Saturday, 13 November 2021

रावणवध एवं श्रीरामचन्द्रराज्यभिषेख शंकासमाधान

 




आक्षेपकर्ता ने जो श्लोक उपदृष्ट किया है वह मैं आप सभी के सामने रख रहा हूँ एवमं स्क्रीन शॉट में भी रेखांकित किया हूँ 

आक्षेपकर्ता ने इस श्लोक के माध्यम से रावण वध का प्रकरण और श्रीरामचन्द्र का राज्यभिषेख दिखलाया है 

👇👇👇

(1)   अभ्युत्थानं त्वमद्यैव कृष्णपक्षचतुर्दशीम् । 

        कृत्वा निर्याह्यमावास्यां विजयाय बलैर्वृतः ।। ६.९२.६५


(2)     पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः । 

         भरद्वाजश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ।। १२४/६/१

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यह विचारणीय है कि यहाँ प्रकरण क्या है और यह वाक्य किनका कहा हुआ है 

यहाँ आक्षेपकर्ता ने पूरा का पूरा प्रकरण ही उलट दिया है अयोध्या कांड सर्ग ९२ में लक्ष्मण द्वारा इंद्रजित का वध होता है इस सर्ग का प्रथम श्लोक ही इंद्रजित के वध की पुष्टि करता है 


#ततः_पौलस्त्यसचिवाः_श्रुत्वा_चेन्द्रजीतो_वधम् (वा0रा0 ६/९२/१)


इंद्रजीत के वध हो जाने का समाचार सुनते ही रावण क्रोध के वशीभूत हो सीता को मारने के लिए दौड़ता है परन्तु रावण के मन्त्री रावण को ऐसा करने से रोकता है और कहता है कि आज कृष्णपक्ष की चतुर्दशी है अतः आज ही युद्ध की तैयारी कर के कल अमावस्या के दिन सेना को लेकर विजय के लिए प्रस्थान करो ।

इस प्रकरण को इस धूर्त ने पूरा का पूरा ही उलट दिया है ताकि लोग भ्रामित हो सके ।

यह तो रहा श्लोक 1 के आक्षेप का समाधान 

अब दूसरे श्लोक पर बिचार करें |

दूसरा श्लोक रावण का वध कर पुष्पक विमान से श्रीरामचन्द्र जब अयोध्या के लिए प्रस्थान करते है तो भारद्वाज मुनि के आश्रम में रुक कर वहाँ यह प्रसंग कहते है 14 वर्षो का वनवास मेरा पूर्ण हो चुका है अतः अतिशिघ्र मुझे अयोध्या जाना है 

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अब आते है राक्षसराज रावण का वध और श्रीरामचन्द्र जी का राज्यभिषेख बिषय शंका निवारण 

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महाभारत में जिस प्रकार पाण्डवो का 13 वर्ष वनवास अधिक मास को लेकर जोड़ा गया था यह बिराट पर्व के भीष्मवाक्य से सिद्ध है इसी तरह श्रीरामचन्द्र जी का 14 वर्ष का वनवास भी अधिकमास को लेकर ही पूरा हुआ था इस तरह अमान्त मान से कृष्णचतुर्दशी में पुर्णिमान्त मान से कार्तिक कृष्ण षष्ठी में १४ वर्षो की पूर्ति होती है अन्यथा चैत्रमास की शुक्ल दशमी के आरम्भ होकर १४ वर्ष की समाप्ति षष्ठी को नही रह सकती थी परन्तु अधिकमास की गड़ना से ११ दिन कम छः मास की वृद्धि हो जाती तभी १४ वर्ष की पूर्ति षष्ठी को हो सकती है अतः १२ वर्ष के पूरे होने पर १३ वे वर्ष के कुछ समय बीतने पर फाल्गुन अष्टमी को सीता हरण हुआ था १४ वे वर्ष के कुछ दिन बीतने पर श्रीराम जी लङ्का के समीप पहुंचे  थे|


#वर्तते_दशमो_मासो_द्वौ_तु_शेषौ_प्लवङ्गम (वा0 रा0 ५/३७/८)


#दर्शयामास_वैदेह्याः_स्वरूपमरिमर्दनः(वा0रा ५/३७/३३)


इस सितोक्ति के अनुसार सावन मान से सव्हरण दिन से १० मास बीत चुकने पर सीता हनुमान का सम्वाद हुआ था #पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता 

इस रामोक्ति के अनुसार पौष शुक्ल के चतुर्दशी या पूर्णिमा को श्रीरामजी त्रिकुट के शिखर पर आयें थे |


हनुमान का लङ्का में प्रवेश काल :-


#हिमव्यपायेन_च_शितरश्मीरभ्युत्थितो_नैकसहस्त्ररश्मि:(वा0रा ५/१६/३१)

#द्वौ_मासो_रक्षितव्यौ_मे_योSवाधिस्ते_मया_कृत: (वा0 रा0 ५/२०/८)

इन वाक्यो से प्रतीत होता है कि हनुमान जब लङ्का में प्रवेश किया था तब शरद ऋतु का आगमन हो चुका था मार्गशीर्ष दशमी के बाद ही हनुमान का लङ्का मे प्रवेश का स्पष्ट प्रमाण है

अन्यत्र मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को राम को प्रस्थान कहा गया है पौषपूर्णिमा को राम त्रिकुट आये थे उसके १५ दिन सेनानिवेस दूतप्रेषण आदि में बीत गयें तब युद्ध आरम्भ हुआ तब से लेकर श्रावण अभय अमान्त पर्यंत लङ्कापुर के बाहर दोनों दोनों सेनाओ का युद्ध हुआ ।

इंद्रजीत वध अनन्तर यह कहा गया है की तुम आज कृष्पक्ष चतुर्दशी अभ्युत्थान करके अमावस्या में ही शत्रुबिजय के लिए गमन करो ।

इंद्रजीत का वध तीन दिनों में हुआ था दशमी के चौथे प्रहर से लेकर त्रयोदशी के चौथे प्रहर के अवधि में इंद्रजीत का वध हुआ था |

रावण का निर्गमन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था 

उसके बाद ही रावण वध और इसके अनन्तर आदित्य को स्थिरप्रभ होना कहा गया है इससे प्रतीत होता है कि रावण का वध दिन में ही हुआ


इसी पक्ष का समर्थन कालिका पुराण से होता है ।


रामस्यानुग्रहार्थाय रावणस्य वधाय च।। 


रात्रावेव महादेवी ब्रह्मणा बोधिता पुरा।

ततस्तु त्यक्तनिद्रा सा नन्दायामाश्विने सिते।। 


जगाम नगरीं लङ्कां यत्रासीद्राघवः पुरा।

तत्र गत्वा महादेवी तदा तौ रामरावणौ।। 


युद्धं नियोजयामास स्वयमन्तर्हिताम्बिका।

रक्षसां वानराणां च जग्ध्वा सा मांसशोणिते ।। 


रामरावणयोर्युद्धं सप्ताहं सा न्ययोजयत्।

व्यतीते सप्तमे रात्रौ नव्यां रावणं ततः।। 


रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी।

यावत्तयोः स्वयं देवी युद्धकेलिमुदैक्षत।। 


तावत् तु सप्तरात्राणि सैव देवैः सुपूजिता।


निहते रावणे वीरे नवम्यां सकलैः सुरैः।। 

विशेषपूजां दुर्गायाश्चक्रे लोकपितामहः।


राम के अनुग्रहार्थ और रावण के वधार्थ ब्रह्मा द्वारा प्रबोधित देवी लङ्का में आयी और सात दिन तक राम रावण का युद्ध हुआ नवमी के दिन राम ने रावण का वध किया सब देवताओ तथा ब्रह्मा द्वारा ८ दिन तक दुर्गा पाठ होती रही ।

ऐसे रावण का वध का स्पष्ट प्रमाण इतिहास पुराणादि में आश्विन मास के शुक्लपक्ष नवमी ही ठहरता है न कि फाल्गुन मास ??

