Thursday, 13 June 2019

आर्य समाजी



वैदिक सनातन वर्णाश्रमधर्मानुयायियाें में अाैर अार्यसमाजियाें मे महत्त्वपूर्ण प्रमुख भेद ।

 सनातनियाें के लिए
 तस्माच् छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थिताै ।
 ज्ञात्वा शास्त्रविधानाेक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।(गीता १६।२४) ।
 यह वचन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है ।
  अाजकल   अत्यधिक सङ्ख्या में मिलने वाले  भाेगवादी देहात्मवादी लाेग ताे  सनातनियाें के मूल शास्त्र वेद का ही विराेध करदेते हैं । इसीप्रकार से  दयानन्द  भी  वैदिक सनातन जन्मना जातिवादी वर्णाश्रमधर्म का विराेध करके प्रकारान्तर  से वेदका ही विराेध कर देता है ।   

 अार्यसमाज का संस्थापक  दयानन्द ने  भी अाश्वलायनशाखा शाङ्खायनशाखा के ऋग्वेद काे, तैत्तिरीयशाखा मैत्रायणीयशाखा के कृष्णयजुर्वेद काे, जैमिनीयशाखा के सामवेद काे, पैप्पलादशाखा के अथर्ववेद काे परतःप्रमाण कहकर वस्तुतः वेद ही नहीं माना ।
  ब्राह्मणग्रन्थाें  काे श्राैतसूत्राें काे गृह्यसूत्राें काे भी न मान कर
पञ्चमहायज्ञविधि संस्कारविधि बनाकर उन का भी वस्तुतः विराेध ही किया ।

 क्या इसी से उक्त  सभी ग्रन्थ वेद के रूप में अमान्य अाैर त्याज्य हाेंगे?

  सनातनियाें की परम्परागत मान्यता है कि
     
विध्यर्थवादमन्त्रेतिकर्तव्यं ब्राह्मणादिभिः।
 कल्पसूत्रैकपठितं कर्म प्रामाण्यमृच्छति।।
 यत्रकुत्रस्थितं  वेदवाक्यं संगृह्य केवलम् ।
अस्य वाक्यस्यायमर्थ इति वक्ताज्ञ उच्यते ।।
(लाैगाक्षिस्मृति, स्मृतिसन्दर्भ, षष्ठभाग, पृष्ठ४०५,४०६)  ।

 इस दृष्टि से  अज्ञ मानेजाने वाले दयानन्द के वेदमन्त्राें के अर्थ सनातनियाें काे सर्वथा अमान्य हैं ।

दयानन्द ने वैदिक सनातनी परम्परा के सभी ग्रन्थाें में मनमाना प्रक्षेपादि का अाराेप करके सर्वत्र अनिश्चय की स्थति बनाने का प्रयास किया है ।

 सनातनी परम्परा में अधाेनिर्दिष्ट प्रमाण से  धर्म में मुख्य रूप में शब्द ही प्रमाण माने जाने से
''शास्त्रस्था वा तन्निमित्तत्वात्'' (जैमिनीय धर्ममीमांसासूत्र१।३।९),
''अशुद्धमिति चेच् छब्दात्'' (ब्रह्ममीमांसासूत्र ३।१।२५),
 ''शब्दप्रमाणका वयम् यच् छब्द अाह तद् अस्माकं प्रमाणम्'' (पाणिनीयव्याकरणभाष्य, पस्पशाह्निक वार्तिक ९, २।१।१ वार्तिक ५) शब्दप्रमाण अतिमहत्त्वपूर्ण है ।
 उसमें दयानन्द से  शब्दप्रमाण में ही अनिश्चय की स्थिति लाने का प्रयास किए जाने से दयानन्द के सत्यार्थप्रकाशादि ग्रन्थ सनातनियाें काे  अमान्य हैं ।

अतः सनातनियाें के लिए सत्यार्थप्रकाश के वेदादि शास्त्र विषय के सब ही कथन सुतराम् सर्वथा अमान्य है ।

Tuesday, 4 June 2019

जरा सोचिए

जरा सोचिए !!!!!!!!!!!

ताज महल = मुसलमानों ने बनाया;
लाल किला = मुसलमानों ने बनाये
कुतुबमीनार = मुसलमानों ने बनाई;
चार मीनार = मुसलमानों ने बनाई;
गोल गुम्बज = मुसलमानों ने बनाया;
लाल दरवाजे = मुसलमानों ने बनाये;

ताजमहल के समकालीन 56 मुसलिम कंट्री में एक भी स्थापत्य कला का उदाहरण दिखला दो ? जो मुगल अऱब में एक दिवार नही बना पाए थे, वे जाहिल भारत आते ही ताजमहल और लालकिला, कुतुबमीनार कैसे बनाने लगे ? दरअसल बनाया नही बल्कि पहले से बनी चीजों को छीन अपना नाम इतिहास में लिखवाया है ।

चमार और भंगी भी मुसलमानो ने ही बनाये है, ...... क्यों ?

हिन्दू सनातन काल से चमड़े का प्रयोग अपवित्र मानता था। याद है वैदिक सन्त या वैदिक लोग अपने पैरों में लकडी की खड़ाऊ पहना करते थे, क्यों? क्योंकि चमडे का प्रयोग हिन्दू करता ही नही था, इसका सीधा सा मतलब है कि चमड़ा का काम करने वाली जाति चमार तो हिंदुओ ने बनायी नही । सीधी बात, मुस्लिम सेनाओ और लोगों को चमड़े की जरूरत होती थी, इसलिए युद्ब बंदियों को चमडे के काम में धकेलकर चमार बनाया गया। 36 बिरादरी को गाय का चमडा छीलने के कारण उन चर्मकारों का बहिष्कार कर दिया और वही आज अछूत बन गये । ये बहिस्कार जाति के कारण नही उनके घृणित कर्म के कारण हुआ था ।

दलितों पर अत्याचार किसने किया ? अछूत जातियाँ किसने बनाई ? हजारो साल से हिंदुओ मे परम्परा रही है खुले मे शौच जाने की । घर के अंदर शौचालय लोग अपवित्र मानते थे । आज भी गांव देहात मे लोग घर मे शौचालय नही बनाते उदाहरण स्वरूप आप टायलेट एक प्रेमकथा फिल्म देखलें। जबकि मुस्लिम काल मे मुस्लिमों में पर्दा प्रथा के कारण औरते खुले मे नही जाती थी, इसलिये मुसलमान अपने घरों के अंदर शौचालय बनाते थे तथा मैला फिकवाने के लिये जिन लोगो का प्रयोग हुआ वे मेहतर कहलाये । इन्ही निम्न कर्यो के कारण ये अछूत बने ।

