Monday, 14 March 2022

गौतम बुद्ध के गृहत्याग का सच









सिद्धार्थ गौतम  के गृहत्याग के बिषय में जो कथाएं प्रचलित है वह यह है 

एक दिन जब वह भ्रमण पर निकले तो उन्होंने एक वृद्ध को देखा जिसकी कमर झुकी हुई थी और वह लगातार खांसता हुआ लाठी के सहारे चला जा रहा था। थोड़ी आगे एक मरीज को कष्ट से कराहते देख उनका मन बेचैन हो उठा। उसके बाद उन्होंने एक मृतक की अर्थी देखी, जिसके पीछे उसके परिजन विलाप करते जा रहे थे।


ये सभी दृश्य देख उनका मन क्षोभ और वितृष्णा से भर उठा, और गृहत्याग कर   परिव्रज्या ग्रहण किया  जब सिद्धार्थ गौतम ने परिव्रज्या ग्रहण किया तब उनकी आयु 29 वर्ष की थी । 

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■-सिद्धार्थ गौतम ने 29 वर्ष की आयु होने पर ही  एक बृद्ध ,रोगी और मृत व्यक्ति को पहली बार देखा होगा  यह व्याख्या तर्क की कसौटी पर कसने पर खरी उतरती प्रतीत नहीं होती. त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में भी गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख तक नहीं है.

■-पुनश्च प्रश्न उठेगा की फिर उनके परिव्रज्या की कथाओं का श्रोत क्या है और किसने उसे लिखा ??

सिद्धार्थ गौतम के मृत्यु के 1000 वर्ष पश्चात भदन्त बुद्धघोष इन कथाओं का सृजन किया और उसे प्रचारित प्रसारित किया ।

■--सिद्धार्थ गौतम ने परिव्रज्या के बिषय में सुतनिपात के खुद्दक निकाय में स्वयं कहते है ।

मुझे शस्त्र धारण करना भयावह लगा यह जनता कैसे झगड़ती है देखो मुझमे संवेग कैसे उतपन्न हुआ यह मैं बताता हूँ अपर्याप्त पानी मे जैसे मछलियां छटपटाती है वैसे एक दूसरे के बिरोध करके छपटाने वाली प्रजा को देख कर मेरे अन्तःकरण में भय उतपन्न हुआ चारो ओर का जगत् असार दिखाई देने लगा सभी दिशाएं कांप रही है ऐसा लग एयर उसमे आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नही मिला क्यो की अंत तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध देख कर मेरा जी ऊब गया ।


संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ 

फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।

अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥

समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।

इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।(खुद्दक निकाय )

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■--सिद्धार्थ गौतम के गृहत्याग के पीछे का सच ---

शाक्यो की राजधानी का नाम कपिलवस्तु था जहाँ सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ था ।

शाक्यो का अपना संघ हुआ करता था और इस संघ से जुड़े हुए व्यक्ति को संघ के नीतियों आदर्शो एवं शाक्यो के रक्षण हेतु प्रतिबद्ध होना पड़ता था । इस संघ के सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु  20 वर्ष  का था  संघ में दीक्षित होने के पूर्व संघ के नीतियों आदर्शो से  परिचय कराया जाता था उन नीति आदर्शो के रक्षण के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होना पड़ता था उसके पश्चात जनमत संग्रह के द्वारा यह सुनिश्चित होता था कि अमुक व्यक्ति संघ से जुड़ सकता है अथवा नही ।

सिद्धार्थ गौतम को अपने वर्णाश्रम धर्म अनुसार वेद वेदाङ्ग एवं क्षात्र धर्म अनुरूप शिक्षण दिक्षण हुआ था सिद्धार्थ गौतम जब 20 वर्ष के हुए तब संघ से जुड़ने के लिए आमंत्रण भेजा गया सिद्धार्थ गौतम ने उस आमंत्रण को स्वीकार कर संघ में जुड़ने के इच्छुक हुए ।