सर्ग १२३ के अंत मे पुष्पक द्वारा अयोध्या के पास पहुंचने का उल्लेख किया गया है किन्तु सर्ग १२४ में वनवास की समाप्ति पर श्रीरामचन्द्र का भारद्वाज मुनि के आश्रम में पहुचने का उल्लेख है 

पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः । 

भरद्वाजश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ।।


 लङ्का में राम  ने बीभीषण से दुर्गम मार्ग का उल्लेख किया था भारद्वाज आश्रम में राम ने मुनि से यह वरदान मांगा था कि मार्ग में सभी बृक्ष अकाल मे फलदार हो यहाँ श्रीरामचन्द्र जी को यह वरदान वानरों के लिए मांगा था 

आक्षेपकर्ता के अनुसार यदि पदयात्र होती तो लङ्का से अयोध्या पहुंचने में कम से कम एक मास का समय अपेक्षित होता इस प्रसंग में स्पष्ट ही पुष्पक यात्रा की संगति होती है ||

वनवास की अवधि पूर्ण होने पर भारद्वाज मुनि के आश्रम में ही कपिश्रेष्ठ हनुमान को आज्ञा देते है कि वानरराज हनुमान तुम अतिशिघ्र अयोध्या का समाचार लो कि वहाँ सब कुशल मंगल तो है न और वहाँ राजा भरत को मेरे आगमन की सूचना दो ।

श्रीरामचन्द्र जी का अयोध्या आगमन कार्तिक मास ही ठहरता है चैत्र मास नही ।

अध्याय ३  चैत्रमास के  शुक्लपक्ष के षष्ठी तिथि को श्रीराम चन्द्र का राज्यभिषेख होने वाला था जिसका उल्लेख अयोध्या पर्व में देखने को मिलता है परन्तु कैकयी के जिद के कारण  श्रीरामचन्द्र को वनवास जाना पड़ा आक्षेपकर्ता ने इस हिसाब से 14 वर्ष चैत्र मास ही माना जबकि सनातन वैदिक धर्म मे मलमास की भी गड़ना होती है इसका भान आक्षेपकर्ता को था अथवा नही था यह तो आक्षेपकर्ता ही जाने जिस कारण आक्षेपकर्ता ने श्रीरामचन्द्र जी के राज्यभिषेख को चैत्र मास बता डाला 

|| जय श्रीराम ||

शैलेन्द्र सिंह

Sunday, 3 October 2021

कन्यादान




भारतीय परम्परा में वेद सनातन और अपौरुषेय हैं। वेद विश्व का प्रथम प्रकाश है, इसे विश्वमनीषा ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया है। 

सनातन संस्कृति व संस्कार  ईश्वरमूला होने से सद्मूला है, चिद्मूला है, आनन्दमूला है,


संस्कार का अर्थ है सजाना-संवारना, पूर्णता प्रदान करना।  इसके लिए उसके अन्दर दिव्य गुणों का आधान किया जाता है। 

 इसमें मुख्य 16 संस्कार हैं जिसके द्वारा मानव के

मूल दिव्य, परिपूर्ण स्वरूप को प्रकट करने की चेष्टा की जाती है और यह संस्कार

परम्परा गर्भाधान से प्रारम्भ हो जाती है और अन्त्येष्टि तक चलती है। यानी जीव

के आने के पूर्व से प्रारम्भ होकर जीव के जाने के बाद तक चलती है। गर्भाधान्

के द्वारा हम दिव्य आत्मा का आह्वान करते हैं, बुलाते हैं तो उसको बैठाने के

लिए स्थान शुद्धि, भावशुद्धि चाहिए। हम जहां- तहां , जैसे-तैसे नहीं बैठते। स्थान

को शुद्ध कर आसन लगाकर बैठते हैं। गर्भाधान द्वारा हम दिव्यात्मा-पुण्यात्मा

को

बुला

रहे हैं तो उसके लिए उपयुक्त शुद्धि भी चाहिए। फिर जाने के बाद.यह


संस्कार देते हैं कि कपाल भेदन करके जाना चाहिए था। अन्य मार्ग से गमन 

आने-जाने का क्रम बना रहेगा। इस प्रकार गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक, सूर्योदय

से सूर्यास्त तक, लोक से परलोक तक हमारे जीवन का कोई भी क्षण, कोई भी

कण और कोई भी कर्म धर्म से रहित, संस्कार से रहित नहीं है। धर्म व संस्कार

हमारे जीवन का केन्द्र-बिन्दु है, प्राण-बिन्दु है जिससे हमारा समग्र व्यक्तिजीवन,

परिवार जीवन, समाज जीवन, राष्ट्र जीवन, विश्व जीवन संचालित है। धर्म या

संस्कार से बाहर कुछ भी नहीं है।

इस प्रकार मानव मन का परिष्कार करने, शोधन करने, पूर्णता प्रदान करने

वाले जितने भाव एवं कार्य हैं, वह संस्कार कहलाते हैं। इन्हीं संस्कारों की दिव्य

परम्परा को संस्कृति कहते हैं। इस दृष्टि से संस्कृति का अर्थ श्रेष्ठतम कृति से भी

होता है। जो मनुष्य को ऊंचा उठाये वह संस्कृति है, जो नीचे गिराये वह विकृति

है। इस प्रकार श्रेष्ठकृति या सम्यक् कृति को भी संस्कृति कहते हैं। संस्कृति जीवन

का सार है, जीवन का तात्पर्य है, जीवन के आदर्शों का विकास है, जीवन के

मूल्यों का विकास है। अत: संस्कृति जीवन के मूल्यों की, जीवन के आदर्शों की

सतत साधना है जो मानव को मानवजीवन का मूल्य प्रदान करती है तथा जिसकी

रक्षा हेतु भारतीय वीरों ने, महापुरुषों ने अपना जीवन हंसते- हंसते उत्सर्ग कर दिया।

वे जीवनमूल्य हैं स्वतंत्रता, समानता, बंधुता आदि।

अत: मानव के सर्वोच्च विकास के लिए जो जीवनमूल्य सर्वाधिक महत्त्व

के हैं उनकी एक क्रमबद्ध व्यवस्थित परम्परा ही संस्कृति है। इस दृष्टि से भारतीय

मनीषियों ने चार जीवनमूल्य, आदर्श या पुरुषार्थ रखे जिसके अन्दर अन्य सारे

जीवनमूल्य समाविष्ट हो जाते हैं। इन 16 संस्कारों में एक संस्कार पाणिग्रहण (विवाह संस्कार) भी है जिसमें पिता अपनी लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री को विष्णु स्वरूपा वर को कन्यादान करता है ।


■- लक्ष्मीरूपामिमां कन्यां प्रददेविष्णुरूपिणे । तुल्यं चोदकपूर्वा तां पितॄणां तारणाय च ॥(लघुआश्वाल्यनस्मृति,१५,२६)


■-महर्षि मनु कहते है  

वेदज्ञ शुशील वर को बुला कर  उसका पूजन सत्कार कर कन्यादान करें ।

■- आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतशीलवते स्वयम् ।

आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः (३/२७)


अल्पज्ञ अल्पश्रुत भ्रामक वामी कामी गैंग दान शब्द का अर्थ अनर्थ के रूप में लेते है वे कहते है दान हेय वस्तुओ का की जाती है ।

