Friday, 28 January 2022

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

 ‘नेताजी सुभाषचन्द्र बोस’ का नाम लेते ही एक ऐसी तेजोमयी मूर्ति दृश्यपटल पर अंकित हो जाती है, जिसे अपने प्यारे देश भारत को एक क्षण के लिए भी पराधीन देखना सहन नहीं था। भारत को विदेशी पाश से मुक्त करने की ऐसी छटपटाहट समकालीन किसी अन्य नेता में शायद ही देखने को मिले। सुभाष हर दृष्टि से अनूठे थे। अपनी विलक्षण कार्यपद्धति, कूटनीतिक चरित्र और साम-दान-दण्ड-भेद— सभी नीतियों का समुचित उपयोग करते हुए शत्रु को समूल नष्ट करने की उनकी भावना उनको अनन्य वीरता के दिव्य अवतार और भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के महानायक के रूप में खड़ा करती है, गाँधी और नेहरू उनके सामने क्या, दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते।


भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में सुभाष चन्द्र बोस किसी फि़ल्मी कथा के नायक के रूप में दिखाई देते हैं। जैसे वह विद्युत की तरह चमके और देदीप्यमान हुए और अचानक वह प्रकाश-पुंज कहीं लुप्त हो गया।


सन् 1939 में मो.क. गाँधी द्वारा ‘निजी हार’ मानने के बाद काँग्रेस से अलग होकर सुभाष ने आगामी छः वर्षों में क्या कुछ नहीं किया। अंग्रेज़ों को चकमा देकर कलकत्ता से गोमो, वहाँ से पेशावर, वहाँ से काबुल, फिर मास्को, वहाँ से बर्लिन जाकर उस युग के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर से मिलना, जर्मनी में ‘आज़ाद हिंद रेडियो’ की स्थापना करना; वहाँ से जापान और सिंगापुर जाकर आज़ाद हिंद फौज़ का गठन करना, सिंगापुर में आज़ाद हिंद फौज़ के सर्वोच्च सेनापति (सुप्रीम कमाण्डर) के रूप में स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार का गठन करना, खुद इस सरकार का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बनना, इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैण्ड द्वारा मान्यता देना; आज़ाद हिंद बैंक की स्थापना करके काग़ज़ी मुद्रा जारी करना; आज़ाद हिंद फौज़ का अंग्रेज़ों पर आक्रमण करके भारतीय प्रदेशों को अंग्रेज़ों से मुक्त कराना, फिर अचानक उस तेजपुंज का लोप हो जाना— यह सब एक स्वप्न की भाँति लगता है।


नेताजी सुभाष चन्द्र बोस-जैसे विलक्षण व्यक्तित्व कभी-कभी ही जन्म लेते हैं। उनके विषय में जितना कहा जाए, बहुत कम है। इतिहास की पुस्तकों में भी योजनाबद्ध रूप में गाँधी और नेहरू के अतिशय महिमामण्डन के बाद नेताजी को हमेशा तीसरे स्थान पर रखा जाता है, ताकि उनकी उज्ज्वल कीर्ति से देशवासी अनजान रहें। उनकी मृत्यु का विवरण भी देशवासियों से छिपाया गया है।


Thursday, 27 January 2022

स्वामी दयानन्द सरस्वती मत भञ्जन




स्वामी दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश जब लिखने बैठा था मानो वे भांग पी कर ही बैठा था ऐसा आप को भी विश्वास हो जाएगा सत्यार्थप्रकाश का स्क्रीनशॉट देख कर 

स्वामी दयानन्द अपने प्रथम समुल्लास के पृष्ठ संख्या  9 में  जो लिखा है वह उनकी  मूर्खता की पराकाष्ठा देखने को मिलता है ।

स्वामी दयानंद  कहते है की #ब्रह्मा_विष्णु_महादेव नामक पूर्वज विद्वान थे जो प्रब्रह्मपरमेश्वर की उपासना करते थे ||

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मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कभी भी ऋग वेदादि का मुख दर्शन भी न  किया हो यदि किया होता तो ऐसा कहने का दुःसाहस न करते ।

वेदो में स्पष्ट रूप से आया है कि जो इंद्र है वही ब्रह्मा है वही विष्णु है वही शिव है |


त्वम॑ग्न॒ इंद्रो॑ वृष॒भः स॒ताम॑सि॒ त्वं विष्णु॑रुरुगा॒यो न॑म॒स्यः॑ ।

त्वं ब्र॒ह्मा र॑यि॒विद्ब्र॑ह्मणस्पते॒ त्वं वि॑धर्तः सचसे॒ पुरं॑ध्या ॥(ऋ २/१/३)


त्वमिन्द्रस्त्वँ रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं ब्रह्म त्वं प्रजापतिः (तैत्तरीय आरणक्यम् )

 स ब्रह्मा स शिवः स हरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् (नृसिंहतापनि उपनिषद )


श्रीमद्भगवद्गीता में भगवन स्वयं कहते है 

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां (गीता)


उस परब्रह्म परमात्मा के दिब्य विभूतियों का अंत नही वही कार्यकारण रूप से ब्रह्मा ,विष्णु ,और शिव है ।

जिस कारण श्रुतियों में नेति नेति कह कर उस परब्रह्म परमात्मा के विभूतियों के अनन्त को दर्शाया है ||

सत्व ,रज:,तम: यह तीनों गुण प्रकृति के है एक परम पुरुष उक्त तीन गुणों से युक्त होकर इस विश्व की सृष्टि स्थिति एवं संहार हेतु  सत्व गुण से हरी: रजो गुण से ब्रह्मा,एवं तम गुण से हर संज्ञा को प्राप्त होते है ।

शैलेन्द्र सिंह

Friday, 14 January 2022

योद्धा जिनकी वजह से हम बचे है।

 योद्धा जिनकी वजह से हम बचे है।



नाम था #कुमारिल_भट्ट इनका जन्म पंडित यज्ञेश्वर भट्ट एवं माता चंद्रकना (यजुर्वेदी ब्राम्हण ) के घर हुवा, इनके जन्म स्थान और जन्म वर्ष को लेकर अलग-अलग मत है कुछ विद्वानों के अनुसार कुमारिल भट्ट का जन्म उत्तरभारत वर्तमान के आसाम राज्य में हुआ था तो कुछ के अनुसार मिथिला में हुआ था, तारानाथ के अनुसार कुमारिल भट्ट का जन्म दक्षिण भारत में ६३५ इसवी के पास हुआ था तो एक अन्य विद्वान् कृपुस्वामी की अनुसार इनका काल ६००- ६५० ईसवी के आस पास का है ।