संघ के सेनानायक ने संघ के नीतियों आदर्शो को सिद्धार्थ गौतम के समक्ष प्रेसित किया सिद्धार्थ गौतम संघ के नीति आदर्शो को पढ़ कर पूर्ण रूप से संतुष्ट हुए एवं भरी सभा मे प्रतिज्ञा ली कि मैं संघ के नीतियों आदर्शो का पालन अक्षरसः रूप से करूँगा यदि किसी भी प्रकार से मैं दोषी पाया जाता हूँ तो संघ अपने नीतियों के अनुरूप मुझे दण्ड का भागी भी बना सकता है ।

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संघ से जुड़े सिद्धार्थ गौतम को अब 8 से 9 वर्ष बीत चुके थे यही वह समय था जब सिद्धार्थ गौतम के जीवन मे वह घटनाएं घटती है फलस्वरूप उन्हें मजबूरन गृहत्याग करना पड़ा ।

शाक्यो के राज्य से सटा हुआ कोलियों का राज्य था रोहिणी नदी दोनों राज्यो के विभाजक रेखा थी ।

शाक्यो और कोलियों दोनों ही अपने राज्य में सिंचाई के लिए रोहिणी नदी के ऊपर दोनों राज्य निर्भर था ।

पानी को लेकर ही शाक्यो और कोलियों के मध्य झगड़ा हुआ और बात यहाँ तक आ पहुची की दोनों के मध्य युद्ध का माहौल बना ।

इस बिषय को लेकर शाक्यो ने संघ का अधिवेशन बुलाया और उस सभा मे सभी ने अपने अपने पक्ष का प्रस्ताव रखा ।

संघ के सेनानायक युद्ध के पक्ष में था और सिद्धार्थ गौतम युद्ध के विरुद्ध अपना मत दिया की युद्ध समस्या का हल नही है ।

इस बिषय को लेकर पुनः जनमत संग्रह हुआ ।

जनमत संग्रह में संघ के सेनानायक को ही प्रधानता मिली और सिद्धार्थ गौतम का पक्ष बहुत बड़े बहुमत से अमान्य सिद्ध हुआ 

दूसरे दिन सेनानायक ने संघ की पुनः सभा बुलाई ।

जब सिद्धार्थ गौतम ने देखा कि जनमत संग्रह में उसे पराजय का मुह देखना पड़ा तब सभा को सम्बोधित करते हुए सिद्धार्थ गौतम ने कहा मैत्रो आप जो चाहो कर सकते हो आप के साथ जनमत संग्रह है लेकिन मुझे खेद के साथ यह कहना पड़ रहा है कि मैं आप सभी के मत का बिरोध करता हूँ मैं किसी भी प्रकार से युद्ध मे भाग नही लूंगा 

तब संघ के सेनानायक ने सिद्धार्थ गौतम को सम्बोधन करते हुए कहा सिद्धार्थ उस शपथ को तुम याद करो जब संघ के सदस्य बनते समय ग्रहण किया था ।

यदि तुम अपने वचनों का पालन न करोगे तो तुम दण्ड का भागी भी बन सकते हो ।

संघ अपनी आज्ञा की अवहेलना करने वाले को फांसी की सजा अथवा देशनिकाला घोषित भी किया जा सकता है ।

केवल इतना ही नही संघ तुम्हारे परिवार को सामाजिक बहिष्कार भी कर सकता है ।

इस लिए इन तीनो में से एक का चुनाव तुम कर सकते हो

(१) सेना में भर्ती हो युद्ध मे भाग लो 

(२) फांसी पर लटकना अथवा देशनिकाला स्वीकार करो 

(३) अपने परिवार का सामाजिक बहिष्कार एवं खेतो की जब्ती 


सेनानायक के इन वचनों को सुन कर सिद्धार्थ गौतम ने कहा कृपया मेरे परिवार को दण्डित न करे उसका सामाजिक बहिष्कार न करें वे निर्दोष है मैं अपराधी हूँ ।

इस लिए दण्ड का पात्र भी मैं ही हूँ ।

इस लिए मैंने एक आसान रास्ता चुना है  की मैं परिव्राजक बन देश से बाहर चला जाऊं ।

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सिद्धार्थ गौतम संघ के नीतियों के विरुद्ध गया फलस्वरूप वे दण्ड के पात्र भी बने और देश निकाला घोषित किया गया जिसे परिव्रज्या के नाम से प्रचारित प्रसारित किया गया ।

मैंने अपने प्रमाण में जिन लेखों का उद्धरण दिया है उस पुस्तक का स्क्रीन शॉट भी प्रेसित कर रहा हूँ ताकि लोग यह न समझे कि मैंने अपने मतों की पुष्टि के लिए केवल कपोलकल्पित शब्दो का सहारा लिया ।

पुस्तक के लेखक :--बौद्धाचार्य भदन्त आनन्द कौशल्यायन 

एवं श्रीमान भीमराव अंबेडकर जी है ।

इनके लेखों को अब तक बौद्ध मत के किसी भी सम्प्रदाय ने खण्डन नही किया क्यो की वे भी जानते है कि बुद्ध के परिव्रज्या ग्रहण के बिषय में त्रिपिटिक आदि ग्रन्थों में कोई उल्लेख नही है ।


#शैलेन्द्र_सिंह

Friday, 11 March 2022

देवराज इंद्र को महर्षि गौतम का शाप देना



एक महाशय ये भी है #Shailesh_k_yadav


जो महर्षि गौतम पर आक्षेप लगा रहे  है कि अहिल्या को ही शाप दिया इंद्र को क्यो नही ।

 हिन्दुओ की सबसे बड़ी दुर्दशा तो यह है कि वे अपने अधिकार अनुरूप शास्त्रो का अध्ययन नही करते ।वामपन्थियों ,ईशाइयो ,इस्लामिक ,एवं तथाकथित बुद्धिजीवियो द्वरा प्रचारित ,प्रसारित बिषयों को तो पढ़ लेते है परन्तु बिषयों के मूल शास्त्रो को नही पढ़ते  , जिस कारण आज यह स्थिति बन पड़ी है धर्मद्रोही दुष्टों द्वरा प्रचारित बिषयों को ही सत्य मान कर उसे स्वीकार भी लेते है और हीन भावना से ग्रसित भी रहते ही ।

जिस कारण इन जैसे धर्मदूषको का बाजार भी चलता है ।

यदि #शैलेश_के_यादव जी  विशुद्ध हिन्दू होते तो वे अपने मुलशास्त्रो का ही अध्ययन किये होते ।

ऐसा न करने का एक कारण वर्णसंकरता भी हो सकता है ।


इसने जो आक्षेप लगाया है वह वाल्मीकि रामायण में स्प्ष्ट दर्शया गया है कि इंद्र द्वरा छल करने पर महर्षि गौतम ने इंद्र शाप दिया था ।

जब महर्षि गौतम इंद्र को शाप दे ही दिए तो भला श्रीरामचन्द्र पुनः उसे दण्ड क्यो दे ??

और वहाँ दण्ड देने का भी अधिकार महर्षि गौतम का था सो महर्षि गौतम ने दोनों को दण्ड दिया ।


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वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग ४८ श्लोक संख्या -२८-२९


अकर्तव्यम् इदम् यस्मात् विफलः त्वम् भविष्यति ॥

गौतमेन एवम् उक्तस्य स रोषेण महात्मना ।

पेततुः वृषणौ भूमौ सहस्राक्षस्य तत् क्षणात् ॥


इससे बड़ा और दण्ड किसी के लिए क्या हो सकता है । 

कलिकाल में ऐसे लोग ही असुर है जो हमारे संस्कृतियों पर घात करते है जैसे त्रेता युग मे महर्षि विश्वामित्र को यज्ञादि कर्मकाण्ड में असुरगण बाधा देते थे वैसे ही आजकल ये लोग भी असुरगण ही है ।


#बिशेष:-- इतना ही कहूंगा कि अपने अपने वर्णाश्रमधर्मानुसार अध्ययन करते रहे तभी बिषयों के गूढ़ रहस्य को समझ पाएंगे और धर्मदूषको को उसका उत्तर दे पाएंगे ।