तो इन धूर्तो से यह प्रश्न करना आवश्यक हो जाता है कि विद्या दान जो कि 

समस्त पाप कर्मों को भस्मीभूत करने वाले मोक्ष की गति प्रदान करने वाले विद्या क्या कोई हेय वस्तु है जो एक आचार्य अपने शिष्य को विद्यादान कर नर से नरत्व ,नरत्व से देवत्व ,देवत्व से ब्रह्मत्व तक कि प्राप्ति का साधन है 


■ दान शब्द का अर्थ :--


स्वस्वत्व नीवृत्ती पूर्वक परस्वत्त्वापादनं दानम् दान शब्द का यह यर्थ कहा गया है अर्थात जिस द्रब्य में अपना स्वत्व अधिकार है उसको त्याग कर इतर अन्य के स्वत्व अधिकार का अपादान करना दान है जैसे की ब्राह्मणाय गां ददाति यहां गो द्रब्य में विद्यमान अपने अधिकार को छुड़ा कर उसमें ब्राह्मण का अधिकार बना दिया जाता है इस प्रकार दान दिए हुए गो द्रब्य में दाता मेरी गाय है ऐसा व्यवहार नही कर सकता  अर्थात उस गो द्रब्य को जिसने प्रतिग्रह किया उस ब्राह्मण का अधिकार हो जाता है दाता दान दी हुई गौ के दुग्ध का पान नही कर सकता यह स्थिति गौ दान में देखी जाती है ।

कन्या दान इसमें कुछ वैलक्षण्य है 

अपने स्वत्वाधिकार की नीवृत्ति होने पर भी मेरी कन्या यह व्यवहार विद्यमान है अतएव गोदानादि लेनेवाला पतिग्रहीता कहलाता है किंतु कन्या दान लेनेवाला परिग्रहिता कहलाता पतिग्रह और परिग्रह शब्द में भेद कहा जा चुका है पारस्कराचार्य ने गृहीत्वा शब्द का प्रयोग किया है प्रत्तामादाय निष्क्रमती इतना कहने से ही कार्य सम्पन्न हो जाता है किन्तु 

प्रत्तामादाय गृहीत्वा निष्क्रमती में अदाय शब्द गौण दान का बोधक है इस प्रकार तात्पर्य कल्पना में गृहीत्वा पद तात्पर्य बोधक माना जाता है इस यर्थ कि पुष्टि कविकुल तिलक कालिदास भी करते है ।


अर्थो हि कन्या परकीय एव  तामद्यसंप्रेष्य परिग्रहीतु: .

जातो ममायं विशद: प्रकामं  प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ।।

कन्या अपने पिता के लिए धरोहर है वह न्यास रूप से अपने अपने द्रब्य को रखता है अतः परकीय है उसका स्वामी दूसरा ही होता है किन्तु जब वह ग्रहण करता है तो वह ग्रहण परिग्रहण कहलाता है पतिग्रह नही ।

यद्यपि समाज की परम्परा में कन्या दान के अनन्तर उस कन्या के हाथ से कुछ

भी लेना निषिद्ध है, ऐसा आचार है, किन्तु यह प्रतिग्रह-पक्ष में सङ्गत है, परिग्रह पक्ष में

नहीं। वर पक्ष के द्वारा प्रेषित घटक लोग कन्या पक्ष के लोगों से मिलते हैं तो वर के गुणों

को सुनकर कन्या-पिता धरोहर के रूप से विद्यमान कन्यारूपी अर्थ को 'दास्यामि' कहता

है। एक बार नहीं तीन तीन बार कहता है । क्योंकि कन्या पिता समझता है कि -

'सोमोऽददद्गन्धर्वाय, गन्धर्वोऽदददग्नये, रयिञ्च पुत्रांश्चादादम्नयेः

अग्नि्मह्यमथो हमाम् ।

अर्थात् चन्द्रमा ने गन्धर्व-सूर्य को दिया, सूर्य ने अग्नि को दिया, अग्नि ने स्वयं श्रेष्ठ रत्न

धारी होने के कारण धन-धान्य आदि से समृद्ध इस कन्या को मुझे दिया। कन्या रूप अर्थ

में परम्परा से प्राप्त परकीयत्व को समझकर पिता 'दास्यामि' यह प्रतिज्ञा करता है । तदै-नन्तर घटक वर के पिता से कहने पर वह परिग्रह के लिए तैयार हो जाता है। कन्या

पिता एवं वरपिता का वरण हो चुका है । तदनन्तर ही कन्यापिता अपने दरवाजे पर

आये हुए वर को मधुपर्क आदि से सत्कृत कर समञ्जन समीक्षण आदि कराकर वृत

कन्यारूपी द्रव्य को समर्पित करता है ।

■ कन्यादान याग है

इस प्रसंग में दान और याग शब्दों का निष्कृष्ट अर्थ समझना आवश्यक प्रतीत

होता है । दान शब्द का अर्थ है- स्वस्वत्वनिवृत्ति पूर्वक परस्वत्वापादन', और याग शब्द

का अर्थ है 'देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागः' । दान में परस्वत्वापादन अर्थात् अपने स्वत्त्व की

निवृत्ति कर परस्वत्व को स्थापित करना होता है । याग में स्वस्वत्त्व की निवृत्ति तो है।

किन्तु परस्वत्वापादन नहीं है । 'इदमग्नये न मम' अग्नय इदं न मम ' इस त्याग में अपने

स्वत्त्व का त्याग मात्र ही है । जिस द्रव्य को देवता के लिए हम देते हैं, वह द्रव्य देवता को

ही प्राप्त है, उसको हम देवता के लिए अपित करते हैं देवता उस द्रव्य को हमें इसलिए

देता है कि हम पुनः अर्पित करें । चन्द्र सूर्य-अग्नि की परम्परा से प्राप्त कन्यारूप द्रव्य का

दान कन्यापिता इसीलिये करता है कि भविष्य में चन्द्र-सूर्य-अग्नि आदि देवताओं की

आराधना होती रहे । अतएव कन्या-पिता वर को विष्णु रूप समझकर स्वागत करता हुआ पाद्य अर्ध्य कुर्च मधुपर्क आदि से पूजन करता है 


वस्तुत: इन सभी कन्यादान विरोधी व्यक्तियों के कुतर्क व्यवहारशून्य, समाज संरचना के ज्ञान से शून्य होते हैं। इनके लिए विवाह न ही समाज के  लिए  है ,न ही वंश,कुल आदि की रक्षा के लिए यहां तक कि अब यह प्रजाति विवाह को पति पत्नी का सम्बन्ध भी नहीं मानती और मेरे पति का मुझ पर अधिकार नहीं है, मैं सम्बन्ध बनाने को स्वतंत्र हूं” जैसी अल्पमति बातें करती देखी जाती हैं।

Sunday, 1 August 2021

भारत आखिर माता कैसे ?