      एक प्रख्यात मत के अनुसार काशी में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान एकदिन जब कुमारिल भट्ट भिक्षाटन के लिए निकले हुवे थे तब उनके सर पर कुछ ऊष्ण तरल की कुछ बुँदे गिरी जब उन्होंने ऊपर देखा तो एक स्त्री रो रही थी वह स्त्री कोई और नहीं बल्कि उस राज्य की रानी थी जो भगवान विष्णु की परम उपासक एवं वैदिक सनातन धर्म की अनुयायी थी। लेकिन राजा बौद्ध धर्म का अनुयायी था उस समय पूरा भारत बौद्धों की चपेट में यानि की पूरा बौद्धप्राय हो गया था नास्तिकता तेजी से बढ़ रही थी भारत देश विदेशी आक्रान्ताओं के लिए चारागाह बन गया था। राजा महाराजाओं का धर्म बौद्ध धर्म बन गया और प्रजा पर भी बिना उनकी इच्छा के बौद्ध धर्म को थोपा जा रहा था इसी से द्रवित होकर रानी रो रही थी जिसकी कुछ बुँदे कुमारिल भट्ट के सर  पर गिरी, जब कुमारिल भट्ट ने कारण पूछा तो रानी बोली “ किंकरोमिकगच्छामि    कोवेदानुद्ध्रिश्यती” अर्थात कहा जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा , कौन बचाएगा वैदिक धर्म ?यह सुनते ही विद्यार्थी कुमारिल भट्ट बोले “माँविषादबरारोहे ! भट्टाचारयोअस्मिभूतले”  अर्थात माँ विषद रहित रहो कुमारील भट्ट अभी इस भूतल पर है।


       इन बातों के बाद रानी ने कुमारिल भट्ट को आपने पास बुलाया और बौद्ध धर्म की अनेक कमियों के बारे में बताया लेकिन समस्या यह थी की कुमारिल भट्ट के पास बौद्ध धर्म के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी वे वैदिक धर्म के प्रकाण्ड पण्डित तथा पूर्णतया अनुयायी थे। उन्होंने वेद, शास्त्रों तथा उपनिषदों का गहन अध्ययन किया था। उनका विश्वास था कि वैदिक तथ्य ही मानव जीवन को ऊँचा उठाने में समर्थ हो सकता है। किंतु जनता के सामने अपनी बात कहने तथा उसे मनवाने से पूर्व यह आवश्यक था कि उस प्रभाव को मिटाया जाय तो बौद्ध धर्म के नास्तिक विचारधारा के रूप में जन मानस में छाया हुआ था। उन्होंने प्रतिज्ञा की, कि - चाहे जो कठिनाई मेरा मार्ग अवरुद्ध करे- मैं वैदिक मान्यताओं का प्रचार प्रसार करने में कुछ भी कमी न रखूँगा।


      लेकिन इस मार्ग में सबसे बड़ी कठिनाई बौद्ध धर्मानुयायियों से शास्त्राथ करने से पहले स्वयं को बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन न होना था। अतः इसके लिए कुमारिल भट्ट ने प्रतिज्ञा ली की सबसे पहले बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन करेंगे इसके लिए वह उस समय के सबसे प्रख्यात विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और पूरे पाँच वर्षों तक बौद्ध धर्म का क्रमबद्ध व विशद् अध्ययन किया। जब शिक्षा पूर्ण हो गई तो चलने का अवसर आया। इस समय की प्रथा के अनुसार बौद्ध विश्वविद्यालयों के स्नातकों की यह प्रतिज्ञा करनी होती थी कि -” कि मैं आजीवन बौद्ध धर्म का प्रचार व प्रसार करूंगा तथा धर्म के प्रति आस्था रहूँगा।


लेकिन एक वैदिक ब्राम्हण के लिए झूठी प्रतिज्ञा मृत्यु के सामान होती है अतः कुमारिल भट्ट के सामने पुनः पहले से बड़ी समस्या आकर खड़ी  हो गयी, समस्या बड़ी ही गम्भीर तथा उलझनमय थी। करना तो था उन्हें वैदिक धर्म का प्रचार और बौद्ध धर्म का अध्ययन तो उन्होंने उनकी ही जड़े काटने के लिए किया था। झूठी प्रतिज्ञा का मतलब था कि गुरु के प्रति विश्वासघात तथा वचनभंग अतः आपत्ति धर्म के रूप में उन्होंने प्रतिज्ञा ली और बौद्ध धर्म का अपार ज्ञान लेकर वहाँ से चल दिये। लौटकर उन्होंने वैदिक धर्म का धुँआधार प्रचार करना शुरू कर दिया। जन जन तक वेदों का दिव्य संदेश पहुँचाया। फिर जहाँ भी विरोध की परिस्थिति उत्पन्न हुई वहाँ पर उन्होंने बौद्ध मान्यताओं का खण्डन किया। अपने गहन अध्ययन के आधार पर चुन चुन कर एक एक भ्रान्त बौद्ध मान्यता और वैदिक तथ्यों द्वारा काटा। बौद्ध मतावलम्बियों को खुला आमंत्रण दिया। शास्त्रार्थ के लिए बड़े से बड़े विद्वानों को अपने अगाध ज्ञान और विशद अध्ययन के आधार पर धर्म संबंधी विश्लेषणों तथा वाद विवादों में धराशायी किया। दिग्भ्रान्त जनता को नया मार्ग,नया प्रकाश और नयी प्रेरणाएँ दी।समस्त विज्ञ और प्रज्ञ समाज में यह साबित कर दिया कि वैदिक धर्म के प्रचार में उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया।