शैलेन्द्र सिंह

Thursday, 17 February 2022

दयानंद सरस्वती मुखमर्दन

 #स्वामी_दयानंद_मुख_मर्दन


स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से समाज मे ब्यभिचार फैलाने की कुचेष्टा की ताकि सनातन धर्म मे वर्णसंकरता को आसानी से फैलाया जा सके नियोग के माध्यम से , जिस भारत भूमि में सती सावित्री ,माता अनुसूया ,माता सीता के पवित्रता का गुणगान आज भी घर घर गाय जाता रहा है उसी भारत भूमि में बालिकाओं और स्त्रियों के चरित्रहनन का पाठ पढ़ाया जा रहा है सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से  |

स्वामी दयानन्द सरस्वती जानते थे कि हिन्दुओ में वेदो के प्रति अटूट श्रद्धा है हिन्दुओ की आस्था जितनी ईश्वर में है उससे भी कहीं ज्यादा आस्था वेदो के प्रति है इस लिए नियोग को सिद्ध करने के लिए वैदिक के दिब्य ऋचाओ को अपने कुबुद्धि द्वरा अनर्थ कर लोगो के मध्य  प्रचारित प्रसारित   किया ।

भले ही मन्त्रो के वास्तविक अर्थ को विकृत कर लोगो के समक्ष क्यो न परोसा जाय ,स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ऋग्वेद के १० वे मण्डल के १० वां सूक्त के मन्त्र को आधार बनाया ,और मन्त्र को विकृत रूप से भाष्य कर प्रचारित किया ||  ताकि सामाजिक रूप से नियोग को मान्यता प्राप्त हो और कर्मणा जातिवाद को बढ़ावा मिले । स्वामी दयानन्द सरस्वती ने जिस मन्त्र को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया वह मन्त्र भी अधूरा है और अपने कथनों को सिद्ध कर पाए इसके लिए दयानन्द ने मन्त्रो को कांटछांट कर उसकी व्याख्या भी कर दी जो यह है 


अन्यमि॑च्छस्व सुभगे॒ पतिं॒ मत् ॥ (ऋग्वेद १०/१०) 


दयानन्द भाष्यार्थ :-जब पति सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ होवे तब अपनी स्त्री को आज्ञा दे हे सुभगे सौभाग्य की इच्छा करने हारी स्त्री तू मुझसे अन्य दूसरे पति की इच्छा कर क्यो की  अब मुझसे सन्तानोत्पत्ति न हो सकेगी तब स्त्री दूसरे से सम्बन्ध बना कर सन्तानोतप्ति करे ।

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अब आते है मूल बिषय पर :-- स्वामी दयानन्द सरस्वती ने जिस मन्त्र को कांट छांट कर व्याख्या की वह मन्त्र पूरा का पूरा यहाँ दिखलाया जा रहा है आप सब भी अवलोकन करें 


आ घा॒ ता ग॑च्छा॒नुत्त॑रा यु॒गानि॒ यत्र॑ जा॒मयः॑ कृ॒णव॒न्नजा॑मि ।


उप॑ बर्बृहि वृष॒भाय॑ बा॒हुम॒न्यमि॑च्छस्व सुभगे॒ पतिं॒ मत् ॥(ऋग्वेद १०/१०/१०)


भाष्यार्थ :-- यम अपने बहन यमी से कहता है 

(ता उत्तरा युगानी घा आगच्छान्) वह युग भविष्य में आ जाएंगे  (यत्र) जिसमे (जामयः) भगिनियां (अजामी कृणवन् ) बंधुत्व के बिहीन भ्राता को पति बनावेगी इसलिए हे (सुभगे) सुन्दरी 

(मत् अन्यं पतिं इच्छस्व) मुझसे भिन्न अन्य सुयोग्य वर को पति बनाने की इच्छा कर (बृषभाय बाहुं उप बर्बृहि ) बीर्य सेवन करने में समर्थ बाहु का आश्रय ले  ।


स्वामी दयानन्द ने भाई बहन के मध्य हुए सम्वाद को  पति पत्नी का सम्वाद बना डाला और लोगो के मध्य भ्रामकता का प्रचार किया की ( मैं सन्तानोतप्ति करने में असमर्थ हूँ इस लिए सन्तानोपत्ति के लिए तू किसी अन्य पुरुष से सम्बन्ध बना)


  किसी को यहाँ शंका हो सकती है कि यह भाई बहन का सम्वाद कैसे ??

