्तयौवनौ (श्रीमद्भागवतं१०/४२)
■--गोपालबालवेषश्च (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
■--माता चकारतौ क्रोडे पिता च सादरं मुने (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
अतः यहाँ तक तो सिद्ध हुआ कि श्रीकृष्णचन्द्र और बलराम अभी युवास्था को भी प्राप्त नही कर पाएं थे ।
कंस वध के पश्चात पुनः जब मातादेवकी सहित श्रीकृष्णचन्द्र गोकुल पहुचते है तो नंद महाराज से माता देवकी क्या कहता है वह अतिमहत्वपूर्ण है , नंद बलराम का आप के गृह्मन्दिर में ११ वर्ष व्यतीत हो चुका है
■--एकादशाब्दं सबलः स्थित्वा ते मन्दिरे सुखम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण ४/९१/७)
आततायी कंस वध के समय हलधर बलराम का आयु मात्र ११ वर्ष का था जबकि श्रीकृष्ण बलराम से आयु में छोटे थे तो अनुमान लगाइये श्रीभगवन की आयु क्या होगी मथुरागमन काल मे क्या होगा ?
गोकुल पहुचने के पश्चात श्रीकृष्णचन्द्र का विधिपूर्वक उपनय संस्कार हुआ इस श्लोक का उपसंहार विधिपूर्वक शब्द से हुआ है अतः यह सिद्ध होता है कि श्रीकृष्णचन्द्र का उपनयन संस्कार शास्त्रनुकूल ही हुआ ।
■--ब्राह्मणैश्च यथावद्विजसंस्कृतिम् (श्रीमद्भागवतं १०/४५/२६)
■-कृष्णोपनयनावधि ।युष्माकं कुशलं तत्वं विज्ञाय विधिपूर्वकम् (ब्रमवैवर्त पुराण ४/९२/१५)
उपनयन संस्कार बिषय में महर्षि मनु कहते है ।
■-ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यो विप्रस्य पञ्चमे ।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे । (मनुस्मृति)
ब्रह्मतेज से उदीप्त ब्राह्मण बालक को गर्भ से 5 वे वर्ष में कर्मकौशल तेज से उदीप्त क्षत्रिय बालक का उपनयन 6 थे वर्ष में करना चाहिए ।।
श्रीकृष्णचन्द्र के बालगोपाल की लीलाओं से भला कौन अनभिज्ञ ?
उनके कर्म कौशल की चर्चा तो सम्पूर्ण भारतवर्ष में हो रहा था फिर उनका उपनयन संस्कार बिषय को देखा जाय तो 10 वर्ष से भी कम आयु ठहरता है ।
अब एक बालक से बृद्धा का क्या सम्बन्ध हो सकता है ?
बिचार करिये ।
कुब्जां तां वृद्धामतियरादुराम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण )
