Thursday, 5 April 2018

महर्षि वाल्मीकि जन्मना ब्राह्मण थे

#महर्षि_वाल्मीकि_जयंती_बिशेष
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मैकाले के अनौरस सन्तान वामपंथियों ने महर्षि वाल्मीकि को किरात,भील,मल्लाह,शुद्र तक बना डाला मिथ्या प्रचार कर लोगो मे भ्रम उतपन्न किया है जबकि यह असत्य और शास्त्र विरुद्ध है ।
महर्षि वाल्मीकि को सास्त्रो में आदिकवि बताया गया है महर्षि वाल्मीकि ने श्रीमद्वाल्मीकिरामायण  में अपना परिचय देते हुए कहते है कि मैं भृगुकुल वंश उतपन्न ब्राह्मण हुँ

सन्निबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विशत्सहस्रकम् ।
उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ।। ७.९४.२६ ।।
इस महाकाब्य में इलोपख्यान २४ सहस्त्र श्लोक है और सौ उपाख्यान है जिसे भृगुवंशीय महर्षि वाल्मीकि जी ने बनाया है ।

महाभारत में भी वाल्मीकि को भार्गव (भृगुकुलोद्भव )
कहा गया है और यही रामायण के रचनाकार है ।

श्लोकद्वयं पुरा गीतं भार्गवेण महात्मना।
आख्याते राजचरिते नृपतिं प्रति भारत।।(महा० शान्तिपर्व १२/५६/४०)

शिवपुराण में यद्यपि उन्हें जन्मांतर का चौर्य बृती करनेवाला बताया तथापि वे भार्गवकुलोतपन्न थे भार्गववंश में लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण थे उन्ही का दूसरा नाम ऋक्ष था ब्राह्मण हो कर भी चौर्य आदि का काम करते थे और श्रीनारद जी की सद्प्रेरणा  पुनः तप के द्वारा महर्षि हो गये  !
इसके अलावा विष्णुपुराण में भी इन्हें भृगुकुलोद्भव ऋक्ष हुए जो  वाल्मीकि कहलाये ।

ऋक्षोऽभूद्भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽबिधीयते ।(विष्णु पुराण ३/३/१८)

श्रीमदवाल्मीकि रामायण में वाल्मीकि अपना परिचय देते हुए कहते है

प्रचेतसो ऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन ।।(वा० रा ७.९६.१९ ।)
मैं प्रचेतस का दसवां पुत्र वाल्मीकि हुँ ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है

कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टुः सृष्टि विधौ पुनः ।।
यः पुत्रश्चेतसो धातुर्बभूव मुनिपुंगवः ।।
तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामहः ।।१/२२/ १-३ ।।

अर्थात कल्पनान्तरो के बीतने पर सृष्टा के नवीन सृष्टि विधान में ब्रह्मा के चेतस से जो पुत्र उतपन्न हुआ उसे ही ब्रह्मा के प्रकृष्ट चित से उतपन्न होने के कारण प्रचेता कहा गया ।
इस लिए ब्रह्मा के चेत से उतपन्न दस पुत्रो में वाल्मीकि प्रचेतस प्रसिद्ध हुए ।
मनुस्मृति में वर्णन है ब्रह्मा जी ने प्रचेता आदि दस पुत्र उतपन्न किये ।

अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ।
पतीन्प्रजानां असृजं महर्षीनादितो दश । । १.३४ । ।
मरीचिं अत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदं एव च । । १.३५ । ।

भगवन जन्मांतर से ही ब्राह्मण थे शुद्र नही

गुरु लक्षण

#गुरु_लक्षण

एतद्‍देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
    स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा:॥(मनुस्मृति)
जो अग्रजन्मा है उसी से पृथ्वी के सभी मानव अपना आचार बिचार सीखें ।

ब्राह्मण सभी वर्णो में।अग्रजन्मा है
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् (ऋग्वेद)
उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्येष्ठ्याद्ब्रह्मणश्चैव धारणात् ।
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १.९३ )

वेदादि शास्त्रो में ब्राह्मण को मुख कहा गया है !
वाक् और बुद्धि  ही अंग प्रत्यंग से लेकर साम्राज्य तक का शाशन करता है यह दृष्टान्त जगत में देखा जाता है जिस कारण किस वर्ण का क्या आचरण है यह ब्राह्मण से ही जानना चाहिए क्यो ?
क्योकि
वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १०.३ )
उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।(मनुस्मृति )
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यां अधिजायते ।(मनुस्मृति)
पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः।।(महाभारत -- आदिपर्व ८१/२०)

ब्राह्मण स्वयं धर्म स्वरूप है ।
जिस कारण श्रुतिस्मृति आदि ग्रन्थों में ब्राह्मण के सानिध्य में ही  अध्ययन अध्यापन और आचार बिचार की शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया गया है

गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः(महाभारत आदिपर्व १/२८/३५)
अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः ।
प्रब्रूयाद्ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः । ।
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्त्युपायान्यथाविधि ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् । । (मनुस्मृति १०/१-२)
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् (श्रीमद्भागवतगीता १८- ४२ )
वृत्त्यर्थं याजयेदज्वान्यानन्यानध्यापयेत् तथा ।
कुर्यात् प्रतिग्रहादानं गुर्वर्थं न्यायतो द्रिजः (विष्णु पुराण ३/२३ )
सास्त्रज्ञा नित्य है और सास्त्रज्ञा मानने वाला ही ईश्वर का आराधना करता है सास्त्र द्रोही नही विष्णुपुराण का उद्घोष है अब उसे न मान मनमाना आचरण को ही धर्म मान ले तो उससे बड़ी और मूर्खता क्या ।

वर्णास्वमेषु ये धर्माः शास्त्रोक्ता नृपसत्तम ।
तेषु तिष्ठन् नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ।(विष्णु पुराण ३/ १९ )