अब सीधा सा मतलब ये है कि चमार और मेहतर समाज को बनाने का जिम्मेदार ब्राहण नही है और ब्राह्मण को निशाना बनाकर संस्कृत और संस्कृति को मिटाने की साजिश है और ये सब केवल मुसलमान ने वामपंथियो को साथ लेकर ही किया है

और एक बात ——
               उपरोक्तानुसार यहीं शतप्रतिशत सत्य भी हैं...
प्रमाण तो नहीं दे सकते...
लेकिन  राक्षसराज रावण के राक्षसी राज्य का अंत होने के बाद रावण की बहन सूर्पणखा अपना वंश बचाने के लिए  शिवलिंग (भगवान शिव का भक्त था रावण) लेकर गुरु शुक्राचार्य के साथ अरब देशों की ओर चली गई... उसे विभीषण से डर था....
सूर्पणखा की नाक और कान लक्ष्मण जी काट चुके थे...
इसीलिए वो हमेशा चेहरा ढक कर रहती थीं..
मुस्लिम महिलाए इसीलिए बुरका पहनतीं हैं...
शिव लिंग की पूजा करतीं थीं.. जो आज मक्का मदीना हैं................
 गुरु शुक्राचार्य थे.. इसीलिए शुक्रवार को पवित्र मानते हैं...............
 कबीलों मे रहते थे... अ. पना धर्म परिवार बढ़ाने के लिए आपस में ही शारिरिक संबंध बना लेते थे...........................
क्या सूर्पणखा+शुक्राचार्य के नाजायज रिश्ते से पैदा होने वाले नाजायज वंशज हैं मुसलमान.............।।

जय श्री राम

Monday, 3 June 2019

हिन्दू संस्कृति की अजेयता


#हिन्दू_संस्कृति_की_अजेयता_और_वर्तमान_खतरा

बहुत आक्रमणों को झेला हमने, एक के बाद एक।
करते रहे संघर्ष पर हार कभी नहीं मानी।

मिश्र, फारस, यूनान, रोम, स्केंडनेविया ... सभी की संस्कृति का विनाश हुआ पर हिंदू अड़े रहे , लड़ते पिटते, हारते, जीतते... पर अड़े रहे।

कैसे? कहाँ से आई इतनी जिजीविषा??

क्या केवल योद्धाओं का संघर्ष?

अगर संघर्ष केवल योद्धाओं का था तो तुर्क जैसे प्रचंड योद्धा अरबों से कैसे हार गए पर मुट्ठी भर राजपूतों ने अरबों को खदेड़ दिया और लगातार 800 वर्षों तक तुर्कों का प्रतिरोध किया।

अगर संघर्ष केवल योद्धाओं का था तो वाइकिंग्स कैसे हार गए पर जाटों को कोई भी मुस्लिम सत्ता कभी दबा नहीं सकी?

अगर संघर्ष केवल योद्धाओं का था तो एक युद्ध में हार से पूरा ईरान मुस्लिम कैसे बन गया पर लाखों की मुगल फौज मुट्ठी भर मराठों व सिखों से पार ना पा सकी।

विश्व में हर कोई इस बात पर आश्चर्य करता है और इकबाल जैसा व्यक्ति अपने पूर्वार्द्ध काव्य जीवन में कह उठा था--

"कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी"

"इस बात" को इस "रहस्य" को जानने में ही हमारे दुश्मनों की रुचि रही है, वे जानना चाहते हैं इस रहस्य को ताकि वे हमारा शिकार आसानी से कर सकें।

"संस्कृति"

इसी शब्द में छिपा था सारा रहस्य जिसपर प्राचीन ऋषियों ने इस राष्ट्र की संकल्पना की थी।

राज छिपा था उन ब्राह्मणों के दुर्दम्य हठ में जिन्होंने घोर दरिद्रता में रहकर भी मुस्लिम शासकों का 'म्लेच्छ' कहकर तिरस्कार तो किया ही उन्हें इतना हीन, यहां तक कि चांडालों से भी ज्यादा अस्पृश्य घोषित कर दिया कि उनके साथ भोजन करने वाला भी अस्पृश्य हो जाता था। पूरे संसार के इतिहास में किसी भी शासक और सैन्य वर्ग का इतना भयंकर तिरस्कार किसी पराजित जाति ने नहीं किया होगा जितना ब्राह्मणों के नेतृत्व में हिंदुओं ने मुस्लिम शासकों का किया। इस तिरस्कार के कारण ही हिंदू पराजित होकर भी स्वयं को मुस्लिमो से श्रेष्ठ मानते रहे और उनमें कभी भी हीनताबोध नहीं जागा
(हालांकि इस नीति ने जड़ मूर्खतापूर्ण रूप भी धारण कर लिया।)

हिंदुओं के इस सतत प्रतिरोध का राज छिपा था उन भाटों, चारणो और लोकगायकों में भी जो हिंदू देवमंडल और महानायकों की गाथाओं को दो मुट्ठी अनाज के बदले एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते रहे।

राज छिपा था उन मूर्ति, काष्ठ और लौह शिल्पकारों में जो भूखे मर गए पर अपनी कला को आक्रांताओं के हाथों बेचा नहीं और जब ये राजपूत योद्धा व ब्राह्मण वन बीहड़ो में दर दर भटके तो ब्राह्मणों, क्षत्रियों के साथ वे भी अस्पृश्यता, शोषण, तिरस्कार और अपमान सहकर भी परछाईं की तरह चले और बिना किसी लोभ या भय के हिंदुत्व पर दृढ़ बने रहे और अधिसंख्य आज भी बने हुए हैं।

इस रहस्य को मुस्लिम नहीं समझ सके तथा "पंथ" को "धर्म" समझकर उसके बाह्य प्रतीकों का विध्वंस करने में जुट गए।

