Sunday, 11 July 2021

एकलव्य

 ■●> एकलव्य :--

महाभारत को काल्पनिक कहने वाले पाश्चात्यविद्  तथा वामपन्थी  इतिहासकार एकलब्य बिषय को बार बार उठाकर जनमानस में वैमनस्यता का बीज बोता है इन तथाकथित इतिहासकारों के अनुसार विश्वविख्यात अयाख्यान महाभारत जब काल्पनिक ही है तो उसमें आये हुए कथानक वास्तविका कैसे ??

उन धूर्त तथाकथित इतिहासकारों के सामने प्रथम यही प्रश्न रखना चाहिए 

फिर देखिए क्या होता है ।

अस्तु यह एक ऐसा बिषय है जिसकी भ्रांति जनमानस में ऐसा व्याप्त है  बड़े से बड़ा विद्वान भी इस बिषय को लेकर यह तक कह डालते है कि एकलव्य के साथ जो हुआ वह न्याय नही है 

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सनातन धर्म मे जितनी महता एक श्रोतीय ब्राह्मण की है उतनी ही महता एक स्वधर्मप्रायण शुद्र की है 

■● अपि शुद्रं च धर्मज्ञं सद् वृत्तमभिपूजयेत् (महाभारत अनुशाशन पर्व ४८/४८)


 स्व स्व धर्मानुरक्त धर्मानुरागी का सम्मान तो स्वयं ईश्वर भी करता है इस लिए शूद्रकुल में उतपन्न हुए विदुर को भी साक्षात् धर्म का अंश माना गया  ,निषादराज गुह्य तो हमारे इष्टदेव श्रीरामचन्द्र के सखा तक हुए फिर 

 निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलब्य के साथ भेदभाव व्यवहार करने का कोई औचित्य भी नही बनता ।


महाभारत में युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का वर्णन है, जिसके अनुसार इस यज्ञ में सभी वर्णों के लोगों के साथ - साथ देश - विदेश के विभिन्न राजाओं को आमंत्रित किया गया था। इनमें निषादराज एकलव्य भी थे तथा उनका स्थान श्रेष्ठ राजाओं और ब्राह्मणों के मध्य था । यदि निषाद जाती के साथ  भेदभाव  हीनभावना होती तो एकलब्य को राजाओं और ब्राह्मणों के मध्य  स्थान न मिला होता ।


■● दुर्योधने च राजेन्द्रे स्थिते पुरुषसत्तमे।

कृपे च भारताचार्ये कथं कृष्णस्त्वयाऽर्चितः।।

द्रुमं कम्पुरुषाचार्यमतिक्रम्य तथाऽर्चितः।

भीष्मके चैव दुर्धर्षे पाण्डुवत्कृतलक्षणे।।

नृपे च रुक्मिणि श्रेष्ठे एकलव्ये तथैव च। (महाभारत सभापर्व ४०/१३-१४)


अतः यह स्प्ष्ट हुआ कि जितना सम्मान भिन्न भिन्न देश से आये हुए राजाओं तथा आचार्यो का था उतना ही सम्मान निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य का भी था ।

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■● द्रोणाचार्य :--


■● द्रोणस्तपस्तेपे महातपाः।। (म 0आ0 १२९/४४)

■●वेदवेदाङ्गविद्वान्स तपसा ।(म0 आ0 १२९/४५)

■● गुरवे ब्रह्मवित्तम (म 0 आ0 १३१/५५)


गुरुद्रोणाचार्य के बिषय में ब्रह्मवेत्ता ,महातपस्वी,वेद वेदाङ्ग विद्या में निष्णात पद विशेषण आया है ऐसा श्रोतीय महातपस्वी ब्रह्मवेत्ता आचार्य जो सम्पूर्ण विद्या में निष्णात हो वे न किसी से द्वेष ही करते है और न किसी से मोह ऐसा श्रुतिवचन है 

■◆ तत्र को मोहः कः शोकेस एकत्वमनुपश्यत


पाञ्चाल नरेश द्रुपद ने जब आचार्य द्रोणाचार्य को तिरस्कृत किया तब वे हस्तिनापुर पहुच कर वे अपनी ब्यथा भीष्म पितामह से कह सुनाई 

भीष्म पितामह ने आचार्य द्रोणाचार्य के सामने अपना प्रस्ताव रखा कि आप यही हस्तिनापुर में रह कर  कुरुवंश के राजकुमारों को धनुर्वेद एवं अस्त्र शास्त्रो की शिक्षा दीजिए एवं कौरवों के घर पर सदा सम्मानित हो मनवान्छित उपभोगों का भोग कीजिये ।

भीष्पिताम्ह का यह प्रस्ताव गुरु द्रोणाचार्य ने स्वीकार किया और भीष्मपितामह को वचन भी दिया कि इसी कुरुवंश के राजकुमारों को मैं विश्व के महानतम योद्धा बनाऊंगा ।


■● अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय।

भुङ्क्ष भोगान्भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये।।

कुरूणामस्ति यद्वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम्।

त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव (महाभारत आदिपर्व १३०/७७-७८)


निष्पक्ष भाव से आचार्य द्रोणाचार्य कुरुवंश के राजकुमारों को धनुर्वेद सहित समस्त शास्त्रो अस्त्रों की शिक्षा देने लगे थे ।

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■●एकलव्य:--


निषादराज हिरण्यधनु पुत्र एकलव्य  अस्त्र शस्त्र विद्या प्राप्त करने हेतु जब आचार्य द्रोणाचार्य के पास जाते है तब आचार्य द्रोणाचार्य उन्हें शिक्षा देने के लिए मना कर देते है ।


■● ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः।

एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह।।

न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्।

■● शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया। (महाभारत आदिपर्व  १३१/  ३१-३२ )


एक क्षण के लिए तो यहाँ पाठकगण को यह लगेगा कि द्रोणाचार्य ने ऐसा अन्याय क्यो किया ??