इस मध्य ही कुमारिल ने बौद्ध मत के खंडन के लिए सात ग्रंथों की रचना कर डाली और शिष्यों की एक विशाल मंडली खड़ी कर डाली। पुरे क्षेत्र में इनके नाम की चर्चा होने लगी और बौद्ध विद्वानों में हाहाकार मच गया वह कुमारिल भट्ट के नाम से ही घबराने लगे। जब यह घटनाएँ राजा तक पहुंची तो राजा कुमारिल भट्ट से मिलने के इच्छुक हुवे अवसर पाकर कुमारिल भट्ट भी राजा के यहाँ पहुंचे। यहाँ राजा की इच्छा के अनुसार विशाल सभा का आयोजन हुआ जिसमें शास्त्रार्थ होआ निर्धारित हुवाजिसमे एक तरफ बौद्ध विद्वानों की सेना दूसरी तरफ कुमारिल भट्ट और उनके शिष्यों की फ़ौज पूरा सभा स्थल दर्शकों एवं श्रोताओं से भरा हुआ शास्त्रार्थ की सुरुवात हुयी तर्क सुरु हुवे कुमारिल जी वेदों के साथ बौद्ध धर्म के भी ज्ञाता अतः बौद्ध धर्माचार्यों की एक न चलने दी। तभी सभास्थल के समीप एक वृक्ष पर कोयल कूक उठी उसी समय कुमारिल भट्ट ने एक श्लोक कहा जिसका अर्थ है  “अरे  कोयल  ! मलिन  , नीच  और श्रुति  –दूषक  काक  – कुल  से यदि  तेरा   सम्बन्ध  न हो, तो तु वास्तव  में प्रशंसा  के योग्य  है” यह व्यंग राजा और बौद्धों के लिए था राजा के लिए यूँ  कि ” हे राजन  ! मलिन  , नीच और वेद निंदक  लोगों  से यदि  तेरा  सम्बन्ध  न हो ,तो तू अवश्य ही प्रशंसा  के योग्य  है”। इस व्यंग्य  का मुख्य आशय  तो बोद्धों के लिए था  , इस कारण वह मन ही मन कुमारिल पर बहुत  चिढ़े ।


बौद्धों के वेद विरुद्ध  तर्कों  का कुमारिल ने खंडन किया तथा अपने पांडित्य  का प्रदर्शन  करते हुए वेदों की सभ्यता ,सत्यता,न्याय  प्रियता  ,सद्गुण , कर्मवाद , कर्मफल , उपासना ,मुक्ति  तथा व्यक्तित्व वाद आदि को इस उत्तमता  से सिद्ध  किया कि  प्रत्येक  व्यक्ति  को वेद की विमल  मूर्ति  के  दर्शन होने लगे। राजा सहित  सब लोग  कुमारिल की विद्वता  पर मोहित हो गए। सब ने स्वीकार  किया कि वेद ही मानवता  का सर्वोच्च व दिव्य   ज्ञान है। यह भी सिद्ध  हो गया की बौद्ध ज्ञान व सिद्धांत  सर्वथा  भ्रामक, भ्रान्ति  मूलक   व  अनिष्टकारी  हैं। इस से सब  संतुष्ट  हुए  और बोद्धों पर  धिक्कारें  व लानतें  पड़ने  से वह अपना मुंह  लटकाए   सभा  से चले  गए। इसके बाद वेद का ज्ञान  और यज्ञ कर्म पुनः सुरु हुवे और तेजी से बढ़ने लगे लेकिन कुमारिल भट्ट इतने में कहाँ संतुष्ट होने वाले थे उन्होंने तो बौद्धों का जड़ सहित समाप्त करने का संकल्प लिया था अतः वह अपने जैसे अनेक शिष्यबनाने सुरु किये।


लेकिन एक चिंता उन्हें सदैव सताती रहती थी, वह थी गुरुकुल में ली हुयी झूठी प्रतिज्ञा और गुरु से किया हुआ द्रोह अतः उन्होंने इसका प्रायश्चित करने का निर्णय लिया और शाश्त्रों में गुरुद्रोह की प्रायश्चित की सजा क्या होती है पढ़ा,जिसके अनुसार उन्होंने तुषानल (भूषे/धान के छिलके की आग) में देह त्यागने का निर्णय लिया जो की जलती नही अपितु सुलगती है और स्वयम को इसके लिए तैयार किया।तुषाग्नि में प्रवेश के लिए उन्होंने प्रयाग का चुनाव किया वर्तमान में यह स्थान झूंसी में है।


इस प्रायश्चित के हृदय स्पर्शी दृश्य को देखने देश के बड़े बड़े विद्वान आये थे । उनमें आदि शंकराचार्य भी थे। उन्होंने समझाया भी, कि आपको तो लोक हित के लिए वैसा करना पड़ा है। आपने स्वार्थ के लिए तो वैसा नहीं किया है । अतः इस प्रकार भयंकर प्रायश्चित मत कीजिए। लेकिन कुमारिल भट्ट ने मंद मंद मुस्कुराते हुवे उत्तर दिया “माना की मैंने धर्म की रक्षा एवं प्रचार के लिए ऐसा किया था लेकिन इस प्रकार की परमपरा का चलन नहीं होना चाहिए। हो सकता है की कोई मेरे मन की बात को न समझ के केवल ऊपरी बात का ही अनुकरण करने लग जाये। अगर ऐसा हुआ तो धर्म और सदाचार नष्ट ही हो जायेगा और तब इससे प्राप्त लाभ का कोई मोल नहीं रह जायेगा” अतः मेरा प्रायश्चित करना सर्वथा उचित है । उनके यह वाक्य कुमारील भट्ट की महानता को कई गुना बढ़ा देते हैं ।


इन्ही वाक्यों के साथ कुमारिल भट्ट तुषानल की अग्नि में प्रवेश कर गए। कहा जाता है की अदि शंकराचार्य द्वरा लिखित ग्रन्थ विद्वत समाज तब तक स्वीकार नहीं करेगा जब तक कुमारिल भट्ट उस पर टिपण्णी न कर दें लेकिन जब आदि शंकराचार्य उनके पास पहुंचे तब उनके पैर झुलस चुके थे अतः उन्होंने विधि का विधान न बदलते हुवे शंकराचार्य जी के शास्त्रार्थ के निवेदन पर कहा की मेरा शिष्य मंडल मिश्र भी मेरे सामान ज्ञानी है उससे शास्त्रार्थ करो मंडल मिश्र के साथ किया गया शास्त्रार्थ मेरे साथ किये गए शास्त्रार्थ के सामान ही माना जायेगा।

  इसी तरह वैदिक-सनातन धर्म के लिये हजारो-लाखो योद्धाओ ने अपना बलिदान किया है,धार्मिक नियमों की स्थापना की है तब जाकर आप अपने पूर्वजो के दिए नाम, थाती,संस्कृति, पूजा पद्धतियों,जीवन प्रणाली, राष्ट्रनूभूति के साथ बचे हैं नही तो आज बचे 198 देशो की तरह इस्लामी या ईसाई रूप में बदल चुके होते। ।


