Thursday, 23 April 2020

आर्यसमाजी


स्वामी दयानंद सरस्वती आर्यसमाज के संस्थापक माने जाते है स्वामी दयानन्द सरस्वती कृत पुस्तक सत्यार्थप्रकाश ही आर्यसमाज  का मूल ग्रन्थ माना जाता है आर्यसमाज स्वयं को सबसे बड़ा वैदिक धर्मी बताते है(यह भी एक तरह का झूठ ही है)
स्वामीदयनन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के पृष्ठ संख्या  ३६१
में स्वीकार किया है कि महाभारत ग्रन्थ में जो जो श्लोक आये है वह सत्य है तथा उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में अपने मत को प्रमाणित करने के लिए   सबसे ज्यादा प्रमाण मनुस्मृति ग्रन्थों से ही दिया है और उसी मनुस्मृति को आर्यसमाजी प्रक्षिप्त मानते है अब जो ग्रन्थ प्रक्षिप्त हो तो भला उस ग्रन्थ से  ही अपने मतों को पुष्टि हेतु प्रमाण में क्यो रखेंगे ? आप स्मृतिआदि ग्रन्थों को प्रक्षिप्त भी कहेंगे और प्रमाण भी उसी ग्रन्थों से देंगे ये तो अर्धकुक्कुट न्याय हुआ  । स्वामी दयानन्द ने महाभारत के बिषय में भी ऐसा ही कहा जबकि पृष्ठा संख्या ३६१ में पहले वे स्वीकार करते है कि महाभारत में आये हुए  सभी श्लोक सत्य है  वही फिर आगे यह भी लिख देते है कि महाभारत में मिलावट हुआ है लगता है सत्यार्थ प्रकाश जब लिखने बैठे थे तब भांग पी कर ही बैठे होंगे ।
 लेकिन दयानन्द सरस्वती ने उसका युक्ति युक्त कोई प्रमाण  दे न सके , बस केवल लिख मारे बिना प्रमाणों के किसी विषयवस्तु को मिथ्या कह देने मात्र से वह मिथ्या नही हो जाता जब तक उसे प्रमाणित न किया जाय ,
आज के सम्बिधान अनुसार भी यदि किसी दोषी को दण्ड देना हो तो उसे भी सम्बिधान अनुरूप दण्ड और सम्बिधान के दायरे में रह कर ही उनके दोषों पर सत्य और मिथ्या का बिचार किया जाता है , और जब तक उसका दोष परिपुष्ट न होगा तब तक उसे उस दोष के लिए दण्ड भी नही दिया जा सकता अन्यथा वह अन्याय के श्रेणी में आजाता है ।
ठीक उसी प्रकार स्वामी दयानन्द ने सनातन धर्म ग्रन्थों को प्रक्षेपित कहा बिना यह प्रमाणित किये की उस उस ग्रन्थों में किसने मिलावट किया तथा किस कालखण्ड में   किया और वे कौन कौन से श्लोक है इसका विवरण बिना दिए ही वे ढोल पीटते रहे । वस्तुतः आर्यसमाज की भीत भी इसी पुराण और स्मृति आदि ग्रन्थों के आड़ लेकर खड़ा है । स्वामी दयानन्द सरस्वती के पूर्व इस भारत भूखण्ड में कई बिभूतियो का अवतरित हुआ जिन्होंने इतिहासपुराण स्मृति आदि ग्रन्थों को मुक्तकण्ठ से प्रमाणिकता स्वीकार की चाहे वह गौड़ापाद हो वा कुमारिल भट्ट हो अथवा शङ्कराचार्य हो वा यमुनाचार्य हो अथवा रामानुजाचार्य हो वा  माधवाचार्य हो अथवा वल्लभाचार्य, वा वाचस्पति मिश्र तथा निम्बार्काचार्य ।
वेद सर्वसाधारण के लिए अत्यंयत दुरूह है वेद की जितनी भी ऋचाएं है वे अपने आप में दिब्य  और प्रभावकारी है यह ऋचाओ के उच्चारण में जरा सा भी भेद अपकल्याण का कारक बन सकता है इस लिए वेदो  को समझने के लिए अनादिकाल से चली आरही परम्पराप्राप्त आचार्यो के सानिध्य में षडाङ्गो के माध्यम से ही समझा जाता है उसी वेद को सरल रूप में समझने के लिए हमे इतिहास पुराण स्मृति आदि ग्रन्थों का सहारा लेना पड़ता है ।
एक माता यदि अपने बालक को गन्ने की गुल्ला देने के बजाय उसे मिश्री देती है तो भला इसमें माता का क्या दोष ?  बालक के प्रसन्न और सुरक्षित रखने के लिए आप उस माता को क्या कहेंगे ??इसे कहने की आवश्यकता सायद मुझे भी नही है ।
ठीक जिन जिन वर्णो का वेदादि ग्रन्थों में अधिकार नही तद्वत वर्णसमुदाय के लिए इतिहासपुराणादि,स्मृति ग्रन्थ ही वह मार्ग बचता है जिस धर्म के सूक्ष्म रूप को समझा जा सके ।

ईतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं  (छान्दोग्य उपनिषद)

स्वयं श्रुतियों में इतिहास पुराणादि को पञ्चम वेद कहा गया है क्यो की बिना इतिहास पुराणादि के वेद को समझना क्लिष्ट है

इसी बिषय को महाभारत में कहा गया है

इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् (महाभारत आदिपर्व)

वेदो के अर्थ को निर्णय करने वाला इतिहास एवं पुराण के ही शब्द विचारणीय है ।
 ऐसे में श्रुतिस्मृति सम्मत बिषयों को न मान कर श्रुतिस्मृति विरुद्ध पाखण्ड का प्रचार आर्यसमाज द्वारा किया गया ।