एकलब्य को धनुर्वेद की  शिक्षा क्यो नही दी। 


ऐसा इस लिए हुआ कि  गुरुद्रोणाचार्य वचनबद्ध थे उन्होंने  भीष्मपितामह को वचन दे रखा था कि कुरुवंश के  राजकुमारों को अस्त्र शास्त्र की शिक्षा देगा ।

दूसरा कारण यह है कि गुरुद्रोणाचार्य को वेतन , धनधान्य तथा समस्त भोग उपलब्ध  पितामह भीष्म करा रहे थे तो भला कुरुवंश को छोड़ वे अन्य कुमारों को शिक्षा देना स्वयं अपने वचनों को भंग करना होता 

द्वेष का कोई कारण नही अपितु वे इस कलङ्क से भी बचना चाहते थे कि वेतन कोई और दे और धनुर्वेद सहित अस्त्र शस्त्र की शिक्षा किसी और को दे ऐसे में पितामह भीष्म भी यह प्रश्न उठा सकते थे कि  आप के मनोवांछित समस्त भोग तथा वेतन कुरुवंश की ओर से प्राप्त हो रहा है और आप कुरुवंश राजकुमारों को छोड़ किस और को अस्त्र शस्त्र विद्या में निष्णात करा रहे है ।

इस कारण आचार्य द्रोण ने एकलब्य को अपने यहाँ धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया ।

गुरु द्रोणाचार्य के मना करने के पश्चात एकलब्य ने वन में लौट कर आचार्य द्रोणाचार्य की ही मूर्ति बना धनुर्विद्या का अभ्यास आरम्भ किया ।


■● स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परन्तपः।

अरण्यमनुसंप्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम्।

तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा।

इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः।। (महाभारत आदिपर्व १३१/३३-३४)


यहाँ दो बिषय बड़े ही महत्वपूर्ण है ।


नम्बर -१ - गुरु के अनुमति के बिना उनकी मूर्ति बना कर अभ्यास प्रारम्भ करना स्मृति शास्त्रो में स्प्ष्ट आदेश आये है कि गुरु की अनुमति के बिना विद्या का अध्ययन करने वाला चोर है और वह दण्ड के पात्र है ।


■● ब्रह्म यस्त्वननुज्ञातं अधीयानादवाप्नुयात् ।

स ब्रह्मस्तेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपद्यते (मनुस्मृति २/११६)

और एकलब्य ने वही किया गुरुद्रोणाचार्य के मना करने के बाद भी उनकी मूर्ति बना कर धनुर्वेद विद्या का अभ्यास  प्रारम्भ किया 


नम्बर -२-- विद्या प्राप्त होने के पश्चात शिष्य अपने गुरु को दक्षिणा प्रदान करें ।


■●  शक्त्या गुर्वर्थं आहरेत् । । 

■◆ क्षेत्रं हिरण्यं गां अश्वं छत्रोपानहं आसनम् ।

धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिं आवहेत्  (मनुस्मृति २/२४५-२४६)


एकलब्य द्वारा विधा की चोरी करना उसे दण्ड का पात्र बनाता है तो गुरु के शिक्षा प्राप्त कर दक्षिणा देने का अधिकारी भी बनाता है 


जब आचार्य द्रोणाचार्य को यह ज्ञात हुआ कि एकलब्य उनकी मूर्ति बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा है तो वे मनोमन प्रसन्न  हुए और उनके कौशल को देखने वन में चले वहाँ एकलब्य की प्रतिभा देख वे दंग रह गए और बिचार भी किये की यदि यह बालक हस्तिनापुर क्षेत्र के अन्तर्गत रहते हुए धनुर्विद्या में पारंगत हो जाता है तो भीष्मपितामह सहित राजा धृतराष्ट्र एवं कृपाचार्य आदि आचार्यगण क्या सोचेंगे ?

इस बिषम परिस्थिति को भांपते हुए गुरुद्रोणाचार्य ने यह बिचार किया कि  एकलब्य का अनिष्ट भी न हो और वे अपनी धनुर्विद्या का अभ्यास भी आरम्भ रखे और मैं कलङ्कित भी न होऊं ।

आचार्य द्रोण एकलब्य से गुरिदक्षिणा मांगता है ।


■● यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम।। (महाभारत आदिपर्व १३१/ ५४)

 

गुरुदक्षिणा का नाम सुन एकलव्य प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ आप स्वयं  इसके लिए आज्ञा दे 

आचार्य द्रोण एकलब्य से गुरुदक्षिणा में उनका अंगूठा मांग लिया 


■◆तमब्रवीत्त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति।। (महाभारत आदिपर्व १३१/५६)

एकलब्य आचार्य द्रोण की इस दारुण वचन सुनकर भी बिना बिचलित हुए प्रसन्नचित हो कर अपने दाहिने हाथ के अंगूठे को काट कर द्रोणाचार्य को समर्पित किया ।


■●तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः।

छित्त्वाऽविचार्य तं प्रादाद्द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः (महाभारत आदिपर्व १३१/५८)

यहाँ भी दो विशेषता है एक तो एकलब्य स्वयं इस प्रकार के दारुणवचन सुनकर भी विचलित नही हुए और  प्रसन्नचित हो गुरुदक्षिणा देकर अपनी गुरुभक्ति भी सिद्ध की ।


वामसेफियो मुलविहीन हिन्दुओ को इस प्रकरण पर भले ही पेट मे दर्द हो परन्तु एकलब्य को अंगूठे कटने पर भी दर्द न हुआ यहाँ प्रसन्नचित जो विशेषण आया है वह इसकी पुष्टि स्वयं करता है ।

एकलब्य की गुरुभक्ति देख आचार्य द्रोण भी प्रसन्न हुए और तत्क्षण एकलब्य को ऐसी विद्या दे डाली जो अपने प्रिय पुत्र तथा शिष्यों को भी प्रदान नही किये ।


■● ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत।

न तथा च स शीघ्रोऽभूद्यथा पूर्वं नराधिप।। (महाभारत आदिपर्व १३१/५९)


गुरुद्रोणाचार्य ने संकेत में ही एकलब्य को यह विद्या प्रदान की जिससे वे तर्जनी और मध्यमा अंगुली से किस प्रकार वाणों का संघान करना चाहिए ।

गुरुद्रोणाचार्य की दृष्टि में एकलब्य के प्रति द्वेष अथवा हेय भाव होता तो वे उन्हें ऐसी विद्या क्यो प्रदान की होती ?