मंदिर तोड़े, बौद्ध विहार तोड़े, जिनालय तोड़े पर वे कभी भी संस्कृति की आत्मा को नहीं तोड़ सके क्योंकि वह तो निहित थी उस ब्राह्मण में जो भूखे मर मर कर भी #तुलसी बनकर महाराणा प्रतापों को रामकथा से हौसला दे रहा था, मानसिंहों को फटकार रहा था और अकबरों का तिरस्कार कर रहा था।

वह #समर्थगुरु बनकर अखाड़ों में #शिवाओं को गढ़ रहा था। वह दक्षिण में #सायण और #विद्यारण्य बनकर वेदों की रक्षा कर रहा था। वह थोड़े से #सीदे के बदले संगीत, साहित्य और इतिहास को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा रहा था।

साथ ही हिंदुत्व की वास्तविक शक्ति निहित थी उन दलितों में जिन्होंने मुस्लिम सत्तावर्ग के 'इस्लामिक समानता' के ऑफर को ठुकरा दिया और शोषण व अत्याचार सहकर भी हिंदुत्व के ध्वज तले रहने में ही अपना गौरव माना।

इस प्रचंड हिंदू एकता के गर्भ से जन्मे वीर मराठे मावलों, राजपूतों, जाटों और सिखों ने मुस्लिम सत्ता को उखाड़ फेंका।

परंतु तभी आ धमके चालाकअंग्रेज उन्होंने 1857 के बाद हिंदुत्व की शक्ति को #पहचान लिया।

इतिहास के माध्यम से हमला प्रारंभ किया गया। आर्य-द्रविड़ वाद से विदेशी शासन के औचित्य को स्थापित किया गया।

हिंदुओं में "सदैव पराजित होने का हीनताबोध" भरा गया और मुस्लिमों में "श्रेष्ठतावाद व असुरक्षा" का बीज बोया गया।

फिर बारी आई हिंदू साहित्य व कला की जिन्हें सदैव पाश्चात्य मानकों पर तौलकर हीन ठहराया गया।

हिंदुओं के सामाजिक संस्कृति के नकारात्मक पहलुओं को चुन चुनकर रेखांकित किया गया और दोषी ठहराया गया ब्राह्मणों को कि एक बार #मस्तिष्क विकृत हो जाये तो हिंदुत्व का शेष शरीर कब तक संतुलित रहेगा।

इसी कारण हिंदू बौद्धिक वर्ग जिसमें अधिकांशतः ब्राह्मण ही थे, में से कुछ इसका शिकार हो गए और रही सही कसर मार्क्सवाद के आगमन ने पूरी कर दी।

श्रेष्ठतम ब्राह्मण मेधा अपनी ही संस्कृति के विरुद्ध पाश्चात्य व वामपंथी षड्यंत्र का अमोघ अस्त्र बनी और निगाह उठाकर देख लीजिये चारों ओर हिंदुत्व के विरुद्ध जहर उगलते वर्ग में सर्वाधिक व्यक्ति इसी वर्ग से मिलेंगे।

बौद्धिक प्रतिरोध भी सर्वाधिक ब्राह्मणों की ओर से ही आया परंतु उन्होंने कभी भी अपने इन स्वजातीय बंधुओं का वैसा बहिष्कार नहीं किया जैसा वे दलित जातियों का मामूली अपराधों पर अन्य जातियों का करते और इसी से आपसी संदेह और अविश्वास का प्रारंभ हुआ और इसका फायदा उठाया अंग्रेजों ने।

ब्रिटिशों और फिर कम्यूनिस्टों ने 'अपना जहर' हिंदुत्व के शरीर में भर दिया था जो असर दिखाने लगा। इतिहास, साहित्य व कला के हर क्षेत्र में ये #मारीच घुस गये और उन्होंने दो तरफा मार की। एक ओर तो उन्होंने भारतीय मूल्यों पर आधारित कला व साहित्य को हतोत्साहित किया वहीं विभाजन व विखंडनकारी साहित्य व कला को बढ़ावा दिया जिन्हें सदैव पाश्चात्य शक्तियों ने प्रोत्साहित किया। अरविंद अडिगा, अरुंधती रॉय, मकबूल फिदा हुसैन, सफदर हाशमी आदि इन्हीं मारीचों के मानस संतानें हैं।

नाजियों से नफरत करने का ढोंग करने वाले इन तथाकथित प्रगतिशीलों और लोकतंत्रवादियों का आदर्श गोबेल्स ही रहा है इसीलिये कॉंग्रेस को समर्थन देने के बदले इतिहास, साहित्य और कला संस्थाओं पर कब्जा कर लिया और उन्हें अपनी हिंदू द्रोही गतिविधियों का अड्डा बना दिया जिसका सर्वोत्तम उदाहरण जे एन यू और मध्यप्रदेश का भारतभवन है।

ब्रिटिशों और वामियों के इतिहास के हीन प्रस्तुतिकरण के कारण उत्पन्न पराजयबोध के कारण पहले से हीनमना हिंदू और अधिक हीनता प्रदर्शित करने लगे। प्रगतिशील और वैज्ञानिक दिखने के लिये हिंदू परंपराओं का और अधिक मजाक उड़ाया जाने लगा, भारतीय आदर्श चरित्र राम, कृष्ण और शिव में या तो खोट ढूंढे जाने लगे या फिर उन्हें काल्पनिक घोषित किया जाने लगा।

फिर आया उदारीकरण के नाम पर उपभोक्तावाद और आधुनिक इस्लामिक आतंकवाद का युग।

उपभोक्तावाद के प्रचार के लिए माध्यम बनी नारी देह जिसके लिये जन्म दिया गया नारीवाद और फेमनिज्म को।
मैत्रेयी पुष्पा, अरुंधती रॉय, द्युति सुदीप्ता जैसी कुंठित फेमनिस्ट, यौनिकता के चिरबुभुच्छित कॉमरेड्स, द्रौपदी सिंगार के छद्म नाम से लिखने वाले #नपुंसक_कवि और नारी शरीर पर लार टपकाने वाले स्त्रैण लोलुप पुरुषों ने दुर्गावती व गार्गी के स्थान पर सनी लियोनी व स्वरा भास्कर को भारतीय लड़कियों का आदर्श बना दिया।

इन धूर्त जमात के #नर_मादाओं ने राम, कृष्ण, युधिष्ठिर को सिर्फ कामुक शोषक पुरुष और सीता, राधा और द्रौपदी को पीड़ित नारी घोषित कर दिया।