० शैलेन्द्र सिंह ०

Tuesday, 14 December 2021

#निरंकारी_मत_भञ्जन


निरंकारी_मत_भञ्जन

#निरंकारी_भक्त :-- हम मनुष्यो को भगवान का स्वरूप मानते है और तुम लोग मनुष्य के बनाये हुए मूर्ति में ।

#प्रमोद_कुमार :--- यदि निरंकारी कथनानुसार माने तो हमे हत्यारा,चोर,डांकु, ब्यभिचारी,बलात्कारी,मिथ्यावादी,,दुष्टाचारी,आचरण वाले मनुष्य को भी  भगवान मानना पड़ेगा     दुनिया मे ऐसा कोई सांसारिक ब्यक्ति सायद ही मीले जो 24 घण्टे अथवा एक सप्ताह अथवा एक माह अथवा पूरे वर्ष मिथ्या न कहता हो अथवा धार्मिक ,सामाजिक रूप से ऐसा कोई कार्य न करता हो जो धर्म विरुद्ध न हो ?
यदि मैं आप से पूछूँ की  क्या भगवन निर्दयी,चोर,हत्यारा,मिथ्यावादी आदि आदि भी हो सकता है क्या ??तो आपका स्प्ष्ट उत्तर होगा नही नही ऐसा कैसे हो सकता है भगवन तो समस्त पापों से अलिप्त सभी का कल्याण करने वाला होता है । तो इससे तो अच्छा है कि हम श्रीहरि: के विग्रह में ही भगवान की कल्पना क्यो न करे विग्रह तो इन समस्त दोषो से रहित होता है कम से कम आप इस पाप से तो बच जाएंगे कि चोर,डांकु, बलात्कारी ,ब्यभिचारी में आप को भगवान न देखना पड़े अत्याचारी को अत्याचारी के रूप में देखो ।
भगवत् शब्द ही अनादि अक्षय परमात्मा का वाचक है
शास्त्रों में भगवान का लक्षण षड्ऐश्वर्य सम्पन्न बताया गया है जो कि इस कलिकाल में असम्भव जान पड़ता है ।
समस्त ऐश्वर्य ,धर्म,यश,श्री,ज्ञान,और,वैराग्य, इन छ: गुणों को धारण करने वाला ही भगवत् शब्द से वाच्य है अब बिचार करिए कि क्या  इस कलिकाल में मनुष्य इनसब गुणों को धारण करने वाला हो  सकता है ??

स्वयं निरंकारी प्रमुख हरदेवसिंह भी  इन छ: लक्षणों को धारण करने।वाला नही हो सकता  क्यो की वे इन लक्षणों से रहित एक साधारण मनुष्य तथा सनातन धर्मद्रोही रहा तभी तो काल के हाथों से कार एक्सीडेंट में मारा गया ? और वह भी काल के हाथों  मलेच्छ देश मे  मारा गया ।
उसे तो यह  पुण्य  भूमि  भारत भी नसीब न हो सका समस्त शाश्त्रो में भारत को देवताओ का नगरी माना गया है फिर भी हरदेव सिंह जी को यह पुण्य भूमि नसीब नही हुआ क्यो ??
क्यो की उसका कार्य ही धर्मविरुद्ध रहा इस लिए उसे यह पाप तो भोगना ही पड़ा ।

#ऐश्वर्य्यस्य_समग्रस्य_धर्म्मस्य_यशसः_श्रियः
#ज्ञान_वैराग्ययोश्चैव_षण्णां_भग_इतीङ्गना ।(विष्णु पुराण)


शैलेन्द्र सिंह

Saturday, 11 December 2021

जाति जन्मना अथवा कर्मणा




ब्राह्मणत्वादि जाति जन्म के अनुसार है, गुण के अनुसार नहीं है, यह प्रत्यक्ष सिद्ध है । शास्त्रकारों के अनुसार गोत्व आदि जाति के समान ब्राह्मणत्वादि जाति भी प्रत्यक्षगम्य एवं जन्मगत है ।

 यदि ब्राह्मणत्वादि जाति को जन्मगत नहीं माना जाय तब दृष्टविरोध, शास्त्रविरोध, अन्योs-न्याश्रय, अव्यवस्था एवं एक साथ वृत्तिद्वय-विरोध आदि अनेक दोषों की सम्भावना है ।

ब्राह्मणत्वादि जाति जन्मगत है, यह प्रत्यक्षगम्य होने से उसका अपलाप करने पर दृष्ट-विरोध होगा । "अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयीत'

आठ वर्ष के ब्राह्मण पुत्र को ब्राह्मण कह कर  उल्लेख किया गया है । यदि जन्मगत जाति न मानी जाय तो इसकी असङ्गति होगी

कारण, आठ वर्ष के बालकों में साधारणतया ब्राह्मणोचित किसी भी गुण की अभिव्यक्ति

नहीं होती है । क्षत्रिय एवं वैश्य के प्रसङ्ग में भी इसी प्रकार उपनयन को अवस्था का

निर्णय किया गया है । यदि जाति को जनम्मगत नहीं माना जाय तो इन शास्त्रवचनों के साथ विरोध होगा । ब्राह्मणत्वादि जाति का आचार से जन्म मानने पर अन्योsन्याश्रयदोष होगा, क्योंकि, जहाँ चारों वर्णों के आचारके विषय में उपदेश दिया गया है, वहाँ ब्राह्मणत्व जाति का परिचय देना शास्त्र का उद्देश्य नहीं था, किन्तु, आचार के

विधान में ही शास्त्र का तात्पर्य है | अतः, जो व्यक्ति ऐसे आचार से सम्पन्न है, वह ब्राह्मण है, इसमें शास्त्र का तात्पर्य नहीं है । क्योंकि धर्म के प्रतिपादन करने में हीशास्त्र का उद्देश्य है । ऐसी स्थिति में वैसा आचार करने पर ब्राह्मण होगा, और

ब्राह्मणत्व पूर्व से सिद्ध रहने पर ही वे आचार अनुष्ठेय होंगे, इस प्रकार वाहमणत्व एवं

