Tuesday, 25 May 2021

वैदिक_वाङ्गमय_और_संगीत

 



वैदिक वाङ्गमय में स्वर के सात प्रकार बताए गए है 


सप्तधा वै वागवदत्' (ऐतरेय ब्राह्मण)


और इन्ही सात स्वरों से संगीत की उत्पति मानी गई है जिसे सप्तक कहा जाता है । 

संगीत जिसका उद्गमस्थल ही सामवेद है जिसे पाश्चात्यकारो ने भी मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है 


सप्तक

षड्ज , ऋषभ   , गांधार , मध्यम , पंचम , धैवत , और  निषाद - सा रे ग म प ध नी सा - यह सात स्वर ब्रह्म व्यंजक होने से ही ब्रह्मरूप कहलाये ।

'पक्षियों एवं जानवरों द्वारा स्वरों की उत्पत्ति'

सप्‍तस्‍वर की उत्‍पति :


षड्जं व‍दति मयूर: पुन: स्‍वरमृषभं चातको ब्रूते 

गांधाराख्‍यं छागोनिगदति च मध्‍यमं क्रौञ्च ।।


गदति पंचममंचितवाक् पिको रटति धैक्‍तमुन्मदर्दुर: 

शृणिसमाशृणिसमाहतमस्‍तक कुंजरो गदति नासिक या, स्‍वरमंतिमम् ।।१७१।। 

                                                            -- संगीत दर्पण से


(मोर से षड्ज, चातक से ऋषभ, बकरे से गांधार, क्रौंच पक्षी से मध्‍यम, कोयल से पंचम, मेंढक से धैवत और हाथी से निषाद स्‍वर की उत्‍पति होती है)

मोर- षड्ज स्वर में बोलता है।

पपीहा- ऋषभ स्वर में बोलता है।

राजहंस- गांधार स्वर में बोलता है।

सारस- मध्यम स्वर में बोलता है।

कोयल- पंचम स्वर में बोलती है।

घोड़ा- धैवत स्वर में हिनहिनाता है।

हाथी- निषाद स्वर में बोलता है।


'स्वरों के रंग'


षड्ज- गुलाबी।

ऋषभ- हरा।

गांधार- नारंगी।

मध्यम- गुलाबी (पीलापन लिए)।

पंचम- लाल।

धैवत- पीला।

निषाद- काला।


'स्वरों के देवता, प्रभाव, स्वभाव व ऋतु'


षड्ज_


देवता- अग्नि।

प्रभाव- चित्त को आह्लाद देने वाला।

ऋतु- शीत।


ऋषभ_


देवता- ब्रह्मा।

प्रभाव- मन को प्रसन्न करने वाला।

ऋतु- ग्रीष्म।


गांधार_


देवता- सरस्वती।

ऋतु- ग्रीष्म।

स्वभाव- ठंडा।


मध्यम_


देवता- महादेव।

ऋतु- वर्षा।


पंचम_


देवता- लक्ष्मी।

ऋतु- वर्षा।

स्वभाव- गर्म, शुष्क।


धैवत_


देवता- गणेश।

ऋतु- शीत।

स्वभाव- कभी प्रसन्न कभी शोकातुर।


निषाद_


देवता- सूर्य।

ऋतु- शीत।

स्वभाव- ठंडा व शुष्क।


Sa (षड्ज or Shadaja) ~ Sun / Aries ( षड्ज means six-born , Sun is figuratively the son of six Indian seasons)


Re (ऋषभ or Rishava) ~ Moon / Taurus ( ऋषभ means not a bull but 'white radiance' symbolical of purity)

 

Ga (गान्धार or Gandharam) ~ Venus / Gemini ( गान्धारं means 'heavenly singer' , quite typical of the planet)

 

Ma (मध्यम or Madhyamam) ~ Jupiter/ Cancer ( मध्यमं means medium , the archetypal teacher is the medium of knowledge to the disciple )

 

Pa (पंचम or Panchama) ~ Mars/ Leo ( पंचमं etymologically means 'binding up' , the fifth is also the 'central' number)

 

Dha ( धैवत or Dhaivata) ~ Mercury/ Virgo (धैवत means devout or morally intelligent)

 

Ni (निषाद or Nishada) ~ Saturn / Libra (  निषाद actually means downward not 'outcaste', the 7th sign naturally is the descendant  of the zodiac)

साभार :-- समुद्रगुप्त विक्रमार्क

पुराण विमर्श भाग २

 श्रोतीयब्रह्मनिष्ठ आचार्यो  के सानिध्य के बिना शास्त्रो के गूढ़ रहस्य को साधारण ब्यक्ति न तो समझ ही पाएंगे और न ही ठीक ठीक मनन  ।


इस लिए शास्त्रो का इस बिषय को लेकर स्प्ष्ट आदेश रहा है 


●-आचार्यवान पुरुषो हि वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)

●-तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् )  


●-इतिहास पुराणाभ्या वेद समुपबृध्येत् (महाभारत )


पुराणों के अध्ययन किये बिना वेदो को समझना कठिन ही नही किन्तु सर्वथा असम्भव है क्यो की मन्त्रार्थ ज्ञान के लिए विनियोग ज्ञान आवश्यक है और विनियोग वर्णित ऋषियों और देवताओं के चरित्र जानने के लिए पुराणों का स्वध्याय अत्यावश्यक है हमारे पास पुराणग्रन्थ ही एकमात्र साधन है जिससे कि हम ऋषयो और देवताओं के बिषय में सर्वतोमुख ज्ञान प्राप्त कर सकते है निखिल आनन्दस्वरूप आनन्दकन्द सर्वज्ञ  ने वेद विद्या का प्रकाश कर पुराणों को भी साथ ही साथ प्रकाशित किया जिससे देवताओं और ऋषयो के जीवन वृत्तांत तथा उनके चरित्रों का भी दिग्दर्शन कराया जा सके ।

जिस प्रकार वेद अपौरुषेय है ठीक उसी प्रकार पुराण भी अपौरुषेय है इसकी पुष्टि स्वयं श्रुति ही करती है 


●- अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि   (बृहदारण्यक उपनिषद)


ऋषयो मंत्र दृष्टारः' (निरुक्त) ऋषिगण मन्त्रद्रष्टा हुए कर्ता नही ठीक उसी प्रकार पुराणों के वक़्ता सत्यवतीसुत  व्यास 

हुए कर्ता नही ।

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● शंका :---  अष्टादश (१८) पुराणों के वक़्ता यदि सत्यवती सुत कृष्णद्वैयापन व्यास ही है तो फिर सृष्टि ,उत्पती,विनाश ,वंश परम्परा, मनुओं का कथन  विशिष्ट व्यक्तियों के चरित्र उक्त यह पांचों बिषय पुराणों में  भेद के साथ क्यो मिलते है ??