Thursday, 6 April 2017

यजीदी yazidi

-----------         यज़ीदी Yazidi        -------------------
                           

सम्भवतः किसी और नृवंश ने यज़ीदी लोगो जैसा संत्रास नही है ईरान में अलकायदा ने उन्हें काफ़िर घोषित कर संपूर्ण नरसंहार की अनुमति दे दी 2007 में सुनियोजित ढंग से कार बमो की सृंखला ने उनमे से लगभग 800 लोगो की हत्या कर दी ।
इस्लामिक स्टेट ने 2014 में यज़ीदी नगरों और गाँवो के बिनाश का एक अभियान आरम्भ किया और इसने उनमे से लगभग 3000 लोगो की हत्या कर दी 6500 का अपहरण किया और 4500 यज़ीदी महिलाओं और लड़कियों को यौन दासत्व हेतु बेच दिया बहुत से अपहृत लड़कियों ने आत्महत्या कर ली ।
यज़ीदी मुख्यतः उतरी ईराक में रहने वाले कुर्दिश भाषी लोग है ।सदियों से अपने मुस्लिम ईसाई पड़ोसियों द्वारा घृणित इन लोगो ने 70 से ज्यादा नरसंहार का सामना किया जिनमे 2 करोड़ से ऊपर यज़ीदियों की मृत्यु का अनुमान है । और इनमें से अधिकाँश अपनी संस्कृति का त्याग करने के लिए बाध्य कर दिए गए है । यूरोप में शरण लिए हुए 150000 यज़ीदियों की संख्या मिलाकर आज लगभग 800000 वे स्वयं सच्चे ईश्वर में आस्था रखने वाले बताते है और वे मयूर देवदूत "ताऊस मेलेके" की आराधना करते है जो अनन्त ईश्वर का रूप (अवतार) है छः दूसरे देवदूत ताऊस मेलेके के सहयोगी है और वे सृष्टि के सात दिनों से सम्बन्ध है जिसमे से रविवार ताऊस मेलेके का दिन है यज़ीदियों के मंदिर और पूजा गृह तथा दूसरे स्थानों की सज्जा मोर के चित्रांकन से की जाती है उन पर हो रहे आक्रमण ईसाइयो और मुसलमानों के इस बिस्वास का परिणाम है कि मयूर दूत इब्लीस यत् शैतान है ।
यज़ीदी पंथ एक रहस्य वादी परम्परा है जिसके प्रार्थना गीत कव्वालों की तरह गाया जाता है परम्परा के कुछ अंश अब दो पुस्तको में संग्रहित किये गए है जिन्हें किताब अल जिल्वा और मिशेफ रेश कहा जाता है यजीदी अपनी उतप्ति भारत में होने का दावा करते है और मोर के प्रति उनका श्रद्धाभाव  इस मूल की स्मृति हो सकता है भारत में मोर शिवपुत्र कार्तिकेय (मुरुगन) देव् का वाहन है कृष्ण भी अपनी केशो में या मुकुट में मोरपंख पहनते थे आदिम इंद्रधनुष में उपजे सात रंगों में नीला रंग ताऊस मेलेके से सम्बंधित है जो कृष्ण का भी रंग है ।
यज़ीदि सूर्यउन्मुख हो कर प्राथना करते है भारतीय परंपरा जैसे पुनर्जन्म में बिश्वाश करते है और उनकी मान्यता यह है कि ताऊस मेलेके के अतिरिक्त अन्य सभी देवदूत धरती पर संतो और पवित्रआत्मा के रूप में अवतरित होते है । हिन्दुओ की तरह वे पुनर्जन्म के लिए वस्त्र बदलने के रूपक का प्रयोग करते है दूसरी भारोपीय संस्कृति की तरह यज़ीदी समुदाय तीनो वर्गो में बिभाजित है शेख (पुजारी) पिर (वयोबृद्ध) मुरीद ( जनसामान्य)  और वे विवाह सम्बन्ध अपनी समूह में ही करते है यज़ीदियों में पंथ परिवर्तन करने का विधान नही है वंश आधारित प्रशाशनिक प्रमुख मीर (राजकुमार) होता है जबकि बाबा शेख धार्मिक पद के प्रमुख होते है यज़ीदी अपने आप को दासेनी कहते है जो देवयास्नी ( संस्कृत देवयज्ञी ) देवपूजक से उद्भूत है यजीदी शब्द यजाता से व्युत्पन्न है जो प्राचीन पारशी और कश्मीर में यजात कहलाता है प्राचीन पारशी में देव को देवा कहते है प्राचीन भारत ईरान और पश्चिम एशिया में देव् पूजको को देवयज्ञी या देवयस्नी कहा जाता था जिसके समानार्थी सनातन वैदिक धर्म है पारशी अपने पन्थ को माज्दायास्ना ( संस्कृत -: मेघा यज्ञ ) या अहुर माज्दा (संस्कृत-  असुर मेघा -मेघा के देव्) का पंथ कहते है भारत में देव् यास्ना के प्रसार के सबसे प्रबल संभावना  हड़प्पा संस्कृति के क्षय के पश्चात लगभग 1900 ईशा पूर्व की बनती है  अफ़ग़ानिस्तान के समीप उत्तर पूर्व ईरान क्षेत्र थे देवपूजक समुदायों को भारत स्थित समुदायों से विखण्डित कर दिया यज़ीदियों का 4000 वर्ष पूर्व भारत से लौटने का मेल खाता है । प्रसङ्गवश यह रोचक की अरस्तू को यह विश्वास था की यहूदियों का मूल भूमि भारत ही था । इसके अतिरिक्त स्वयं को एकेश्वरवादी (अल -मुवहिहदून) अरबी भाषा कहने वाला ड्रुज समुदाय भी पूर्वजन्म में बिश्वाश रखता है और उसके पवित्र धर्मग्रन्थ में रसाईल -अल हिन्द (भारतीय पत्रावली) भी सम्मलित है ।
पारशि पंथ के उदय के पश्चात पश्चिमी एशिया देवयास्नी पन्थ लंबे समय तक बना रहा उसके बने रहने का प्रमाण ईरानी सम्राट (xerxes _486-465)  ईशा पूर्व के देव् या दैव अभिलेख मिलते है जिसमे देवयास्नी बिद्रोह का सीधा उल्लेख मिलता है
【जैरजैस घोषणा करता है और इन क्षेत्रों में एक स्थान ऐसा है जहाँ देव् पूजे जाते थे तदोपरान्त अहुरमज्द की कृपा से मैंने देव् स्थान को नष्ट कर दिया  और मैंने घोषणा की देव् नही पूजे जाएंगे 】
यह लगभग 2500 वर्ष पहले यज़ीदियों के देवयास्नी पूर्वजो के द्वारा झेले गये दमन का एक पुराना लिखित प्रमाण है यज़ीदी पञ्चाङ्ग 4750 ईशा पूर्व जाता है जोकी यवन (ग्रीक) इतिहासकार एरियन (Arrian) द्वारा सिकन्दर अभियान के वर्णन में उल्लेखित ,भारत के 6676  ईशा पूर्व में उदित हुए पुराने सप्तऋषि पञ्चाङ्ग से सम्बंधित प्रतीत होता है ।
यज़ीदियों की आध्यात्मिक परम्परा समृद्ध है और उसकी वर्तमान संस्कृति परम्परा 12 वी सदी के शेख आदि (देहांत 1162) ई: से प्राम्भ होती है जो चौथे उमय्यद ख़लीफ़ा मर्वान प्रथम के वंशज थे शेख आदि की मकबरा उत्तरी इराक के लालिश में है जो यज़ीदी तीर्थयात्रा के मुख्य केंद्र बिन्दु है नववर्ष उत्सव में  कांस्य मयूर आरती दीपो जैसे ही मयूर गढ़े हुए कांस्य दिप संजक एक शोभा यात्रा में कव्वालों के द्वारा मीर के आवाश से लेकर यज़ीदी गांव में घुमाये जाते है मान्यता है कि संजक भारत से आये थे और सात पवित्र देवदूतों के प्रतीक के रूप में मूलतः उनकी संख्या सात थी जिनमे से पांच तुर्को द्वारा छीन लिए गये अब मात्र दो ही बचे है यज़ीदी लोग मानवता के अदम्य संकल्पशक्ति के एक प्रतीक है संसार में सर्वाधिक दमित और प्रताड़ित जन में से एक यज़ीदी समुदाय चरम बिपरीत परिस्थियों में भी अपने साहस और बीरता के लिए प्रशंसा सहयोग और समर्थ। के पात्र है ।