शैलेन्द्र सिंह


Wednesday, 30 June 2021

शिक्षा और शूद्र





हिन्दुओ के लिए वेद स्वतः प्रामाणसिद्ध है ईश्वर द्वरा प्रतिपादित बिषय भी यदि वेद विरुद्ध हो तो वे अप्रामाणिक माने जाते है यही वेद की वेदता और हिन्दू होने का प्रथमप्रामाण है ।


अल्पज्ञ अल्पश्रु भ्रामक ब्यक्तियो वामपंथियों ईसाइयों इस्लामिको  का कहना है कि शूद्रों को पढ़ने नही दिया जाता था उन्हें जानबूझ कर अशिक्षित रखा जाता था ताकि उसका शोषण कर सके ।

प्रथमतः स्प्ष्ट कर देना चाहता हूं कि वैदिक सनातन धर्म शोषणवादी नही अस्तु पोषणवादी है ऐसा कोई कर्मकाण्ड नही जहाँ समस्त वर्णों को आर्थिक रूप से लाभ नही मिलता हो इस पर मैं कई बार पोस्ट लिख चुका हूं अतः वही बिषय को पुनश्च यहाँ रखने का कोई अर्थ नही बनता  ।

दूसरी बात विद्यादि में शूद्रों का भी अधिकार था यह बात 

■ श्रुतिस्मृतिइतिहासपुराणादि से सिद्ध है ।

समावेदीय छन्दोग्य उपनिषद में राजा अश्वपति यह घोषणा करते है

कि मेरे राज्य में कोई भी अशिक्षित नही  , न ही कोई मूर्ख 


■ न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः।

नानाहिताग्निर्ना विद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतः॥ (छान्दोग्य॰ ५ । ११ । १५)

केवल इतना ही नही त्रेतायुग में इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के शासनकाल में भी ऐसा कोई ब्यक्ति देखने को नही मिलता जो अशिक्षित हो ।


■ कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित् ।

द्रष्टुम् शक्यम् अयोध्यायाम् न अविद्वान् न च नास्तिकः ॥(वा0 रा0 १/६/८)


अयोध्या में कही कोई कामी,कृपण, क्रूर,अविद्वान,नास्तिक ब्यक्ति देखने को नही मिलता है ।

अतः इससे स्प्ष्ट प्रामाण हो जाता है कि विद्या आदि में शूद्रों का अधिकार था केवल इतना ही नही शिक्षा दर भी १००% थी तत्तकालीन शासनतंत्र के अधीन भारत के समस्त नागरिक शिक्षित नही है जबकि जिस कालखण्ड में श्रुतिस्मृतिइतिहासपुराणादि का प्रचार प्रसार ईस भूखण्ड पर पूर्णरूपेण था उस कालखण्ड में कोई भी ब्यक्ति अशिक्षित नही था ।

भारत जब यवनों अरबो तुर्को ब्रिटेन की दासता झेल रहा था उसीकालखण्ड में यह अशिक्षिता  व्याप्त हुई क्यो की गुरुकुलों को नष्ट करना विश्विद्यालयों को अग्निदाह करना ही मूल कारण रहा ।


 शूद्रों का तो शिल्पविद्या में एकक्षत्र राज था ।

वर्णाश्रमधर्मी होने का यही अर्थ होता है कि कोई भी किसी के अधिकारों का हनन न करें स्व स्व धर्म का पालन निष्पक्षता पूर्ण करें 

महाभारत जैसे अयाख्यानों में शूद्रकुल में जन्मे हुए विदुर को हस्तिनापुर जैसे साम्राज्य का महामन्त्री बनाया वे नीतिशास्त्र के ज्ञाता धर्माधर्म बिषयों के ज्ञाता तथा साक्षात् धर्म का अंश माना गया यदि सनातन धर्म शोषणवादी अशिक्षित रखने की नीति होती तो स्वधर्मपरायण विदुर को हस्तिनापुर जैसे साम्राज्य का महामन्त्री न बनाया होता ।

एकलब्य के बिषय को लेकर भी भ्रामक प्रचार किया गया है 

महाभारत में ही स्प्ष्ट लिखा है कि गुरु द्रोणाचार्य ने एकलब्य को वह विद्या प्रदान की जो न तो पाण्डवो, कौरवो और न ही अश्वथामा को प्रदान की थी ।

इक्ष्वाकु वंश के ही राजा हरिश्चंद्र एक चाण्डाल के यहाँ नौकरी किये अब बिचार कीजिये कि इक्ष्वाकु वंश के राजा को भी खरीदने का सामर्थ्य एक चाण्डाल के पास था कितना धन होगा उस चाण्डाल के पास ??

हमने कभी भी बिषयों पर सत्यासत्य बिचार नही किया अपितु हमने उसी को सत्य मान बैठा जिसका प्रचार वामी,कामी,इस्लामी,ईसाइयत,गैंग ने प्रचार किया और वे सफल भी हुए पाश्चात्यविद से लेकर भारत के हिन्दू इस बिषय पर भ्रामित है ।

इन सब मिथ्या बिषयों का प्रचार प्रसार भी इस लिए हुए की यवन ,तुर्क,अरब,(इस्लामी) यूरोप (ईसाइयों) ने जब धर्मान्तरण करने में असफल हुए तो वे इस तरह के भ्रामक प्रचार प्रसार किया ताकि विखण्डन का बीज बोया जा सके और धतमान्तरण रूपी खेल आसान हो जाय ।


शैलेन्द्र सिंह

Thursday, 24 June 2021

द्रौपदी रहस्य




धर्मस्य_सूक्ष्मतवाद्_गतिं (महाभारत ) 

धर्म की गति अति सूक्ष्म है अतः हम जैसे अल्पज्ञ अल्पश्रुत पूर्णतः धर्म बिषयो के गूढ़ रहस्य को समझ पाने में अक्षम है बस हम अपनी बुद्धि बल से ही बिषयो का अन्वेषण करते फिरते है   धर्म के गूढ़ रहस्यों के बिषय में पूर्णप्रज्ञ मनीषी जन ही समझ सकते है 

ठीक ऐसा ही रहस्य यज्ञशेनी द्रोपदी का है ।


 द्रोपदी अयोनिज है जिस कारण उनका जीवन भी  दिब्य और रहस्यपूर्ण है क्यो की उनका आविर्भाव  यज्ञवेदी से हुआ है जिस कारण उनका एक नाम यज्ञशेनी भी हुआ ।


#कुमारी_चापि_पाञ्चाली_वेदिमध्यात्समुत्थिता। (महाभारत आदिपर्व)


जिनका जन्म ही यज्ञवेदी से हुआ हो उनकी पवित्रता पर सन्देह नही किया जा सकता ।

राजा द्रुपद की कन्या होने से उनका एक नाम द्रौपदी भी पड़ा 

साथ ही द्रुपद पाञ्चाल देश का राजा था जिस कारण द्रौपदी का एक नाम पाञ्चाली भी पड़ा । 