निवारण :--- इस संसय का निवारण भी पुराण से ही हो जाता है कलिकाल के प्रभवा से मनुष्यो को क्षिणायु निर्बल एवं दुर्बुद्धि जानकर ब्रह्मादि लोकपालों के प्रार्थना करने पर धर्मरक्षा के लिए महर्षि पराशर द्वरा सत्यवती में भगवन के अंशांश कलावतार रूप में अवतार धारण कर वेद तथा पुराणों को विभक्त कर उसे प्रकाशित किया ततपश्चात महामति व्यास ने अपने योग्य पैल , वैशंपायन ,जैमिनी ,सुमंत आदि शिष्यों पर वेद संहिताओं के रक्षण का भार निहित किया तथा इतिहास और पुराणों के रक्षा का भार सुत के पिता रोमहर्षण को नियुक्त किया रोमहर्षण जी के  छः शिष्य  सुमति ,मित्रयु ,शांशपायन अग्निवर्चा अकृतव्रण ,और सावर्णि थे ।


●-प्रख्यातो व्यासशिष्योऽभूत् सूतो वै रोमहर्षणः ।

पुराणसंहितां तस्मै ददौ व्यासो महामुनिः ।। (विष्णु पुराण ३/६/१६)

●-इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षणः ॥(श्रीमद्भागवतम् १/४/२२)


●-सुमतिशचाग्नि वर्चाश्च  मित्रायुः शांशपायनः ।

अकृतव्रणः सावर्णिः षट् शिष्यास्तस्य चाभवन् (विष्णु पुराण ३/६/१७)


●-षट्शः कृत्वा मयाप्युक्तं पुराणमृषिसत्तमाः 

आत्रेयः सुमतिर्धीमान्काश्यपो ह्यकृतव्रणः।

भारद्वाजोऽग्निवर्चाश्च वसिष्ठो मित्रयुश्च यः ।

सावर्णिः सोमदत्तिस्तु सुशर्मा शांशपायनः (वायु पुराण )


जिस प्रकार शाखा भेद के कारण शाकल तथा वाष्कल संहिताओं में मन्त्रो का न्यूनाधिक देखने को मिलता है ठीक उसी प्रकार शिष्य प्रशिष्य के भेद के कारण पुराणों में भी पाठ भेद हो सकता है ।

 यदि पुराणों के सङ्कलनकर्ता भिन्न भिन्न व्यास माने तो 

पुराणों के इन वचनों का क्या होगा ?

  

●-अष्टादश पुराणानि वयासेन कथितानी तू ( मत्सय पुराण / वराह पुराण )

●-पराशरसुतो व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽभवत् ।

स एव सर्ववेदानां पुराणानां प्रदर्शकः ।(कूर्मपुराण ५२/९)

अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।(देवीभागवत पुराण स्कंध १/ अध्याय ३ श्लोक संख्या १७)


अतः पुराणों के सङ्कलनकर्ता भिन्न भिन्न व्यास नही अपितु कृष्णद्वैयापन व्यास ही सिद्ध होता है ।


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●शंका  :-- अच्छा यह तो ठीक है परन्तु अष्टादश (१८) पुराणों की रचना सत्यवती सुत ही अगर करते तो पुराणों में ही ऐसा क्यो कहा गया है कि वशिष्ठ और पुलत्स्य के वरदान से महर्षि पराशर जी ने विष्णु पुराण की रचना की 


●-अथ तस्य पुलस्त्यस्य वसिष्ठस्य च धीमतः।। 

प्रसादाद्वैष्णवं चक्रे पुराणं वै पराशरः।। (लिङ्ग पुराण पूर्वभाग ६४/१२०-१२१)


निवारण  :--वेदो की भांति पुराण भी नित्य माने गए है स्वयं वेदो का ही इस बिषय पर शङ्खानाद है  अतः पुराणों के रचयिता  कोई नही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी भी पुराणों को स्मरण ही करते है 

 पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् l

अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदा अस्य विनिर्गता: l 


यदि पुराणों के कर्ता महर्षि पराशर वा महर्षि व्यास माना जाय तो फिर श्रुतियाँ ही बाधित हो जाय ।


ऋक् ,यजु,साम,अथर्व,इतिहास,पुराणादि समस्त विद्या उस आनन्दकन्द सर्वज्ञ परमेश्वर  से ही प्रकट हुए है अतः इस शंका का निवारण यही हो जाता है कि पुराणों के कर्ता महर्षि पराशर अथवा व्यास नही है वे तो केवल  सङ्कलनकर्ता मात्र है ।


जो ऋषि मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के द्रष्टा है वे ही पुराणों के प्रवक्ता भी है ।

पुराणों के उपक्रम और उपसंहार पढ़ने पर अथवा नारद आदि पुराणों में दी हुई पुराणसूची का परायण करने पर यह स्प्ष्ट हो जाता है कि समस्त पुराणों के आदिम वक़्ता ब्रह्मा,विष्णु,महेश,पराशर,अग्नि,सावर्णि,मार्कण्डेय ,और सनकादि तथा आदिम श्रोता ब्रह्मा मारीच वायु गरुड़ नारद वशिष्ठ जैमिनी पुलत्स्य भूमि आदि है इन सब के पुरातन संवादों को ही वेदव्यास जी ने द्वापर के अंत मे क्रमबद्ध किया ।


●--ये एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टार: प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति। (न्यायदर्शन ४/१/६२)