इनकी धूर्तताओं की बानगी देखिये--

-- इनकी निगाह में हर स्त्री को यौन स्वतंत्रता होनी चाहिए लेकिन द्रौपदी की सहमति से पांडवों के साथ उनका विवाह स्त्री का शोषण है।

-- इनकी निगाह में पद्मिनी एक मामूली मूर्ख औरत थी लेकिन दिनरात पुरुषों को स्त्रिलोलुप ठहराते इस गैंग के मेम्बरों के लिए खिलजी और अकबर 'जुनूनी प्रेमी'।

-- इन्हें दुर्गावती और लक्ष्मीबाई में नारी सशक्तिकरण नजर नहीं आता बल्कि सनी लियोनी बनने में नारी सशक्तिकरण दिखाई देता है।

इन संस्कृति द्रोहियों ने नारी स्वतंत्रता की ओट में नारी देह को उसी बाजारवाद और पूंजीवाद के प्रसार का माध्यम बना दिया जिसके विरोध में ये क्रांति के तराने गाते नहीं थकते।

ऐसी स्थिति में कला की आधुनिकतम विधाम #सिनेमा इन गिद्धों की नजर से कैसे बच पाता और फिर वे तो पूर्व में ही वे सिनेमा का महत्व समझ गये और सिनेमा भी उसका शिकार बना। नेहरू की मेहरबानी से वे उस पर काबिज हो भी गये।

फिर तो जो सिनेमा जो उदात्त हिंदू चरित्रों राम कृष्ण हरिश्चन्द्र, महाराणा प्रताप, शिवाजी तथा हिंदू प्रतिरोध की घटनाओं जैसे संन्यासी विद्रोह का चित्रण कर रहा था वह प्रगतिशील सिनेमा के नाम पर केवल और केवल गरीबी, स्त्री दुर्दशा, सामाजिक शोषण को परोसने लगा।
कमर्शियल सिनेमा भी गरीबी को महिमामंडित किया जाने लगा। अमिताभ के दौर की फ़िल्मों को याद कीजिये कि किस तरह अमिताभ गरीबी को महिमामंडित करने वाले डायलॉग मारते थे और बेवकूफ पब्लिक खुश होकर डायलॉग्स पर तालियाँ बजाती थी।

50% सत्य होने के बावजूद सिनेमा में सर्वदा और शतप्रतिशत सत्य के रूप में अतिरेकपूर्ण ढंग से पंडित के नाम पर सिर्फ एक तोंद युक्त, कुटिल चेहरे वाले लालची पुजारी, ठाकुर के नाम पर सिर्फ एक अत्यचारी जमींदार, बनिये के नाम पर सिर्फ एक सूदखोर महाजन को चित्रित किया गया और दूसरी ओर इमाम साहब या चर्च के फादर को सदैव धर्मपरायण, दयालु और भव्य व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया गया।

अपने इस नैरेटिव को प्रारम्भिक रूप से सफलतापूर्वक स्थापित करने के बाद पहले उन्होंने अगला प्रहार किया भारतीय नारी पर जिसको उन्होंने ग्लैमर से ललचाया और इसमें एकता कपूर ने जाने अनजाने में उनकी मदद की।

नारी उन्मुक्तता के इस दौर में दाऊद के नेतृत्व में पाकिस्तान व सऊदी अरब ने मुंबई में बॉलीवुड पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और फिर जोधा अकबर, ताजमहल, खिलजावत जैसी फिल्मों, अकबर द ग्रेट, नूरजहां, सत्यमेव जयते जैसे टी वी कार्यक्रम बनाये गए ताकि हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों की ओर आकर्षित कर 'लव जेहाद' के माध्यम से अल्लाह मिंयाँ की खिदमत की जा सके और गजवा ए हिंद के सपने को साकार किया जा सके।

वरना कोई मुझे बताये कि आमिरखान ने कभी तीन तलाक, हलाला और बुर्के पर कुछ बोला हो।

मीडिया, सिनेमा और सोशल एक्टिविज्म पर इस्लामी व वैटिकन शक्तियों के शिकंजे के कारण ही लव जेहाद, धर्मांतरण, मुस्लिम इनमाइग्रेशन जैसे राष्ट्र विध्वंसक व हिंदुत्व विरोधी कार्यक्रम सफल हो रहे हैं। इधर भारत और हिंदुत्व के दुर्भाग्य से आंभी, जयचंद व मानसिंह जैसे राष्ट्रद्रोहियों की एक लंबी परंपरा रही है और बरखादत्त,प्रणय रॉय रविश कुमार, मुलायम, लालू , दिग्विजय, ममता बैनर्जी आदि उसी देशद्रोही परम्परा के वारिस हैं और इनके द्वारा समर्थित भीम-मीम का अपवित्र गठजोड़ उसका विस्तार।

अब हिंदुत्व पर इस भयानक चहुँ ओर हमले की गहनता और भयानकता को महसूस कर लीजिये और तय कर लीजिये उसका मुकाबला "भीमटा हाय हाय, "आरक्षण हाय हाय", "मोदी हाय हाय" के नारों से करना है या धीरता गंभीरता से रणनीति बनाकर और अपने पूर्वजों के तपस्या व संघर्ष के मार्ग पर चलकर, उनकी गलतियों का परिमार्जन करके, 'सर्व हिंदू सहोदरा' के मार्ग पर चलकर?????

खुद तय कर लीजिये।

Thursday, 25 April 2019

ऐतरेय ब्राह्मण



ऐतरेय ब्राह्मण की कथा (Aitareya Brahmana Story)  :
मांडुकी नाम के एक ऋषि थे, उनकी पत्नी का नाम इतरा था। वे दोनों ही भगवान के भक्त थे तथा अत्यंत पवित्र जीवन व्यतीत कर रहे थे। दोनों ही एक-दूसरे का ध्यान रखते थे तथा हंसी-ख़ुशी से समय काटते थे। दुःख था तो केवल एक कि उनके कोई संतान नहीं थी। सोच-विचार के पश्चात पुत्र प्राप्ति की इच्छा से दोनों ने कठिन तपस्या की तथा भगवान से बार-बार पुत्र के लिए प्रार्थना की।