जिस प्रोपेगैंडा को ईशाई मिशनरी तथा इस्लामिक मत   फैलाने में असफल रहे उसी प्रोपेगैंडा को स्वामी दयानन्द के जरिये प्रचार किया गया ताकि हिन्दूओ में वर्णाश्रमधर्म के विरुद्ध विखण्डन का बीज बोया जा सके और हिन्दुओ को खण्ड खण्ड में बांटा जाय इसी कारण इतिहासपुराण स्मृति आदि ग्रन्थों के बिषय में भ्रामक प्रचार किया गया ,
की इन सभी ग्रन्थों में मिलावट किया गया है अतः इतिहासपुराणादि बिषय अब पठन पाठन में नही रहा इससे उन लोगो के प्रति मन मे सन्देह उतपन्न हुआ जिन्हें वेदो से भिन्न इतिहासपुराणा आदि ग्रन्थों के श्रवण और अध्ययन में अधिकार था जिससे तद् तद् वर्णसमुदाय अपने स्वधर्म को समझते थे और पालन भी करते थे ऐसे में उन उन वर्णसमुदाय के मन मे सन्देह उतपन्न करना ही एक मात्र मार्ग शेष बचा था क्यो की भारतीयों को गुलाम बना कर भी ईशाई और इस्लामिक शाशनकर्ता मानसिक रूप से भारतीयों को गुलाम न बना सका  भारतीय मानसिक रूप से दृढ़संकल्प वाले थे और उसके दृढ़ संकल्प को भेदन कैसे किया जाय इसके लिए उसे कोई ऐसे ब्यक्ति की तलाश थी जो इस काम को पूरा कर सके ऐसे में स्वामी दयानन्द उनके बैचारिकता को पोषण देने वाला बना ।
 जिन्हें अपने स्वधर्म और अपने धर्मग्रन्थो पर अटूट श्रद्धा था ।उन उन वर्णाश्रमधर्मियो के मन में यह शंका का बीज बोया गया कि तुम्हारे ग्रन्थ जाली और प्रक्षिप्त है
और आज जनसाधारण में लगभग यह बात घर कर गई है कि इतिहासपुराणादि ग्रन्थों में मिलावट हुई है इसी बात का सहारा लेकर ईशाई मिशनरी और इस्लाम धर्म अपने मनोरथ में लगभग सफल हुए ।
आर्यसामज वेदादि धर्म के रक्षक नही अपितु भक्षक बन कर उभरा और सनातन धर्म को शनै शनै क्षरण करता गया ।

Sunday, 5 April 2020

माता शबरी

#माता_शबरी_शंका_समाधान

श्रीरामचन्द्र आदि रामायण के बिषय में प्रथम प्रमाण वाल्मीकि रामायण का ही माना जाता है देवऋषि नारद तथा ब्रह्मादि देवताओं के आशीर्वचन से महर्षि वाल्मीकि को तपोबल से श्रीरामचन्द्र ,माता सीता दसरथ,आदि राक्षसों का प्रकट और गुप्त चरित्र साक्षात्कार हुआ था ।जिसको उन्होंने श्लोकबद्ध कर इस महा काब्य को जनकल्याणर्थ प्रकाशित किया ।

रामस्य चरितम् कृत्स्नम् कुरु त्वम् ऋषिसत्तम ।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः ॥१-२-३२॥
वृत्तम् कथय धीरस्य यथा ते नारदात् श्रुतम् ।
रहस्यम् च प्रकाशम् च यद् वृत्तम् तस्य धीमतः ॥१-२-३३॥
रामस्य सह सौमित्रे राक्षसानाम् च सर्वशः ।
वैदेह्याः च एव यद् वृत्तम् प्रकाशम् यदि वा रहः ॥१-२-३४॥
तत् च अपि अविदितम् सर्वम् विदितम् ते भविष्यति ।
न ते वाक् अनृता काव्ये काचित् अत्र भविष्यति ॥
कुरु रामकथाम् पुण्याम् श्लोक बद्धाम् मनोरमाम् ।१-२-३५॥
राम लक्ष्मण सीताभिः राज्ञा दशरथेन च ।
स भार्येण स राष्ट्रेण यत् प्राप्तम् तत्र तत्त्वतः ॥१-३-३॥
हसितम् भाषितम् च एव गतिर्यायत् च चेष्टितम् ।
तत् सर्वम् धर्म वीर्येण यथावत् संप्रपश्यति ॥१-३-४॥
स्त्री तृतीयेन च तथा यत् प्राप्तम् चरता वने ।
सत्यसन्धेन रामेण तत्सर्वम् च अन्ववेक्षत ॥१-३-५॥
ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वम् योगमास्थितः ।
पुरा यत् तत्र निर्वृत्तम् पाणाव आमलकम् यथा ॥१-३-६॥

इसी महाकाब्य में माता शबरी का भी वर्णन है समय समय पर माता शबरी को लेकर लोग भांति भांति से अपने बिचारो को प्रकट किया और करते भी रहेंगे ।की माता शबरी शुद्रा थी ,तो कोई कहता है माता शबरी भील जाती से थी ,मुण्डे मुण्डे मति:भिन्ना ।

उसी बिषय को लेकर हम यहाँ बिचार करेंगे ।

वाल्मीकि रामायण में माता शबरी मतङ्ग मुनि के आश्रम में गुरुओं और ऋषियों की सेवाशुश्रूषा करने वाली बताई गई है ।

●--गुरु शुश्रूषा सफला चारुभाषिणि (वा०रा०आ०७४/९)

आश्रम शब्द अपने आप में शुचिता ,मर्यादानुकूल आचरण, वेदादि विद्याओं का अध्यय अध्यापन का स्थान माना जाता है ऐसे में माता शबरी के आश्रम में निवास होने का अर्थ यही होता है कि उनका आचरण मर्यादानुकूल ,शुचिता, अध्ययनध्यापन के विद्याओं में   बाधा न पड़े होना सिद्ध होता है ।

●--धर्मसूत्र तथा स्मृतियों में कहा गया है कि ।
#श्मशाने_चाध्य्यनं_वर्जयेत_शुद्रायां_तू_यदा_परस्परं_भवति
#तदैवाSनध्याय_न_समानागरे_नापिशम्याप्रसादिति ।

●--श्मशानवच्छुद्रपतितौ (आपस्तम्ब १/३/९/९)
●--समानागार इत्येक (आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/३/९/१०)
●--शुद्रायां तू प्रेक्षणप्रतिपेक्षणयोरेवाSनध्याय (आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/३/९/११)

ऐस में माता शबरी का शुद्रा अथवा चाण्डाल होना  इस मत का यहाँ ध्वंस हो जाता है ऋषि महर्षि गण पूर्णप्रज्ञ होते थे ऐसे में उन्हें अपने आश्रम की शुचिता अशुचिता का बोध कैसे न हो की आश्रम में किस किस कुलगोत्रादि के लोग रहे ।
अब आगे आते है

वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड मे माता शबरी को सिद्धा तपस्वी कहा गया है ।
●--तापसी पृष्ठा सा सिद्धा सिद्धसम्मता  (वा०रा०आ७४/१०)

 सिद्धियां उन्हें ही प्राप्त हो सकती है जो अपने वर्णाश्रमधर्म का पालन अक्षरसः करता हो ।
●--स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।(गीता१८/४५)
●--कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। (गीता ३/२०)

अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-को प्राप्त कर लेता है महाराज जनकादि भी अपने वर्णोचित कर्म से ही सिद्धियां प्राप्त की थी ।
अब यहाँ प्रसंग यह भी उठ सकता है कि माता शबरी हो न हो क्षत्रिय कुल अथवा वैश्य कुल से होगी इस लिए उन्हें भी सिद्धियां प्राप्त हुई ।

परन्तु वाल्मीकि रामायण में माता शबरी के बिषय में जन्मादि वृतान्त  का अभाव है जिससे इसका निर्णय भी कठिन हो जाता है ऐसे में श्रुतिस्मृतिआदि ग्रन्थों में ब्राह्मण ,क्षत्रिय,वैश्य,बिशेष को लेकर आये हुए बिषयों पर बिचार करना आवश्यक हो जाता है ।
जैसे
●---गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः (महाभारत आदिपर्व)
●---अध्यापनं याजनं च विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ।।
विप्रस्य जीविका प्रोक्ता (स्कन्दपुराण वैष्णवखण्ड २०/२८)
●--उपनीय तु यः शिष्यं वेदं अध्यापयेद्द्विजः ।
सकल्पं सरहस्यं च तं आचार्यं प्रचक्षते । । (मनुस्मृति २/१४०)

इस न्याय से ब्राह्मण से भिन्न अन्य कोई भी वर्ण का अधिकार गुरु ,आचार्यत्व तथा अध्यापन आदि में अधिकार नही ठीक वैसे ही कृष्णमृगचर्म का धारण करना केवल मात्र ब्राह्मणो का ही अधिकार है ।
क्षत्रिय,वैश्य के लिए अलग अलग वस्त्रों का विधान है ।

●--हारिणमैणेयं वा कृष्णं ब्राह्मणस्य (आपस्तम्ब धर्मसूत्र१/३/३)
●--कार्ष्णरौरवबास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः ।
वसीरन्नानुपूर्व्येण शाणक्षौमाविकानि च । । (मनुस्मृति २.४१ )

माता शबरी को वाल्मीकि रामायण में कृष्णमृगचर्म धारण करने वाली बताई गई है ।

●--जटिला चीरकृष्णाजिनाम्बरा (वा०रा०७४/३२)

ऐसे में आप सभी पाठकगण बिचार करें कि माता शबरी किस वर्ण से थी

यदि मुझ अल्पज्ञ से कोई त्रुटि हो तो विद्जन छमा करें


Friday, 28 February 2020

शोषण

स्वर्णो ने बहुत शोषण किया है साहब

अंगिरस, आपस्तम्भ, अत्रि, बॄहस्पति, बौधायन, दक्ष, गौतम, वत्स,हरित, कात्यायन, लिखित, पाराशर, समवर्त, शंख, शत्तप, ऊषानस, वशिष्ठ, विष्णु, व्यास, यज्ञवल्क्य तथा यम तक
आद्य शङ्कराचार्य से लेकर रामानुजाचार्य तक , आचार्य पाणिनि से लेकर आर्यभट्ट तक ,आचार्य चाणक्य से लेकर सायणाचार्य तक ,
वाचस्पति मिश्र से लेकर करपात्री महाराज तक
मंगल पांडेय से लेकर चन्द्रशेखर आजाद तक ,बीर सावरकर से लेकर पण्डित मदन मोहन मालवीय तक , चैतन्य महाप्रभु से लेकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी तक
इस पवित्र भूखण्ड भारत को पुष्पित पल्लवित करने विश्व के अध्यात्म ज्ञान का प्रकाश पुञ्ज बनाने तथा इस राष्ट्र को अंग्रेजो की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने में ब्राह्मणों का योगदान नही था क्यो की ये सभी ब्राह्मण अन्य वर्णो के शोषण में लगे हुए थे .........
क्या इन ब्राह्मणों के बिना आप इस भारतवर्ष की कल्पना तक कर सकते है ???
घिन आता है ऐसे मानसिक से ग्रसित लोगो से जो यह कहते है कि ब्राह्मणों ने तो अन्य वर्णो का शोषण किया .....
इतने कष्टप्रद वचनों को सुनकर भी ब्राह्मण आज भी अपने यजमानो की मंगलकामना की प्रार्थनाएं करता है .....
मैं गर्व करता हूँ इन ब्राह्मणों पर जिन्होंने ने आज तक सनातन धर्म को अक्षुण बनाये रखने में अपना सम्पूर्ण जीवन वैदिक सनातन धर्म और राष्ट्र के प्रति निश्चल भावना से समर्पित किया ...

Friday, 7 February 2020

माता सीता का वन गमन


श्रीराम चन्द्र केवल मात्र सीता का पति ही नही अपितु अयोध्या के अधिपति भी थे ऐसे में उसका यह दायित्व भी बनता था कि अयोध्या के प्रत्येक प्रजा सुख, समृद्ध ,संशयशील रहित  रहे तभी राजा अश्वमेघयज्ञ के अधिकारी होता है जिस राज्य में प्रजा दुःख,  ईर्ष्या, संशयशील हो उस राजा को यह अधिकार नही की वह अश्वमेघयज्ञादि कर स्वयं को चक्रवर्ती सम्राट घोषित करें अयोध्या का यह इतिहास रहा है कि इक्ष्वाकु कुल के  शाशन काल  में वैश्या,  चोर,मद्यप, जुआड़ी ,  नही था फिर श्रीरामचन्द्र जी के शाशनकाल में यदि प्रजा संशयशील हो तो राजा का यह नैतिक कर्तब्य बनता है कि उसका निवारण करें अन्यथा युगों युग की कीर्ति पर कंलक लग सकता है ।
अतः श्रीरामचन्द्र जी का सीता का वनगमन का निर्णय लेना धर्म सम्मत है ।
शास्त्रो में उपदिष्ट है कि