बिस्तार भय  के कारण अत्यधिक प्रमाणों को मैं यहाँ नही रख पा रहा हूँ फिर भी विद्जनो के लिए इतना उपदिष्ट कर दे रहा हूँ जो समय निकाल कर शंका का निवारण कर सके 

मत्स्य पुराण अध्याय ५५ जहाँ इस विषय मे बिस्तार से बताया गया है कि किन किन पुराणों को किन किन ऋषयो अथवा देवताओं के प्रति कहा गया था ।

अतः विष्णु पुराण के प्रति महर्षि पराशर का भी यही सन्दर्भ लेना उचित जान पड़ता है क्यो की समस्त पुराण एक सुर में यही उद्घोषणा करते है कि । 


●-अष्टादश पुराणानि वयासेन कथितानी तू ( मत्सय पुराण / वराह पुराण )

●-पराशरसुतो व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽभवत् ।

●-स एव सर्ववेदानां पुराणानां प्रदर्शकः ।(कूर्मपुराण ५२/९)

अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।(देवीभागवत पुराण स्कंध १/ अध्याय ३ श्लोक संख्या १७)

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विशेष----● पुराणों के बिषय में गौड़ापाद,शङ्कर, रामानुज,माध्व, वल्लभाचार्य,निम्बकाचार्य प्रभृति आचार्यो तथा इनसे भी पूर्वकालिक मूर्धन्य आचार्यो एवं विद्वानों को भी पुराणादि बिषयों पर सन्देह नही था अपितु हम जैसे अल्पज्ञ अल्पश्रुत स्वयमेव स्वघोषित विद्वान बन शास्त्रो के अर्थो का मनमाना अर्थ बड़ी धृष्टतापूर्वक कर विद्वान बनने का ढोल पीटने लगते है इससे बड़ा और हास्यस्पद क्या हो सकता है भले ही वह मैं ही क्यो न रहूं ।


शैलेन्द्र सिंह

पुराण आक्षेपो का खण्डन भाग १



 


मान्यवर तथागत ने वेदव्यास कृत पुराणादि बिषयों पर जो आक्षेप लगाए है वह अनादर है स्वध्याय आदि अल्पता के कारण लोगो मे तद् तद् बिषयों के प्रति भ्रम उतपन्न होना स्वभाविक है ।

मुख्य रूप से जो आक्षेप लगाए है वह यह है 


नम्बर (१):--पुराण की रचना काल की अवधि लगभग ५०० वर्ष  निर्धारित करना ।


नम्बर (२) :-- १८ पुराणों के कर्ता एक व्यास नही अपितु भिन्न भिन्न व्यास है ।


नम्बर (३) :-- जैसे व्यास पीठ शङ्कर पीठ आदि पर बिराजमान पीठाधीश्वर  को आचार्य शङ्कर तथा आचार्य व्यास से सम्बोधित किया जाता है अतः उन्ही व्यासो द्वरा रचित ग्रन्थों को कृष्ण द्वैयापन व्यास के नाम से ही प्रचारित किया गया हो ।


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सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य (महाभारत अनुशासन पर्व ) धर्म की गति अति सूक्ष्म है इस लिए शास्त्रो का स्प्ष्ट उपदेश है कि 


वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।

नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]

आचार्यवान् पुरुषो हि वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् ) 

 

अतः निज मतमतान्तरों अपरम्पराप्राप्त अश्रद्धा से धर्म विषयक अर्थो का अनर्थ करना शास्त्रो की हत्या करने जैसा  है 

#बिभेत्यल्पश्रुताद वेदो मामयं प्रतरिष्यति

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सर्वप्रथम पुराण के कालावधि बिषयों पर बिचार करते है ।


किसी भी बिषयों की सिद्धि हेतु लक्षणों का निरूपण करना आवश्यक है तो फिर पुराणादि ग्रन्थ का निरूपण उनके लक्षणों को छोड़ स्व मतमतान्तर अनुसार बिषयों को प्रतिपादित करना क्या न्यायोचित है ?

पाठक गण बिचार करे ।


पुराणों का लक्षण  शास्त्रो में जो उपदिष्ट है वह यह है 


सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।

वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ।।  (विष्णु पुराण /कूर्म पुराण )

शास्त्रो में पुराण के पांच लक्षण बताए गए है ।

१) सर्ग - पंचमहाभूत, इंद्रियगण, बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन,

(२) प्रतिसर्ग - ब्रह्मादिस्थावरांत संपूर्ण चराचर जगत् के निर्माण का वर्णन,

(३) वंश - सूर्यचंद्रादि वंशों का वर्णन्,

(४) मन्वंतर - मनु, मनुपुत्र, देव, सप्तर्षि, इंद्र और भगवान् के अवतारों का वर्णन्,

(५) वंश्यानुचरित - प्रति वंश के प्रसिद्ध पुरुषों का वर्णन.


अब यदि पुराण का निर्माण काल ५०० वर्ष माने तो फिर सर्ग ,प्रतिसर्ग,वंश,मन्वन्तर,वंश्यानुचरित विषयो का वर्णन कैसे सम्भव होगा ?

अतः इस लक्षणामात्र से ही आप के समस्त दोषों का परिहार हो जा रहा है ।

फिर आप दोषारोपण करेंगे कि हम पुराणों को क्यो माने ?

जब आप पुराण को मानते ही नही तो उसकी व्यख्या क्यो ?

अस्तु वेद स्वयं पुराणों की नित्यता का उद्घोष करता है 


ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह

उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः 

 (अथर्ववेद ११.७.२”)


एवमिमे सर्वे वेदा निर्मितास्सकल्पा सरहस्या: सब्राह्मणा सोपनिषत्का: सेतिहासा: सांव्यख्याता:सपुराणा:सस्वरा:ससंस्काराः सनिरुक्ता: सानुशासना सानुमार्जना: सवाकोवाक्या (गोपथब्राह्मण पूर्वभाग ,प्रपाठक 2) 


अध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युस्तार्क्ष्यो वै पश्यतो राजेत्याह तस्य वयांसि विशस्तानीमान्यासत इति

वयांसि च वायोविद्यिकाश्चोपसमेता भवन्ति तानुपदिशति पुराणं वेदः सोऽयमिति

किंचित्पुराणमाचक्षीतैवमेवाध्वर्युः सम्प्रेष्यति न प्रक्रमान्जुहोति - (शतपथ ब्राह्मण १३.४.३.)