Wednesday, 5 April 2017

*~ संस्कृत भाषा का जादू ~*

*~ संस्कृत भाषा का जादू ~*
संस्कृत में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं जो उसे अन्य सभी भाषाओं से उत्कृष्ट और विशिष्ट बनाती हैं:-
१.अनुस्वार (अं )
२.विसर्ग(अ:)
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग।
-पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं,
यथा= राम: बालक: हरि: भानु: आदि,
-नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं,
यथा= जलं वनं फलं पुष्पं आदि।
अब जरा ध्यान दें, तो पता चलेगा कि विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण होगा, उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाएगा, जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।
उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है। भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भौंरे की तरह गुंजन करना होता है, और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जावेगा।
कपालभाति और भ्रामरी प्राणायामों से क्या लाभ है? यह बताने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि स्वामी रामदेव जी जैसे संतों ने सिद्ध करके सभी को बता दिया है। मैं तो केवल यह बताना चाहता हूँ कि संस्कृत बोलने मात्र से उक्त प्राणायाम अपने आप होते रहते हैं।
जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- ''राम फल खाता है",
इसको संस्कृत में बोला जायेगा- ''राम: फलं खादति",
राम फल खाता है, यह कहने से काम तो चल जायेगा, किन्तु 'राम: फलं खादति' कहने से भ्रामरी (अनुस्वार) और कपालभाति (विसर्ग) रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है।
संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् बोल-चाल योग साधना करना।
*शब्द-रूप*
संस्कृत की दूसरी विशेषता है, शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 (मुलधातु सहित) रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार २५ रूप बनते हैं।
यथा:- रम् (मूल धातु),
राम:, रामौ, रामा:,
रामं, रामौ, रामान्,
रामेण, रामाभ्यां, रामै:,
रामाय, रामाभ्यां, रामेभ्य:,
रामात्, रामाभ्यां, रामेभ्य:,
रामस्य, रामयो:, रामाणां,
रामे, रामयो:, रामेषु,
हे राम!, हेरामौ!, हे रामा:!,
ये २५ रूप सांख्य दर्शन के २५ तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है। और इन २५ तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ (संस्कृत बोलने वाले) को प्राप्त होने लगती है।
सांख्य दर्शन के २५ तत्व निम्नानुसार हैं:-
आत्मा= पुरुष,
अंत:करण= मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार,(कुल चार)
ज्ञानेन्द्रियाँ = नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण,(कुल पांच)
कर्मेन्द्रियाँ = पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक्,(कुल पांच)
तन्मात्रायें = गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द,(कुल पांच)
महाभूत = पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश,(कुल पांच)
*द्विवचन*
संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है।
जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।
*संधि*
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।
''इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है,
यथा:- १. इत्यहं जानामि,
२.अहमिति जानामि,
३.जानाम्यहमिति,
४.जानामीत्यहम्,
इन सभी उच्चारणों में विशेष अभ्यांतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फलस्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं निरोगी हो जाता है।
इन तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा और अमृतवाणी कहा जाता हैं।
अतः हम सबको नित्यप्रति कुछ श्लोक याद कर चलते फिरते समय बोलते रहना चाहिये।
*यदा-यदा हि धर्मस्य.
ग्लानिर्भवति भारत
.........अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम् ।
*.....परित्राणाय साधूनाम्
विनाशाय च दुष्कृताम्....
धर्मसंस्थापनार्थाय
.....सम्भवामि युगे-युगे...।

Tuesday, 6 December 2016

पाणिनि कालीन भारत

पाणिनि सूत्रों में पठित निश्चित स्थान नामो की सहायता से पाणिनि कालीन भौगोलिक बिस्तार का परिचय मिलता है उत्तर पश्चिम में कापिषी(४/२/६९) का उल्लेख मिलता है यह नगरी प्राचीन काल में अतिप्रसिद्ध राजधानी थी काबुल से लगभग ५० मिल उत्तर इसके प्राचीन अवशेष मिलते है यहाँ से प्राप्त एक शिलालेख में इसे कपिषा कहा गया है आजकल इसका नाम बेग्राम है कापिषि से भी और उत्तर में कम्बोज (४/१/१७५ पा ०सूत्र) जनपद था जहाँ इस समय मध्य एशिया का पामीर पठार है कम्बोज के पूर्व में तारिम नदी के समीप कूचा प्रदेश था जो सम्भवतः वहीँ है जिसे पाणिनि ने कुच वार (४/३/९४) में कहा है तक्षशिला के दक्षिण पूर्व में मद्र जनपद (४/२/१३१) था जिसकी राजधानी शाकल (बर्तमान) स्यालकोट थी मद्र के दक्षिण में उशीनर (४/२/११८) और शिबि जनपद थे बर्तमान पंजाब का उत्तर पूर्वी भाग जो चंबा से कांगड़ा तक फैला हुआ है प्राचीन त्रिगर्त देश था सतलुज,व्यास,और रावी,इन तीन नदियों की घाटियों के कारण इसका नाम त्रिगर्त पड़ा (पा०सूत्र ५/३/११६)दक्षिण पूर्व पंजाब में थानेश्वर कैथल करनाल पानीपत का भूभाग भरत जनपद था इसी का दूसरा नाम प्राच्य भरत (पा०सूत्र ४/२/११३) भी था क्यों की यहीं से देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो खण्डों की सीमाएं बंट जाती थी दिल्ली मेरठ का प्रदेश कुरु जनपद (४/१/१७२) कहलाता था उसकी राजधानी हस्तिनापुर था अष्टाध्यायी में उसका रूप हस्तिनापुर (४/२/१०१) है गंगा और रामगंगा के बीच में प्रत्यग्रथ  नामक जनपद(४/११७१) था जिसे पांचाल भी कहा जाता था मध्यप्रदेश में कोशल (४/१/१७१) और काशी (४/२/११६) जनपदों का नाम उल्लेख किया गया है इससे पूर्व में मगध (४/१/१७०) जनपद था पूर्वी समुद्र तट पर कलिंग देश था इस समय महानदी बहती है (४/१/१७०) में पाणिनि में सुरमस जनपद का नामोउल्लेख किया है इसकी पहचान असम प्रांत की सुरमा नदी की घाटी और गिरी प्रदेश से की जा सकती है इस प्रकार पश्चिम में कम्बोज (पामीर) से लेकर पूरब के कामरूप असम के छोर तक फैले हुए जनपदों का तांता अष्टध्य्यायी में पाया जाता है पश्चिम के समुद्रतटवर्ती कच्छ जनपद (४/२/१३३) और दक्षिणमे गोदावरी तटवर्ती अस्मक जनपद (४/१/१७३) का भी नामोउल्लेख था  अस्मक की राजधानी प्रतिष्ठान थी जो गोदावरी के बाएं किनारे बम्बई और हैदराबाद की सीमा पर बर्तमान पैठण है कलिंग और अस्मक एक ही अक्षांश रेखा पर थे उत्तर के पहाड़ में हिमालय का नाम हिमवत (४/४/११२) आया है पाणिनि को भारतीय समुद्रों का भी परिचय था  कर्क की अयनांश रेखा कच्छ भुज से अनार्ट अवंति जनपदों को पार करती हुई सुरमस तक चली गई है इसके दक्षिण में भारतवर्ष का भूभाग अंतरयन कहलाता था पाणिनि ने देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो भागो  का उल्लेख किया है इन दोनों के बीच भरत जनपद था जहाँ इस समय कुरुक्षेत्र है प्राच्य भरत पद पर पतञ्जलि ने लिखा है कि वस्तुतः प्राच्य देश भरत के पूरब से प्रारम्भ होता था पाणिनि ने शरावती नदी का उल्लेख (शारदीनां च ६/३/१२०)किया है नागेश के एक प्राचीन श्लोक का प्रमाण देते हुए लिखा है कि शरावती प्राच्य और उदीच्य देशों की बिच की सीमा थी अमरकोश से ज्ञात होता है कि गुप्त काल में भी शरावती उदीच्य और प्राच्य के बीच की सीमा मानी जाती थी और वही प्राची और उदीच्य की सीमा को अलग करती थी पाणिनि की दृष्टि में प्राच्य और उदीच्य दोनों प्रदेशो में बोली जाने वाली भाषा  शिष्टसम्मत थी उसके शब्द ब्याकरण के बिषय थे शब्दो के शुद्ध रूप जानने के लिए जिस लोक का प्रमाण दिया जाता था वह यही था गांधार और वाहीक दोनों मिलकर उदीच्य कहलाते थे सिंधु और शतद्रु तक का प्रदेश वाहीक था जिसके अंतर्गत मद्र उशीनर और त्रिगर्त थे तीन मुख्य भाग थे तक्षशिला से काबुल तक का प्रदेश गांधार कहलाता था पाणिनि की समकालीन संस्कृत भाषा  का क्षेत्र गांधार से प्राच्य तक फैला हुआ था पाणिनि लगभग पांचवी शताब्दी बिक्रम पूर्व में हुए थे उसके लगभग दो शती पीछे यवनों का और शको का आगमन इस देश में हुआ था शक और यवन के कारण बाल्हीक और गंधार प्रदेश भारतवर्ष के राजनैतिक सिमा से कुछ काल के लिए अलग हो गए थे और उसके साथ संस्कृत सम्बन्ध में ढील पड़ने लगे थे और इस लिए पतञ्जलि भाष्य में शक और यवनों के प्रदेश को आर्याव्रत को बाहर कहा और भाषा भेद के कारण उन्हें शिष्ट संस्कृत क्षेत्र से अलग समझा पतञ्जलि के दृष्टि में आर्याव्रत की शिष्टजनो की भाषा प्रतिमानित संस्कृत थी और तत्कालीन संकुचित आर्यवर्त हिमालय के दक्षिण परियात्र पर्वत के उत्तर आदर्श के पूर्व और कालक वन पश्चिम अवस्थित था आदर्श प्रायः आदर्शन या सरस्वती नदी को सुख जाने (विनशन) का प्रदेश समझाजाता है किन्तु काशिका में उसे एक जनपद के नाम से कहा गया है (४/२/१२४) और नागेश ने उसे कुरुक्षेत्र की पहाड़ी कहा है कालका वन पाली साहित्य के अनुसार साकेत एक भाग था इस प्रकार हम देखते है की राजनैतिक कारणों से पतञ्जलि के समय आर्याव्रत की सीमाएं काफी सिकुड़ गई थी पतञ्जलि ने शक यवन किष्किन्धा गब्दिक और सौर्यकौंच को आर्याव्रत को सीमा से बाहर कहा एक
किष्किन्धा गोरखपुर में था जिसे पाली साहित्य में खुखुन्दो कहा चंबा रियासत के गद्दी प्रदेश के प्राचीन नाम गाब्दिक था और वह पतञ्जलि के समय बाहर समझा जाता था किन्तु पाणिनि के समय गंधार से मगध तक संस्कृत भाषा का अखण्ड प्रवाह फैला हुआ था उसी समय प्राच्य और उदीच्य दो स्वाभाविक भाग माने जाते थे ।