#यद्यदाचरति_श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो_जनः।
#स_यत्प्रमाणं_कुरुते_लोकस्तदनुवर्तते (गीता )

श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसका अनुसरण करते हैं ।
ऐसे में अयोध्य्या में किसी ने राम और सीता के मध्य कोई प्रश्न उठाया तो उसका निवारण करना राजा का प्रथम कर्तब्य बन जाता है अन्यथा राज्य में व्यभिचार बढ़ने की सम्भवना बढ़ती है ।
माता जानकी के कुटिल विरोधी समाज ने भी लवकुश के कंठो से  श्रीरामकथा का गान सुन उनका भक्त हो कर पश्चाताप के अश्रुधाराओं से अपने कल्मषों को धो डाला यह राघवेन्द्र की नीति ही थी जिसके फलस्वरूप ये घटनाएं घटित हुई जो काम किसी दण्डबिधान और प्रोपोगेंडा से कभी सम्भव न था वही श्रीरामचन्द्र जी के नीतियों से ही सुसम्पन्न हुआ जो महर्षि बाल्मीकि के माध्यम से लवकुश द्वरा  जनता के समक्ष माता जानकी के पवित्रता और निर्मलता का ज्ञान कराया ।
माता जानकी श्रीरामचन्द्र की काया की छाया थी राम रूप भानु की प्रभा एवं रामरूप चन्द्र की चंद्रिका थी रामरूप ईश्वर की महाशक्ति रूपा की प्रकृति थी एवं आनंदसिन्धु श्रीराम की माधुर्यसार सर्वस्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी थी वाहिरङ्ग दृष्टि से रामसीता का विप्रयोग सम्भव था परन्तु अंतरंग दृष्टि से तो यह विप्रयोग सम्भव ही नही था इस लोए लङ्का में जैसे सीता की छाया रह सकती थी वैसे ही सीता बनवास में भी  सीता की छाया ही थी वस्तुतः अमृत में मधुरिमा का पार्थक्य जैसे असम्भव है ठीक वैसे ही श्रीराम सीता का पार्थक्य असम्भव है ।

#अनन्या_हि_मया_सीता_भास्करेण_प्रभा_यथा ।(बाल्मीकि रामायण)

परन्तु स्नेह और प्रेम उद्वेग में राम ने कर्तब्य से बिचलित न होने की प्रतिज्ञा ले रखी थी वे किसी भी स्नेह ,दया या मोह, सुख के लोभ में पड़कर लोकाराधन प्रजारञ्जन के कार्य से कैसे बिमुख हो सकते थे और उन्होंने सीता का भी इसी में हित समझा और वह हुआ भी इस कठोरता का आश्रयण कोई बिना महर्षि बाल्मीकि का समागम नही हो सकता था सीता के सुपुत्र लवकुश इस प्रकार के संस्कारी ,विद्वान, बलवान,धनुष्मान,कीर्तिमान तथा प्रतिभावान नही बनते सीता का कष्ट राम का ही कष्ट था श्रीरामचन्द्र ने सीता को बनवास देकर स्वयं को कष्ट में डाला सीता के निर्मल ,निष्कंल्क परमपवित्र उज्ज्वल चरित्र संसार के सामने उपस्थित किया ।
श्रीराम ने अनन्त  अद्भुत अनुराग के साथ ही सीता को वनवास देकर सीता को भी अवसर दिया कि वो महर्षियों के मुखारविन्द से अध्यात्मचर्चा श्रवण कर सके और समाधिनिष्ठ होकर आध्यात्मिक उच्च स्थिति की पारमार्थ साधना में  प्रतिष्ठित हो इसप्रकार प्रजारंजन के साथ परमार्थ भी सम्पन्न हो ।उत्तराधिकारी लवकुश की उच्च स्थिति के लिए सीता का चरित्र उज्ज्वल निष्कलंक होना आवश्यक था राजमहलों में पालन पोषण एवं संस्कारो के अपेक्षा आरणक्य ऋषियों के आश्रम के पालनपोषण एवं संस्कार बहुत अधिक महत्वपूर्ण होता है इसलिए अपने उत्तराधिकारी पुत्रो का उत्कृष्ट संस्कार एवं उत्कृष्ट शक्तिशाली चरित्र का निर्माण हो सके इस कार्य मे सीता का वनवास अत्यधिक उपयोगी था ।


Friday, 25 October 2019

सनातन संस्कृति

एक तरफ थी हजारों वर्ष पुरानी अजेय-अपराजेय एवं विराट भारतीय संस्कृति और दूसरी तरफ थे आधुनिकता एवं ईसाई धर्म का झंडा लिए गोरे महाशय अंग्रेज ।

वे भारत की भूमि पर तो राज कर रहे थे परन्तु भारतीयों के दिल और दिमाग पर राज था अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपनी परम्पराओं और अपने महा पुरुषों का ।

इसीलिए वे अंग्रेज जीतकर भी हार का अनुभव कर रहे थे।
भारत के सम्पूर्ण पराजय में सबसे बड़ी बाधा थी यहाँ के लोगों की अपराजेय मानसिकता ।

उनका राजा भले ही कोई भी हो परन्तु वे समझते थे उनका मूल और विस्तार है प्राचिनत्तम सनातन धर्म-संस्कृति ।

 वे अपने धर्म, संस्कृति, परम्परा, इतिहास एवं अपने महापुरुषों के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा से परिपूर्ण थे ।

अंग्रेजों के सामने यही लक्ष्य था की भारतीयों के इस अद्भुत श्रद्धा भाव को खंडित कर इन्हें यूरोपियन संस्कृति में एवं ईसा के धर्म में किस प्रकार दीक्षित, शिक्षित किया जाये।
इस काम में नियुक्त किये गए लार्ड मैकाले।

ईसा सम्वत १८३४ में लार्ड मैकाले भारत के शिक्षा प्रमुख बनकर भारत आये।
उनके पास गुप्त योजना थी और उसको लागु करने की लगन भी।

वे बिना लडे भारतीयता को पराजित करने के मिशन पर थे। वे सभी भारतीयोंको मानसिक रूप से गुलाम बनाना चाहते थे ।