अरेअस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् ऋग्वेद यजुर्वेदःसामवेदोSथर्वाअङ्गीरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषद: श्लोका:सूत्रांण्यनु व्याख्यानानी व्याख्यानान्यस्यैव निश्वासीतानी (बृहदारण्यक उपनिषद २/४/१०)


छान्दोग्य उपनिषद में देवऋषि नारद और सनत कुमार कथा प्रकरण में पुराणादि विद्या का उल्लेख है ।


त्रेता तथा द्वापर युग मे भी पुराणों का श्रवण आदि की परम्परा रही है ।

श्रूयताम् तत् पुरा वृत्तम् पुराणे च मया श्रुतम् (वाल्मीकि।रामायण १-९-१)


पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम्।

कथ्यन्ते ये पुराऽस्माभिः श्रुतपूर्वाः पितुस्तव।।

तत्र वंशमहं पूर्वं श्रोतुमिच्छामि भार्गवम्।

कथयस्व कथामेतां कल्याः स्मः श्रवणे तव।। (महाभारत आदिपर्व )


विस्तार भय से इस बिषय को यही बिराम देता हूँ ।

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नम्बर (2) १८ पुराणों की रचना कृष्णद्वैयापन व्यास नही अपितु भिन्न भिन्न व्यासो ने मिलकर इसकी रचना की ।


अब तक 28 व्यास हो चुके है इस बिषय को लेकर कोई शंका नही परन्तु १८ अष्टादश पुराणों के कर्ता भिन्न भिन्न व्यास नही है कृष्णद्वैयापन व्यास ही है  इसकी पुष्टि भी स्वयं पुराण ही करता है ।

सृष्टि के आरम्भ में पुराण एक ही था समयानुसार समस्त पुराणों के ग्रहण करने में असमर्थ होने लगे तब व्यासरूपी भगवन द्वापर में अवतरित हो उसी पुराण को १८ भागो में विभक्त कर उसे प्रकाशित करते है ।


पुराणमेकमेवासीदस्मिन् कल्पान्तरे मुने ॥ 

त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।

स्मृत्वा जगाद च मुनीन्प्रति देवश्चतुर्मुखः ॥ 

प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्ततः ।

कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो मुनिः ॥ 

व्यासरूपं विभुः कृत्वा संहरेत्स युगे युगे ।

अष्टलक्षप्रमाणे तु द्वापरे द्वापरे सदा ॥ 

तदष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रभाष्यते ।

अद्यापि देवलोके तच्छतकोटिप्रविस्तरम् ॥ 

तथात्र चतुर्लक्षं संक्षेपेण निवेशितम् ।

पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते (स्कन्द पुराण रेवाखण्ड )


अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।(देवीभागवत पुराण स्कंध १/ अध्याय ३ श्लोक संख्या १७)


अतः आक्षेपकर्ता का मत यहाँ भी ध्वस्त हुआ ।

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नम्बर (३) जैसे व्यास पीठ शङ्कर पीठ पर बिराजमान पीठाधीश्वर व्यास वा शङ्कराचार्य के नाम से सम्बोधित होता है ठीक उसी प्रकार भिन्न भिन्न व्यासो द्वरा कृत पुराणों को एक ही व्यास के नाम से जोड़ दिया हो । 


यह भी सम्भव नही  अनादि काल से चली आ रही गुरुकुलों द्वरा रक्षित तथा परम्पराप्राप्त शास्त्रो का अध्ययन अध्यापन  आदि की भी महत्व न रह जाय  । तथा  कठ ,कपिष्ठल,शौनक, पिप्पलाद आदि नाम से जो जो शाखाएं है वह भी बाधित हो जाएगी ऐसे में व्याघात दोष लगेगा ।


अतः आप का यह आक्षेप भी अनादर है   द्वितीय प्रश्न के समाधान में इस प्रश्न का भी समाधान हो जा रहा है  जहाँ स्प्ष्ट रूप से द्वापर युग मे अवतरित हुए सत्यवती सूत से कर दिया गया है ।

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विशेष :--- वेदादि के प्रकाण्ड विद्वान सायणाचार्य ने ऐतरेय ब्राह्मण के उपक्रम में लिखा है ।


देवासुरा: संयता आसन्नितयादयइतिहासा:इदं वा अग्रे नैव किन्चिदासीदित्यादिकं जगत:प्रागवस्थानुक्रम्य सर्गप्रतिपादकम वाक्यजातां पुराणं ।


इतिहासपुराणं पुष्पं  (छा०उ ०)

 श्रुतियों में पुराणों को पुष्प माना गया जिसकी सुगन्ध चारो ओर फैला हुआ है जिनकी मादकता से मधुमक्षिता ही उस पुष्प की ओर आकर्षित हो शहद का निर्माण करता है ।

मलमूत्र पर बैठा हुआ माक्षी नही ।

शैलेन्द्र सिंह 

Monday, 24 May 2021

शिवलिङ्ग



लिंगार्थगमकं चिह्नं लिंगमित्यभिधीयते।(शिव पुराण विशेश्वर संहिता)


अर्थात शिवशक्ति के चिन्ह का सम्मेलन ही लिंग हैं। लिंग में विश्वप्रसूति-कर्ता की अर्चा करनी चाहिये। यह परमार्थ शिवतत्त्व का गमक, बोधक होने से भी लिंग कहलाता है।


सर्वाधिष्ठान, सर्वप्रकाशक, परब्रह्म परमात्मा ही ‘‘शान्तं शिवं चतुर्थम्मन्यन्ते’’ इत्यादि श्रुतियों से शिवतत्व कहा गया है। वही सच्च्दिानन्द परमात्मा अपने आपको ही शिवशक्तिरूप में प्रकट करते हैं। वह परमार्थतः निर्गुण, निराकार होते हुए भी अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्ति से सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूप में भी प्रकट होते हैं। 