आखिर कुछ समय पश्चात भगवान ने उनकी तपस्या तथा प्रार्थना से प्रसन्न होकर उनकी इच्छा को पूरा कर दिया। उनके घर में एक पुत्र का जन्म हुआ जो अत्यंत सुंदर तथा आकर्षक था। वह बालक उनकी महान तपस्या का फल था। यद्यपि बचपन से ही वह बालक अलौकिक एवं चमत्कारपूर्ण घटनाओं का जनक था, लेकिन प्रायः चुप ही रहता था। काफी दिनों के पश्चात उसने बोलना शुरू किया। आश्चर्य की बात यह थी कि वह जब भी बोलता ‘वासुदेव, वासुदेव’ ही कहता। आठ वर्ष तक उसने ‘वासुदेव’ शब्द के अतिरिक्त और कोई शब्द नहीं कहा। वह आंखे बंद किये चुप बैठा ध्यान करता रहता। उसके चेहरे पर तेज बरसता तथा आंखों में तीव्र चमक थी।


आठवें ववर्ष में बालक का यज्ञोपवीत संस्कार कराया गया तथा पिता ने उसे वेद पढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन उसने कुछ भी नहीं पढ़ा, बस ‘वासुदेव’ नाम का संकीर्तन करता रहता। पिता हताश हो गए और उसे मुर्ख समझते हुए उसकी ओर ध्यान देना बंद कर दिया। परिणाम स्वरूप उसकी माता की ओर से भी उन्होंने मुंह फेर लिया।

कुछ दिनों पश्चात मांडुकी ऋषि ने दूसरा विवाह कर लिया जिससे अनेक पुत्र हुए। बड़े होकर वे सभी वेदो के तथा कर्मकांड के महान ज्ञाता हुए। चारों ओर उन्ही की पूजा होती थी। बेचारी पूर्व पत्नी घर में ही उपेक्षित जीवन व्यतीत कर रही थी। उसके पुत्र ऐतरेय को इसका बिलकुल ध्यान नहीं था। वह हर समय भगवान ‘वासुदेव’ का नाम जपता रहता तथा एक मंदिर में पड़ा रहता।


एक दिन माँ को अति क्षोभ हुआ। वह मंदिर में ही अपने पुत्र के पास पहुंची और उससे कहने लगी-“तुम्हारे होने से मुझे क्या लाभ हुआ ? तुम्हें तो कोई पूछता ही नहीं है, मुझे भी सभी घृणा की दृष्टी से देखते है। बताओ ऐसे जिवन से क्या लाभ है।”

माता की ऐसी दुखपूर्ण बाते सुनकर ऐतरेय को कुछ ध्यान हुआ, वह बोला- “माँ ! तुम तो संसार में आसक्त हो जबकि यह संसार और इसके भोग सब नाशवान है, केवल भगवान का नाम ही सत्य है। उसी का में जाप करता हूं लेकिन अब मैं समझ गया हूं कि मेरा अपनी माँ के प्रति भी कुछ कर्तव्य है। मैं उसको अब पूरा करूंगा और तुम्हे ऐसे स्थान पर पदासीन करूंगा जहां अनेक यज्ञ करके भी नहीं पहुंचा जा सकता।”


ऐतरेय ने भगवान विष्णु की सच्चे ह्रदय से वेदों की विधियों के अनुसार स्तुति की। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न हो गए। उन्होंने साक्षात प्रकट होकर ऐतरेय और उसकी माता को आशीर्वाद दिया- “पुत्र ! यद्यपि तुमने वेदो का अध्धयन नहीं किया है। लेकिन मेरी कृपा से तुम सभी वेदो के ज्ञाता और प्रकांड विद्वान हो जाओगे। तुम वेद के एक अज्ञात भाग की भी खोज करोगे। वह तुम्हारे नाम से ऐतरेय ब्राह्मण कहलायेगा। विवाह करो, गृहस्थी बसाओ तथा सभी कर्म करो, लेकिन सबको मुझे समर्पित कर दो अर्थात यह सोचकर करो कि मेरे आदेश से कर रहे हो। उनमे आसक्त मत होना, तब तुम संसार में नहीं फंसोगे। एक स्थान जो कोटितीर्थ कहलाता है, वहां जाओ। वहां पर हरिमेधा यज्ञ कर रहे है। तुम्हारे जैसे विद्वान की वहां आवश्यकता है। वहां जाने पर तुम्हारी माता की सभी इच्छाएं पूरी हो जाएगी।” इतना कहकर भगवान विष्णु अंतर्धान हो गए।

माता का ह्रदय अपने पुत्र के प्रति बजाय ममता के श्रद्धा से ओतप्रोत हो गया। उसी के कारण तो उसे भी भगवान के दर्शन हुए थे तथा अपनी माता के कारण ही उसने भगवान के नाम के अतिरिक्त कुछ न बोला था। अब दोनों माता और पुत्र भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए हरिमेधा के यज्ञ में पहुंच गए। वहां ऐतरेय ने भगवान विष्णु से संबंधित प्रार्थना का गान किया। उसे सुनकर तथा उनके तेज और विद्व्ता से सभी उपस्थित विद्वान प्रभावित हो गए। हरिमेधा ने उन्हें ऊंचे आसन पर बैठाकर उनका परिचय प्राप्त किया तथा उनकी आवभगत की।


ऐतरेय ने यहीं पर वेद नवीन चालीस अध्यायों का पाठ किया। ये पाठ अभी तक पूरी तरह अज्ञात थे। बाद में ये पाठ ऐतरेय ब्राह्मण के नाम से विख्यात हुए। हरिमेधा ने ऐतरेय से अपनी पुत्री का विवाह कर दिया।

ऐतरेय की माता ने अपने पुत्र से जो कामना की थी, वह उसे प्राप्त हो गई थी। भगवान विष्णु की कृपा से ऐतरेय का नाम महर्षि ऐतरेय के रूप में सदा-सदा के लिए अमर हो गया।

Monday, 22 April 2019

वासुदेव: सर्वम

वासुदेवः सर्वम्
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गीताप्रेमियों के लिए