आचार दोनों की उत्पत्ति परस्पर सापेक्ष होने से अन्योsन्याश्रय दोष है, क्योंकि,ब्राह्मणत्व आदि पूर्व से सिद्ध न रहे तो उसको उद्देश्य कर किसी आचार का विधान सम्भव ही नहीं है । जाति को जन्मगत न कहकर आचार जन्य मानने पर अव्यवस्था भी होगी, क्योंकि, एक ही व्यक्ति कमी सदाचार करता है एवं कभी दुराचार या कदाचार

करता है, अतः, सदाचार के समय वह ब्राह्मण और दूसरे ही क्षण कदाचार करने के

समय शूद्र होगा । इस प्रकार एकही व्यक्ति में ब्राह्मणत्वादि कभी भी व्यवस्थित नहीं

रहेगा, पुनः पुनः जाति का परिवर्तन होगा । ऐसी स्थिति में वह बराह्मण है या ब्राह्मणेतर

इसका प्रमाण देना संसार में दुर्लभ हो जायगा । फलतः, शास्त्रीय विधि के अनुष्ठान का

लोप हो जायेगा । इस प्रकार युगपत् वृत्तिद्वयका विरोध भी होगा, कारण, एकही व्यक्ति

एकही प्रयत्न से ऐसा काम कर सकता है कि जिसके फल स्वरूप किसी का अनिष्ट और किसी का इष्ट होगा ! इससे युगपत् परपीड़ा और परानुग्रह करने से उनमे शूद्रत्व एवं ब्रह्मणत्व दो विरुद्ध जातियों का एक साथ समावेश होगा । इत्यादि |

पूर्वप्रसङ्ग में जाति की दुर्जानता को लक्ष्य कर "नचेतद् विद्भुः" इत्यादि वाक्य में

उस विषय का अज्ञान कहा गया है । जाति दु्जेय है, कारण, गोत्वादि जाति के प्रत्यक्ष

में जैसे अनेक इतिकर्त व्यता या सहकारी रहते है, वैसे ही ब्राह्मणत्वादि जाति के प्रत्यक्ष

में भी उत्पादन कर्ता की जाति का स्मरण करना इतिकर्तव्यता या सहकारी है ।

उत्पादक कौन है, इसको जननी को छोड़कर कोई भी नहीं कह सकता हैं | स्त्रियों में

दुश्वरित्रा भी रहती हैं । इसलिए, पति ही सभी पुत्रों का जनक है, यह भी नहीं कहा जा

सकता है । क्योंकि, जारज रमणी जार से पुत्र की उत्पत्ति कर सकती है । पिता एवं माता की समान जातीयता ही जाति की विशुद्धि का कारण है, अन्यथा माता अन्य जाति

का और पिता दूसरा जाति का होने पर पुत्र की जाति अश्वतर के समान सङ्कर हो जायेगी। इस प्रकार वर्णसङ्करता जिससे न हो इसी लिए श्रुति कह रही है कि

"अप्रमत्ता रक्षत तन्तुमेनम्" हे रमणियो ? तुम सब असावधान न होकर अर्थात् यत्न-पूर्वक इस जाति तंतु की रक्षा करो क्यो की जाति का आश्रय स्वरूप ब्यक्ति का आसाङ्कर्य  यत् शुद्ध वर्ण तुम्हारे ही अधीन है इस प्रकार श्रुतियाँ स्त्रियों को ब्यभिचारिता रूप अपराध को जाति उच्छेद का कारण कह रही है अन्यथा जातितन्तु पितृपरम्परा क्रम से सनातन होने से निश्चित है

Saturday, 13 November 2021

रावणवध एवं श्रीरामचन्द्रराज्यभिषेख शंकासमाधान

 




आक्षेपकर्ता ने जो श्लोक उपदृष्ट किया है वह मैं आप सभी के सामने रख रहा हूँ एवमं स्क्रीन शॉट में भी रेखांकित किया हूँ 

आक्षेपकर्ता ने इस श्लोक के माध्यम से रावण वध का प्रकरण और श्रीरामचन्द्र का राज्यभिषेख दिखलाया है 

👇👇👇

(1)   अभ्युत्थानं त्वमद्यैव कृष्णपक्षचतुर्दशीम् । 

        कृत्वा निर्याह्यमावास्यां विजयाय बलैर्वृतः ।। ६.९२.६५


(2)     पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः । 

         भरद्वाजश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ।। १२४/६/१

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यह विचारणीय है कि यहाँ प्रकरण क्या है और यह वाक्य किनका कहा हुआ है 

यहाँ आक्षेपकर्ता ने पूरा का पूरा प्रकरण ही उलट दिया है अयोध्या कांड सर्ग ९२ में लक्ष्मण द्वारा इंद्रजित का वध होता है इस सर्ग का प्रथम श्लोक ही इंद्रजित के वध की पुष्टि करता है 


#ततः_पौलस्त्यसचिवाः_श्रुत्वा_चेन्द्रजीतो_वधम् (वा0रा0 ६/९२/१)


इंद्रजीत के वध हो जाने का समाचार सुनते ही रावण क्रोध के वशीभूत हो सीता को मारने के लिए दौड़ता है परन्तु रावण के मन्त्री रावण को ऐसा करने से रोकता है और कहता है कि आज कृष्णपक्ष की चतुर्दशी है अतः आज ही युद्ध की तैयारी कर के कल अमावस्या के दिन सेना को लेकर विजय के लिए प्रस्थान करो ।

इस प्रकरण को इस धूर्त ने पूरा का पूरा ही उलट दिया है ताकि लोग भ्रामित हो सके ।

यह तो रहा श्लोक 1 के आक्षेप का समाधान 

अब दूसरे श्लोक पर बिचार करें |

दूसरा श्लोक रावण का वध कर पुष्पक विमान से श्रीरामचन्द्र जब अयोध्या के लिए प्रस्थान करते है तो भारद्वाज मुनि के आश्रम में रुक कर वहाँ यह प्रसंग कहते है 14 वर्षो का वनवास मेरा पूर्ण हो चुका है अतः अतिशिघ्र मुझे अयोध्या जाना है 

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अब आते है राक्षसराज रावण का वध और श्रीरामचन्द्र जी का राज्यभिषेख बिषय शंका निवारण 