उन्होंने पारम्परिक शिक्षा संस्थानों को अनुदान देना बंध कर दिया और अंग्रेजी स्कुलो में भारतीयता के जड़ों को खोदनेवाली शिक्षा का प्रारम्भ कर दिया ।

उन्होंने  १२-१०-१८३६ में अपने पिता को पत्र लिखा था कि   "मैंने बनायीं पद्धति से यहाँ शिक्षा का क्रम चलता रहा तो आगामी ३० सालों में बंगाल में एक भी हिन्दू नही बचेगा, सभी ख्रिस्ती बन जायेंगे या  फिर केवल पोलिशी के लिए नाम मात्र हिन्दू-पोलिटिकल हिन्दू बने रहेंगे ।

धर्म पर या अपने धर्मशास्त्र वेदों पर उनकी श्रद्धा कतिपय नही रहेगी।
स्पष्ट रूप से हिन्दू धर्म में हस्तक्षेप किये बिना, बाहर से उनकी स्वतन्त्रता कायम रखते हुए हमारा उद्देश्य पूरा सफल होगा ।''

निश्चित रूप से भारतीय संविधान के सेक्युलरिज्म और धर्म श्रद्धाविहीन हिंदुत्व का मूल मैकाले के इस पत्र में स्पष्ट दिखाई देता है ।

इस प्रकार अंग्रेज  ईसाईयोंने योजनापूर्वक भारतीयता के शिक्षा पद्धति को आमूलचूल बदल डाला ।

इसप्रकार सैन्य बल से अपराजित, अतुलनीय भारत मैकाले की शिक्षा  निति से पराजित हो गया ।

दुःख की बात है की आज भी बाह्य रूप से भारत स्वतंत्र दिखने पर भी दिल और दिमाग के रूप से स्वतंत्र नही हो पाया है ।

आर्य और द्रविड़ का सिद्धान्त भी अंग्रेजों के इन्ही निति पर आधारित था ।
वे हमारी सांस्कृतिक एकता को तोड़कर हमारे स्वतंत्रता के विचारों को ख़तम करना चाहते थे ।

वे उन विचार के द्वारा हमें समझाना चाह रहे थे की  आप लोग आर्य और अनार्यों में बटे हुए हो और दूसरी बात आप लोग भी बाहर से आये है और हम भी ।

फिर कौन किस को भगाए? अंतर केवल इतना है की आप हम से थोड़ा पहले आये है और हम थोड़े बाद में।

मैक्समूलर के शब्दों में ~~ 

india has been conquered once ,but india must be conquered again and second conquest should de a conquest by aducation....     

इन सब के मूल में अंग्रेजो की वे अति गोपनीय नीतियाँ थी जो हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाना चाहते थे ।

उन नीतियों से अंग्रेजों को कितना लाभ हुआ यह तो पता नही है परन्तु हमारी ही मुर्खता से हम उनसे परास्त हो गए।

आज हम भारतीय भले ही दिखाई पड़ते है परन्तु दिल और दिमाग से अंग्रेज की प्रतिमूर्ति है ।

पंडित जवाहर लाल नेहरू, मोहम्मद अलि जिन्ना आदि जैसे लोग अंग्रेजों के इस कूटनीति के ही उत्पाद थे ।

वे ऊपर से भारतीय नजर आते थे परन्तु अन्दर से, अन्तर्मन से अंग्रेजों को भी मात देनेवाले अंग्रेज थे ।

आज सभी क्षेत्र के लोग, चाहे वे राजनैतिक पार्टियां हो, सामाजिक संस्थान हो या धर्म संस्थान चलानेवाले साधू संत कारक पुरुष, इन सब पर अंग्रेजियत का असर साफ दिखाई देता है...क्योंकि ये धर्म संस्थानों को चलानेवाले लोग भी तो इसी समाज से आते है. आज तो इनकी कोई गिनती ही नहीं है,  हर जगह हम यूरोपियन की तरह आचरण कर रहे है ।

मैकाले जीत रहा है और हम हार रहे हैं,    परन्तु हमारी हार अंतिम नहीं है , हम जित के लिए संघर्ष जारी रखे हुए है ।

Monday, 16 September 2019

श्राद्ध बिशेष



#प्रश्न:---श्राद्ध क्या है ?

#उत्तर:----पितर पितृ (पा.) रक्षण करना इस धातुसे पितृ शब्द की उत्पत्ती हुई है। अत: पितर ही अपने कुलकी रक्षा करता है इसलिए श्राध्दादि कर्मसे उन्हे संतूष्ट करना चाहिए।
श्रुतिस्मृति सम्मत वचनों से मृत पितरों के निमित पितृदेवो के पूजनार्थ होम पिण्डदान आदि ब्राह्मणभोजन रूप जो सत्कर्म है वही शास्त्रोक्त श्राद्ध शब्द का मुख्य भावार्थ है प्रजा के कल्याणार्थ श्रुतिस्मृति ने जिस शुभकर्म का उपदेश किया उसी का नाम श्राद्ध पितृयज्ञ है ।जैसे देवयज्ञ में इन्द्रादि देवताओ का पूजन सत्कार होता है और आहवनीय अग्नि उनके तृपत्यर्थ होम का आधार है वैसे ही इस पितृयज्ञ में पितृदेव का पूजन सत्कार और उनके तृपत्यर्थ होम का आधार अग्नि की जगह ब्राह्मणो का मुख है ।

श्राद्धं वा पितृयज्ञ स्यात् (कात्यायन स्मृति १३/४)
श्राद्धं तत्कर्म शास्त्रत: (अमरकोश २/७/२१)

अथर्ववेद में मृत पितरों को तृप्ति (खिलाने) के लिए आह्वानार्थ  अग्नि से प्रार्थना की गई है
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः ।
सर्वांस्तान् अग्न आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे ॥(अथर्ववेद १८/२/३४)
महाभारत आदिपर्व में भी अग्नि की उक्ति है
वेदोक्तेन विधानेन मयि यद्धूयते हविः।
देवताः पितरश्चैव तेन तृप्ता भवन्ति वै।।
देवताः पितरश्चैव भुञ्जते मयि यद्भुतम्।
देवतानां पितॄणां च मुखमेतदहं स्मृतम्।।
मन्मुखेनैव हूयन्ते भुञ्जते च हुतं हविः।।(महाभारत आदिपर्व ७/७-१०-११)

#प्रश्न :--- श्राद्ध में पितरों की तृप्ति हेतु हम ब्राह्मणो के ही मुख में कव्य  क्यो दे अग्नि को क्यो नही ?