ऋषियों की तपोभूमि भारत जिसे सनातन धर्म शास्त्रों में भारत को ब्रह्मावर्त (देवताओ ) का देश कहा है जहाँ ऋषियों ने अपनी दिब्य अनुभूतियों से भारत का जो गुणगान किया है वह समस्त विश्व मे अदर्शनिय है ।


समुद्रवसने देवी प्रवतस्तन मण्डले 

विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यम पादस्पर्श क्षमस्व मे  ||


इस श्लोक में मातृभूमि के उन सभी गुणों का उल्लेख है जो एक माता में होनी चाहिए भारत के मातृभूमि की वन्दना इससे उत्कृष्ट कुछ नही हो सकता ।

इस श्लोक के प्रथम पद में भारत माँ को #समुद्र_वसने कहा गया है इसका तात्पर्य यह है कि जहाँ भारत की भौगोलिक सिमा समुद्र से घिरी हुई निर्देश करना है वहाँ भारत माता के लज्जा शीलता को भी बतलाना है  सभी पुत्र अपनी माता को बहुमूल्य वश्त्राभूषणो से अलंकृत देख प्रसन्नता अनुभव करते है यह भी हम सभी की हार्दिक कामना होती है जननी जैसे गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित कोई भी जननी सभी आदर्श गुणों से युक्त होना चाहिए वस्त्रों की चर्चा करते हुए इस वन्दना में लक्षण द्वरा भारत माता की शालीनता को भलीभांति प्रकट कर दिया है भारतवर्ष में दूर दूर तक फैले हुए हरे भरे वनों उपवनों को वस्त्र न कह कर समुद्र को ही भारत माँ के वस्त्र से उपमित करना रहस्य से खाली नही है ।बहुत प्राचीन समय से ही समुद्र ब्यापार का कुञ्जी रहा है आज भी जिन राष्ट्रों का समुद्र पर प्रभुत्व है वे थैलिशाह बने बैठे है इस वन्दना के समय समुद्र भारत के ही अधिकार में थे समुद्र से होने वाला ब्यापार पर उसका पूर्ण अधिकार था फलतः भारत माँ इन समुद्रों का उपयोग उतने ही प्रेम , सावधानी और चाव से करती थी जितना कि आज भी स्त्रियां अपने बहुमूल्य वस्त्रों से करती है इन वस्त्रों से ही उसकी लोकोत्तर शोभा होती थी जिसे देख कर बिदेशी ईर्ष्या करते थे और हम अभागे इस बहुमूल्य वस्त्रों का मोल न समझ पाए जिसका परिणाम हमे आज भोगना पड़ रहा है ।समुद्र वसने से सम्बोधन में भारत माता को जहाँ सम्भ्रान्त महिला की भांति लज्जा गुण से युक्त प्रकट किया गया वही राष्ट्रीय दृष्टिकोण से रत्नाकर महोदधि आदि आज भी इंडियन ओसियन या हिन्द महासागर के नाम से पुकारे जाने वाले महा समुद्र को भारत माता के सुतरां संरक्षणीय उपकरण प्रकट किया गया है आज से नौ लाख पूर्व बिदेशी रावण ने माता सीता की साड़ी को छु डाला था जिसका बदला चुकाने के लिए मानव समाज ही क्या भारत के अर्ध्य सभ्य कहे जाने वाले रीछ ,वानर,गिद्ध जैसे पशुपक्षीयों में तहलका मच गया था शतयोजन समुद्र पर पुल बांधकर सोने की लङ्का मिट्टी में मिला दी गई इसी प्रकार पांच सहस्त्र पूर्व दुर्मार्गी दुशाशन ने द्रौपदी के साड़ी को छू डाला था फलस्वरूप कुरुक्षेत्र में 36 लाख योद्धाओं के मुण्ड कट गए काश 250 वर्ष पूर्व बिदेशी लुटेरे जब भारत माँ की समुद्र रूपी साड़ी को अपने अपने स्टीमरों से रौंदते हुए इस देश मे घूंस आये थे तब यदि उसके लाडले बेटे जान पाते कि उनकी माता की लाज खतरे में है और बिदेशी उसे नग्न करना चाहते है उन्हें आज यह पराधीनता न भोगनी पड़ती 

इस श्लोक में दूसरा पद #प्रवत_स्तन_मण्डले है माता कितनी भी लज्जाशील तथा कुलीना हो किन्तु यदि वह अपने बालक का पोषण नही कर सकती यदि उसके स्तनों में बालक के पोषण के लिए पर्याप्त मात्रा में दुग्ध न हो तो उस माता का होना न होना बराबर है ।वह पुत्र प्रथम तो जीवित ही नही रह सकता कदाचित् रह भी जाय तो निर्बल ही रहेगा इस दूसरे पद में बताया गया है कि भारत माता जहां लज्जाशील है वही हिमालयादि  पर्वत रूपी उस सुन्दर स्तनों वाली है जिन स्तनों से निकलने वाली गंगा ,यमुना,गोदावरी आदि सहस्त्रो क्षीर धाराएं देश के 130 करोड़ अपने बालको का पालन पोषण कर रही है इनके बालक जीवन निर्वहन के लिए अन्य राष्ट्रों की भांति दूसरे धाय की खुराक पर निर्भर नही सभी वस्तुओं में वे स्वश्रित है अन्यान्य देशों की तुलना में  भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो अपने पुत्रो को भरणपोषण में समर्थ है अमेरिका में रुई कनाडा और आस्ट्रेलिया में गेहूं चाहे कितनी मात्रा में क्यो न उतपन्न हो परन्तु अन्यान्य वस्तुओं के लिए उन्हें दूसरे देशों पर निर्भर होना पड़ता है सम्पूर्ण विश्व मे भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहाँ 6 ऋतुएं अपनी दस्तक देती है जिसकारण  अन्न औषदि वस्त्रादि जीवनोपयोगी अन्यान्य सभी पदार्थ प्रभूत मात्र में प्रदान करता है ।अलंकारिक शब्दो मे भारत माता के हिमालय गैरिशिखर कंचनजंघा ध्वलगिरी कैलाश आदि ऊंचे स्तन रूप पर्वतों से बहने वाली गंगा यमुना गोदावरी ब्रह्मपुत्र जैसी पयस्वनी धाराएं प्रिय पुत्रो को भरणपोषण करने में समर्थ है ।

श्लोक का तीसरा पद #विष्णुपत्नी कह कर सम्बोधन किया गया है तथाकथित बुद्धिजीवी आज महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कह कर सम्बोधन किया है जबकि यह ठीक नही 

क्यो की इस राष्ट्र ने स्वयं महात्मा गांधी को भी जना है अतः गांधी को राष्ट्रपिता कहना निराधार ही है । 

विष्णुपत्नी अर्थात इस भारतभूमि को लक्ष्मी की संज्ञा से बिभूषित किया गया है पश्चिम के नास्तिक देशों में चूंकि अनीश्वरवादी की।प्रधानता होने के कारण कुकर शूकर आदि पशुओ की भांति माता मात्र का परिचय रखते है संसार मे समस्त मनुष्य का व्यवहार परिचय पिता के नाम से ही होता हैं स्कूल कचहरी नौकरी जन्मकालीन उल्लेख से लेकर मृत्युकालीन खाते पर्यंत में पिता का ही नाम अनिवार्यरूप से लिखा जाता है पिता के बिषय में अनजान होना बालक की मूर्खता का द्योतक तो है  ही किन्तु माँ के चरित्र में अपरिमार्जन लांछन है बिदेशी छाया से तैयार हुई हमारी काल्पनिक मातृवन्दना में भी न केवल भारत ही नही अपितु समस्त विश्व के पिता ईश्वर का कोई ध्यान नही रखा गया इसलिए वन्दे मातरम् का यह गान नीतान्त अधूरा है इसके बिपरीत उपयुक्त श्लोक में विष्णुपत्नी कह कर जहां।भारतमाता के सौभाग्यवती बनाकर वन्दना की गई है वहां आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा ईश्वर के साथ कितना घनिष्ट सम्बन्ध है यह भी भलीभांति दर्शाया गया है इसके अतिरिक्त वन्दना पूर्वक भूमि स्पर्श करते हुए हम एक सत्पुत्र  की भांति अपने हृदय में विद्यमान मातृप्रेम को प्रकट कर के अपने कर्तब्य का पालनभी करते है इसलिए प्रत्येक भारतीय को जो भारतभूमि को अपने हृदय से मातृभूमि समझता है उसे अवश्य ही वन्दना करनी।चाहिए ।