Tuesday, 29 November 2016

भारतीय संस्कृति व सभ्यता बिश्व ब्यापक है

भारतीय संस्कृति व सभ्यता बिश्व ब्यापक है
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भारतीय संस्कृति व सभ्यता विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। मध्यप्रदेश के भीमबेटका में पाए गए 25 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा मेहरगढ़ के अलावा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत की भूमि आदिमानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। यहीं से मानव ने अन्य जगहों पर बसाहट करने व वैदिक धर्म की नींव रखी थी।
आज से 3,500 वर्ष पूर्व जो सभ्यताएं जीवित थीं उनको पाश्चात्य इतिहासकारों ने ‘प्राचीन सभ्यताएं’ मानकर ही मानव इतिहास और समाज का विश्‍लेषण किया, लेकिन उनका यह विश्लेषण एकदम गलत और ईसाई धर्म को स्थापित करने वाला था। इसके लिए उन्होंने ऐसे कई तथ्य नकारे, जो प्राचीन भारत और चीन के इतिहास को महान बताते हैं और ईसा बाद के समाज से कहीं ज्यादा उन्हें सभ्य सिद्ध करते हैं।
प्राचीन सभ्यताओं पर अब कुछ ज्यादा ही शोध होने लगे हैं और उनसे नई-नई बातें निकलकर आ रही हैं, मसलन कि उनका एलियन से संबंध था और वे भी बिजली उत्पादन की तकनीक जानते थे। धरती पर फैली प्राचीन सभ्यताओं के बात करें तो धरती के पश्चिमी छोर पर रोम, ग्रीस और मिस्र देश की सभ्यताओं के नाम लिए जाते हैं तो पूर्वी छोर पर चीन का नाम लिया जाता है। मध्य में स्थित भारत की चर्चाभर करके उसे छोड़ दिया जाता है। क्यों? क्योंकि भारत को जानने से उनके समाज और धर्म के सारे मापदंड गिरने लगते हैं, तो वे नहीं चाहते हैं कि भारत और उसके धर्म का सच लोगों के सामने आए। लेकिन सच कब तक छिपा रहेगा?
दुनियाभर की प्राचीन सभ्यताओं से हिन्दू धर्म का क्या कनेक्शन था? या कि संपूर्ण धरती पर हिन्दू वैदिक धर्म ने ही लोगों को सभ्य बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक विचारधारा की नए नए रूप में स्थापना की थी? आज दुनियाभर की धार्मिक संस्कृति और समाज में हिन्दू धर्म की झलक देखी जा सकती है चाहे वह यहूदी धर्म हो, पारसी धर्म हो या ईसाई-इस्लाम धर्म हो।
ईसा से 2300-2150 वर्ष पूर्व सुमेरिया, 2000-400 वर्ष पूर्व बेबिलोनिया, 2000-250 ईसा पूर्व ईरान, 2000-150 ईसा पूर्व मिस्र (इजिप्ट), 1450-500 ईसा पूर्व असीरिया, 1450-150 ईसा पूर्व ग्रीस (यूनान), 800-500 ईसा पूर्व रोम की सभ्यताएं विद्यमान थीं। उक्त सभी से पूर्व महाभारत का युद्ध लड़ा गया था इसका मतलब कि 3500 ईसा पूर्व भारत में एक पूर्ण विकसित सभ्यता थी।