#उत्तर :--   ब्राह्मणो के हव्य कव्य में अग्नि के बाद उन्ही का अधिकार है क्यो की  ब्राह्मण स्वयं अग्नि स्वरूप है

विद्यातपःसमृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु (मनुस्मृति ३/९८)

अग्नि और ब्राह्मण की सहोदरता में स्वयं वेद ही प्रमाण है
ब्राह्मणोSस्य मुखमासीद् (ऋग्वेद)
मुखादग्निरजायत (यजुर्वेद)
इसलिए शास्त्रो में ब्राह्मणो को आग्नेय या अग्नि कहा गया है ।तभी मीमांसा दर्शन के (१/४/२४) सूत्र के साबर भाष्य में अग्नयो वै ब्राह्मणः पर प्रकाश डालने के लिए इस प्रकार प्रश्नोत्तर प्रक्रिया की गई है ।
(प्रश्न:-- आग्नेयेषु (ब्राह्मणेषु) अग्नेयादिशब्दा:केन्प्रकारेण ?
(उ ० :-- गुणवादेन ।(प्रश्न ) को गुणवाद: (उ०) अग्नि सम्बन्ध:
(प्रश्न) कथम् (उ०) एकजातीयत्वाद् (अग्निब्राह्मणयो:) (प्रश्न) किमेकजातीयत्वं (उ०) प्रजापतिरकामयत-- प्रजा:सृजयमिति स मुखतसि्त्रवृतं निरभिमित तमग्निर्देवता अन्वसृज्यत.....ब्राह्मणो मनुष्याणां तस्मात ते मुख्या: मुखतोSन्वसृज्यन्त यहाँ पर अग्नि और ब्राह्मण की एकजातीय स्प्ष्ट शब्दो मे कहि गयी है ।
स्मृतियों में कहा गया है कि अग्नि न हो तो ब्राह्मणो को ही कव्य दे दे ।
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् ।
यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते । ।(मनुस्मृति ३/२१२)
यह कहकर यहाँ हेतु दिया गया है । इस लिए श्राद्ध हेतु यहाँ अग्नि वा ब्राह्मणो को ही खिलाना लिखा है ।
गां विप्रं अजं अग्निं वा प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत्  (मनुस्मृति३/२६०)
प्रश्न :--- हम मनुस्मृति को ही प्रमाण क्यो माने ??
उत्तर:-- क्यो की शास्त्रो में मनुस्मृति को ही प्रमाण माना गया है ऐसा स्वयं वेदवचन है ।
यद् वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम्  (तैत्तिरीय सं०२/२/१०/२)
मनु र्वै यत्किञ्चावदत्तत्भेषज्यायै (ताण्ड्य-महाब्रा०२३/१६/१७)
अथापि निष्प्रचमेव मानव्यो हि प्रजाः।" (ऋग्वे० १/८०/१६) ।
और ऐसा केवल मनुस्मृति ही क्यो स्वयं वेद में ही उपदिष्ट है ।

ब्राह्मणो ह वा इमम् अग्निं वैश्वानरं बभार (गोपथ ब्राह्मण १/२/२०)
अग्नि ब्राह्मणामाविवेश (अथर्ववेद १९/५९/२)
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो (काठोपनिषद् )
इसका ऐतिहासिक प्रमाण महाभारत में भी देखना चाहिए  निषाद के अचारवाले ब्राह्मण को निगलने के समय गरुण के कण्ठ में अग्निदाह होने लगा था ।
प्रश्न :-- पितृपक्ष कृष्ण पक्ष में क्यो करते है शुक्लपक्ष में क्यो नही ??
उत्तर :-- क्यो की कृष्णपक्ष ही पितरों का दिन होता है और शुक्लपक्ष पितरों का रात ।
कर्मचेष्टास्वहः कृष्णः शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी । ।(मनुस्मृति १/६६)

#प्रश्न :--- श्राद में केवल पुत्रो का ही अधिकार क्यो ?

#उत्तर :---  क्यो की पुत्र ही अपने पितरों को नरक से रक्षा करता है पुत्र श्राद्ध के जरिये अपने पितरों को क्लेशसागर से उद्धार करता है ।
पुत्र इति पुत-नामकात् नरकात् त्रायते। ऐतरेयब्राह्मणे पुत्रस्य भव्या प्रशंसा समाजे वीरसन्ततेः मूल्याङ्कनाय पर्यासममन्यत । पितरः पुत्रैः क्लेशसागराद् उद्धत्तुं समर्थाः भवन्ति । पुत्रः अात्मनः जन्म गृहीत्वा आत्मस्वरूपमेव भवति । सोऽन्नेन पूरिताः तरिः भवति यः संसृतिसागरात्समुद्धर्तुं नितान्तः समर्थो भवति — ‘स वै लोकोऽवदावदः ।' पुत्रः स्वर्गलोकस्य प्रतीको भवति, तस्य निन्दा कदापि न कर्त्तव्या । ‘ज्योतिर्हि पुत्रः परमे व्योमन्’, ‘नापुत्रस्य लोकोऽस्ति' इत्येतानि श्रुतिवाक्यानि पुत्रस्य सामाजिकमूल्यस्य परिकल्पनायाः कतिपयानि निदर्शनान्येव सन्ति ।

#प्रश्न:--श्राद्ध क्यो किया जाय ?