किसी भी बिषय पर व्याख्या करने से पहले पूर्व में आये हुए प्रसंग का बिचार कर पश्चात आये हुए बिषयों की व्याख्या होती है दसवे मण्डल के पूरा का पूरा दसवां सूक्त सहोदरता की पुष्टि करता है ।  ऋग्वेद के दसवां मण्डल यम यमी सूक्त के नाम से जाना जाता है  यम यमी दोनों सहोदर (भाई बहन)  है यमी अपने भाई यम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है  यम अपने बहन यमी को यह कहते हुए प्रस्ताव को ठुकरा देता है  की जो भ्राता अपने भगिनी को पत्नी रूप में स्वीकार करता है  समाज मे लोग उसे पापी कहते है अतः तू  मुझसे भिन्न किसी दूसरे सुयोग्य वीर्यवान पुरुष को पति बना  ऐसा दिब्य सन्देश को स्वामी दयानन्द ने विकृत कर भाई बहन के मध्य हुए सम्वाद को पतिपत्नी बना डाला ।

वेदो का सन्देश दिब्य अलौकिक अपौरुषेय है वेदो का एक एक शब्द दिब्य ज्ञान को प्रकाशित करने वाला जिसकी समानता विश्व का कोई भी पौरुषेय (मानवी कृत) पुस्तक समानता नही कर सकता उसी दिब्य सन्देशो को दयानन्द सरस्वती ने विकृत कर सनातन धर्म ग्रन्थों पर घात किया है ।

स्मृतिकारों ने ठीक ही कहा है कि वेद अल्पश्रुत से डरता है कि कहीं वे मेरी हत्या न कर दे ।

केवल इतना ही नही दयानन्द सरस्वती ने इसी चतुर्थ समुल्लास में स्त्रियों को 11 -11 पुरुषों से सम्बन्ध  बनाने को कहा है जैसे इस्लाम मे हलाला प्रथा है ठीक उसी प्रथा के चलन का वकालत दयानन्द सरस्वती ने किया है अपने बिचारो के माध्यम से और लोक में ढोल पीटा जाता है कि दयानन्द सरस्वती ने वैदिक धर्म की रक्षा की , यह सब कितना सही है आप सभी विद्वतजन बिचार करें  ||

सनातन धर्म अपने आप मे पवित्रता का द्योतक है इसमें अपवित्र बिचारो का कोई स्थान नही ।

शैलेन्द्र सिंह


Wednesday, 16 February 2022

गुरु लक्षण और स्कूली शिक्षक भाग --3



तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।(गीता)


श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान्स्वधर्मे निविशेत वै । 

श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं अनुतिष्ठन्हि मानवः ।। (मनुस्मृति)


कार्याकार्यव्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत जितने भी संस्कार है उनमें शास्त्रो का स्पष्ट घन्टाघोष है की कैसे उसे आचरण में लाया जाए फिर वेदविद्या आदि तथा आचार्यो के प्रति शास्त्र मौन कैसे रहे ?

लौकिक तथा पारलौकिक कल्याण हेतु मोक्षरूपी विद्या प्रदान करने वाले गुरु अथवा आचार्य का लक्षण क्या है और कौन इसका अधिकारी है शाश्त्रो ने बृहदरूप से इस पर प्रकाश डाला है 


एतद्‍देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।

  स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा:॥(मनुस्मृति)

जो अग्रजन्मा है उसी से पृथ्वी के सभी मानव अपना आचार बिचार सीखें ।


ब्राह्मण सभी वर्णो में।अग्रजन्मा है 

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् (ऋग्वेद)

उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्येष्ठ्याद्ब्रह्मणश्चैव धारणात् ।

सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १.९३ )


वेदादि शास्त्रो में ब्राह्मण को मुख कहा गया है !

वाक् और बुद्धि  ही अंग प्रत्यंग से लेकर साम्राज्य तक का शाशन करता है यह दृष्टान्त जगत में देखा जाता है जिस कारण किस वर्ण का क्या आचरण है यह ब्राह्मण से ही जानना चाहिए क्यो ?