लिंग शब्द के प्रति आधुनिक समाज में ब़ड़ी भ्रान्ति पाई जाती है।

संस्कृत में "लिंग" का अर्थ होता है प्रतीक।अथवा चिन्ह 

जननेंद्रि के लिए संस्कृत में एक दूसरा शब्द है - "शिश्न".आया है 

शिवलिंग का अर्थ लोकप्रसिद्ध मांसचर्ममय ही लिंग और योनि नहीं है, किन्तु वह व्यापक है। उत्पति का उपादानकारण पुरुषतत्व का चिह्न ही लिंग कहलाता है।  अतः वह लिंगपदवाच्य है। लिंग और योनि पुरुष-स्त्री के गुह्यांगपरक होने से ही इन्हें अश्लील समझना ठीक नहीं है। । 

उस अव्यक्त चैतन्यरूप लिंग सत्ता और प्रकृति से ही ब्रह्माण्ड बना है 

भगवान् के निर्गुण-निराकार रूप का प्रतीक ही शिवलिङ्ग है 

वह परमप्रकाशमय, अखण्ड, अनन्त शिवतत्त्व ही वास्तविक लिंग है 

 जब अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी प्रकृति समष्टि योनि है, तब अनन्त ब्रह्माण्डनायक परमात्मा ही समष्टि लिंग है और अनन्त ब्रह्माण्ड प्रपंच ही उनसे उत्पन्न सृष्टि है।

■भं वृद्धिं गच्छतीत्यर्थाद्भगः प्रकृतिरुच्यते

मुख्यो भगस्तु प्रकृतिर्भगवाञ्छिव उच्यते  (शि०पु० वि० संहिता १६/१०१-१०२)

(भ) बृद्धि को (ग) या प्राप्त करने वाली प्रकृति को भग कहते है और प्रकृति की अधिष्ठाता शिव (भगवन) ही परमानन्द ब्रह्म है ।


शिव-शक्ति ही यहाँ लिंग-योनि शब्द से विवक्षित है। उत्पत्ति का आधारक्षेत्र भग है, बीज लिंग है। वृक्ष, अंकुरादि सभी प्रपंच की उत्पत्ति का क्षेत्र भग है


अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनि,है

अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी अनिर्वचनीय शक्तिविशिष्ट ब्रह्म में भी शिव-पार्वती भाव है। उस परमात्मा में ही लिंगयोनिभाव की कल्पना है। निराकार, निर्विकार, व्यापक दृक् या पुरुषतत्व का प्रतीक ही लिंग है और अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनि,है

उसी की प्रतिकृति पाषाणमयी, घातुमयी जलहरी और लिंगरूप में बनायी जाती है।


शिवलिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, ऊपर प्रणवात्मक शिव हैं। लिंग महेश्वर, अर्घा महादेवी हैं-


■मूले ब्रह्मा तथा मध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः।*

■रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः।।*

■लिंगवेदी महादेवी लिंग साक्षान्महेश्वरः।*

■तयोः सम्पूजनान्नित्यं देवी देवश्च पूजितौ।।’*


जिसकी उपासना करने प्रत्येक वेदाभिमानी का कर्तब्य है ।

शैलेन्द्र सिंह

Wednesday, 12 August 2020

श्रीकृष्ण

 #श्रीकृष्ण


#रानू_विश्वकर्मा  जी प्रश्न करते है  :--- क्या श्रीकृष्ण भगवन् है ? क्या वे जगत के पालनहार है ?? 

साथ ही साथ वे आक्षेप भी लगाते है श्रीकृष्ण भगवन् नही वह तो ईश्वर के फरिस्ते है श्रीकृष्ण तो मृत्यु को प्राप्त हुए जिनकी मृत्यु हो वह ईश्वर कैसे ??

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Ranu Vishwakarma  जी के शंकाओं का समाधान 

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यह समस्त चराचर जगत जिससे उतपन्न होता है  जिनके आश्रय से जीवित रहते है अन्त में बिनाशोउन्मुख होकर जिनमे लीन होते है  वही ब्रह्म है ।

आप समस्त हेय गुणों से रहित समस्त कल्याणगुणो को धारण करने वाले सर्वज्ञ,सत्यसङ्कल्प, अकाशात्मा

सर्वकर्मा ,सर्वकाम,सर्वगन्ध,सर्वरस ,से परिपूर्ण पूर्णानंद बिकार,जरा मृत्यु से रहित निष्कलंक ,निरंजन,निर्विध्न,अमृत का सेतु है आप की नाना प्रकार की शक्ति सुनी जाती है ज्ञान,बल,क्रिया जो आप का स्वभाविकि गुण है 

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यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद् ब्रह्मेति ।(तैत्तरीय उपनिषद)


सत्यसङ्कल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः (छा०उ०३/१४/२)

य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः (छा०उ०८/७/१)

निष्कलं निष्क्रियंशान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । अमृतस्य परंसेतुं (श्वे ०उ० ६/१९)


परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च (श्वे०उ०६/८)

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समस्त शक्तियों का जो नियमन करते है वही ईश्वर है इस कार्यकारण से ही शाश्त्रो में आप को ईश्वर ,प्रभु,भगवन्  आदि नामों से कहे गए है निखिल विरुद्धाविरुद्ध शक्तिमत्तत्व ही भगवन् है ।


सम्पूर्ण ऐश्वर्य , वीर्य ( जगत् को धारण करने की शक्तिविशेष ) , यश ,श्री ,समस्त ज्ञान , और परिपूर्ण वैराग्य । 


“ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ।।”

—विष्णु पुराण ,६/५/७४ ,


अब ये छहों गुण जिसमे नित्य रहते हैं ,उन्हें भगवान् कहते हैं ।


भगोस्ति अस्मिन् इति भगवान्, यहाँ भग शब्द से मतुप् प्रत्यय नित्य सम्बन्ध बतलाने के लिए हुआ है । अर्थात् पूर्वोक्त छहों गुण जिनमे हमेशा रहते हैं ,उन्हें भगवान् कहा जाता है |मतुप् प्रत्यय नित्य योग (सम्बन्ध ) बतलाने के लिए होता है –यह तथ्य वैयाकरण भलीभांति जानते है