            हमारी समस्या तब बढ़ जाती है जब हम श्रुति-शास्त्र के अनुभवों की अनदेखी करने लगते हैं । अब कहा "वासुदेवः सर्वम्" तो आपने सबको वासुदेव मान लिया, अपने को नहीं । यह तो भगवान ने कहा नहीं कि आपको छोड़कर बाकी सब मैं हूँ....! अगर नहीं कहा तो तो सबको वासुदेव मान लिया अपने को क्यों नहीं माना ? फिर वासुदेवः सर्वम् कैसे हुआ ? इसके अतिरिक्त देखिये--- "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति" ७/७ यहाँ पर कहा मुझसे भिन्न अन्य नहीं है लेकिन यह भी संभव था कि मुझको छोड़कर अन्य कुछ भी श्रीभगवान से भिन्न नहीं है, इसीलिये कहा "किञ्चित्" अर्थात कुछ भी ऐसा नहीं है जो मुझसे भिन्न हो, इस जगत का निमित्त उपादन कारण मैं हूँ और आप भी जगत से भिन्न न होने के कारण मुझसे भिन्न नहीं हो, द्विविधा प्रकृति मुझसे अभिन्न है इसलिये आप भी मुझसे भिन्न नहीं हो ।

           आप जीवन धारण करते हो ? तो "जीवनं सर्वभूतेषु" अर्थात प्राणियों के जीवन का मूलभूत गुण प्राण मैं हूँ । प्राणों का मूल अन्न मैं हूँ "अन्नं वै प्राणः" । अन्न का मूल ब्रह्म मैं हूँ "अन्नं वै ब्रह्म" । अन्न से ही जीवन धारित होता है और वह अन्न मैं हूँ तो तुम मुझसे भिन्न कैसे हो गये ? इस शरीर को धारण करने वाली आत्मा मैं हूँ "अहमात्मा" १०/२० "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि" १३/२ तुम जो अपने को जानने वाला मानते हो वह कोई और नहीं मैं स्वयं वासुदेव हूँ ऐसा जानो ।

          इस पर एक द्वैतवादी मित्र ने कहा कि इस शरीर में जानने वाले दो हैं । एक जीव और दूसरा आत्मा । जीव मात्र मन, बुद्धि, शरीर सहित संसार को जानता है और ईश्वर इस संसार सहित जीव को भी जानता है । अब इनसे पूछा जाये कि जीव अगर मात्र बुद्धि शरीर सहित संसार को ही यदि जानता है तो उसने कैसे जाना कि कोई ईश्वर है ? और अगर वह जानता है कि कोई ईश्वर है उसे प्राप्त करना चाहिए तो अनजान वस्तु के लिए मन में कल्पना भी नहीं हो सकती है तो प्राप्ति की बात कैसे की जा सकती है ? इसका मतलब जिसे आप जीव कह रहे हैं वह ईश्वर को भी जानता है, जानता है तो किस रूप में जानता है ? यदि जीव ईश्वर को जानता है तो ईश्वर व्याप्य और जीव व्यापक होगा और यदि ईश्वर जीव को जानता है तो जीव व्याप्य और ईश्वर व्यापक होगा । दोनो व्याप्त व्यापक हो नहीं सकते अतः आप कैसे कह सकते हैं कि ईश्वर ही जीव को जानता है जीव नहीं । आपकी ही बात से आपकी बात की हानि हो रही है । फिर श्रुति-शास्त्र सिद्धांत को चोट पहुंचे तो क्या आश्चर्य ?

           अतः आप जीव को ही व्याप्य कहेंगे ये स्वाभाविक है । अब विचार करो कि व्याप्य का अस्तित्व क्या है ? घड़ा है, जिस समय घड़ा दिख रहा है उस समय भी वह मिट्टी ही है क्योंकि घड़ा बनने से पहले भी मिट्टी ही थी और घड़ा बनने के बाद भी वह मिट्टी ही है । अगर आप घड़ा और मिट्टी अलग मानते हो तो हम कहते हैं घड़े से मिट्टी अलग करके फेंक और घड़ा ले जाओ । तो घड़ा बचेगा ? नहीं न ? इसी प्रकार जीव व्याप्य है ईश्वर व्यापक है, ईश्वर से भिन्न कोई जीव नहीं है क्योंकि व्याप्य व्यापक से भिन्न नहीं हो सकता । जीव प्रकाश्य है ईश्वर प्रकाशक है । जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस ज्ञान गुन धामू ।। सब कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ।। सब कर परम प्रकाशक कहने का भव यह है कि जो द्विविधा प्रकृति भगवान ने बताया उसमें अपरा अर्थ जड़ का प्रकाशक परा अर्थात जीव है और और इन दोनों का प्रकाशक ब्रह्म है जैसा कि "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा । ७/६ ।

              भगवान कहते हैं "जीवभूतां" ७/५ वह जीव है नहीं जीव भाव को प्राप्त हुआ है, उसने जीवत्व रूप उपाधि को स्वयं स्वीकार करके व्यापक अहंता का त्याग करके सीमित अहंता को स्वयं स्वीकार करके स्वयं को बांध लिया है । जब मुक्त होना चाहेगा तब सीमित अहंता को व्यापक अहंता में हवन करके, "त्वं" पदार्थ का "तत्" पदार्थ में लय करके "अहमात्मा" १०/२० के रूप में अपने आपको देखेगा । वह स्वयं सबका एक मात्र क्षेत्रज्ञ होगा । वह "वासुदेवः सर्वम्" के रूप में अपने आपको देखेगा । अर्थात वह मुझसे अभिन्न अपने को सर्वत्र मुझ व्यापक सर्वात्मा के रूप में जानेगा । वासुदेवः सर्वम् का यही भाव है । ओ३म् !

                                         

Tuesday, 16 April 2019

हनुमान जी वानर थे या मनुष्य


वादी:--हनुमान जी को हम वेदों का विद्वान और उच्च
कोटि घोषित करने का प्रयास कर रहे हैं आप उन्हें
बन्दर बनाना चाहते हैं। आप विद्वान श्रेष्ठ हैं , यह
बताये की हनुमान जी का ज्यादा मान पशु बन्ने में हैं
अथवा विद्वान मनुष्य बनने में हैं।
ईश्वर ,देव और उपदेव में क्या अंतर हैं ? शास्त्र से प्रमाण करें