शैलेन्द्र सिंह


Tuesday, 13 July 2021

माता जानकी तथा श्रीरामचन्द्र विवाह एवं मुहम्मद सल्लाह तथा आयशा निकाह

 माता_सीता_का_विवाह


_______तथा ______


मुहम्मद_सलल्लाह_और_आइशा_का_निकाह


श्रीमद्वाल्मीकिरामायण ,उस सर्वज्ञ,सर्वकामा ,सर्वरस ,सर्वेश्वर 

सच्चिदानन्द आनन्दकन्द के लीला विभूतियों का गायन है |

जो जगत के अधिपति है जिनकी अध्यक्षता में ही समस्त चराचर जगत चलायमान है जो सृष्टि, स्थिति, लय के कारण रूप है |


 जिनका आविर्भाव ही धर्मस्थापना आताताइयों को दण्ड देना  ऋषिमुनी तपस्वियों को निर्भय बनाना असुरों के विनाश करना तथा समस्त प्राणियों आह्लादित करना ही कारण रहा ।

 भगवन् श्रीरामचन्द्र की मर्यादाएं उस पर्वत के समान है जिसकी समता विश्व के बृद्धातिबृद्ध पर्वत शिखर भी न कर पाए  तथा माता जानकी की पवित्रता पतिव्रता उस सूर्यकी भांति प्रकाशमान है जब तक यह सृष्टि प्रवाहमान है ।


तिमिररोग से ग्रसित ब्यक्ति को भी आकाश में कई सूर्य दिखते है इससे सूर्य की एकाकी होने का प्रमाण नष्ट नही होता वरन तिमिररोग से ग्रसित ब्यक्ति को अंततः वैध के समक्ष ही उपस्थित होना पड़ता है ।


मुहम्मद सल्लाह और आयशा की भांति ही मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र और अयोनिज माता सीता का  विवाह मान लेना अल्पज्ञ अल्पश्रुत अज्ञानता का ही परिचायक है जिसने न तो कभी शास्त्रो के रहस्यों को समझ पाया और न ही कभी श्रद्धा पूर्वक शास्त्रो का अध्ययन ही किया 

वामी ,कामी ,इस्लामी, ईसाइयत बुल्के गिरोह  ढोल पीटते हुए मिथ्या घोष करने वाले कि ही बातों को सत्य मान बैठना न्यायसंगत नही हो सकता ।

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● एकओर मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम जिनका आचरण समस्त जगत के लिए अनुकरणीय है जो स्वयं साक्षात् धर्म स्वरूप है 

●वही दूसरी ओर आसुरी वृत्तियों से सम्पन्न निर्दोष प्राणियों की हत्या करना उसका माल लूटना तथा जबरन स्त्रियों को अपने हरम में रखना छल से स्वयं को प्रतिष्ठित करना ही मोहम्मद सल्लाह का लक्ष्य रहा  ।


●वही माता सीता जिनका आविर्भाव ही दिब्य है ऐसा आविर्भाव जगत में न तो किसी का हुआ है और न ही होगा माता सीता अयोनिज है ।


●वही आइशा का जन्म साधरण प्राणियों की भांति मलमूत्र से दूषित योनिमार्ग से हुआ ।

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वामी कामी, इस्लामी,ईसाइयत बुल्के गिरोह कभी आप को यह नही बताएगा कि जब माता सीता का श्रीरामचन्द्र जी से विवाह हुआ तो मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी की आयु 13 वर्ष की थी ।


वे माता सीता के 6 वर्ष होने का ढोल तो पीटते है परन्तु मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के आयु के बिषय में मौन रहते है ।

महर्षि विश्वामित्र यज्ञयाग सम्पन्न कराने हेतु राक्षसों से रक्षण   के लिए काकुस्थ वंशी दसरथ नरेश के पास जब  श्रीरामचन्द्र जी को लेने आते है तब  महाराज दशरथ ने महर्षि विश्वामित्र को कहते है हे ऋषिप्रवर अभी तो मेरा राम 16 वर्ष का भी नही हुआ एक बालक को कम से कम दुर्धस युद्ध मे मत धकेलिये ।


●ऊन षोडश वर्षो मे रामो राजीव लोचनः 

(वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड १/२०/२)


माता सीता और श्रीराम के स्वयंवर के पश्चात श्रीरामचन्द्र जी के राज्यभिषेख की मन्त्रणा दसरथ जी अपनी मंत्रियों से करता है कि अब वह उपयुक्त समय आगया है कि श्रीरामचन्द्र जी को युवराजपद से विभूषित किया जाय और यह मन्त्रणा तब हुआ जब  श्रीरामचन्द्र ने महर्षी विश्वामित्र के मनोरथ को सिद्ध किया तथा राजा जनक के दरबार मे विश्व के समस्तनृपगणो के सामने अपने बाहुबल का कौशल दिखा कर माता जानकी से स्वयम्वर किया । 


●तत्र त्रयो दशे वर्षे राज अमंत्र्यत प्रभुः । 

अभिषेचयितुम् रामम् समेतो राज मन्त्रिभिः ॥ (वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड ३/४७/५)


जब दसरथ नरेश अपने मंत्रियगण से यह मन्त्रणा करते है कि श्रीरामचन्द्र जी के राज्यभिषेख की तैयारी की जाय उस समय श्रीरामचन्द्र जी का आयु 13 वर्ष का था ।


अतः भ्रान्तवादियो मिथ्याबिचारो के पोषण करने वाले वामी कामी इस्लामी ईसाइयत बुल्के गिरोह के मुख मलिन यही हो जाता है ऐसे तो अनेको प्रमाण भरे पड़े है वाल्मीकि रामायण में जहाँ मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी और माता सीता का आयु स्पष्ट रूप से उल्लेख है ।

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इसके विपरीत 

मुहम्मद सलल्लाह की निकाह जब आयशा से हुई उस वक़्त आयशा की आयु 6 वर्ष और मुहम्मद सलल्लाह की आयु 53 वर्ष रही ।

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अब विद्जन स्वयं बिचार करें कि एक 6 वर्षीय बालिका के साथ 13 वर्ष के बालक का विवाह न्यायसंगत है न् कि 

एक 6 वर्षीय बालिका के साथ 53 वर्ष का बृद्ध ??

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अन्त में मैं यही कहना चाहूंगा कि 

#रामो_विग्रहवान_धर्म: 

भगवन् श्रीराम स्वयं धर्मस्वरूप है जहाँ शङ्का का भी लेश मात्र  गन्ध भी न हो वहां अनुचित दोषारोपण मूर्खता की पराकाष्ठा ही तो है 


शैलेन्द्र सिंह

Sunday, 11 July 2021

एकलव्य

 ■●> एकलव्य :--

महाभारत को काल्पनिक कहने वाले पाश्चात्यविद्  तथा वामपन्थी  इतिहासकार एकलब्य बिषय को बार बार उठाकर जनमानस में वैमनस्यता का बीज बोता है इन तथाकथित इतिहासकारों के अनुसार विश्वविख्यात अयाख्यान महाभारत जब काल्पनिक ही है तो उसमें आये हुए कथानक वास्तविका कैसे ??