“भूमनिन्दाप्रशन्सासु नित्ययोगेतिशायने |संसर्गेस्ति विवक्षायां भवन्ति मतुबादयः ||”

-सिद्धान्तकौमुदी , पा.सू .५/२/९४ पर वार्तिक,

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कुछ अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रांत वादियों  का कहना है  कि श्रीकृष्ण भगवन् नही है  वे ईश्वर के (दूत) प्रतिनिधि है ।

उनके बिषय में मैं बस इतना ही कहूंगा कि पूर्णप्रज्ञ त्रिकालदर्शी महर्षि वेदव्यास के प्रज्ञा के आगे विश्व के सभी विद्वान बौना है  फिर अल्पज्ञ अल्पश्रुतो का तो कहना ही क्या ।

केवल वेदव्यास ही क्यो वेदविद्  परशुराम,भीष्म,द्रोणाचार्य,कृपाचार्य,विदुर,अश्वथामा,कर्ण, राजा शल्य,युधिष्ठिर,भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव,धृतराष्ट्र,तथा द्वापर युग के समस्त नृपगण जो वेद विशारद है वे भगवन् श्रीकृष्ण की परमतत्व होने की पुष्टि करते है तथा भगवन् श्रीकृष्ण के बिभूतियो का गायन मुक्त कण्ठ से करते है वे सभी वेद विद्या में निपुण थे  वे यह  जानते थे कि श्रीकृष्ण षड् गुण ऐश्वर्यों से परिपूर्ण भगवद् तत्व है क्या उनके समकक्ष आज के सभी विद्वान क्षण मात्र भी टिक पाएंगे ??


सभी सुहृदयजनो का एक ही उत्तर होगा नही ।


ईश्वर के प्रतिनिधि(दूत) ईश्वर के आदेशों का पालन मात्र ही करते है जबकि ईश्वर समस्त चराचर सृष्टि का सञ्चालन ।

ईश्वर के प्रतिनिधि भगवद् तत्व की व्याख्या  श्रुतिस्मृति प्रोक्त आचरणों से परिपूर्ण वेदादि बिषयो के व्याख्याकार होते है 

भूत भविष्य के द्रष्टा हो सकते है परन्तु सञ्चालक कर्ता नही ।

द्वापर युग मे भगवन् श्रीकृष्ण के समकालीन वेद विशारद महात्मन श्रीकृष्ण के बिषय में क्या कहते है आइये देखते है ।

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●महर्षि वेद व्यास 


आदिदेवो जगन्नाथो लोककर्ता स्वयं प्रभुः (महाभारत द्रोणपर्व  २०१)


●महर्षि मार्केण्डेय 


स एष कृष्णो वार्ष्णेय: पुरणपुरुषों विभु: (महाभारत वनपर्व   / ५४)

सर्वेषामेव भूतानां पिता माता च माधवा: (महाभारत वनपर्व )


●ब्राह्मणशिरोमणि परशुराम 


निर्माता सर्वलोकानामीश्वरः सर्वकर्मवित्। (महाभारत उद्योग पर्व ९६/ ४६)


●भीष्म द्वरा श्रीकृष्ण की स्तुति

अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदू (महाभारत शांतिपर्व ४१/१८)

यस्मिन् विश्वानि भूतानि तिष्ठन्ति च विशन्ति च (महाभारत शांतिपर्व ४१/२१)


यस्मिँल्लोका: स्फुरन्ति में जले शकुनयो यथा 

ऋतमेकारक्षरं ब्रह्म यत् यत् सदसतो: परम्   (महाभारत शांतिपर्व ४१/३४)

●सञ्जय  द्वारा श्रीकृष्ण के बिभूतियो का गायन


मनसैव विशिष्टात्मा नयत्यात्मवशं वशी (महाभारत उद्योगपर्व  ६८/५)

यतः कृष्णस्ततो जयः  (महाभारत उद्योग पर्व ६८ /९)

कालचक्रं जगच्चक्रं युगचक्रं च केशवः। (महाभारत उद्योग पर्व ६८/१२)


●युधिष्ठित द्वरा श्रीकृष्ण की स्तुति 

नमस्ते देवदेवेश सनातन विशातन।

विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम। (महाभारत द्रोणपर्व ८३/१८)

●अर्जुन द्वरा श्रीकृष्ण का ईश्वरत्व की।पुष्टि


क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानामादिरन्तश्च केशव ।

निधानं तपसां कृष्ण यज्ञस्त्वं च सनातनः । (महाभारत वन पर्व  १२/१७)


●धृतराष्ट्र द्वरा श्रीकृष्ण ही जगत के हितकर्ता है 

त्वमेव पुण्डरीकाक्ष सर्वस्य जगतो हितः।(महाभारत उद्योग पर्व १३०/१७)


साथ ही साथ कौराव सभा मे बैठे समस्त नृपगण के समक्ष श्रीकृष्ण ने अपना दिब्य रूप का दर्शन भी कराया था ।

अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ का नष्ट होना पश्चात श्रीकृष्ण द्वरा गर्भ में परीक्षित को पुनः जीवन दान देना क्या उनके बिभूतियो का गायन करने करते कण्ठ भी मौन हो जाय फिर भी उनके बिभूतियो का अन्त न होगा ।

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वही  कुरान में आये अल्लाह के बिषय में भी जरा प्रकाश डाल दे 


कुरान में अल्लाह के बिषय में केवल मात्र मोहम्मद सल्लाह ही प्रमाण है कोई अन्य नही उस काल खण्ड में अल्लाह के बिषय में न किसी को अनुभूति ही हुई और न ही कोई साक्षी बने यह वैसा ही है जैसे एक ब्यक्ति ने कहा सामने वाले पहाड़ी पर सिंह रहता है उसे सुन कर उसके मित्र ,सुहृदज़न मान लिए जबकि न तो कभी उसने सिंह की गर्जना सुनी न ही उनलोगों को सिंह होने का अनुभूति ही हुआ 


मनुष्य ,भ्रम,प्रमाद,विप्रलिप्सा,कर्णपाटव, ईर्ष्या ,लोभ जनित बिषयो से ग्रसित होता है ,एक ही बिषय में यदि कोई एक ही ब्यक्ति प्रमाण हो तो उसकी प्रामाणिकता में भी सन्देह होना निर्विवाद है  ऐसे प्रमाणों को आज के न्यायव्यवस्था भी नही मानती उन्हें भी विटनेश (साक्षी) की आवश्यकता होती है  और अल्लाह के बिषय में मुहम्मद को छोड़ कोई अन्य ब्यक्ति साक्षी भी नही ।

  ऐसे में मोहम्मद सल्लाह ने अल्लाह के बिषय में झूठ नही कहा इसकी प्रमाणिकता कौन तय करे ?