द्रौपदी इंद्र की ही पत्नी शचीपति थी 


#शक्रस्यैकस्य_सा_पत्नी_कृष्णा_नान्यस्य_कस्यचित् ।(मार्कण्डेय पुराण ५/२५)


#पूर्वमेवोपदिष्टा_भार्या_यैषा_द्रौपदी (महाभारत अनुशाशन पर्व १९५/३५)


प्रजा के कल्याणार्थ महादेव की आज्ञा से ही इंद्र पत्नी सहित मनुष्य योनि में अवतरित हुए थे ।


#तेजोभागैस्ततो_देवा_अवतेरुर्दिवो_महीम् ।

#प्रजानामुपकारार्थं_भूभारहरणाय_च (मार्कण्डेय पुराण ५/.२०)


#गमिष्यामो_मानुषं_देवलोकाद् (महाभारत आदिपर्व १९५/२६)


देवता :-- दिब्य बिभूतियो को धारण करने के कारण ही वे देवता कहलाते है ।

वे अपनी सङ्कल्प शक्ति से कई प्रकार के रूप धारण करने में सक्षम होते है ।


योगीश्वराः शरीराणि कुर्वन्ति बहुलान्यपि (मार्कण्डेय पुराण ५.२५॥)


पांचों पाण्डव युधिष्ठिर,भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव ये सभी के सभी इंद्र के ही अंश से उतपन्न हुए थे स्वयं इंद्र ही अपने आप को पांच अंशो में विभक्त कर (युधिष्ठिर,भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव,) के रूप में मनुष्य योनि में अवतरित हुए थे ।


#शक्रस्यांस_पाण्डवा: (महाभारत आदिपर्व १९५/ ३४)


#एवमेते_पाण्डवा_सम्वभुवुर्ये_ते_राजन्_पूर्वेमिन्द्रा (महाभारत आदिपर्व  १९५/३५)


#पञ्चधा_भगवानित्थमवतीर्णः_शतक्रतुः॥ (मार्कण्डेय पुराण ५/२३)


अतः पांचों पाण्डव पांच हो कर भी तात्विक दृष्टि से एक ही थे ऐसे में द्रोपदी पर आक्षेप गढ़ने वाले तो आक्षेप गढ़ सकते है परन्तु गूढ़ रहस्यों को समझ पाने में अक्षम होते है ।


शचीपति जो पूर्व में इंद्र की पत्नी थी वही द्रौपदी रूप में यज्ञवेदी से उतपन्न हुई  थी।


शास्त्रो में द्रौपदी की दिब्यरूपा कहा है दिब्य रूप की दिब्यता भी अलौकिक होगी जिसे समझ पाना हम जैसे सर्वसाधारणो के लिए अगम्य है ।


#द्रौपदी_दिव्यरूपा (महाभारत आदिपर्व  /१९५/३५)


द्रोपदी इंद्र के पांचों अंश पाण्डव को वरण इस लिए करती है की  वह  पांचों पाण्डव स्वयं इंद्र ही थे जो स्वयं दिब्य रूपा हो वे इस रहस्य से कैसे अज्ञात रह सकती है 

अतः द्रौपदी पांच पांडवो की पत्नी होते हुए भी एक ही इंद्र की पत्नी थी ।


देवताओं की दिब्य लीलाओं को भला कौन समझे क्या रहस्य है और क्या नही ।


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तेजोभागैस्ततो देवा अवतेरुर्दिवो महीम् ।

प्रजानामुपकारार्थं भूभारहरणाय च॥५.२०॥


यदिन्द्रदेहजं तेजस्तन्मुमोच स्वयं वृषः ।

कुन्त्या जातो महातेजास्ततो राजा युधिष्ठिरः॥५.२१॥


बलं मुमोच पवनस्ततो भीमो व्यजायत ।

शक्रवीर्यार्धतश्चैव जज्ञे पार्थो धनञ्जयः॥५.२२॥


उत्पन्नौ यमजौ माद्रयां शक्ररूपौ महाद्युती ।

पञ्चधा भगवानित्थमवतीर्णः शतक्रतुः॥५.२३॥


तस्योत्पन्ना महाभागा पत्नी कृष्णा हुताशनात्॥५.२४॥


शक्रस्यैकस्य सा पत्नी कृष्णा नान्यस्य कस्यचित् ।

योगीश्वराः शरीराणि कुर्वन्ति बहुलान्यपि॥५.२५॥


पञ्चानामेकपत्नीत्वमित्येतत् कथितं तव ।

श्रूयतां बलदेवोऽपि यथा यातः सरस्वतीम्॥५.२६॥(मार्कण्डेय पुराण)


शैलेन्द्र सिंह

Tuesday, 25 May 2021

वैदिक_वाङ्गमय_और_संगीत

 



वैदिक वाङ्गमय में स्वर के सात प्रकार बताए गए है 


सप्तधा वै वागवदत्' (ऐतरेय ब्राह्मण)


और इन्ही सात स्वरों से संगीत की उत्पति मानी गई है जिसे सप्तक कहा जाता है । 

संगीत जिसका उद्गमस्थल ही सामवेद है जिसे पाश्चात्यकारो ने भी मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है 


सप्तक

षड्ज , ऋषभ   , गांधार , मध्यम , पंचम , धैवत , और  निषाद - सा रे ग म प ध नी सा - यह सात स्वर ब्रह्म व्यंजक होने से ही ब्रह्मरूप कहलाये ।

'पक्षियों एवं जानवरों द्वारा स्वरों की उत्पत्ति'

सप्‍तस्‍वर की उत्‍पति :


षड्जं व‍दति मयूर: पुन: स्‍वरमृषभं चातको ब्रूते 

गांधाराख्‍यं छागोनिगदति च मध्‍यमं क्रौञ्च ।।


गदति पंचममंचितवाक् पिको रटति धैक्‍तमुन्मदर्दुर: 

शृणिसमाशृणिसमाहतमस्‍तक कुंजरो गदति नासिक या, स्‍वरमंतिमम् ।।१७१।। 

                                                            -- संगीत दर्पण से


(मोर से षड्ज, चातक से ऋषभ, बकरे से गांधार, क्रौंच पक्षी से मध्‍यम, कोयल से पंचम, मेंढक से धैवत और हाथी से निषाद स्‍वर की उत्‍पति होती है)