उन धूर्त तथाकथित इतिहासकारों के सामने प्रथम यही प्रश्न रखना चाहिए 

फिर देखिए क्या होता है ।

अस्तु यह एक ऐसा बिषय है जिसकी भ्रांति जनमानस में ऐसा व्याप्त है  बड़े से बड़ा विद्वान भी इस बिषय को लेकर यह तक कह डालते है कि एकलव्य के साथ जो हुआ वह न्याय नही है 

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सनातन धर्म मे जितनी महता एक श्रोतीय ब्राह्मण की है उतनी ही महता एक स्वधर्मप्रायण शुद्र की है 

■● अपि शुद्रं च धर्मज्ञं सद् वृत्तमभिपूजयेत् (महाभारत अनुशाशन पर्व ४८/४८)


 स्व स्व धर्मानुरक्त धर्मानुरागी का सम्मान तो स्वयं ईश्वर भी करता है इस लिए शूद्रकुल में उतपन्न हुए विदुर को भी साक्षात् धर्म का अंश माना गया  ,निषादराज गुह्य तो हमारे इष्टदेव श्रीरामचन्द्र के सखा तक हुए फिर 

 निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलब्य के साथ भेदभाव व्यवहार करने का कोई औचित्य भी नही बनता ।


महाभारत में युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का वर्णन है, जिसके अनुसार इस यज्ञ में सभी वर्णों के लोगों के साथ - साथ देश - विदेश के विभिन्न राजाओं को आमंत्रित किया गया था। इनमें निषादराज एकलव्य भी थे तथा उनका स्थान श्रेष्ठ राजाओं और ब्राह्मणों के मध्य था । यदि निषाद जाती के साथ  भेदभाव  हीनभावना होती तो एकलब्य को राजाओं और ब्राह्मणों के मध्य  स्थान न मिला होता ।


■● दुर्योधने च राजेन्द्रे स्थिते पुरुषसत्तमे।

कृपे च भारताचार्ये कथं कृष्णस्त्वयाऽर्चितः।।

द्रुमं कम्पुरुषाचार्यमतिक्रम्य तथाऽर्चितः।

भीष्मके चैव दुर्धर्षे पाण्डुवत्कृतलक्षणे।।

नृपे च रुक्मिणि श्रेष्ठे एकलव्ये तथैव च। (महाभारत सभापर्व ४०/१३-१४)


अतः यह स्प्ष्ट हुआ कि जितना सम्मान भिन्न भिन्न देश से आये हुए राजाओं तथा आचार्यो का था उतना ही सम्मान निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य का भी था ।

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■● द्रोणाचार्य :--


■● द्रोणस्तपस्तेपे महातपाः।। (म 0आ0 १२९/४४)

■●वेदवेदाङ्गविद्वान्स तपसा ।(म0 आ0 १२९/४५)

■● गुरवे ब्रह्मवित्तम (म 0 आ0 १३१/५५)


गुरुद्रोणाचार्य के बिषय में ब्रह्मवेत्ता ,महातपस्वी,वेद वेदाङ्ग विद्या में निष्णात पद विशेषण आया है ऐसा श्रोतीय महातपस्वी ब्रह्मवेत्ता आचार्य जो सम्पूर्ण विद्या में निष्णात हो वे न किसी से द्वेष ही करते है और न किसी से मोह ऐसा श्रुतिवचन है 

■◆ तत्र को मोहः कः शोकेस एकत्वमनुपश्यत


पाञ्चाल नरेश द्रुपद ने जब आचार्य द्रोणाचार्य को तिरस्कृत किया तब वे हस्तिनापुर पहुच कर वे अपनी ब्यथा भीष्म पितामह से कह सुनाई 

भीष्म पितामह ने आचार्य द्रोणाचार्य के सामने अपना प्रस्ताव रखा कि आप यही हस्तिनापुर में रह कर  कुरुवंश के राजकुमारों को धनुर्वेद एवं अस्त्र शास्त्रो की शिक्षा दीजिए एवं कौरवों के घर पर सदा सम्मानित हो मनवान्छित उपभोगों का भोग कीजिये ।

भीष्पिताम्ह का यह प्रस्ताव गुरु द्रोणाचार्य ने स्वीकार किया और भीष्मपितामह को वचन भी दिया कि इसी कुरुवंश के राजकुमारों को मैं विश्व के महानतम योद्धा बनाऊंगा ।


■● अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय।

भुङ्क्ष भोगान्भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये।।

कुरूणामस्ति यद्वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम्।

त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव (महाभारत आदिपर्व १३०/७७-७८)


निष्पक्ष भाव से आचार्य द्रोणाचार्य कुरुवंश के राजकुमारों को धनुर्वेद सहित समस्त शास्त्रो अस्त्रों की शिक्षा देने लगे थे ।

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■●एकलव्य:--


निषादराज हिरण्यधनु पुत्र एकलव्य  अस्त्र शस्त्र विद्या प्राप्त करने हेतु जब आचार्य द्रोणाचार्य के पास जाते है तब आचार्य द्रोणाचार्य उन्हें शिक्षा देने के लिए मना कर देते है ।


■● ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः।

एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह।।

न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्।

■● शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया। (महाभारत आदिपर्व  १३१/  ३१-३२ )


एक क्षण के लिए तो यहाँ पाठकगण को यह लगेगा कि द्रोणाचार्य ने ऐसा अन्याय क्यो किया ??

एकलब्य को धनुर्वेद की  शिक्षा क्यो नही दी। 


ऐसा इस लिए हुआ कि  गुरुद्रोणाचार्य वचनबद्ध थे उन्होंने  भीष्मपितामह को वचन दे रखा था कि कुरुवंश के  राजकुमारों को अस्त्र शास्त्र की शिक्षा देगा ।

दूसरा कारण यह है कि गुरुद्रोणाचार्य को वेतन , धनधान्य तथा समस्त भोग उपलब्ध  पितामह भीष्म करा रहे थे तो भला कुरुवंश को छोड़ वे अन्य कुमारों को शिक्षा देना स्वयं अपने वचनों को भंग करना होता 

द्वेष का कोई कारण नही अपितु वे इस कलङ्क से भी बचना चाहते थे कि वेतन कोई और दे और धनुर्वेद सहित अस्त्र शस्त्र की शिक्षा किसी और को दे ऐसे में पितामह भीष्म भी यह प्रश्न उठा सकते थे कि  आप के मनोवांछित समस्त भोग तथा वेतन कुरुवंश की ओर से प्राप्त हो रहा है और आप कुरुवंश राजकुमारों को छोड़ किस और को अस्त्र शस्त्र विद्या में निष्णात करा रहे है ।

इस कारण आचार्य द्रोण ने एकलब्य को अपने यहाँ धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया ।

गुरु द्रोणाचार्य के मना करने के पश्चात एकलब्य ने वन में लौट कर आचार्य द्रोणाचार्य की ही मूर्ति बना धनुर्विद्या का अभ्यास आरम्भ किया ।


■● स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परन्तपः।

अरण्यमनुसंप्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम्।

तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा।

इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः।। (महाभारत आदिपर्व १३१/३३-३४)


यहाँ दो बिषय बड़े ही महत्वपूर्ण है ।


नम्बर -१ - गुरु के अनुमति के बिना उनकी मूर्ति बना कर अभ्यास प्रारम्भ करना स्मृति शास्त्रो में स्प्ष्ट आदेश आये है कि गुरु की अनुमति के बिना विद्या का अध्ययन करने वाला चोर है और वह दण्ड के पात्र है ।


■● ब्रह्म यस्त्वननुज्ञातं अधीयानादवाप्नुयात् ।

स ब्रह्मस्तेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपद्यते (मनुस्मृति २/११६)

और एकलब्य ने वही किया गुरुद्रोणाचार्य के मना करने के बाद भी उनकी मूर्ति बना कर धनुर्वेद विद्या का अभ्यास  प्रारम्भ किया 


नम्बर -२-- विद्या प्राप्त होने के पश्चात शिष्य अपने गुरु को दक्षिणा प्रदान करें ।


■●  शक्त्या गुर्वर्थं आहरेत् । । 

■◆ क्षेत्रं हिरण्यं गां अश्वं छत्रोपानहं आसनम् ।

धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिं आवहेत्  (मनुस्मृति २/२४५-२४६)


एकलब्य द्वारा विधा की चोरी करना उसे दण्ड का पात्र बनाता है तो गुरु के शिक्षा प्राप्त कर दक्षिणा देने का अधिकारी भी बनाता है 


जब आचार्य द्रोणाचार्य को यह ज्ञात हुआ कि एकलब्य उनकी मूर्ति बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा है तो वे मनोमन प्रसन्न  हुए और उनके कौशल को देखने वन में चले वहाँ एकलब्य की प्रतिभा देख वे दंग रह गए और बिचार भी किये की यदि यह बालक हस्तिनापुर क्षेत्र के अन्तर्गत रहते हुए धनुर्विद्या में पारंगत हो जाता है तो भीष्मपितामह सहित राजा धृतराष्ट्र एवं कृपाचार्य आदि आचार्यगण क्या सोचेंगे ?