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महाभारत में जिस प्रकार पाण्डवो का 13 वर्ष वनवास अधिक मास को लेकर जोड़ा गया था यह बिराट पर्व के भीष्मवाक्य से सिद्ध है इसी तरह श्रीरामचन्द्र जी का 14 वर्ष का वनवास भी अधिकमास को लेकर ही पूरा हुआ था इस तरह अमान्त मान से कृष्णचतुर्दशी में पुर्णिमान्त मान से कार्तिक कृष्ण षष्ठी में १४ वर्षो की पूर्ति होती है अन्यथा चैत्रमास की शुक्ल दशमी के आरम्भ होकर १४ वर्ष की समाप्ति षष्ठी को नही रह सकती थी परन्तु अधिकमास की गड़ना से ११ दिन कम छः मास की वृद्धि हो जाती तभी १४ वर्ष की पूर्ति षष्ठी को हो सकती है अतः १२ वर्ष के पूरे होने पर १३ वे वर्ष के कुछ समय बीतने पर फाल्गुन अष्टमी को सीता हरण हुआ था १४ वे वर्ष के कुछ दिन बीतने पर श्रीराम जी लङ्का के समीप पहुंचे  थे|


#वर्तते_दशमो_मासो_द्वौ_तु_शेषौ_प्लवङ्गम (वा0 रा0 ५/३७/८)


#दर्शयामास_वैदेह्याः_स्वरूपमरिमर्दनः(वा0रा ५/३७/३३)


इस सितोक्ति के अनुसार सावन मान से सव्हरण दिन से १० मास बीत चुकने पर सीता हनुमान का सम्वाद हुआ था #पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता 

इस रामोक्ति के अनुसार पौष शुक्ल के चतुर्दशी या पूर्णिमा को श्रीरामजी त्रिकुट के शिखर पर आयें थे |


हनुमान का लङ्का में प्रवेश काल :-


#हिमव्यपायेन_च_शितरश्मीरभ्युत्थितो_नैकसहस्त्ररश्मि:(वा0रा ५/१६/३१)

#द्वौ_मासो_रक्षितव्यौ_मे_योSवाधिस्ते_मया_कृत: (वा0 रा0 ५/२०/८)

इन वाक्यो से प्रतीत होता है कि हनुमान जब लङ्का में प्रवेश किया था तब शरद ऋतु का आगमन हो चुका था मार्गशीर्ष दशमी के बाद ही हनुमान का लङ्का मे प्रवेश का स्पष्ट प्रमाण है

अन्यत्र मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को राम को प्रस्थान कहा गया है पौषपूर्णिमा को राम त्रिकुट आये थे उसके १५ दिन सेनानिवेस दूतप्रेषण आदि में बीत गयें तब युद्ध आरम्भ हुआ तब से लेकर श्रावण अभय अमान्त पर्यंत लङ्कापुर के बाहर दोनों दोनों सेनाओ का युद्ध हुआ ।

इंद्रजीत वध अनन्तर यह कहा गया है की तुम आज कृष्पक्ष चतुर्दशी अभ्युत्थान करके अमावस्या में ही शत्रुबिजय के लिए गमन करो ।

इंद्रजीत का वध तीन दिनों में हुआ था दशमी के चौथे प्रहर से लेकर त्रयोदशी के चौथे प्रहर के अवधि में इंद्रजीत का वध हुआ था |

रावण का निर्गमन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था 

उसके बाद ही रावण वध और इसके अनन्तर आदित्य को स्थिरप्रभ होना कहा गया है इससे प्रतीत होता है कि रावण का वध दिन में ही हुआ


इसी पक्ष का समर्थन कालिका पुराण से होता है ।


रामस्यानुग्रहार्थाय रावणस्य वधाय च।। 


रात्रावेव महादेवी ब्रह्मणा बोधिता पुरा।

ततस्तु त्यक्तनिद्रा सा नन्दायामाश्विने सिते।। 


जगाम नगरीं लङ्कां यत्रासीद्राघवः पुरा।

तत्र गत्वा महादेवी तदा तौ रामरावणौ।। 


युद्धं नियोजयामास स्वयमन्तर्हिताम्बिका।

रक्षसां वानराणां च जग्ध्वा सा मांसशोणिते ।। 


रामरावणयोर्युद्धं सप्ताहं सा न्ययोजयत्।

व्यतीते सप्तमे रात्रौ नव्यां रावणं ततः।। 


रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी।

यावत्तयोः स्वयं देवी युद्धकेलिमुदैक्षत।। 


तावत् तु सप्तरात्राणि सैव देवैः सुपूजिता।


निहते रावणे वीरे नवम्यां सकलैः सुरैः।। 

विशेषपूजां दुर्गायाश्चक्रे लोकपितामहः।


राम के अनुग्रहार्थ और रावण के वधार्थ ब्रह्मा द्वारा प्रबोधित देवी लङ्का में आयी और सात दिन तक राम रावण का युद्ध हुआ नवमी के दिन राम ने रावण का वध किया सब देवताओ तथा ब्रह्मा द्वारा ८ दिन तक दुर्गा पाठ होती रही ।

ऐसे रावण का वध का स्पष्ट प्रमाण इतिहास पुराणादि में आश्विन मास के शुक्लपक्ष नवमी ही ठहरता है न कि फाल्गुन मास ??

सर्ग १२३ के अंत मे पुष्पक द्वारा अयोध्या के पास पहुंचने का उल्लेख किया गया है किन्तु सर्ग १२४ में वनवास की समाप्ति पर श्रीरामचन्द्र का भारद्वाज मुनि के आश्रम में पहुचने का उल्लेख है 

पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः । 

भरद्वाजश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ।।


 लङ्का में राम  ने बीभीषण से दुर्गम मार्ग का उल्लेख किया था भारद्वाज आश्रम में राम ने मुनि से यह वरदान मांगा था कि मार्ग में सभी बृक्ष अकाल मे फलदार हो यहाँ श्रीरामचन्द्र जी को यह वरदान वानरों के लिए मांगा था 

आक्षेपकर्ता के अनुसार यदि पदयात्र होती तो लङ्का से अयोध्या पहुंचने में कम से कम एक मास का समय अपेक्षित होता इस प्रसंग में स्पष्ट ही पुष्पक यात्रा की संगति होती है ||

वनवास की अवधि पूर्ण होने पर भारद्वाज मुनि के आश्रम में ही कपिश्रेष्ठ हनुमान को आज्ञा देते है कि वानरराज हनुमान तुम अतिशिघ्र अयोध्या का समाचार लो कि वहाँ सब कुशल मंगल तो है न और वहाँ राजा भरत को मेरे आगमन की सूचना दो ।