क्योकि 

वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १०.३ )

उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।(मनुस्मृति )

ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यां अधिजायते ।(मनुस्मृति)

पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः।।(महाभारत -- आदिपर्व ८१/२०)


ब्राह्मण स्वयं धर्म स्वरूप है । 

जिस कारण श्रुतिस्मृति आदि ग्रन्थों में ब्राह्मण के सानिध्य में ही  अध्ययन अध्यापन और आचार बिचार की शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया गया है 


गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः(महाभारत आदिपर्व १/२८/३५)

अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः ।

प्रब्रूयाद्ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः । । 

सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्त्युपायान्यथाविधि ।

प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् । । (मनुस्मृति १०/१-२)

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् (श्रीमद्भागवतगीता १८- ४२ )

वृत्त्यर्थं याजयेदज्वान्यानन्यानध्यापयेत् तथा ।

कुर्यात् प्रतिग्रहादानं गुर्वर्थं न्यायतो द्रिजः (विष्णु पुराण ३/२३ )

सास्त्रज्ञा नित्य है और सास्त्रज्ञा मानने वाला ही ईश्वर का आराधना करता है सास्त्र द्रोही नही विष्णुपुराण का उद्घोष है अब उसे न मान मनमाना आचरण को ही धर्म मान ले तो उससे बड़ी और मूर्खता क्या ।


वर्णास्वमेषु ये धर्माः शास्त्रोक्ता नृपसत्तम ।

तेषु तिष्ठन् नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ।(विष्णु पुराण ३/ १९ )

कहाँ श्रुतिस्मृति प्रोक्त वर्णाश्रमधर्म  आचरित गुरु तो कहाँ  भौतिक शिक्षा के बल पर प्राप्त किया हुआ संवैधानिक पद  अतः यह नीतान्त भ्रामक प्रचार है कि स्कूली शिक्षक और गुरु समतुल्य है 

शैलेन्द्र सिंह

Monday, 14 February 2022

भीमराव अंबेडकर एक भ्रामक तथ्य












भीमराव अम्बेडकर का जन्म एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था भीमराव अम्बेडकर के दादा 

मालो जी सकपाल ईष्ट इण्डिया के अंतर्गत मुम्बई सेना में हवलदार पद पर विभूषित थे 

मालोजी सकपाल के दो संतान हुए जिनमे एक पुत्र  रामजी सकपाल और दूसरा पुत्री के रूप में मीरा बाई 

मालो जी सकपाल का पुत्र राम जी सकपाल सैनिक स्कूल के प्रधानाचार्य नियुक्त होते हुए सूबेदार मेजर पद पर विभूषित थे ।

ऐसे सम्भ्रान्त परिवार के बिषय में यह नैरेटिव गढ़ा जाता है कि भीमराव अम्बेडकर सहित उनके परिवार का शोषण हुआ ।

जिनके कुल के सदस्य सैनिक के महत्वपूर्ण पदों पर विभूषित उस कुल के शोषण तो क्या ऊंची आवाज में कोई बात तक न कर सके फिर ऐसे कैसे नैरेटिव गढ़ा गया कि उनके कुल का शोषण हुआ ??


हमने यहाँ भीमराव अम्बेडकर के बाल्यकाल से लेकर बृद्धावस्था तक के फोटो को शेयर भी किया है एक भी ऐसा फोटो नही जहाँ भीमराव अम्बेडकर सूटबूट में न हो ।

भीमराव अम्बेडकर एक सम्भ्रान्त परिवार से था उनके रहन सहन  वेशभूषा तथा उनका पठनपाठन भी विश्व के धनी विद्यालयों में हुई थी यह सर्वविदित है ।

उनकी जीवनी पढ़ने से ज्ञात होता है कि वे न तो शोषित ही थे और न ही अछूत ।

यदि शोषित होते तो इतने सम्भ्रान्त कैसे होते ?

और यदि उन्हें अछूत माना जाता तो उनकी शिक्षा दीक्षा एक ब्राह्मण के सानिध्य में कैसे हुई ??

फिर ऐसा क्या हुआ कि भीमराव अम्बेडकर हिन्दू धर्म के प्रति विषवमन किया ??

क्यो भारतीयों के जनमानस में यह जहर घोला की शुद्रो को शोषित किया जाता है उसे अछूत माना जाता है ??