जबकि श्रीकृष्ण के ब्रह्मबिषय में उनके समकालीन समस्त नृपगण ,ऋषि ,मुनि जन ने उनके दिब्यता को देखा अनुभव किया जाना ततपश्चात सभी का एक ही  मत स्प्ष्ट रहा कि श्रीकृष्ण स्वयं परमेश्वर है 


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मैने अन्य ग्रन्थों का साक्ष्य इस लिए नही दिया कि महाभारत में आये हुए पात्र सभी के सभी भगवन् श्रीकृष्ण के समकालीन थे


 श्रीकृष्ण की भगवद् तत्व का विवेचन समस्त  पुराण आदि ग्रन्थों में निहित है जिनमे श्रीकृष्ण को परम तत्व कहा गया है 

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अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रांत वादियों  का आक्षेप है कि श्रीकृष्ण ने मृत्यु को प्राप्त किया तो वह भगवन् कैसे ???

प्रथमतः स्प्ष्ट कर देना चाहता हूं कि श्रीकृष्ण अवध्य है 

अवध्यौ वदत: कृष्णो (महाभारत कर्ण पर्व ४१/७९)

क्यो की उनका जन्मकर्म ही दिब्य है 

जन्म कर्म च मे दिव्यम् (गीता) वे अपनी योगमाया शक्ति से आविर्भावित होते है

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया। (गीता)  


ब्रह्मादि देवता मेरे प्रभवको यानी अतिशय प्रभुत्वशक्तिको अथवा प्रभव यानी मेरी उत्पत्तिको नहीं जानते और भृगु आदि महर्षि भी ( मेरे प्रभवको ) नहीं जानते। 


न मे विदु: सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः (गीता)


भगवन् श्रीकृष्ण का विग्रह सच्चिदानंद स्वरूप पाञ्चभौतिक तत्व से परे  दिब्य  तत्वो से बना है जिसका छेदन का सामर्थ्य  स्वयं काल भी न करें  फिर अन्य तत्वो की बात ही क्या , धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र समरांगण में भीष्म,द्रोण,कर्ण अश्वथामा जैसे मृत्यु को भी जीत लेने वाले योद्धा भी जिन्हें मृत्यु  छू न सके उन जैसे योद्धाओं ने भी श्रीकृष्ण के बाल भी बांका न कर सके अपितु स्वयं श्रीकृष्ण ने ही सबके प्राणों का हरण भी किये  


मयैवैते निहताः पूर्वमेव (श्रीमद्भागवद्गीता ११/३३ )


फिर उस परात्पर के बिनाश के बिषय में सोचना भी अल्पज्ञता का ही संकेत है

 समस्त कार्य पूर्ण होने के पश्चात भगवन् स्वेच्छा से अपने शरीर का त्याग कर  परमधाम को प्राप्त हुए थे ।


देवोपि सन्देहविमोक्षहेतो-र्निमित्तमैच्छत्सकलार्थतत्त्ववित्।।

स सन्निरुद्धेन्द्रियवाङ्मनास्तुशिश्ये महायोगमुपेत्य कृष्णः। (मौसल पर्व )

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नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां(१०/४०)


जिनकी बिभूतियाँ अनन्त हो उनके बिभूतियो का दिग्दर्शन कौन करा पाए उनके बिभूतियो को न तो देवगण ही जानते है न ऋषि गण ही जानते है वे भी नेति नेति कह कर मौन हो जाते है उस परब्रह्म के बिषय में हम जैसे क्षुद्र प्राणी अपने शब्दों से जितना भी लिख ले वह अंश मात्र ही होगा 


 #रानू_विश्वकर्मा द्वारा उठाये गए प्रश्नों का स्क्रीनशॉट कॉमेंट्स बॉक्स में आप सभी मित्रगण देख सकते है 

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उस परब्रह्म पुरुषोत्तम के बिषय में मेरा मत् यही है 

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मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति (गीता)

वासुदेवः सर्वमिति (गीता)


शैलेन्द्र सिंह


Saturday, 11 July 2020

स्त्रियां और वेद

#शंका_समाधान

#शंका:-- स्त्रियों को वेदाध्ययन में अधिकार क्यो नही ?जबकि गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी कई विदुषियां हुई हैं जो स्वयं वेदो के मन्त्रद्रष्टा भी रह चुकी है ऐसे में स्त्रियों को वेदाध्ययन में अनाधिकार क्यो ?

#समाधान:-- मन्त्रद्रष्टा वे है जो यमनियम आदि का आचरण कर  अपने तपःपूत के बल पर मन्त्रो का साक्षात्कार करते है

ऋषिर्मन्त्रद्रष्टा ॥ गत्यर्थत्वात् ऋषेर्ज्ञानार्थत्वात् मन्त्रं दृष्टवन्तः ऋषयः ॥' ( श्वेतवनवासिरचितवृत्तौ उणादिसूत्रं ४॥१२९ द्रष्टव्यम्)

वेद कहता है तपस्या से ब्रह्म को जानो क्योंकि तप ही ब्रह्म है – तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व| तपो ब्रह्मेति| – तैत्तिरीयोपनिषत् / भृगुवल्ली / ०

इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत्। बिभेत्यल्प श्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।। अर्थात् इतिहास पुराण से ही वेद को समझना चाहिए। इनको नहीं जानने वाले से वेद भी डरता है कि यह मेरी हत्या कर देगा।