#उत्तर:--पिण्ड और जलदान की क्रिया के लोप हो जाने से पितर पतित हो जाते है ।
पतन्ति पितरो ह्येषांलुप्तपिण्डोदकक्रियाः(गीता १/४२)

शैलेन्द्र सिंह

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Monday, 9 September 2019

सरस्वती नदी आखिर कहाँ गई

#सरस्वती_नदी_आखिर_कहाँ_गई ?
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भारतीय जीवन एवं साधना में अप्रतिम महत्व रखने वाली सरस्वती भारतीय सभ्यता के उषाकाल से लेकर अद्यपर्यन्त अपने आप में ही नहीं,प्रत्युत अपनी अर्थ,परिधि एवं सम्बन्धों के विस्तार के कारण भी अत्यन्त महत्वपूर्ण रही हैlसरस्वती शब्द की व्युत्पति गत्यर्थक सृ धातु से असुन प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है शब्द सरस,जिसका अर्थ होता है गतिशील जलlसरस का अर्थ गतिशीलता के कारण जल भी हो सकता है,लेकिन केवल जल ही गतिशील नहीं होता,ज्ञान भी गतिशील होता हैlसूर्य-रश्मि भी गतिशील होती हैlअतः सरस का अर्थ ज्ञान, वाणी (अन्तःप्रेरणा की वाणी), ज्योति, सूर्य-रश्मि, यज्ञ ज्वाला, आदि भी किया गया हैlज्ञान के आधार पर सरस्वती का अर्थ सर्वत्र और सर्वज्ञानमय परमात्मा भी हो जाती हैlआदिकाव्य ऋग्वेद में सरस्वती नाम देवता (विभिन्न वैदिक देवता एक ही देव के भिन्न-भिन्न दिव्यगुणों के कारण अनेक नाम अर्थात सरस्वती मात्र देवता,परमात्मा का सूचक नाम मात्र है,दृश्य रूप भौतिक नदी विशेष नहीं है) तथा नदी वत दोनों ही रूपों में प्रयुक्त हुआ हैlसरस्वती शब्द का अर्थ करते हुए यास्क ने निरुक्त में लिखा है-
वाङ नामान्युत्तराणि सप्तपञ्चाशत् वाक्क्स्मात् वचेः l तत्र सरस्वतीत्येत्स्य नदीवद् देवतावच्चा निगमा भवन्ति l
तद्यद् देवतावदुपरिष्टातद् व्याख्यास्यामः l अथैतन्न्दीवत ll
-निरूक्त २/७/२३
अर्थात- वाक् शब्द के सत्तावन रूप कहे गये हैंlवाक् के उन सत्तावन रूपों में एक रूप सरस्वती हैlवेदों में सरस्वती शब्द का प्रयोग देवतावत् और नदीवत् आया हैlनदीवत् अर्थात नदी की भान्ति (नदी नहीं) बहने वालीlसायन एवं निघण्टुकार ने भी सरस्वती के नदी एवं देवता दोनों दोनों रूप स्वीकार किये हैंlयास्काचार्य की उक्ति सरस्वती – सरस इत्युदकनाम सर्तेस्तद्वती (निरूक्त ९/३/२४) से यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका अभिप्राय नदी विशेष है अथवा सामान्य नदियों से अथवा जलाशयों से परिपूर्ण भूमि सेl फिर कतिपय विद्वानों ने इसे सरस्वती नाम की नदी विशेष अर्थ (रूप) में स्वीकार किया हैlऋग्वेद में यास्कानुसार केवल छः मन्त्रों में ही सरस्वती नदी रूप में वर्णित है,शेष वर्णन उसके देवता रूप विषयक हैंlऋग्वेद में सरस्वती का नाम प्रथम वाक् देवता के रूप में प्रयुक्त हुआ है या नदी के लिये यह आज भी विद्वानों के मध्य विवाद के विषय बना हुआ हैlयद्यपि मनुस्मृति १/२१ के अनुसार सरस्वती के देवता रूप की कल्पना ही पहले होनी चाहिये तथापि कतिपय विद्वानों के अनुसार बाद में देवता रूप के आधार पर ही नदी विशेष के लिये सरस्वती नाम प्रचलित हुआlउनके अनुसार ऋग्वेद की सरस्वती मात्र एक दिव्य अन्तःप्रेरणा की देवी, वाणी की देवी ही नहीं वरन प्राचीन आर्य जगत की सात नदियों में से एक भी हैl
वैदिक विचार
विद्वानों का विचार है कि ऋग्वैदिक काल में सिन्धु और सरस्वती दो नदियाँ थींlऋग्वेद में अनेक स्थलों पर दोनों नदियों का साथ-साथ वर्णन तो उल्लेख है ही विशालता में भी दोनों एक सी कही गईं हैंlफिर भी सिन्धु के अपेक्षतया सरस्वती को ही अधिक महिमामयी एवं महत्वशालिनी माना गया हैlऋग्वेद के अनुसार सरस्वती की अवस्थिति यमुना और शतुद्रि (सतलज) के मध्य (यमुने सरस्वति शतुद्रि) थीlऋग्वेद में सरस्वती के लिये प्रयुक्त विशेषण सप्तनदीरूपिणी, सप्तभगिनीसेविता, सप्तस्वसा, सप्तधातु आदि हैंlसरस्वती से सम्बद्ध ऋग्वेद में उल्लिखित स्थान अथवा व्यक्ति सभी भारतीय हैंlऋग्वेद ७/९५/२ में सरस्वति का पर्वत से उद्भूत हो समुद्रपर्यन्त प्रवाहित होने का उल्लेख मिलता हैlभूमि सर्वेक्षण के कई प्रतिवेदनों अर्थात रिपोर्टों से प्रमाणित होता है कि लुप्त सरस्वती कभी पँजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान से प्रवाहित होने वाली विशाल नदी थीlस्पेस एप्लीकेशनसेंटर और फिजिकल लेबोरेट्री द्वारा प्रस्तुत लैंड सैटेलाईट इमेजरी एरियल फोटोग्राफ्स से भी सरस्वती की ऋग्वैदिक स्थिति की पुष्टि होती हैl
ऋग्वेद में सरस्वती के उल्लेखों वाले मन्त्रों को दृष्टिगोचर करने से इस सत्य का सत्यापन होता है कि ऋग्वैदिक सभ्यता का उद्भव एवं विकास सरस्वती के काँठे में ही हुआ था,वह सारस्वत प्रदेश की सभ्यता थीlबाद में यह सभ्यता क्षेत्र विस्तार के क्रम में मुख्यतः पश्चिमाभिमुख होकर एवं कुछ दूर तक पूर्व की ओर बढती हैlसभ्यता का केन्द्र सरस्वती तट से सिन्धु एवं उसके सहायिकाओं के तट पर पहुँचता है और इस सिलसिले में इसकी व्यापारिक गतिविधियों का व्यापक विस्तार होता हैlकहा जाता है कि सारस्वत प्रदेश के अग्रजन्माओं की आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का श्रेय सरस्वती नदी को ही थाlपशुपालक व कृषिजीवी जहाँ सरस्वती के तटीय वनों और उपजाऊ भूमि से आधिभौतिक उन्नति कर रहे थे,वहीँ ऋषि-मुनिगण इसके तट पर सामगायन कर याजिकीय अनुष्ठानों द्वारा आध्यात्मिक उत्कर्ष कर रहे थेl