श्रीरामचन्द्र जी का अयोध्या आगमन कार्तिक मास ही ठहरता है चैत्र मास नही ।

अध्याय ३  चैत्रमास के  शुक्लपक्ष के षष्ठी तिथि को श्रीराम चन्द्र का राज्यभिषेख होने वाला था जिसका उल्लेख अयोध्या पर्व में देखने को मिलता है परन्तु कैकयी के जिद के कारण  श्रीरामचन्द्र को वनवास जाना पड़ा आक्षेपकर्ता ने इस हिसाब से 14 वर्ष चैत्र मास ही माना जबकि सनातन वैदिक धर्म मे मलमास की भी गड़ना होती है इसका भान आक्षेपकर्ता को था अथवा नही था यह तो आक्षेपकर्ता ही जाने जिस कारण आक्षेपकर्ता ने श्रीरामचन्द्र जी के राज्यभिषेख को चैत्र मास बता डाला 

|| जय श्रीराम ||

शैलेन्द्र सिंह

Sunday, 3 October 2021

कन्यादान




भारतीय परम्परा में वेद सनातन और अपौरुषेय हैं। वेद विश्व का प्रथम प्रकाश है, इसे विश्वमनीषा ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया है। 

सनातन संस्कृति व संस्कार  ईश्वरमूला होने से सद्मूला है, चिद्मूला है, आनन्दमूला है,


संस्कार का अर्थ है सजाना-संवारना, पूर्णता प्रदान करना।  इसके लिए उसके अन्दर दिव्य गुणों का आधान किया जाता है। 

 इसमें मुख्य 16 संस्कार हैं जिसके द्वारा मानव के

मूल दिव्य, परिपूर्ण स्वरूप को प्रकट करने की चेष्टा की जाती है और यह संस्कार

परम्परा गर्भाधान से प्रारम्भ हो जाती है और अन्त्येष्टि तक चलती है। यानी जीव

के आने के पूर्व से प्रारम्भ होकर जीव के जाने के बाद तक चलती है। गर्भाधान्

के द्वारा हम दिव्य आत्मा का आह्वान करते हैं, बुलाते हैं तो उसको बैठाने के

लिए स्थान शुद्धि, भावशुद्धि चाहिए। हम जहां- तहां , जैसे-तैसे नहीं बैठते। स्थान

को शुद्ध कर आसन लगाकर बैठते हैं। गर्भाधान द्वारा हम दिव्यात्मा-पुण्यात्मा

को

बुला

रहे हैं तो उसके लिए उपयुक्त शुद्धि भी चाहिए। फिर जाने के बाद.यह


संस्कार देते हैं कि कपाल भेदन करके जाना चाहिए था। अन्य मार्ग से गमन 

आने-जाने का क्रम बना रहेगा। इस प्रकार गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक, सूर्योदय

से सूर्यास्त तक, लोक से परलोक तक हमारे जीवन का कोई भी क्षण, कोई भी

कण और कोई भी कर्म धर्म से रहित, संस्कार से रहित नहीं है। धर्म व संस्कार

हमारे जीवन का केन्द्र-बिन्दु है, प्राण-बिन्दु है जिससे हमारा समग्र व्यक्तिजीवन,

परिवार जीवन, समाज जीवन, राष्ट्र जीवन, विश्व जीवन संचालित है। धर्म या

संस्कार से बाहर कुछ भी नहीं है।

इस प्रकार मानव मन का परिष्कार करने, शोधन करने, पूर्णता प्रदान करने

वाले जितने भाव एवं कार्य हैं, वह संस्कार कहलाते हैं। इन्हीं संस्कारों की दिव्य

परम्परा को संस्कृति कहते हैं। इस दृष्टि से संस्कृति का अर्थ श्रेष्ठतम कृति से भी

होता है। जो मनुष्य को ऊंचा उठाये वह संस्कृति है, जो नीचे गिराये वह विकृति

है। इस प्रकार श्रेष्ठकृति या सम्यक् कृति को भी संस्कृति कहते हैं। संस्कृति जीवन

का सार है, जीवन का तात्पर्य है, जीवन के आदर्शों का विकास है, जीवन के

मूल्यों का विकास है। अत: संस्कृति जीवन के मूल्यों की, जीवन के आदर्शों की

सतत साधना है जो मानव को मानवजीवन का मूल्य प्रदान करती है तथा जिसकी

रक्षा हेतु भारतीय वीरों ने, महापुरुषों ने अपना जीवन हंसते- हंसते उत्सर्ग कर दिया।

वे जीवनमूल्य हैं स्वतंत्रता, समानता, बंधुता आदि।

अत: मानव के सर्वोच्च विकास के लिए जो जीवनमूल्य सर्वाधिक महत्त्व

के हैं उनकी एक क्रमबद्ध व्यवस्थित परम्परा ही संस्कृति है। इस दृष्टि से भारतीय

मनीषियों ने चार जीवनमूल्य, आदर्श या पुरुषार्थ रखे जिसके अन्दर अन्य सारे

जीवनमूल्य समाविष्ट हो जाते हैं। इन 16 संस्कारों में एक संस्कार पाणिग्रहण (विवाह संस्कार) भी है जिसमें पिता अपनी लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री को विष्णु स्वरूपा वर को कन्यादान करता है ।


■- लक्ष्मीरूपामिमां कन्यां प्रददेविष्णुरूपिणे । तुल्यं चोदकपूर्वा तां पितॄणां तारणाय च ॥(लघुआश्वाल्यनस्मृति,१५,२६)


■-महर्षि मनु कहते है  

वेदज्ञ शुशील वर को बुला कर  उसका पूजन सत्कार कर कन्यादान करें ।

■- आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतशीलवते स्वयम् ।

आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः (३/२७)


अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रामक वामी कामी गैंग दान शब्द का अर्थ अनर्थ के रूप में लेते है वे कहते है दान हेय वस्तुओ का की जाती है ।

तो इन धूर्तो से यह प्रश्न करना आवश्यक हो जाता है कि विद्या दान जो कि 

समस्त पाप कर्मों को भस्मीभूत करने वाले मोक्ष की गति प्रदान करने वाले विद्या क्या कोई हेय वस्तु है जो एक आचार्य अपने शिष्य को विद्यादान कर नर से नरत्व ,नरत्व से देवत्व ,देवत्व से ब्रह्मत्व तक कि प्राप्ति का साधन है 