इस बिषम परिस्थिति को भांपते हुए गुरुद्रोणाचार्य ने यह बिचार किया कि  एकलब्य का अनिष्ट भी न हो और वे अपनी धनुर्विद्या का अभ्यास भी आरम्भ रखे और मैं कलङ्कित भी न होऊं ।

आचार्य द्रोण एकलब्य से गुरिदक्षिणा मांगता है ।


■● यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम।। (महाभारत आदिपर्व १३१/ ५४)

 

गुरुदक्षिणा का नाम सुन एकलव्य प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ आप स्वयं  इसके लिए आज्ञा दे 

आचार्य द्रोण एकलब्य से गुरुदक्षिणा में उनका अंगूठा मांग लिया 


■◆तमब्रवीत्त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति।। (महाभारत आदिपर्व १३१/५६)

एकलब्य आचार्य द्रोण की इस दारुण वचन सुनकर भी बिना बिचलित हुए प्रसन्नचित हो कर अपने दाहिने हाथ के अंगूठे को काट कर द्रोणाचार्य को समर्पित किया ।


■●तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः।

छित्त्वाऽविचार्य तं प्रादाद्द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः (महाभारत आदिपर्व १३१/५८)

यहाँ भी दो विशेषता है एक तो एकलब्य स्वयं इस प्रकार के दारुणवचन सुनकर भी विचलित नही हुए और  प्रसन्नचित हो गुरुदक्षिणा देकर अपनी गुरुभक्ति भी सिद्ध की ।


वामसेफियो मुलविहीन हिन्दुओ को इस प्रकरण पर भले ही पेट मे दर्द हो परन्तु एकलब्य को अंगूठे कटने पर भी दर्द न हुआ यहाँ प्रसन्नचित जो विशेषण आया है वह इसकी पुष्टि स्वयं करता है ।

एकलब्य की गुरुभक्ति देख आचार्य द्रोण भी प्रसन्न हुए और तत्क्षण एकलब्य को ऐसी विद्या दे डाली जो अपने प्रिय पुत्र तथा शिष्यों को भी प्रदान नही किये ।


■● ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत।

न तथा च स शीघ्रोऽभूद्यथा पूर्वं नराधिप।। (महाभारत आदिपर्व १३१/५९)


गुरुद्रोणाचार्य ने संकेत में ही एकलब्य को यह विद्या प्रदान की जिससे वे तर्जनी और मध्यमा अंगुली से किस प्रकार वाणों का संघान करना चाहिए ।

गुरुद्रोणाचार्य की दृष्टि में एकलब्य के प्रति द्वेष अथवा हेय भाव होता तो वे उन्हें ऐसी विद्या क्यो प्रदान की होती ?

शैलेन्द्र सिंह


Wednesday, 30 June 2021

शिक्षा और शूद्र





हिन्दुओ के लिए वेद स्वतः प्रामाणसिद्ध है ईश्वर द्वरा प्रतिपादित बिषय भी यदि वेद विरुद्ध हो तो वे अप्रामाणिक माने जाते है यही वेद की वेदता और हिन्दू होने का प्रथमप्रामाण है ।


अल्पज्ञ अल्पश्रु भ्रामक ब्यक्तियो वामपंथियों ईसाइयों इस्लामिको  का कहना है कि शूद्रों को पढ़ने नही दिया जाता था उन्हें जानबूझ कर अशिक्षित रखा जाता था ताकि उसका शोषण कर सके ।

प्रथमतः स्प्ष्ट कर देना चाहता हूं कि वैदिक सनातन धर्म शोषणवादी नही अस्तु पोषणवादी है ऐसा कोई कर्मकाण्ड नही जहाँ समस्त वर्णों को आर्थिक रूप से लाभ नही मिलता हो इस पर मैं कई बार पोस्ट लिख चुका हूं अतः वही बिषय को पुनश्च यहाँ रखने का कोई अर्थ नही बनता  ।

दूसरी बात विद्यादि में शूद्रों का भी अधिकार था यह बात 

■ श्रुतिस्मृतिइतिहासपुराणादि से सिद्ध है ।

समावेदीय छन्दोग्य उपनिषद में राजा अश्वपति यह घोषणा करते है

कि मेरे राज्य में कोई भी अशिक्षित नही  , न ही कोई मूर्ख 


■ न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः।

नानाहिताग्निर्ना विद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतः॥ (छान्दोग्य॰ ५ । ११ । १५)

केवल इतना ही नही त्रेतायुग में इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के शासनकाल में भी ऐसा कोई ब्यक्ति देखने को नही मिलता जो अशिक्षित हो ।


■ कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित् ।

द्रष्टुम् शक्यम् अयोध्यायाम् न अविद्वान् न च नास्तिकः ॥(वा0 रा0 १/६/८)


अयोध्या में कही कोई कामी,कृपण, क्रूर,अविद्वान,नास्तिक ब्यक्ति देखने को नही मिलता है ।

अतः इससे स्प्ष्ट प्रामाण हो जाता है कि विद्या आदि में शूद्रों का अधिकार था केवल इतना ही नही शिक्षा दर भी १००% थी तत्तकालीन शासनतंत्र के अधीन भारत के समस्त नागरिक शिक्षित नही है जबकि जिस कालखण्ड में श्रुतिस्मृतिइतिहासपुराणादि का प्रचार प्रसार ईस भूखण्ड पर पूर्णरूपेण था उस कालखण्ड में कोई भी ब्यक्ति अशिक्षित नही था ।

भारत जब यवनों अरबो तुर्को ब्रिटेन की दासता झेल रहा था उसीकालखण्ड में यह अशिक्षिता  व्याप्त हुई क्यो की गुरुकुलों को नष्ट करना विश्विद्यालयों को अग्निदाह करना ही मूल कारण रहा ।


 शूद्रों का तो शिल्पविद्या में एकक्षत्र राज था ।

वर्णाश्रमधर्मी होने का यही अर्थ होता है कि कोई भी किसी के अधिकारों का हनन न करें स्व स्व धर्म का पालन निष्पक्षता पूर्ण करें 

महाभारत जैसे अयाख्यानों में शूद्रकुल में जन्मे हुए विदुर को हस्तिनापुर जैसे साम्राज्य का महामन्त्री बनाया वे नीतिशास्त्र के ज्ञाता धर्माधर्म बिषयों के ज्ञाता तथा साक्षात् धर्म का अंश माना गया यदि सनातन धर्म शोषणवादी अशिक्षित रखने की नीति होती तो स्वधर्मपरायण विदुर को हस्तिनापुर जैसे साम्राज्य का महामन्त्री न बनाया होता ।

एकलब्य के बिषय को लेकर भी भ्रामक प्रचार किया गया है 

महाभारत में ही स्प्ष्ट लिखा है कि गुरु द्रोणाचार्य ने एकलब्य को वह विद्या प्रदान की जो न तो पाण्डवो, कौरवो और न ही अश्वथामा को प्रदान की थी ।

इक्ष्वाकु वंश के ही राजा हरिश्चंद्र एक चाण्डाल के यहाँ नौकरी किये अब बिचार कीजिये कि इक्ष्वाकु वंश के राजा को भी खरीदने का सामर्थ्य एक चाण्डाल के पास था कितना धन होगा उस चाण्डाल के पास ??