मोर- षड्ज स्वर में बोलता है।

पपीहा- ऋषभ स्वर में बोलता है।

राजहंस- गांधार स्वर में बोलता है।

सारस- मध्यम स्वर में बोलता है।

कोयल- पंचम स्वर में बोलती है।

घोड़ा- धैवत स्वर में हिनहिनाता है।

हाथी- निषाद स्वर में बोलता है।


'स्वरों के रंग'


षड्ज- गुलाबी।

ऋषभ- हरा।

गांधार- नारंगी।

मध्यम- गुलाबी (पीलापन लिए)।

पंचम- लाल।

धैवत- पीला।

निषाद- काला।


'स्वरों के देवता, प्रभाव, स्वभाव व ऋतु'


षड्ज_


देवता- अग्नि।

प्रभाव- चित्त को आह्लाद देने वाला।

ऋतु- शीत।


ऋषभ_


देवता- ब्रह्मा।

प्रभाव- मन को प्रसन्न करने वाला।

ऋतु- ग्रीष्म।


गांधार_


देवता- सरस्वती।

ऋतु- ग्रीष्म।

स्वभाव- ठंडा।


मध्यम_


देवता- महादेव।

ऋतु- वर्षा।


पंचम_


देवता- लक्ष्मी।

ऋतु- वर्षा।

स्वभाव- गर्म, शुष्क।


धैवत_


देवता- गणेश।

ऋतु- शीत।

स्वभाव- कभी प्रसन्न कभी शोकातुर।


निषाद_


देवता- सूर्य।

ऋतु- शीत।

स्वभाव- ठंडा व शुष्क।


Sa (षड्ज or Shadaja) ~ Sun / Aries ( षड्ज means six-born , Sun is figuratively the son of six Indian seasons)


Re (ऋषभ or Rishava) ~ Moon / Taurus ( ऋषभ means not a bull but 'white radiance' symbolical of purity)

 

Ga (गान्धार or Gandharam) ~ Venus / Gemini ( गान्धारं means 'heavenly singer' , quite typical of the planet)

 

Ma (मध्यम or Madhyamam) ~ Jupiter/ Cancer ( मध्यमं means medium , the archetypal teacher is the medium of knowledge to the disciple )

 

Pa (पंचम or Panchama) ~ Mars/ Leo ( पंचमं etymologically means 'binding up' , the fifth is also the 'central' number)

 

Dha ( धैवत or Dhaivata) ~ Mercury/ Virgo (धैवत means devout or morally intelligent)

 

Ni (निषाद or Nishada) ~ Saturn / Libra (  निषाद actually means downward not 'outcaste', the 7th sign naturally is the descendant  of the zodiac)

साभार :-- समुद्रगुप्त विक्रमार्क

पुराण विमर्श भाग २

 श्रोतीयब्रह्मनिष्ठ आचार्यो  के सानिध्य के बिना शास्त्रो के गूढ़ रहस्य को साधारण ब्यक्ति न तो समझ ही पाएंगे और न ही ठीक ठीक मनन  ।


इस लिए शास्त्रो का इस बिषय को लेकर स्प्ष्ट आदेश रहा है 


●-आचार्यवान पुरुषो हि वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)

●-तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् )  


●-इतिहास पुराणाभ्या वेद समुपबृध्येत् (महाभारत )


पुराणों के अध्ययन किये बिना वेदो को समझना कठिन ही नही किन्तु सर्वथा असम्भव है क्यो की मन्त्रार्थ ज्ञान के लिए विनियोग ज्ञान आवश्यक है और विनियोग वर्णित ऋषियों और देवताओं के चरित्र जानने के लिए पुराणों का स्वध्याय अत्यावश्यक है हमारे पास पुराणग्रन्थ ही एकमात्र साधन है जिससे कि हम ऋषयो और देवताओं के बिषय में सर्वतोमुख ज्ञान प्राप्त कर सकते है निखिल आनन्दस्वरूप आनन्दकन्द सर्वज्ञ  ने वेद विद्या का प्रकाश कर पुराणों को भी साथ ही साथ प्रकाशित किया जिससे देवताओं और ऋषयो के जीवन वृत्तांत तथा उनके चरित्रों का भी दिग्दर्शन कराया जा सके ।

जिस प्रकार वेद अपौरुषेय है ठीक उसी प्रकार पुराण भी अपौरुषेय है इसकी पुष्टि स्वयं श्रुति ही करती है 


●- अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि   (बृहदारण्यक उपनिषद)


ऋषयो मंत्र दृष्टारः' (निरुक्त) ऋषिगण मन्त्रद्रष्टा हुए कर्ता नही ठीक उसी प्रकार पुराणों के वक़्ता सत्यवतीसुत  व्यास 

हुए कर्ता नही ।

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● शंका :---  अष्टादश (१८) पुराणों के वक़्ता यदि सत्यवती सुत कृष्णद्वैयापन व्यास ही है तो फिर सृष्टि ,उत्पती,विनाश ,वंश परम्परा, मनुओं का कथन  विशिष्ट व्यक्तियों के चरित्र उक्त यह पांचों बिषय पुराणों में  भेद के साथ क्यो मिलते है ??


निवारण :--- इस संसय का निवारण भी पुराण से ही हो जाता है कलिकाल के प्रभवा से मनुष्यो को क्षिणायु निर्बल एवं दुर्बुद्धि जानकर ब्रह्मादि लोकपालों के प्रार्थना करने पर धर्मरक्षा के लिए महर्षि पराशर द्वरा सत्यवती में भगवन के अंशांश कलावतार रूप में अवतार धारण कर वेद तथा पुराणों को विभक्त कर उसे प्रकाशित किया ततपश्चात महामति व्यास ने अपने योग्य पैल , वैशंपायन ,जैमिनी ,सुमंत आदि शिष्यों पर वेद संहिताओं के रक्षण का भार निहित किया तथा इतिहास और पुराणों के रक्षा का भार सुत के पिता रोमहर्षण को नियुक्त किया रोमहर्षण जी के  छः शिष्य  सुमति ,मित्रयु ,शांशपायन अग्निवर्चा अकृतव्रण ,और सावर्णि थे ।


●-प्रख्यातो व्यासशिष्योऽभूत् सूतो वै रोमहर्षणः ।

पुराणसंहितां तस्मै ददौ व्यासो महामुनिः ।। (विष्णु पुराण ३/६/१६)

●-इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षणः ॥(श्रीमद्भागवतम् १/४/२२)


●-सुमतिशचाग्नि वर्चाश्च  मित्रायुः शांशपायनः ।

अकृतव्रणः सावर्णिः षट् शिष्यास्तस्य चाभवन् (विष्णु पुराण ३/६/१७)


●-षट्शः कृत्वा मयाप्युक्तं पुराणमृषिसत्तमाः 

आत्रेयः सुमतिर्धीमान्काश्यपो ह्यकृतव्रणः।

भारद्वाजोऽग्निवर्चाश्च वसिष्ठो मित्रयुश्च यः ।

सावर्णिः सोमदत्तिस्तु सुशर्मा शांशपायनः (वायु पुराण )


जिस प्रकार शाखा भेद के कारण शाकल तथा वाष्कल संहिताओं में मन्त्रो का न्यूनाधिक देखने को मिलता है ठीक उसी प्रकार शिष्य प्रशिष्य के भेद के कारण पुराणों में भी पाठ भेद हो सकता है ।

 यदि पुराणों के सङ्कलनकर्ता भिन्न भिन्न व्यास माने तो 

पुराणों के इन वचनों का क्या होगा ?