सिन्धु-सरस्वती घाटी की सभ्यता (5000-3500 ईसा पूर्व) : हिमालय से निकलकर सिन्धु नदी अरब के समुद्र में गिर जाती है। प्राचीनकाल में इस नदी के आसपास फैली सभ्यता को ही सिन्धु घाटी की सभ्यता कहते हैं। इस नदी के किनारे के दो स्थानों हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान) में की गई खुदाई में सबसे प्राचीन और पूरी तरह विकसित नगर और सभ्यता के अवशेष मिले। इसके बाद चन्हूदड़ों, लोथल, रोपड़, कालीबंगा (राजस्थान), सूरकोटदा, आलमगीरपुर (मेरठ), बणावली (हरियाणा), धौलावीरा (गुजरात), अलीमुराद (सिंध प्रांत), कच्छ (गुजरात), रंगपुर (गुजरात), मकरान तट (बलूचिस्तान), गुमला (अफगान-पाक सीमा) आदि जगहों पर खुदाई करके प्राचीनकालीन कई अवशेष इकट्ठे किए गए। अब इसे सैंधव सभ्यता कहा जाता है।
हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में असंख्य देवियों की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। ये मूर्तियां मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं। प्राचीनकाल से ही मातृ या प्रकृति की पूजा भारतीय करते रहे हैं और आधुनिक काल में भी कर रहे हैं। यहां हुई खुदाई से पता चला है कि हिन्दू धर्म की प्राचीनकाल में कैसी स्थिति थी। सिन्धु घाटी की सभ्यता को दुनिया की सबसे रहस्यमयी सभ्यता माना जाता है, क्योंकि इसके पतन के कारणों का अभी तक खुलासा नहीं हुआ है।
इतना तो तय है कि इस काल में महाभारत का युद्ध इसी क्षेत्र में हुआ था। लोगों के बीच हिंसा, संक्रामक रोगों और जलवायु परिवर्तन ने करीब 4 हजार साल पहले सिन्धु घाटी या हड़प्पा सभ्यता का खात्मा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी। यह दावा एक नए अध्ययन में किया गया है।

नॉर्थ कैरोलिना स्थित एप्पलचियान स्टेट यूनिवर्सिटी में नृविज्ञान (एन्थ्रोपोलॉजी) की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ग्वेन रॉबिन्स शुग ने एक बयान में कहा कि जलवायु, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों, सभी ने शहरीकरण और सभ्यता के खात्मे की प्रक्रिया में भूमिका निभाई, लेकिन इस बारे में बहुत कम ही जानकारी है कि इन बदलावों ने मानव आबादी को किस तरह प्रभावित किया।
आज जिस हिस्से को पाकिस्तान और अफगानिस्तान कहा जाता है, महाभारतकाल में इसे पांचाल, गांधार, मद्र, कुरु और कंबोज की स्थली कहा जाता था। अयोध्या और मथुरा से लेकर कंबोज (अफगानिस्तान का उत्तर इलाका) तक आर्यावर्त के बीच वाले खंड में कुरुक्षेत्र था, जहां यह युद्ध हुआ। आजकल यह हरियाणा का एक छोटा-सा क्षेत्र है।
उस काल में सिन्धु और सरस्वती नदी के पास ही लोग रहते थे। सिन्धु और सरस्वती के बीच के क्षेत्र में कई विकसित नगर बसे हुए थे। यहीं पर सिन्धु घाटी की सभ्यता और मोहनजोदड़ो के शहर भी बसे थे। मोहनजोदड़ो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है।
जब पुरातत्व शास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोहनजोदड़ो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्होंने देखा कि वहां की गलियों में नरकंकाल पड़े थे। कई अस्थिपंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थिपंजरों ने एक-दूसरे के हाथ इस तरह पकड़ रखे थे मानो किसी विपत्ति ने उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुंचा दिया था।
उन नरकंकालों पर उसी प्रकार की रेडियो एक्टिविटी के चिह्न थे, जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गए थे। मोहनजोदड़ो स्थल के अवशेषों पर नाइट्रिफिकेशन के जो चिह्न पाए गए थे, उसका कोई स्पष्ट कारण नहीं था, क्योंकि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है। उल्लेखनीय है कि महाभारत में अश्‍वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था जिसके चलते आकाश में कई सूर्यों की चमक पैदा हुई थी।
सुमेरिया2300-2150 : सुमेर सभ्यता को ही मेसोपोटामिया की सभ्यता कहा जाता है। मेसोपोटामिया का अर्थ होता है- दो नदियों के बीच की भूमि। दजला (टिगरिस) और फुरात (इयुफ़्रेट्स) नदियों के बीच के क्षेत्र को कहते हैं। इसी तरह सिन्धु और सरस्वती के बीच की भूमि पर ही आर्य रहते थे। इसमें आधुनिक इराक, उत्तर-पूर्वी सीरिया, दक्षिण-पूर्वी तुर्की तथा ईरान के कुजेस्तान प्रांत के क्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्र में ही सुमेर, अक्कदी, बेबिलोन तथा असीरिया की सभ्यताएं अस्तित्व में थीं। अक्कादियन साम्राज्य की राजधानी बेबिलोन थी अतः इसे बेबिलोनियन सभ्यता भी कहा जाता है। यहां के बाद की जातियां क्षेत्र तुर्क, कुर्द, यजीदी, आशूरी (असीरियाई), सबाईन, हित्ती, आदि सभी ययाति, भृगु, अत्रि वंश की मानी गई हैं।
सुमेरिया की सभ्यता और संस्कृति का विकास फारस की खाड़ी के उत्तर में दजला और फरात नदियों के कछारों में हुआ था। सुमेरियन सभ्यता के प्रमुख शहर ऊर, किश, निपुर, एरेक, एरिडि, लारसा, लगाश, निसीन, निनिवेह आदि थे। निपुर इस सभ्यता का सर्वप्रमुख नगर था जिसका काल लगभग 5262 ईपू बताया जाता है। इस नगर का प्रमुख देवता एनलिल समस्त देश में पूजनीय माना जाता था।
सुमेरिया निवासी भी आस्तिक और मूर्तिपूजक थे। वे भी मंदिरों का निर्माण कर उनमें अपने इष्ट देवताओं कि मूर्तियां स्थापित कर उसकी पूजा-अर्चना करते थे। हिन्दू संस्कृति पर आधारित यह सभ्यता ईसा पूर्व 2000 के पूर्व ही समाप्त हो गई।