■ दान शब्द का अर्थ :--


स्वस्वत्व नीवृत्ती पूर्वक परस्वत्त्वापादनं दानम् दान शब्द का यह यर्थ कहा गया है अर्थात जिस द्रब्य में अपना स्वत्व अधिकार है उसको त्याग कर इतर अन्य के स्वत्व अधिकार का अपादान करना दान है जैसे की ब्राह्मणाय गां ददाति यहां गो द्रब्य में विद्यमान अपने अधिकार को छुड़ा कर उसमें ब्राह्मण का अधिकार बना दिया जाता है इस प्रकार दान दिए हुए गो द्रब्य में दाता मेरी गाय है ऐसा व्यवहार नही कर सकता  अर्थात उस गो द्रब्य को जिसने प्रतिग्रह किया उस ब्राह्मण का अधिकार हो जाता है दाता दान दी हुई गौ के दुग्ध का पान नही कर सकता यह स्थिति गौ दान में देखी जाती है ।

कन्या दान इसमें कुछ वैलक्षण्य है 

अपने स्वत्वाधिकार की नीवृत्ति होने पर भी मेरी कन्या यह व्यवहार विद्यमान है अतएव गोदानादि लेनेवाला पतिग्रहीता कहलाता है किंतु कन्या दान लेनेवाला परिग्रहिता कहलाता पतिग्रह और परिग्रह शब्द में भेद कहा जा चुका है पारस्कराचार्य ने गृहीत्वा शब्द का प्रयोग किया है प्रत्तामादाय निष्क्रमती इतना कहने से ही कार्य सम्पन्न हो जाता है किन्तु 

प्रत्तामादाय गृहीत्वा निष्क्रमती में अदाय शब्द गौण दान का बोधक है इस प्रकार तात्पर्य कल्पना में गृहीत्वा पद तात्पर्य बोधक माना जाता है इस यर्थ कि पुष्टि कविकुल तिलक कालिदास भी करते है ।


अर्थो हि कन्या परकीय एव  तामद्यसंप्रेष्य परिग्रहीतु: .

जातो ममायं विशद: प्रकामं  प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ।।

कन्या अपने पिता के लिए धरोहर है वह न्यास रूप से अपने अपने द्रब्य को रखता है अतः परकीय है उसका स्वामी दूसरा ही होता है किन्तु जब वह ग्रहण करता है तो वह ग्रहण परिग्रहण कहलाता है पतिग्रह नही ।

यद्यपि समाज की परम्परा में कन्या दान के अनन्तर उस कन्या के हाथ से कुछ

भी लेना निषिद्ध है, ऐसा आचार है, किन्तु यह प्रतिग्रह-पक्ष में सङ्गत है, परिग्रह पक्ष में

नहीं। वर पक्ष के द्वारा प्रेषित घटक लोग कन्या पक्ष के लोगों से मिलते हैं तो वर के गुणों

को सुनकर कन्या-पिता धरोहर के रूप से विद्यमान कन्यारूपी अर्थ को 'दास्यामि' कहता

है। एक बार नहीं तीन तीन बार कहता है । क्योंकि कन्या पिता समझता है कि -

'सोमोऽददद्गन्धर्वाय, गन्धर्वोऽदददग्नये, रयिञ्च पुत्रांश्चादादम्नयेः

अग्नि्मह्यमथो हमाम् ।

अर्थात् चन्द्रमा ने गन्धर्व-सूर्य को दिया, सूर्य ने अग्नि को दिया, अग्नि ने स्वयं श्रेष्ठ रत्न

धारी होने के कारण धन-धान्य आदि से समृद्ध इस कन्या को मुझे दिया। कन्या रूप अर्थ

में परम्परा से प्राप्त परकीयत्व को समझकर पिता 'दास्यामि' यह प्रतिज्ञा करता है । तदै-नन्तर घटक वर के पिता से कहने पर वह परिग्रह के लिए तैयार हो जाता है। कन्या

पिता एवं वरपिता का वरण हो चुका है । तदनन्तर ही कन्यापिता अपने दरवाजे पर

आये हुए वर को मधुपर्क आदि से सत्कृत कर समञ्जन समीक्षण आदि कराकर वृत

कन्यारूपी द्रव्य को समर्पित करता है ।

■ कन्यादान याग है

इस प्रसंग में दान और याग शब्दों का निष्कृष्ट अर्थ समझना आवश्यक प्रतीत

होता है । दान शब्द का अर्थ है- स्वस्वत्वनिवृत्ति पूर्वक परस्वत्वापादन', और याग शब्द

का अर्थ है 'देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागः' । दान में परस्वत्वापादन अर्थात् अपने स्वत्त्व की

निवृत्ति कर परस्वत्व को स्थापित करना होता है । याग में स्वस्वत्त्व की निवृत्ति तो है।

किन्तु परस्वत्वापादन नहीं है । 'इदमग्नये न मम' अग्नय इदं न मम ' इस त्याग में अपने

स्वत्त्व का त्याग मात्र ही है । जिस द्रव्य को देवता के लिए हम देते हैं, वह द्रव्य देवता को

ही प्राप्त है, उसको हम देवता के लिए अपित करते हैं देवता उस द्रव्य को हमें इसलिए

देता है कि हम पुनः अर्पित करें । चन्द्र सूर्य-अग्नि की परम्परा से प्राप्त कन्यारूप द्रव्य का

दान कन्यापिता इसीलिये करता है कि भविष्य में चन्द्र-सूर्य-अग्नि आदि देवताओं की

आराधना होती रहे । अतएव कन्या-पिता वर को विष्णु रूप समझकर स्वागत करता हुआ पाद्य अर्ध्य कुर्च मधुपर्क आदि से पूजन करता है 


वस्तुत: इन सभी कन्यादान विरोधी व्यक्तियों के कुतर्क व्यवहारशून्य, समाज संरचना के ज्ञान से शून्य होते हैं। इनके लिए विवाह न ही समाज के  लिए  है ,न ही वंश,कुल आदि की रक्षा के लिए यहां तक कि अब यह प्रजाति विवाह को पति पत्नी का सम्बन्ध भी नहीं मानती और मेरे पति का मुझ पर अधिकार नहीं है, मैं सम्बन्ध बनाने को स्वतंत्र हूं” जैसी अल्पमति बातें करती देखी जाती हैं।