  

●-अष्टादश पुराणानि वयासेन कथितानी तू ( मत्सय पुराण / वराह पुराण )

●-पराशरसुतो व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽभवत् ।

स एव सर्ववेदानां पुराणानां प्रदर्शकः ।(कूर्मपुराण ५२/९)

अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।(देवीभागवत पुराण स्कंध १/ अध्याय ३ श्लोक संख्या १७)


अतः पुराणों के सङ्कलनकर्ता भिन्न भिन्न व्यास नही अपितु कृष्णद्वैयापन व्यास ही सिद्ध होता है ।


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●शंका  :-- अच्छा यह तो ठीक है परन्तु अष्टादश (१८) पुराणों की रचना सत्यवती सुत ही अगर करते तो पुराणों में ही ऐसा क्यो कहा गया है कि वशिष्ठ और पुलत्स्य के वरदान से महर्षि पराशर जी ने विष्णु पुराण की रचना की 


●-अथ तस्य पुलस्त्यस्य वसिष्ठस्य च धीमतः।। 

प्रसादाद्वैष्णवं चक्रे पुराणं वै पराशरः।। (लिङ्ग पुराण पूर्वभाग ६४/१२०-१२१)


निवारण  :--वेदो की भांति पुराण भी नित्य माने गए है स्वयं वेदो का ही इस बिषय पर शङ्खानाद है  अतः पुराणों के रचयिता  कोई नही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी भी पुराणों को स्मरण ही करते है 

 पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् l

अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदा अस्य विनिर्गता: l 


यदि पुराणों के कर्ता महर्षि पराशर वा महर्षि व्यास माना जाय तो फिर श्रुतियाँ ही बाधित हो जाय ।


ऋक् ,यजु,साम,अथर्व,इतिहास,पुराणादि समस्त विद्या उस आनन्दकन्द सर्वज्ञ परमेश्वर  से ही प्रकट हुए है अतः इस शंका का निवारण यही हो जाता है कि पुराणों के कर्ता महर्षि पराशर अथवा व्यास नही है वे तो केवल  सङ्कलनकर्ता मात्र है ।


जो ऋषि मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के द्रष्टा है वे ही पुराणों के प्रवक्ता भी है ।

पुराणों के उपक्रम और उपसंहार पढ़ने पर अथवा नारद आदि पुराणों में दी हुई पुराणसूची का परायण करने पर यह स्प्ष्ट हो जाता है कि समस्त पुराणों के आदिम वक़्ता ब्रह्मा,विष्णु,महेश,पराशर,अग्नि,सावर्णि,मार्कण्डेय ,और सनकादि तथा आदिम श्रोता ब्रह्मा मारीच वायु गरुड़ नारद वशिष्ठ जैमिनी पुलत्स्य भूमि आदि है इन सब के पुरातन संवादों को ही वेदव्यास जी ने द्वापर के अंत मे क्रमबद्ध किया ।


●--ये एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टार: प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति। (न्यायदर्शन ४/१/६२)


बिस्तार भय  के कारण अत्यधिक प्रमाणों को मैं यहाँ नही रख पा रहा हूँ फिर भी विद्जनो के लिए इतना उपदिष्ट कर दे रहा हूँ जो समय निकाल कर शंका का निवारण कर सके 

मत्स्य पुराण अध्याय ५५ जहाँ इस विषय मे बिस्तार से बताया गया है कि किन किन पुराणों को किन किन ऋषयो अथवा देवताओं के प्रति कहा गया था ।

अतः विष्णु पुराण के प्रति महर्षि पराशर का भी यही सन्दर्भ लेना उचित जान पड़ता है क्यो की समस्त पुराण एक सुर में यही उद्घोषणा करते है कि । 


●-अष्टादश पुराणानि वयासेन कथितानी तू ( मत्सय पुराण / वराह पुराण )

●-पराशरसुतो व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽभवत् ।

●-स एव सर्ववेदानां पुराणानां प्रदर्शकः ।(कूर्मपुराण ५२/९)

अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।(देवीभागवत पुराण स्कंध १/ अध्याय ३ श्लोक संख्या १७)

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विशेष----● पुराणों के बिषय में गौड़ापाद,शङ्कर, रामानुज,माध्व, वल्लभाचार्य,निम्बकाचार्य प्रभृति आचार्यो तथा इनसे भी पूर्वकालिक मूर्धन्य आचार्यो एवं विद्वानों को भी पुराणादि बिषयों पर सन्देह नही था अपितु हम जैसे अल्पज्ञ अल्पश्रुत स्वयमेव स्वघोषित विद्वान बन शास्त्रो के अर्थो का मनमाना अर्थ बड़ी धृष्टतापूर्वक कर विद्वान बनने का ढोल पीटने लगते है इससे बड़ा और हास्यस्पद क्या हो सकता है भले ही वह मैं ही क्यो न रहूं ।


शैलेन्द्र सिंह

पुराण आक्षेपो का खण्डन भाग १



 


मान्यवर तथागत ने वेदव्यास कृत पुराणादि बिषयों पर जो आक्षेप लगाए है वह अनादर है स्वध्याय आदि अल्पता के कारण लोगो मे तद् तद् बिषयों के प्रति भ्रम उतपन्न होना स्वभाविक है ।