सुमेरिया वालों का वर्ष हिन्दुओं जैसा ही 12 मासों का था। उनकी मास गणना भी चन्द्रमा की गति पर आधारित थी। इस कारण हर तीसरे वर्ष एक माह बढ़ता था, जो हिन्दुओं के अधिकमास जैसा ही था। हिन्दुओं के समान ही अष्टमी और पूर्णिमा का वे बड़े उत्साह से स्वागत करते थे।
सुमेरियावासियों का संबंध सिन्धु घाटी के लोगों से घनिष्ठ था, क्योंकि यहां कुछ ऐसी मुद्राएं पाई गई हैं, जो सिन्धु घाटी में पाई गई थीं। पश्चिम के इतिहासकार मानते हैं कि सिन्धु सभ्यता सुमेरियन सभ्यता का उपनिवेश स्थान था जबकि समेल लोग पूर्व को अपना उद्गम मानते थे। सुमेर के भारत के साथ व्यापारिक संबंध थे।
प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता लैंगडन के अनुसार मोहनजोदड़ो की लिपि और मुहरें, सुमेरी लिपि और मुहरों से एकदम मिलती हैं। सुमेर के प्राचीन शहर ऊर में भारत में बने चूने-मिट्टी के बर्तन पाए गए हैं। मोहनजोदड़ो की सांड (नंदी) की मूर्ति सुमेर के पवित्र वृषभ से मिलती है और हड़प्पा में मिले सिंगारदान की बनावट ऊर में मिले सिंगारदान जैसी है। इन सबके आधार पर कहा जा सकता है कि सुमेर सभ्यता के लोग भी हिन्दू धर्म का पालन करते थे। ‘सुमेर’ शब्द भी हमें पौराणिक पर्वत सुमेरु की याद दिलाता है। बेबिलोनिया (2000-400 ईसा पूर्व) : सुमेरी सभ्यता के पतन के बाद इस क्षेत्र में बाबुली या बेबिलोनियन सभ्यता पल्लवित हुई। अक्कादियन साम्राज्य की राजधानी बेबिलोन थी, उसके प्रसिद्ध सम्राट् हम्मुराबी (हाबुचन्द्र) ने अत्यंत प्राचीन कानून और दंड संहिता बनाई। बेबिलोनियन सभ्यता की प्रमुख विशेषता हम्मुराबी की (2123-2080 ईपू) दंड संहिता है। बेबिलोनियन सभ्यता का प्रमुख ग्रंथ्र गिल्गामेश महाकाव्य था। गिल्गामेश (2700 ईपू) प्राचीन उरुक (वर्तमान इराक में) जन्म एक युवा राजा था।
इस सभ्यता के लोग हिन्दु्ओं के समान ही पूजा प्रात: और सायं अर्घ्य, तेल, धूप, अभ्यंग, दीप, नेवैद्य आदि लगाकर करते थे। ईसा पूर्व 18वीं शताब्दी के वहां के कसाइट राजाओं के नामों में वैदिक देवताओं के सूर्य, अग्नि, मरूत आदि नाम मिलते हैं। वहां के हिट्टाइट और मिनानी राजाओं के बीच हुई संधियों में गवाह के रूप में इंद्र, वरुण, मित्र, नासत्य के नाम मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बेबिलोनिया के लोग भी हिन्दू धर्म का ही पालन करते थे।
अलअपरना में मिले शिलालेखों में सीरिया, फिलिस्तीन के राजाओं के नाम भारतीय राजाओं के समान है। असीरिया शब्द असुर का बिगड़ा रूप है। बेबिलोन की प्राचीन गुफाओं में पुरातात्विक खोज में जो भित्तिचित्र मिले हैं, उनमें भगवान शिव के भक्त, वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं की उपासना करते हुए उत्कीर्ण किया गया है।
असीरिया(1450-500 ईसा पूर्व) : असीरिया को पहले अश्शूर कहा जाता था। अश्शूर प्राचीन मेसोपोटामिया का एक साम्राज्य था। यह असुर शब्द का अपभ्रंश है। यह दजला नदी के ऊपरी हिस्से में अश्शूर साम्राज्य में स्थित था। इसके बाद यह साम्राज्य फारस के हखामनी वंश के शासकों के अधीन आ गया।
असीरिया निवासी सूर्यपूजक थे और वहां के राजा अपने आपको सूर्य का वंशज मानते थे। अथर्वण संप्रदाय में भारत में अंगीकृत अथर्वणि चिकित्सा यहां भी प्रचार में थी।
अथर्ववेद का बहुत-सा भाग असीरिया में प्रचलित था। होम, यज्ञ, वशीकरण, भूतविद्या आदि प्रकार प्रचलित थे। आयुर्वेद के अष्टांगों में तथा चरक संहिता के इंद्रिय स्थान के दूताधिकार अध्याय में इन विषयों का विवेचन किया गया है।

ईरान(2000-2500 ईसा पूर्व) : ईरान को प्राचीनकाल में पारस्य देश कहा जाता था। आर्याण से ईरान शब्द की उत्पत्ति हुई है। ईसा की 7वीं शताब्दी में जब खलीफाओं का आक्रमण बढ़ गया, तब अधिकतर को इस्लाम अपनाना पड़ा और जो नहीं चाहते थे अपनाना उन्हें अपने ही देश को छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेना पड़ी। यहां का मूल धर्म तो वैदिक धर्म ही था लेकिन जरथुस्त्र में वेदों पर आधारित पारसी धर्म की शुरुआत हुई। प्राचीनकाल में आर्यों का एक समूह ईरान में ही रहता था। ईरान में वेदकालीन धर्म और संस्कृति का गहरा प्रभाव था।
जरथुष्ट्र को ऋग्वेद के अंगिरा, बृहस्पति आदि ऋषियों का समकालिक माना जाता है। वे ईरानी आर्यों के स्पीतमा कुटुम्ब के पौरुषहस्प के पुत्र थे। इतिहासकारों का मत है कि जरथुस्त्र 1700-1500 ईपू के बीच हुए थे। यह लगभग वही काल था, जबकि राजा सुदास का आर्यावर्त में शासन था और दूसरी ओर हजरत इब्राहीम अपने धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे थे।
पारसियों का धर्मग्रंथ ‘जेंद अवेस्ता’ है, जो ऋग्वैदिक संस्कृत की ही एक पुरातन शाखा अवेस्ता भाषा में लिखा गया है। यही कारण है कि ऋग्वेद और अवेस्ता में बहुत से शब्दों की समानता है। अत्यंत प्राचीन युग के पारसियों और वैदिक आर्यों की प्रार्थना, उपासना और कर्मकांड में कोई भेद नजर नहीं आता। वे अग्नि, सूर्य, वायु आदि प्रकृति तत्वों की उपासना और अग्निहोत्र कर्म करते थे। मिथ्र (मित्रासूर्य), वयु (वायु), होम (सोम), अरमइति (अमति), अद्दमन् (अर्यमन), नइर्य-संह (नराशंस) आदि उनके भी देवता थे। वे भी बड़े-बड़े यश्न (यज्ञ) करते, सोमपान करते और अथ्रवन् (अथर्वन्) नामक याजक (ब्राह्मण) काठ से काठ रगड़कर अग्नि उत्पन्न करते थे। उनकी भाषा भी उसी एक मूल आर्य भाषा से उत्पन्न थी जिससे वैदिक और लौकिक संस्कृत निकली है। अवेस्ता में भारतीय प्रदेशों और नदियों के नाम भी हैं, जैसे हफ्तहिन्दु (सप्तसिन्धु), हरव्वेती (सरस्वती), हरयू (सरयू), पंजाब इत्यादि। मिस्र (इजिप्ट- 2000-150 ईसा पूर्व) : मिस्र बहुत ही प्राचीन देश है। यहां के पिरामिडों की प्रसिद्धि और प्राचीनता के बारे में सभी जानते हैं। ये पिरामिड प्राचीन सभ्यता के गवाह हैं। प्राचीन मिस्र नील नदी के किनारे बसा है। यह उत्तर में भूमध्य सागर, उत्तर-पूर्व में गाजा पट्टी और इसराइल, पूर्व में लाल सागर, पश्चिम में लीबिया एवं दक्षिण में सूडान से घिरा हुआ है।