हमने कभी भी बिषयों पर सत्यासत्य बिचार नही किया अपितु हमने उसी को सत्य मान बैठा जिसका प्रचार वामी,कामी,इस्लामी,ईसाइयत,गैंग ने प्रचार किया और वे सफल भी हुए पाश्चात्यविद से लेकर भारत के हिन्दू इस बिषय पर भ्रामित है ।

इन सब मिथ्या बिषयों का प्रचार प्रसार भी इस लिए हुए की यवन ,तुर्क,अरब,(इस्लामी) यूरोप (ईसाइयों) ने जब धर्मान्तरण करने में असफल हुए तो वे इस तरह के भ्रामक प्रचार प्रसार किया ताकि विखण्डन का बीज बोया जा सके और धतमान्तरण रूपी खेल आसान हो जाय ।


शैलेन्द्र सिंह

Thursday, 24 June 2021

द्रौपदी रहस्य




धर्मस्य_सूक्ष्मतवाद्_गतिं (महाभारत ) 

धर्म की गति अति सूक्ष्म है अतः हम जैसे अल्पज्ञ अल्पश्रुत पूर्णतः धर्म बिषयो के गूढ़ रहस्य को समझ पाने में अक्षम है बस हम अपनी बुद्धि बल से ही बिषयो का अन्वेषण करते फिरते है   धर्म के गूढ़ रहस्यों के बिषय में पूर्णप्रज्ञ मनीषी जन ही समझ सकते है 

ठीक ऐसा ही रहस्य यज्ञशेनी द्रोपदी का है ।


 द्रोपदी अयोनिज है जिस कारण उनका जीवन भी  दिब्य और रहस्यपूर्ण है क्यो की उनका आविर्भाव  यज्ञवेदी से हुआ है जिस कारण उनका एक नाम यज्ञशेनी भी हुआ ।


#कुमारी_चापि_पाञ्चाली_वेदिमध्यात्समुत्थिता। (महाभारत आदिपर्व)


जिनका जन्म ही यज्ञवेदी से हुआ हो उनकी पवित्रता पर सन्देह नही किया जा सकता ।

राजा द्रुपद की कन्या होने से उनका एक नाम द्रौपदी भी पड़ा 

साथ ही द्रुपद पाञ्चाल देश का राजा था जिस कारण द्रौपदी का एक नाम पाञ्चाली भी पड़ा । 


द्रौपदी इंद्र की ही पत्नी शचीपति थी 


#शक्रस्यैकस्य_सा_पत्नी_कृष्णा_नान्यस्य_कस्यचित् ।(मार्कण्डेय पुराण ५/२५)


#पूर्वमेवोपदिष्टा_भार्या_यैषा_द्रौपदी (महाभारत अनुशाशन पर्व १९५/३५)


प्रजा के कल्याणार्थ महादेव की आज्ञा से ही इंद्र पत्नी सहित मनुष्य योनि में अवतरित हुए थे ।


#तेजोभागैस्ततो_देवा_अवतेरुर्दिवो_महीम् ।

#प्रजानामुपकारार्थं_भूभारहरणाय_च (मार्कण्डेय पुराण ५/.२०)


#गमिष्यामो_मानुषं_देवलोकाद् (महाभारत आदिपर्व १९५/२६)


देवता :-- दिब्य बिभूतियो को धारण करने के कारण ही वे देवता कहलाते है ।

वे अपनी सङ्कल्प शक्ति से कई प्रकार के रूप धारण करने में सक्षम होते है ।


योगीश्वराः शरीराणि कुर्वन्ति बहुलान्यपि (मार्कण्डेय पुराण ५.२५॥)


पांचों पाण्डव युधिष्ठिर,भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव ये सभी के सभी इंद्र के ही अंश से उतपन्न हुए थे स्वयं इंद्र ही अपने आप को पांच अंशो में विभक्त कर (युधिष्ठिर,भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव,) के रूप में मनुष्य योनि में अवतरित हुए थे ।


#शक्रस्यांस_पाण्डवा: (महाभारत आदिपर्व १९५/ ३४)


#एवमेते_पाण्डवा_सम्वभुवुर्ये_ते_राजन्_पूर्वेमिन्द्रा (महाभारत आदिपर्व  १९५/३५)


#पञ्चधा_भगवानित्थमवतीर्णः_शतक्रतुः॥ (मार्कण्डेय पुराण ५/२३)


अतः पांचों पाण्डव पांच हो कर भी तात्विक दृष्टि से एक ही थे ऐसे में द्रोपदी पर आक्षेप गढ़ने वाले तो आक्षेप गढ़ सकते है परन्तु गूढ़ रहस्यों को समझ पाने में अक्षम होते है ।


शचीपति जो पूर्व में इंद्र की पत्नी थी वही द्रौपदी रूप में यज्ञवेदी से उतपन्न हुई  थी।


शास्त्रो में द्रौपदी की दिब्यरूपा कहा है दिब्य रूप की दिब्यता भी अलौकिक होगी जिसे समझ पाना हम जैसे सर्वसाधारणो के लिए अगम्य है ।


#द्रौपदी_दिव्यरूपा (महाभारत आदिपर्व  /१९५/३५)


द्रोपदी इंद्र के पांचों अंश पाण्डव को वरण इस लिए करती है की  वह  पांचों पाण्डव स्वयं इंद्र ही थे जो स्वयं दिब्य रूपा हो वे इस रहस्य से कैसे अज्ञात रह सकती है 

अतः द्रौपदी पांच पांडवो की पत्नी होते हुए भी एक ही इंद्र की पत्नी थी ।


देवताओं की दिब्य लीलाओं को भला कौन समझे क्या रहस्य है और क्या नही ।


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तेजोभागैस्ततो देवा अवतेरुर्दिवो महीम् ।

प्रजानामुपकारार्थं भूभारहरणाय च॥५.२०॥


यदिन्द्रदेहजं तेजस्तन्मुमोच स्वयं वृषः ।

कुन्त्या जातो महातेजास्ततो राजा युधिष्ठिरः॥५.२१॥


बलं मुमोच पवनस्ततो भीमो व्यजायत ।

शक्रवीर्यार्धतश्चैव जज्ञे पार्थो धनञ्जयः॥५.२२॥


उत्पन्नौ यमजौ माद्रयां शक्ररूपौ महाद्युती ।

पञ्चधा भगवानित्थमवतीर्णः शतक्रतुः॥५.२३॥


तस्योत्पन्ना महाभागा पत्नी कृष्णा हुताशनात्॥५.२४॥


शक्रस्यैकस्य सा पत्नी कृष्णा नान्यस्य कस्यचित् ।

योगीश्वराः शरीराणि कुर्वन्ति बहुलान्यपि॥५.२५॥


पञ्चानामेकपत्नीत्वमित्येतत् कथितं तव ।

श्रूयतां बलदेवोऽपि यथा यातः सरस्वतीम्॥५.२६॥(मार्कण्डेय पुराण)


शैलेन्द्र सिंह