मुख्य रूप से जो आक्षेप लगाए है वह यह है 


नम्बर (१):--पुराण की रचना काल की अवधि लगभग ५०० वर्ष  निर्धारित करना ।


नम्बर (२) :-- १८ पुराणों के कर्ता एक व्यास नही अपितु भिन्न भिन्न व्यास है ।


नम्बर (३) :-- जैसे व्यास पीठ शङ्कर पीठ आदि पर बिराजमान पीठाधीश्वर  को आचार्य शङ्कर तथा आचार्य व्यास से सम्बोधित किया जाता है अतः उन्ही व्यासो द्वरा रचित ग्रन्थों को कृष्ण द्वैयापन व्यास के नाम से ही प्रचारित किया गया हो ।


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सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य (महाभारत अनुशासन पर्व ) धर्म की गति अति सूक्ष्म है इस लिए शास्त्रो का स्प्ष्ट उपदेश है कि 


वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः ।

नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥[ऋ १/१२०/२]

आचार्यवान् पुरुषो हि वेद । (छान्दोग्य उपनिषद)

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् ) 

 

अतः निज मतमतान्तरों अपरम्पराप्राप्त अश्रद्धा से धर्म विषयक अर्थो का अनर्थ करना शास्त्रो की हत्या करने जैसा  है 

#बिभेत्यल्पश्रुताद वेदो मामयं प्रतरिष्यति

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सर्वप्रथम पुराण के कालावधि बिषयों पर बिचार करते है ।


किसी भी बिषयों की सिद्धि हेतु लक्षणों का निरूपण करना आवश्यक है तो फिर पुराणादि ग्रन्थ का निरूपण उनके लक्षणों को छोड़ स्व मतमतान्तर अनुसार बिषयों को प्रतिपादित करना क्या न्यायोचित है ?

पाठक गण बिचार करे ।


पुराणों का लक्षण  शास्त्रो में जो उपदिष्ट है वह यह है 


सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।

वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ।।  (विष्णु पुराण /कूर्म पुराण )

शास्त्रो में पुराण के पांच लक्षण बताए गए है ।

१) सर्ग - पंचमहाभूत, इंद्रियगण, बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन,

(२) प्रतिसर्ग - ब्रह्मादिस्थावरांत संपूर्ण चराचर जगत् के निर्माण का वर्णन,

(३) वंश - सूर्यचंद्रादि वंशों का वर्णन्,

(४) मन्वंतर - मनु, मनुपुत्र, देव, सप्तर्षि, इंद्र और भगवान् के अवतारों का वर्णन्,

(५) वंश्यानुचरित - प्रति वंश के प्रसिद्ध पुरुषों का वर्णन.


अब यदि पुराण का निर्माण काल ५०० वर्ष माने तो फिर सर्ग ,प्रतिसर्ग,वंश,मन्वन्तर,वंश्यानुचरित विषयो का वर्णन कैसे सम्भव होगा ?

अतः इस लक्षणामात्र से ही आप के समस्त दोषों का परिहार हो जा रहा है ।

फिर आप दोषारोपण करेंगे कि हम पुराणों को क्यो माने ?

जब आप पुराण को मानते ही नही तो उसकी व्यख्या क्यो ?

अस्तु वेद स्वयं पुराणों की नित्यता का उद्घोष करता है 


ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह

उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः 

 (अथर्ववेद ११.७.२”)


एवमिमे सर्वे वेदा निर्मितास्सकल्पा सरहस्या: सब्राह्मणा सोपनिषत्का: सेतिहासा: सांव्यख्याता:सपुराणा:सस्वरा:ससंस्काराः सनिरुक्ता: सानुशासना सानुमार्जना: सवाकोवाक्या (गोपथब्राह्मण पूर्वभाग ,प्रपाठक 2) 


अध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युस्तार्क्ष्यो वै पश्यतो राजेत्याह तस्य वयांसि विशस्तानीमान्यासत इति

वयांसि च वायोविद्यिकाश्चोपसमेता भवन्ति तानुपदिशति पुराणं वेदः सोऽयमिति

किंचित्पुराणमाचक्षीतैवमेवाध्वर्युः सम्प्रेष्यति न प्रक्रमान्जुहोति - (शतपथ ब्राह्मण १३.४.३.)


अरेअस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् ऋग्वेद यजुर्वेदःसामवेदोSथर्वाअङ्गीरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषद: श्लोका:सूत्रांण्यनु व्याख्यानानी व्याख्यानान्यस्यैव निश्वासीतानी (बृहदारण्यक उपनिषद २/४/१०)


छान्दोग्य उपनिषद में देवऋषि नारद और सनत कुमार कथा प्रकरण में पुराणादि विद्या का उल्लेख है ।


त्रेता तथा द्वापर युग मे भी पुराणों का श्रवण आदि की परम्परा रही है ।

श्रूयताम् तत् पुरा वृत्तम् पुराणे च मया श्रुतम् (वाल्मीकि।रामायण १-९-१)


पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम्।

कथ्यन्ते ये पुराऽस्माभिः श्रुतपूर्वाः पितुस्तव।।

तत्र वंशमहं पूर्वं श्रोतुमिच्छामि भार्गवम्।

कथयस्व कथामेतां कल्याः स्मः श्रवणे तव।। (महाभारत आदिपर्व )


विस्तार भय से इस बिषय को यही बिराम देता हूँ ।

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नम्बर (2) १८ पुराणों की रचना कृष्णद्वैयापन व्यास नही अपितु भिन्न भिन्न व्यासो ने मिलकर इसकी रचना की ।


अब तक 28 व्यास हो चुके है इस बिषय को लेकर कोई शंका नही परन्तु १८ अष्टादश पुराणों के कर्ता भिन्न भिन्न व्यास नही है कृष्णद्वैयापन व्यास ही है  इसकी पुष्टि भी स्वयं पुराण ही करता है ।

सृष्टि के आरम्भ में पुराण एक ही था समयानुसार समस्त पुराणों के ग्रहण करने में असमर्थ होने लगे तब व्यासरूपी भगवन द्वापर में अवतरित हो उसी पुराण को १८ भागो में विभक्त कर उसे प्रकाशित करते है ।


पुराणमेकमेवासीदस्मिन् कल्पान्तरे मुने ॥ 

त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।

स्मृत्वा जगाद च मुनीन्प्रति देवश्चतुर्मुखः ॥ 

प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्ततः ।

कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो मुनिः ॥ 

व्यासरूपं विभुः कृत्वा संहरेत्स युगे युगे ।

अष्टलक्षप्रमाणे तु द्वापरे द्वापरे सदा ॥ 

तदष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रभाष्यते ।

अद्यापि देवलोके तच्छतकोटिप्रविस्तरम् ॥ 

तथात्र चतुर्लक्षं संक्षेपेण निवेशितम् ।

पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते (स्कन्द पुराण रेवाखण्ड )


अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।(देवीभागवत पुराण स्कंध १/ अध्याय ३ श्लोक संख्या १७)


अतः आक्षेपकर्ता का मत यहाँ भी ध्वस्त हुआ ।

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नम्बर (३) जैसे व्यास पीठ शङ्कर पीठ पर बिराजमान पीठाधीश्वर व्यास वा शङ्कराचार्य के नाम से सम्बोधित होता है ठीक उसी प्रकार भिन्न भिन्न व्यासो द्वरा कृत पुराणों को एक ही व्यास के नाम से जोड़ दिया हो । 


यह भी सम्भव नही  अनादि काल से चली आ रही गुरुकुलों द्वरा रक्षित तथा परम्पराप्राप्त शास्त्रो का अध्ययन अध्यापन  आदि की भी महत्व न रह जाय  । तथा  कठ ,कपिष्ठल,शौनक, पिप्पलाद आदि नाम से जो जो शाखाएं है वह भी बाधित हो जाएगी ऐसे में व्याघात दोष लगेगा ।


अतः आप का यह आक्षेप भी अनादर है   द्वितीय प्रश्न के समाधान में इस प्रश्न का भी समाधान हो जा रहा है  जहाँ स्प्ष्ट रूप से द्वापर युग मे अवतरित हुए सत्यवती सूत से कर दिया गया है ।

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विशेष :--- वेदादि के प्रकाण्ड विद्वान सायणाचार्य ने ऐतरेय ब्राह्मण के उपक्रम में लिखा है ।


देवासुरा: संयता आसन्नितयादयइतिहासा:इदं वा अग्रे नैव किन्चिदासीदित्यादिकं जगत:प्रागवस्थानुक्रम्य सर्गप्रतिपादकम वाक्यजातां पुराणं ।


इतिहासपुराणं पुष्पं  (छा०उ ०)

 श्रुतियों में पुराणों को पुष्प माना गया जिसकी सुगन्ध चारो ओर फैला हुआ है जिनकी मादकता से मधुमक्षिता ही उस पुष्प की ओर आकर्षित हो शहद का निर्माण करता है ।

मलमूत्र पर बैठा हुआ माक्षी नही ।

शैलेन्द्र सिंह 

Monday, 24 May 2021

शिवलिङ्ग



लिंगार्थगमकं चिह्नं लिंगमित्यभिधीयते।(शिव पुराण विशेश्वर संहिता)


अर्थात शिवशक्ति के चिन्ह का सम्मेलन ही लिंग हैं। लिंग में विश्वप्रसूति-कर्ता की अर्चा करनी चाहिये। यह परमार्थ शिवतत्त्व का गमक, बोधक होने से भी लिंग कहलाता है।


सर्वाधिष्ठान, सर्वप्रकाशक, परब्रह्म परमात्मा ही ‘‘शान्तं शिवं चतुर्थम्मन्यन्ते’’ इत्यादि श्रुतियों से शिवतत्व कहा गया है। वही सच्च्दिानन्द परमात्मा अपने आपको ही शिवशक्तिरूप में प्रकट करते हैं। वह परमार्थतः निर्गुण, निराकार होते हुए भी अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्ति से सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूप में भी प्रकट होते हैं। 


लिंग शब्द के प्रति आधुनिक समाज में ब़ड़ी भ्रान्ति पाई जाती है।

संस्कृत में "लिंग" का अर्थ होता है प्रतीक।अथवा चिन्ह 

जननेंद्रि के लिए संस्कृत में एक दूसरा शब्द है - "शिश्न".आया है 

शिवलिंग का अर्थ लोकप्रसिद्ध मांसचर्ममय ही लिंग और योनि नहीं है, किन्तु वह व्यापक है। उत्पति का उपादानकारण पुरुषतत्व का चिह्न ही लिंग कहलाता है।  अतः वह लिंगपदवाच्य है। लिंग और योनि पुरुष-स्त्री के गुह्यांगपरक होने से ही इन्हें अश्लील समझना ठीक नहीं है। । 

उस अव्यक्त चैतन्यरूप लिंग सत्ता और प्रकृति से ही ब्रह्माण्ड बना है 

भगवान् के निर्गुण-निराकार रूप का प्रतीक ही शिवलिङ्ग है 

वह परमप्रकाशमय, अखण्ड, अनन्त शिवतत्त्व ही वास्तविक लिंग है 

 जब अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी प्रकृति समष्टि योनि है, तब अनन्त ब्रह्माण्डनायक परमात्मा ही समष्टि लिंग है और अनन्त ब्रह्माण्ड प्रपंच ही उनसे उत्पन्न सृष्टि है।

■भं वृद्धिं गच्छतीत्यर्थाद्भगः प्रकृतिरुच्यते

मुख्यो भगस्तु प्रकृतिर्भगवाञ्छिव उच्यते  (शि०पु० वि० संहिता १६/१०१-१०२)

(भ) बृद्धि को (ग) या प्राप्त करने वाली प्रकृति को भग कहते है और प्रकृति की अधिष्ठाता शिव (भगवन) ही परमानन्द ब्रह्म है ।


शिव-शक्ति ही यहाँ लिंग-योनि शब्द से विवक्षित है। उत्पत्ति का आधारक्षेत्र भग है, बीज लिंग है। वृक्ष, अंकुरादि सभी प्रपंच की उत्पत्ति का क्षेत्र भग है


अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनि,है

अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी अनिर्वचनीय शक्तिविशिष्ट ब्रह्म में भी शिव-पार्वती भाव है। उस परमात्मा में ही लिंगयोनिभाव की कल्पना है। निराकार, निर्विकार, व्यापक दृक् या पुरुषतत्व का प्रतीक ही लिंग है और अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनि,है

उसी की प्रतिकृति पाषाणमयी, घातुमयी जलहरी और लिंगरूप में बनायी जाती है।


शिवलिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, ऊपर प्रणवात्मक शिव हैं। लिंग महेश्वर, अर्घा महादेवी हैं-


■मूले ब्रह्मा तथा मध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः।*

■रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः।।*

■लिंगवेदी महादेवी लिंग साक्षान्महेश्वरः।*

■तयोः सम्पूजनान्नित्यं देवी देवश्च पूजितौ।।’*


जिसकी उपासना करने प्रत्येक वेदाभिमानी का कर्तब्य है ।

शैलेन्द्र सिंह