यहां का शहर इजिप्ट प्राचीन सभ्यताओं और अफ्रीका, अरब, रोमन आदि लोगों का मिलन स्थल है। यह प्राचीन विश्‍व का प्रमुख व्यापारिक और धार्मिक केंद्र रहा है। मिस्र के भारत से गहरे संबंध रहे हैं। यहां पर फराओं राजाओं का बहुत काल तक शासन रहा है। माना जाता है कि इससे पहले यादवों के गजपत, भूपद, अधिपद नाम के तीन भाइयों का राज था। गजपद के अपने भाइयों से झगड़े के चलते उसने मिस्र छोड़कर अफगानिस्तान के पास एक गजपद नगर बसाया था। गजपद बहुत शक्तिशाली था।
मिस्र में सूर्य को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा देवता के रूप में माना जाता है। भारतीयों ने कहा है- आरोग्यं भास्करादिच्छेत। यहां अनेक औषधियां भारत से मंगाई जाती थीं। भारतीय और मिस्र की भाषाओं में बहुत से शब्द और उनके अर्थ समान है, जैसे हरी (सूर्य)- होरस, ईश्वरी- ईसिस, शिव- सेव, श्वेत- सेत, क्षत्रिय- खेत, शरद- सरदी आदि। मिस्र के पुरोहितों की वेशभूषा भारतीय पुरोहितों व पंडितों की तरह है। उनकी मूर्तियों पर भी वैष्णवी तिलक लगा हुआ मिलता है। एलोरा की गुफा और इजिप्ट की एक गुफा में पाई गई नक्काशी और गुफा के प्रकार में आश्चर्यजनक रूप से समानता है।
मिस्र के प्रसिद्ध पिरामिड वहां के राजाओं की एक प्रकार की कब्रें हैं। भारतीयों को इस विद्या की उत्तम जानकारी थी। उन्होंने राजा दशरथ का शव उनके पुत्र भरत के कैकेय प्रदेश से अयोध्या आने तक सुरक्षित रखा था।
यूनान (ग्रीस- 1450-150) : यूनान और भारत के तो बहुत प्राचीनकाल से ही संबंध रहे हैं। यूनानी देवी और देवताओं में बहुत हद तक समानताएं हैं। उनका संबंध सितारों से है, उसी तरह जिस तरह की हिन्दू देवी-देवताओं का है।
ग्रीस देश के महाकवि होमर ने ईसा की 8वीं शताब्दी में ‘ओडिसी’ नामक महाकाव्य लिखा था जिसमें उसने अपने समय की देश स्थिति का वर्णन किया है। इस ग्रंथ से पता चलता है कि आयुर्वेद की ‘दैव व्यपाश्रय’ पद्धति वहां प्रचलित थी। उसकी दूसरी पुस्तक ‘इलियाड’ में भारतीय शल्य चिकित्सा के उपयोग का भी वर्णन है।
डॉ. रॉयल अपनी पुस्तक ‘सिविलाइजेशन इन इंडिया’ में लिखते हैं कि ‘विश्व की प्रथम चिकित्सा प्रणाली के लिए हम हिन्दुओं के ऋणी हैं।’ ग्रीस की वैद्यकीय चिकित्सा पर भारतीय आयुर्वेद का प्रभाव प्रत्यक्षतः तथा परोक्षतः (मिस्र, ईरान आदि के माध्यमों से) पड़ा था। डोरोथिया चैम्पलीन लिखते हैं- ‘भारतीय आयुर्वेद के शरीर विज्ञान में कोई भी विदेशी शब्द नहीं है जबकि पाश्चात्य शरीर विज्ञान पर भारत की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।’
सर में मस्तिष्क के ऊपर के भाग को आयुर्वेद में शिरोब्रह्म कहते हैं, वह ग्रीस और रोम में ‘सेरेब्रम’ हो गया है। वैसे ही मस्तिष्क के पीछे का भाग शिरोविलोम ‘सेरिबैलम’ और हृद ‘हार्ट’ हो गए हैं। घोड़ों पर सवार होकर रोगियों की चिकित्सा करने वाले भारतीय अश्विनीकुमारों के युग्म जैसे ‘कैक्टस और पोलुपस’ ग्रीक युग्म घोड़ों पर सवार होकर रोगियों की रक्षा करते हैं।
प्रसिद्ध इतिहासकार मोनियर विलियम्स ने स्पष्ट बताया है कि यूरोप के प्रथम दार्शनिक प्लेटो और पायथागोरस दोनों दर्शनशास्त्र के विषय में सब तरह से भारतवासियों के ऋणी हैं। पाइथागोरस के नाम से प्रसिद्ध प्रमेय भारत के बौधायन शुल्ब सूत्र में बहुत पहले से ही विद्यमान है। रोम(800-500 ईसा बाद) : रोमन सभ्यता के पास खुद का स्वयं का कुछ नहीं था। उसके पास जो भी ज्ञान था वह मिस्र, भारत और यूनान का दिया हुआ था। रोमनों ने ही भारतीय पंचांग और कैलेंडर को देखकर अपना खुद का एक कैलेंडर बनाया।