समाधान:--- हनुमानजी का ज्यादा मान पशु बन्ने में हैं अथवा विद्वान
मनुष्य बनने में हैं।" --इसका उत्तर हमें स्वयं
महर्षि वाल्मीकि दे रहे हैं , रावण वध के विषय में
देवों की प्रार्थना पर ब्रह्मा जी ने स्वयं देवताओं
को वानर रूप में अपने समान पराक्रमी और बुद्धिमान
पुत्रों को उत्पन्न करने की आज्ञा दी --सृजध्वं
हरिरूपेण पुत्रान्स्तुल्यपराक्रमान् --वा.रा.
बा.का.१७/६,उन वानर वीरों में हनुमान जी पवन देव के
औरस पुत्र हुए --" मारुतस्यौरसः श्रीमान् हनूमान् नाम
वानरः " -१७/१६, ये सबसे अधिक बुद्धिमान और
बलवान हैं --" सर्व वानर मुख्येषुबुद्धिमान्
बलवानपि-१७/१७,इस प्रकार वहां अनेक देव
योनियों की स्त्रियों से वानरों की उत्पत्ति का वर्णन
है ,वानर राज सुग्रीव बालि | ये आज कल जैसे वानर नही थे ||
जहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण की गति नही वहां परम आप्त
महर्षि वाल्मीकि के अतिरिक्त कौन है जो इस विषय
पर अन्यथा कल्पना करने का दुस्साहस कर सके |
अतः ये वानर ही थे , इन्हें हम न तो वानर बनाना चाहते हैं न मनुष्य ही | ये जो थे और हैं वह महर्षि के
वचनों से स्पष्ट है |आप्त पुरुषों के वचन से विरुद्ध
कोई कल्पना सत्य नही हो सकती , वह केवल
कल्पना ही रहेगी |
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आचार्य सियारामदास नैयायिक
भैया विवेक जी आपने पूंछा कि--" ? शास्त्र प्रमाण के साथ स्पष्ट कीजिये।"--यहाँ पर मैं आपसे
इतना ही कहना चाहता हूँ कि जब वाल्मीकि रामायण
जैसे प्रामाणिक इतिहास
जो सभी ऋषियों को प्रमाणतया मान्य है --
उसी का अपलाप करके हनुमान जी के स्वरूप को विकृत
करने का कुत्सित प्रयास किया गया तो पहले हमें यह
पता चले कि शास्त्र प्रमाण से यहाँ क्या अभिप्रेत
है ? जो सर्व मान्य था उसका अपलाप कर दिया गया |
विकृत करने वाले किसे शास्त्र मानते हैं ?
| क्या वाल्मीकि रामायण शास्त्र नही ? क्या उससे
समाज में किसके प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए --
यह शिक्षा नही मिलती ? जिन हनुमान
जी को आततायी दुराचारी राक्षस और स्वयं रावण
तथा ग्रंथकार महर्षि वाल्मीकि आदि उद्घोष पूर्वक
वानर कहकर उनके चरित्र का वर्णन किये , |
उनके ऊपर आक्षेप कर्ता ने तो कोई प्रमाण
नही दिया ,और हमने जो प्रमाण प्रस्तुत किया -उस
पर पुनः प्रमाण ? रही बात उपदेव की तो जैसे कुम्भ
और उपकुम्भ ये दो शब्द हैं | इनमे कुम्भ सब समझते
हैं पर उपकुम्भ ,व्याकरण का मर्मज्ञ ही समझ
सकता है --कुम्भस्य समीपम् उपकुम्भाम--कुम्भ के
जो समीप हो उसे उपकुम्भ कहते हैं  |
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आचार्य सियारामदास नैयायिक
इन्हें पशु समझने की भूल नही करनी चाहिए ,क्योंकि "
ज्ञानेन हीनः पशुभिः समानः -कहा गया है , और ये
वानर के आकार में होते हुए भी ज्ञान संपन्न हैं |
इसीलिये तो रावण भी  बोल पड़ा की मैं उसे
वानर नही मानता , " नह्यहं तं कपिं मन्ये
कर्मणा प्रति तर्कयन्--वा. रा. सु. का.-४६/६,ओर
भी --" नैवाहं तं कपिं मन्ये यथेयं
प्रस्तुता कथा --४६/७, मैं उसे वानर नही मानता जिस
प्रकार की घटना उसके और राक्षसों के विषय में
प्रस्तुत की गयी है | रावण की यह
स्थिति है तो आज कल के लोग हनुमान जी की उस
अद्भुत क्षमता को देखकर उन्हें वानर मानने को तैयार
न हों तो क्या आश्चर्य ?
देखिये --" तुम्हारा तेज वानर का नही है ,तुम केवल रूप
मात्र से वानर हो " --" नहि ते वानरं तेजो रूप मात्रं
हि वानरम् "|--सु,का,५०/१०, अब हनुमान
जी अपना परिचय देते हुये कहते हैं --" यह मेरी जाति है
अर्थात् मैं वानर जाति का हूँ ,मैं वानर हूँ ओर
यहाँ आया हूँ--" जातिरेव मम
त्वेषा वानरोsहमिहागतः "--सु .का . ५०/१४,अब इस
सुस्पष्ट वचन से जिसको हनुमान जी के कपि रूप में
संदेह रह जाय उसे ब्रह्मा जी भी नही समझा सकते!