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भगवन् के चरण कहे जाने वाले शुद्र अछूत कैसे हो सकते है ??

सनातन धर्म मे तो चरणों की महत्ता ऐसी की , की भगवद् विग्रह में चरणों की ही पूजा की जाती है मुखमण्डल की नही ।

 पूरा का पूरा शरीर इन्ही चरणों के स्तम्भ पर खड़ा होता है फिर उन्हें अछूत कैसे माना जाता ??

यदि ऐसा होता तो विदुर शुद्र होते हुए भी हस्तिनापुर जैसे महान साम्राज्य का महामन्त्री कैसे बना ?? 

इक्ष्वाकु वंश के राजा हरिश्चंद्र एक चाण्डाल के यहाँ नौकरी कैसे किया यदि अछूत माना जाता तो यह सम्भव ही न होता और यदि शोषित होता तो इक्ष्वाकु वंश के राजा को खरीदने का उस चाण्डाल के पास धन नही होता ।

अस्तु सनातन धर्म वर्णव्यवस्था शोषक नही पोषक है समस्त वर्णो को अपने अपने क्षेत्र में एकाधिकार प्राप्त था कोई भी वर्ण दूसरे वर्ण के व्यवस्था का अतिक्रमण नही करता था ।

तभी यह भारत भूमि आर्थिक रूप से सबसे सम्पन्न था और यवन ,अरब,तुर्क,ब्रिटिश भारत पर डाका डालने आये ।

प्रश्न तो बहुतेरे है ।

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दर्शल ऐसा इसलिए हुआ कि जिस आयु में  युवक अपने संस्कृतियो और संस्कारों के प्रति जिज्ञाशू होते है वे उसी आयु में  ईसाई बहुल देश अमेरिका चले गए तब उनकी उम्र महज 22 वर्ष की थी यही वह कालखण्ड था जब भारत मे क्राइस्ट मिशनरियों द्वरा सनातन संस्कृतियो पर प्रहार किया जा रहा था यहाँ के संस्कारों के प्रति लोगो मे विषवमन किया जारहा था और धर्मांतरण की होड़ लगी थी  जब भारत देश मे यह दृश्य चारो ओर था फिर ईसाई बहुल देशों में रह कर भीमराव अम्बेडकर के बिचारो में बदलाव कैसे न हो ???

अंग्रेजो ने जातिवाद का बीज इन्ही के माध्यम से बोया और भारत मे जातिवाद का फसल लहलहाने लगा ।

जिसका लाभ सभी मत पन्थो मजहबो को मिला जिसे जहां भी मौका मिला वे फसल काट (धर्मांतरण ) कर ले गए ।

और आज भी उसी फसल का बीज इस भारत भूमि में पसरा पड़ा है जब जिन्हें मौका मिलता है चुन लेते है ।

शैलेन्द्र सिंह

वैदिक हिंसा हिंसा नही

 त्रैगुण्यविषया_वेदा (गीता) 

 वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः (मनुस्मृति)

वेद सात्विक ,राजसिक,तामसिक तीनो गुणों को भी मोक्ष प्रदान करने वाला है ऐसे में यदि अग्निषोमियदि के बिरोध करने वाले के  कथनों को माने तो ( तंत्र विद्या) वाममार्गी तो नरक के ही भागी होंगे फिर दुर्गा,काली आदि देवियों की स्तुत्य पशुबलि कर कौन ऐसा ब्यक्ति है जो नरक में जाने की इच्छा करेगा ?क्यो की वाममार्ग में बलि मान्य है  वेद इन वाममार्गियों का उद्धार कैसे करेगा ?? 