रोम का साम्राज्य पूरे यूरोप में फैला हुआ होने के कारण रोम की सभ्यता का प्रभाव सारे यूरोप पर पड़ा इसलिए यहां पर केवल एक ही उदाहरण दिया जा सकता रहा है- रोम के मुद्रसकन लोगों के देवता ‘तितिया’ के अस्त्र का वर्णन भारत के इंद्र के वज्र जैसा ही है।
इतिहासकारों के अनुसार बहुत से भारतीय घूमते-घूमते संसार के अनेक देशों में पहुंचे। वे स्वयं को ‘रोम’ कहते थे और उनकी भाषा रोमानी थी, परंतु यूरोप में उन्हें ‘जिप्सी’ कहा जाता था। वे वर्तमान समय के पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि को पार कर पश्चिम की ओर निकल गए थे। वहां से ईरान और इराक होते हुए वे तुर्की पहुंचे। फारस, तौरस की पहाड़ी और कुस्तुन्तुनिया होते हुए वे यूरोप के अनेक देशों में फैल गए।
इस अवधि में वे लोग यह तो भूल गए कि वे कहां के निवासी हैं, परंतु उन्होंने अपनी भाषा, रहन-सहन के ढंग, रीति-रिवाज और व्यवसाय आदि को नहीं छोड़ा। रोम लोगों को उनके नृत्य और संगीत के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि हर एक रोम गायक और अद्भुत कलाकार होता है।
वास्तव में ईसा युग की प्रथम तीन शताब्दियों में भारत का पश्चिम के साथ लाभप्रद समुद्री व्यापार हुआ जिनमें रोम साम्राज्य प्रमुख था। रोम भारतीय सामान का सर्वोत्तम ग्राहक था। यह व्यापार दक्षिण भारत के साथ हुआ, जो कोयम्बटूर और मदुराई में मिले रोम के सिक्कों से सिद्ध होता है। धार्मिक इतिहासकारों के अनुसार राजा विक्रमादित्य से रोम का राजा प्रतिद्वंद्विता रखता था। विक्रमादित्य को ज्योतिष और खगोल विज्ञान में बहुत रुचि थी। वराहमिहिर जैसे विद्वान उनके काल में थे। उनके प्रयासों के चलते ही आज दुनिया ने खगोल में उन्नति की।
हरिदत्त शर्मा ज्योति विश्वकोष के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने ही अपना दिल्ली में एक ‘ध्रुव स्तंभ’ बनवाया था जिसे आज ‘कुतुब मीनार’ कहते हैं। दरअसल, यह ध्रुव स्तंभ ‘हिन्दू नक्षत्र निरीक्षण केंद्र’ है। कुतुब मीनार के आसपास दोनों पहाड़ियों के बीच से ही सूर्यास्त होता है। वराहमिहिर के अनुसार 21 जून को सूर्य ठीक इसके ऊपर से निकलता है। कुतुबुद्दीन लुटेरा तो मात्र 4 साल ही भारत में रहा और चला ‍गया, जबकि यह कुतुब मीनार (ध्रुव स्तंभ) 2 हजार वर्ष पुराना‍ सि‍द्ध किया गया है।
माया सभ्यता (250 ईस्वीसे900 ईस्वी) : अमेरिका की प्राचीन माया सभ्यता ग्वाटेमाला, मैक्सिको, होंडुरास तथा यूकाटन प्रायद्वीप में स्थापित थी। यह एक कृषि पर आधारित सभ्यता थी। 250 ईस्वी से 900 ईस्वी के बीच माया सभ्यता अपने चरम पर थी। इस सभ्यता में खगोल शास्त्र, गणित और कालचक्र को काफी महत्व दिया जाता था। मैक्सिको इस सभ्यता का गढ़ था। आज भी यहां इस सभ्यता के अनुयायी रहते हैं।
यूं तो इस इलाके में ईसा से 10 हजार साल पहले से बसावट शुरू होने के प्रमाण मिले हैं और 1800 साल ईसा पूर्व से प्रशांत महासागर के तटीय इलाक़ों में गांव भी बसने शुरू हो चुके थे। लेकिन कुछ पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि ईसा से कोई एक हजार साल पहले माया सभ्यता के लोगों ने आनुष्ठानिक इमारतें बनाना शुरू कर दिया था और 600 साल ईसा पूर्व तक बहुत से परिसर बना लिए थे। सन् 250 से 900 के बीच विशाल स्तर पर भवन निर्माण कार्य हुआ, शहर बसे। उनकी सबसे उल्लेखनीय इमारतें पिरामिड हैं, जो उन्होंने धार्मिक केंद्रों में बनाईं लेकिन फिर सन् 900 के बाद माया सभ्यता के इन नगरों का ह्रास होने लगा और नगर खाली हो गए।
माया सभ्यता का पंचांग 3114 ईसा पूर्व शुरू किया गया था। इस कैलेंडर में हर 394 वर्ष के बाद बाकतुन नाम के एक काल का अंत होता है। 21 दिसबंर, 2012 को उस कैलेंडर का 13वां बाकतुन खत्म हो जाएगा। हालांकि माया सभ्यता के बारे में कहा जाता है कि यह भी सिन्धु घाटी और मिस्र की सभ्यताओं की तरह सबसे रहस्यमयी सभ्यता है, जो अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्य समेटे हुए है।
अमेरिकन इतिहासकार मानते हैं‍ कि भारतीय आर्यों ने ही अमेरिका महाद्वीप पर सबसे पहले बस्तियां बनाई थीं। अमेरिका के रेड इंडियन वहां के आदि निवासी माने जाते हैं और हिन्दू संस्कृति वहां पर आज से हजारों साल पहले पहुंच गई थी। माना जाता है कि यह बसाहट महाभारतकाल में हुई थी।

हिन्दू  अमेरिकन महाद्वीप के बोलीविया (वर्तमान में पेरू और चिली) में हिन्दुओं ने प्राचीनकाल में अपनी बस्तियां बनाईं और कृषि का भी विकास किया। यहां के प्राचीन मंदिरों के द्वार पर विरोचन, सूर्य द्वार, चन्द्र द्वार, नाग आदि सब कुछ हिन्दू धर्म समान हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक सेना ने नेटिव अमेरिकन की एक 45वी मिलिट्री इन्फैंट्री डिवीजन का चिह्न एक पीले रंग का स्वास्तिक था। नाजियों की घटना के बाद इसे हटाकर उन्होंने गरूड़ का चिह्न अपनाया।

Wednesday, 9 November 2016

दास शब्द शुद्र का ही वाचक नही है भक्त और सेवक को भी दासान्त नाम से सम्बोधन किया जाता है

नाम वैष्णवहेतुत्वम मुखमित्येतदुच्यते योजयेन्नाम दासान्तं भगवन्नामपूर्वकम् ।। ( पाराशरीय धर्मशास्त्र उत्तरखण्ड अध्याय 2 श्लोक 49 )
यह नाम संस्कार वैष्णव का मुख्य कारण कहा है इससे भगवन्नामपूर्वक दासान्त नाम सब का रखना चाहिए
और बृद्धहारित स्मृति में कहा है की
दद्यात्तन्नाम दासान्तं भगवन्नामपूर्वकम् (बृद्धहारित स्मृति)
आचार्य भगवन्नाम पूर्वक दासान्त नाम शिष्य के लिए दे ।
दासभुतमिदं तस्य ब्रह्माद्यम सकलंजगत् (पद्मपुराण उत्तरखण्ड ६ अध्याय २२६ श्लोक ९२)
परमात्मा के ब्रह्मादिक समस्त दास है । दास केवल शुद्रो को ही नही कहते सेवक को भी कहते है क्यों की अमरकोश में लिखा है कि
(दासः सेवकशूद्रयो ) अमरकोश
दास शब्द सेवक और शूद्र दोनों का वाचक है नाम संस्कार में दास नाम सेवक का ही ग्रहण होता है  ।

दासो ऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः । हनुमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः ।।( बाल्मीकि रामायण  ५.४३.९।। )
शुद्ध कर्म करने वाले कौशलयेन्द्र श्रीराम चन्द्र जी का मै सेवक हूँ सत्रुओं की सेना को मारनेवाला पवनसुत हनुमान हूँ ।
श्रीपद्मनाभ पुरुषोत्तम देहि दास्यम ( पाण्डवगी० श्लोक२५)
हे पद्मनाभ हे पुरुषोत्तम मेरे लिए आप अपनी दासता को दीजिये
दास्येन च गृहाण माम् (नारद प०)
अपनी दासता के लिए मुझे ग्रहण कीजिये ।
दासभूताःस्वतःसर्वे ह्यात्मन:परमात्मनः
नान्यथा लक्षणं तेषां बन्धे च मोक्ष विद्यते (पाराशर)
सब जीव निश्चय कर के परमात्मा के स्वतः सिद्ध दासः है उन जीवात्माओं के बन्धन या मोक्ष में कोई और लक्षण नही ।
दास्यमेव परं धर्म दास्यमेव परम् हितम दास्येनैव भवेन्मुक्तिरन्यथा निरयं वज्रेत ( हारित्स्मृति)
भागवत की दासता सर्वश्रेष्ठ धर्म है तथा दासता ही श्रेष्ठ हित है और दासता से ही मुक्ति होती है तथा भगवन की दासता न होने से जीव नरक को प्राप्त होता है ।
ब्रह्मशुत्र में लिखा है कि
ब्रह्मदासा ब्रह्मदासा ब्रह्मैवेमेकितवा ( ब्रह्मशुत्र)
जीव ब्रह्म का दास है  सेवक है और ये कितव है ।
और देखिये यजुर्वेद संहिता में लिखा है ।
यस्यायं विश्व आर्यो दासा (यजुर्वेद० अ ०३३० मण्डल०८२)
जिस परमात्मा के यह संसार और श्रेष्ठ ब्राह्मणादि दास है ।