Sunday, 14 April 2019

महर्षि वेद व्यास और वाल्मीकि

श्रीमद्रामायणके रचयिता भगवान् वाल्मीकि और महाभारतके रचयिता भगवान् वेदव्यासजीके विषममें जितनी भ्रान्तियाँ हैं ,उतनी अन्य किसी क्रान्तदर्शी महर्षिके विषयमें नहीं ।
मैकालेकी अनौरस संतान वामपंथियोंने भगवान् वाल्मीकि और व्यासजीको किरात-भील-मल्लाह आदि बना दिया है ,जबकि यह शास्त्र विरुद्ध है ,असत्य है ।
आदिकवि भगवान् वाल्मीकि आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकिरामायणमें स्वयंका परिचय देते हैं , वे किसी किरात-दस्यु कुलोत्पन्न नहीं थे ,अपितु ब्रह्मर्षि भृगुके वंशमें उत्पन्न ब्राह्मण थे । रामायणमें भार्गव वाल्मीकिने २४००० श्लोकोंमें श्रीराम उपाख्यान ‘रामायण’ लिखी ऐसा वर्णन है –
“संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्र कम् ! उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना !! ( वाल्मीकिरामायण ७/९४/२५)
महाभारतमें भी आदिकवि वाल्मीकि को भार्गव (भृगुकुलोद्भव) कहा है , और यही भार्गव रामायणके रचनाकार हैं –
“श्लोकश्चापं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना !
आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत !!” (महाभारत १२/५७/४०)
शिवपुराणमें यद्यपि उनको जन्मान्तरका चौर्य वृत्ति करने वाला बताया है तथापि वे भार्गव कुलोत्पन्न थे । भार्गव वंशमें लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण थे ,उन्हीका दूसरा नाम ऋक्ष था । ब्राह्मण होकर भी चौर्य आदि कर्म करते थे और श्रीनारदजीकी सद् प्रेरणासे पुनः तपके द्वारा महर्षि हो गये ।
“भार्गवान्वयसम्भवः !!
लोहजङ्घो द्विजो ह्यासीद् ऋक्षनामोन्तरो हि स: !
ब्राह्मीं वृत्तिं परित्यज्य चोर कर्म समाचरेत् ! नारदेनोपदिष्टस्तु तपोनिष्ठां समाश्रितः !!
इत्यादि वचनोंसे भृंगु वंश में उत्पन्न लोहजगङ्घ ब्राह्मण जिसे ऋक्ष भी कहते थे , ब्राह्मण वृत्ति त्यागकर चोरी करने लगा था , फिर नारदजीकी प्रेरणासे तप करके पुनः ब्रह्मर्षि हो गये । उन्हें किरात-भील कुलोत्पन्न कहना अपराध है । २४ वे त्रेतायुगमें भगवान् श्रीराम हुए तब रामायणकी रचनाकर आदिकवि के रूपमें प्रसिद्ध हुए । विष्णुपुराणमें इन्हीं भृगुकुलोद्भव ऋभु वाल्मीकिको २४ वे द्वापरयुगमें वेदोंका विस्तार करने वाले २४वे व्याजजी कहा है –
“ऋक्षोऽभूद्भार्गववस्तस्माद्वाल्मीकिर्योऽभिधीयते (विष्णु०३/३/१८) । यही भार्गव ऋभु २४ वे व्यासजी पुनः ब्रह्माजीके पुत्र प्राचेतस वाल्मीकि हुए । श्रीमद्वाल्मीकिरामायणमें वाल्मीकि भगवान् श्रीरामचन्द्रको अपना परिचय देते हैं –
“प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन ! (वाल्मीकिरामायण ७/९६/१८)
स्वयं को प्रचेताका दशवाँ पुत्र वाल्मीकि कहा है । ब्रह्मवैवर्तपुराणमें कहा है –
” कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टु: सृष्टिविधौ पुनः !
य: पुत्रश्चेतसो धातु: बभूव मुनिपुङ्गव: !!
तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामह: !
– अर्थात् कल्पान्तरोंके बीतने पर सृष्टाके नवीन सृष्टि विधानमें ब्रह्माके चेतस से जो पुत्र उत्पन्न हुआ , उसे ही ब्रह्माके प्रकृष्ट चित्तसे आविर्भूत होनेके कारण प्रचेता कहा गया है ।
इसीलिए ब्रह्माके चेतससे उत्पन्न दशपुत्रोंमें वाल्मीकि प्राचेतस प्रसिद्ध हुए ।
मनु स्मृतिमें वर्णन है ब्रह्माजीने प्रचेता आदि दश पुत्र उत्पन्न किये –
“अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ! पतीत् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश !! मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलसत्यं पुलहं क्रतुम् ! प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च !! (मनु०१/३४-३५) भगवान् वाल्मीकि जन्मान्तरमें भी ब्राह्मण (भार्गव) थे और आदिकवि वाल्मीकिके जन्ममें भी (प्राचेतस) ब्राह्मण थे !
शिवपुराणमें कहा है प्राचेतस वाल्मीकि ब्रह्माके पुत्रने श्रीमद्रामायणकी रचनाकी ।
” पुरा स्वायम्भुवो ह्यासीत् प्राचेतस महाद्युतिः ! ब्रह्मात्मजस्तु ब्रह्मर्षि तेन रामायणं कृतम् !! ”
महाभारतकार भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासजी भी भील-मल्लाह नहीं वासिष्ठकुलोद्भव थे । व्यासजीकी माता सत्यवती अमावसु पितृकी मानसी कन्या अच्छोदा थीं , जिनका पितृलोकसे पतन होकर मर्त्यलोकमें कुरुवंशी महाराज चैद्योपरिचरवसुकी कन्या मत्स्यगन्धा के रूपमें जन्मी थीं । व्यासजीके पिता महर्षि पराशर भगवान् वसिष्ठके पौत्र और शक्तिके पुत्र थे ।
भगवान् व्यासजीकी माता सत्यवती भीष्मजीसे कहती हैं –
“यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतास्ते भरतर्षभ !
तस्य शुक्रादहं मत्स्याद् धृताकुक्षौ पुरा किला !!
मातरं मे जलाद् धृत्वा दाश: परमधर्मवित् !
मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वे ह्यकल्पयत् !!
(महाभारत आदि पर्व १०४-६)
– भरत श्रेष्ठ ! तुमने महाराज वसुका नाम सुना होगा । पूर्वकालमें मैं उन्हीं के वीर्यसे उत्पन्न हुई थी । मुझे एक मछलीने अपने पेट में धारण किया था(इसीलिये मत्स्यकी गन्ध उनके शरीर से आती थी जिससे उनका नाम मत्स्यगन्धा प्रसिद्ध था ) । एक परम् धर्मज्ञ मल्लाहने जलसे मेरी माताको पकड़ा ,उसके पेट से मुझे निकाला और अपने घर लाकर अपनी पुत्री बनाकर रखा !”
इस वृत्तान्त से माता सत्यवती कुरुवंशी महाराज उपरिचरिवसुकी औरस पुत्री सिद्ध होती हैं , जिन्हें दाशराज मल्लाहने पालके बड़ा किया था ।
इन्हीं मत्स्यगन्धासे महर्षि पराशरने कन्यावस्थामें व्यासजी को उत्पन्न किया था ।
“पराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषि: !
कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः !!” (आदिपर्व०१०४/१४)
भगवान् व्यासजी की माता क्षत्रिय राजा वसुपुत्री थीं और पिता महर्षि पराशर वासिष्ठ ब्राह्मण थे , फिर व्यासजी को मल्लाह ,केवट ,निषाद कहना निरीह मूर्खता ही नहीं ,महान् अपराध भी है ।