ऐसे में त्रैगुण्यविषया वेदा से वेदों की सिद्धि कैसे हो ??तब तो वेद भी अमान्य हो जाएगा इस लिए वेद सात्विक राजसिक तामसिक मार्गो को भी मोक्षप्रदान करने के लिए भिन्न भिन्न मार्गो को प्रसस्त किया है 


इस लिए श्रुतियों का उद्घोष है #स्वर्गकामो_यजतेती_सततं_श्रूयते_श्रुति 

यज्ञाधारं जगतसर्व यज्ञो विश्वस्य जीवनम्

यज्ञो ही परमो धर्मो   यज्ञे सर्वप्रतिष्ठितम (इति श्रुति:)


अग्निषोमियादिषु च न हिंशा पशो: निहिन्तरच्छागादिदेहिपरि त्यागपूर्वक कल्याणदेह स्वर्गादिप्राप्तकत्वश्रुते: संज्ञपनस्य 


न वा एतन् म्रियसे नोत रिष्यसि देवं इदेषि पथिभिः शिवेभिः । 

यत्र यन्ति सुकृतो नापि दुष्कृतस्तत्र त्वा देवः सविता दधातु ॥ (यजुर्वेद)


अग्नीषोमीयं पशुमालभते (ऐतरेय ब्राह्मण २/३)

यज्ञोऽस्य भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः । ।

या वेदविहिता हिंसा नियतास्मिंश्चराचरे ।

अहिंसां एव तां विद्याद्वेदाद्धर्मो हि निर्बभौ ।(मनुस्मृति)

अनुग्रह:पशूनां ही संस्कारो विधिनोदित:(महाभारत शान्तिपर्व ४९/२८)

पशवश्चाथ धान्यं च यज्ञस्याङ्गमिति श्रुतिः।।(महाभारत मोक्षधर्म पर्व २६८/२०)

न हिनस्ति नारभते नाभिद्रुह्यति किंचन।

यज्ञैर्यष्टव्यमित्येव यो यजत्यफलेप्सया।।(महाभारत मोक्षधर्म पर्व  २६८/३१)

शैलेन्द्र सिंह


भीम+हिडिम्बा विवाह शंका समाधान

 भीम + हिडिम्बा विवाह शंका समाधान ।


विशाल मालवीय जी पढ़ते भी हो वा  केवल धूर्त समाजी की भांति आक्षेप करना ही जानते हो ??


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मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्मं स्वजनं तथा।

वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे।। 

वीरेणाऽहं तथाऽनेन त्वया चापि यशस्विनी।

प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते।। 

यदर्हसि कृपां कर्तुं मयि त्वं वरवर्णिनि।

मत्वा मूढेति तन्मां त्वं भक्ता वाऽनुगतेति वा।।

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हिडिम्बा मन ही मन विक्रोदर को पति मान चुकी थी और केवल एक सन्तान उतपन्न होने तक भीम के साथ गन्धर्व विवाह के लिए अनुमोदन किया था यदि भीम वरण न करते तो वे आत्महत्या भी कर सकती थी ।


#न_जीवामि_सत्यमेतद्ब्रवीमि_ते

 यदि भीम गन्धर्व विवाह के लिए सहमत न होते तो स्त्री हत्या का पाप भी लगता साक्षात् धर्म के अंश स्वरूप  युधिष्ठिर जी स्पष्ट कहते है कि क्रुद्ध में आकर भी कभी स्त्री का वध न करे 


#क्रुद्धोऽपि_पुरुषव्याघ्र_भीम_मा_स्म_स्त्रियं_वधीः

हिडिम्बा के इस अनुमोदन के लिए माता कुन्ति भी विक्रोदर को आज्ञा देती है ।

यहाँ माता कुंती को 

#सर्वशास्त्रविशारदम् कहा गया है समस्त शास्त्रो के ज्ञाता माता कुंती द्वारा दिया गया आदेश धर्म विरुद्ध नही हो सकता अन्यथा माता कुंती को सर्वशास्त्रविशारद कह कर अलंकृत न किया गया होता ।

माता कुंती विक्रोदर को यह आज्ञा देती है कि एक सन्तान उतपन्न होने तक हिडिम्बा भीमसेन की सेवा में रहे ।


तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा कुन्ती वचनमब्रवीत्।। 

युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम्। 

त्वं हि धर्मभृतां श्रेष्ठो मयोक्तं शृणु भारत।। 

राक्षस्येषा हि वाक्येन धर्मं वदति साधु वै।

भावेन दुष्टा भीमं वै किं करिष्यति राक्षसी।। 

भजतां पाण्डवं वीरमपत्यार्थं यदीच्छसि।' (महाभारत आदिपर्व)

शैलेन्द्र सिंह