स्त्रियों के लिए स्वधर्मपालन पतिशुश्रूषा ही तप है यज्ञ है

नास्ति यज्ञः स्त्रियाः कश्चिन्न श्राद्धं नोप्रवासकम्।
धर्मः स्वभर्तृशुश्रूषा तया स्वर्गं जयन्त्युत।।(महाभारत अनुशाशन पर्व ४६/१३)

स्त्रीभिरनायासं पतिशुश्रूषयैव हि ।।(विष्णु पुराण ६-२-३५ )

 नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् ।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते । (मनुस्मृति ५/१५५)

धर्मशास्त्रों में स्प्ष्ट कहा है स्त्री तन ,मन ,धन से अपनी पति की सेवा करे वही उसका यज्ञ ,तप,व्रत है उसी से वे अनायास धर्म की सिद्धि प्राप्त कर लेती है   मन्वादि प्रबल शास्त्र प्रमाणों से सिद्ध है कि अपनी तपस्या से पूर्वकाल में स्त्रियां वेद मन्त्रो का साक्षात्कार कर लेती थी उनकी तपस्या क्या है ? स्वधर्म पर चलने से उनको वेद्य तत्त्व का ज्ञान हो जाता था वो तपस्या है स्वधर्मपालन, देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञों का पूजन , आर्जव , इन्द्रियों पर निग्रह , अहिंसा , इसी से वे स्त्रियाँ सिद्धि  को प्राप्त कर लेती थी ऐसे में यह सिद्ध नही होता कि स्त्रियी को वेदाध्यन में अधिकार हो क्यो की स्मृति, इतिहास ,पुराणादि समस्त धर्म शास्त्र में स्त्रियों को वेदाध्ययन का अनाधिकारी ही कहा क्यो की #तमुपनीय (छा०उ०) श्रुतियों का स्प्ष्ट आज्ञा है वेदविद्या में प्रवेश करने के पूर्व उपनयन सँस्कार आवश्यक है बिना उपनयन के वेदविद्या में प्रवेश का अधिकार तो ब्राह्मणो तक को नही फिर जिनका उपनयन ही न हो उसको वेदविद्या में अधिकार कैसे ? स्त्रियों के उपनयन संस्कार के बिषय में इतिहास,पुराणादि शास्त्रो में अभाव है ।

अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणां आवृदशेषतः ।। (मनुस्मृति)

वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः (मनुस्मृति)

 जिस कारण वेदाध्ययन का उन्हें अधिकारी नही माना गया है

 वेदे पत्नीं वाचयति न स्तृणाति (शङ्खायन श्रौतसूत्रम् ८/१२/९)

स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा " ( श्रीमद्भागवत १.४.२५)


Friday, 10 July 2020

गुरु_लक्षण_और_स्कूली_शिक्षक_भाग_3



तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।(गीता)

श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान्स्वधर्मे निविशेत वै ।
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं अनुतिष्ठन्हि मानवः ।। (मनुस्मृति)

कार्याकार्यव्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत जितने भी संस्कार है उनमें शास्त्रो का स्पष्ट घन्टाघोष है की कैसे उसे आचरण में लाया जाए फिर वेदविद्या आदि तथा आचार्यो के प्रति शास्त्र मौन कैसे रहे ?
लौकिक तथा पारलौकिक कल्याण हेतु मोक्षरूपी विद्या प्रदान करने वाले गुरु अथवा आचार्य का लक्षण क्या है और कौन इसका अधिकारी है शाश्त्रो ने बृहदरूप से इस पर प्रकाश डाला है

एतद्‍देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
  स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा:॥(मनुस्मृति)
जो अग्रजन्मा है उसी से पृथ्वी के सभी मानव अपना आचार बिचार सीखें ।

ब्राह्मण सभी वर्णो में।अग्रजन्मा है
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् (ऋग्वेद)
उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्येष्ठ्याद्ब्रह्मणश्चैव धारणात् ।
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १.९३ )

वेदादि शास्त्रो में ब्राह्मण को मुख कहा गया है !
वाक् और बुद्धि  ही अंग प्रत्यंग से लेकर साम्राज्य तक का शाशन करता है यह दृष्टान्त जगत में देखा जाता है जिस कारण किस वर्ण का क्या आचरण है यह ब्राह्मण से ही जानना चाहिए क्यो ?
क्योकि
वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १०.३ )
उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।(मनुस्मृति )
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यां अधिजायते ।(मनुस्मृति)
पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः।।(महाभारत -- आदिपर्व ८१/२०)

ब्राह्मण स्वयं धर्म स्वरूप है ।
जिस कारण श्रुतिस्मृति आदि ग्रन्थों में ब्राह्मण के सानिध्य में ही  अध्ययन अध्यापन और आचार बिचार की शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया गया है

गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः(महाभारत आदिपर्व १/२८/३५)
अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः ।
प्रब्रूयाद्ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः । ।
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्त्युपायान्यथाविधि ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् । । (मनुस्मृति १०/१-२)
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् (श्रीमद्भागवतगीता १८- ४२ )
वृत्त्यर्थं याजयेदज्वान्यानन्यानध्यापयेत् तथा ।
कुर्यात् प्रतिग्रहादानं गुर्वर्थं न्यायतो द्रिजः (विष्णु पुराण ३/२३ )
सास्त्रज्ञा नित्य है और सास्त्रज्ञा मानने वाला ही ईश्वर का आराधना करता है सास्त्र द्रोही नही विष्णुपुराण का उद्घोष है अब उसे न मान मनमाना आचरण को ही धर्म मान ले तो उससे बड़ी और मूर्खता क्या ।

वर्णास्वमेषु ये धर्माः शास्त्रोक्ता नृपसत्तम ।
तेषु तिष्ठन् नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ।(विष्णु पुराण ३/ १९ )
कहाँ श्रुतिस्मृति प्रोक्त वर्णाश्रमधर्म  आचरित गुरु तो कहाँ  भौतिक शिक्षा के बल पर प्राप्त किया हुआ संवैधानिक पद  अतः यह नीतान्त भ्रामक प्रचार है कि स्कूली शिक्षक और गुरु समतुल्य है