ऋग्वेद के सूक्तों से इस सत्य का सत्यापन होता है कि सरस्वती नदी नाहन पहाड़ियों से आगे आदिबदरी के निकट निकलकर पँजाब, हरियाणा, उत्तरी-पश्चिमी राजस्थान में प्रवाहित होती हुई समुद्र में प्रभाष क्षेत्र में मिलती हैlइसकी स्थिति यमुना और शतुद्रि के मध्य (ऋग्वेद १०/७५/५) किन्तु दृषद्वती (चितांग) के पश्चिम (ऋग्वेद ७/९५/२) कही गई हैlइसकी उत्पति दैवी (असुर्या ऋग्वेद ७/९६/१) भी मानी गई हैlब्राह्मण ग्रन्थों,श्रौतसूत्रों एवं पुराणादि ग्रन्थों में सरस्वती का उद्गम स्थान प्लक्ष प्राश्रवण कहा गया हैlयमुना नदी के उद्गम स्थल को प्लाक्षावतरण कहा गया हैlऋग्वेद में सरस्वती सम्बन्धी (करीब) पैंतीस मन्त्र अंकित हैं,जिनमें से तीन ऋग्वेद ६/६१,ऋग्वेद ७/९५ और ७/९६ स्तुतियाँ हैंlविविध मन्त्रों में सरस्वती की अपरिमित जलराशि,अनवरत बदलती रहने वाली प्रचण्ड वेगवती धारा,भयंकर गर्जना,उससे होने वाले संभावित खतरों,महनीयता आदि के भी जीवन्त वर्णन हैंl(ऋग्वेद ६/६१/३, ६/६१/८, ६/६१/११,६/६१/१३)सरस्वती प्रचण्ड वेगवाली होने के साथ ही सर्वाधिक जलराशि वाली होने के कारण बाढ़ के समय इसका पाट इतना चौड़ा और विस्तृत हो जाता है कि यह आक्षितिज फैली हुई प्रतीत होती हैlऋग्वेद६/६१/७ में अंकित है कि सरस्वती कूल किनारों को तोड़ती हुई बहुधा अपना प्रवाह बदल लेती हैl
प्रसविणी सरस्वती
ऋग्वेद १०/६४/९ में में सरस्वती,सरयू सिन्धु की गणना बड़े नदों में हुई है जिसमें ऋग्वेद ७/३६/३ में सरस्वती ही सरिताओं की प्रसविणी कही गई हैlऋग्वेद ६/६१/१२ में अंकित है कि सरस्वती में सात नदियों के मिलने के कारण सप्तधातु एवं ऋग्वेद ६/६१/१० में सप्तस्वसा कही गई हैlऋग्वेद ७/९६/३ के अनुसार सरस्वती सदा कल्याण ही करती हैlसरस्वती का जल सदा और सबको पवित्र करने वाला हैlयह पूषा की तरह पोषक अन्न देने वाली हैlअन्यान्य नदियों की तुलना में यह सबसे अधिक धन-धान्य प्रदायिनी हैlऋग्वेद ७/९६/३ में यह अन्नदात्री, अन्न्मयी एवं वाजिनीवती कही गई हैlधन, समृद्धि, ज्ञान प्रदायिनी होने के कारण ही सरस्वती को वाजिनीवती कहा गया हैlसरस्वती के माध्यम से नहुष ने अकूत धन-सम्पदा अर्जित की थीlइसी कारण धन-धन्य प्राप्ति के लिये सरस्वती की प्रार्थना करने की परिपाटी बाद में चल पड़ीlसरस्वती का जल स्वच्छ एवं सुस्वादु होने के कारण अन्नोत्पादिका होने के परिणामस्वरूप यह कल्याणकारिणी एवं धन-धान्य प्रदायिनी कही गई हैlसरस्वती अग्रजन्माओं की भूमि प्रदायिनी कही गई हैlऋग्वेद ६/६१/३ एवं ८/२१/१८ के अनुसार सारस्वत प्रदेश की प्राचीनता सिद्ध होती हैlसरस्वती के तट पर एक प्रसिद्द राजा और पञ्चजन निवास करते हैं जिन तटवासियों को सरस्वती स्मृद्धि प्रदान करती हैlऋग्वेद ६/६१/७ के अनुसार वृत्र का संहार सरस्वती तट पर हुआ था जिसके कारण इसकी नाम वृत्रघ्नी भी हुईlसर्वप्रथम यज्ञाग्नि सरस्वती तट पर प्रज्वलित हुई थीlतटवासी भरतों ने सर्वप्रथम अग्नि जलाई थीlइसी कारण सरस्वती का एक नाम भारती भी हुईlसरस्वती तट से ही अग्नि का अन्यत्र विस्तार भी हुआlफलतः सरस्वती के साथ ही दृषद्वती और आपया के तटों पर भी यज्ञों का संपादन होने लगाlनदियों में सरस्वती की इतनी महिमा मणि गई है कि इसे नदीतमे ही नहीं अम्बितमे और देवितमे भी घोषित करते हुए कहा गया है –
अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वती l
प्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिम्ब नस्कृधि ll
-ऋग्वेद २/४१/६

ऋग्वेद ७/९६/१ में सरस्वती की महता गायन करने वशिष्ठ को आदेश देते हुए ऋषि कहते हैं, हे वशिष्ठ! तुम नदियों से बलवती सरस्वती के लिये वृहद स्तोत्र का गायन करोlऋग्वेद ६/६१/१० के अनुसार सरस्वती के स्तुतिगायकों ने अपने पूर्वजों द्वारा भी इसके स्तुति का उल्लेख किया है l इससे भी सरस्वती तट पर वैदिकों के निवास की प्राचीनता का संकेत मिलता हैlकतिपय विद्वान कहते हैं, भरतों की आदिम वासभूमि सरस्वती तटवर्त्ती भूमि (सारस्वत प्रदेश) ही थी जहाँ उन्होंने सर्वप्रथम यज्ञाग्नि जलाई थीlमैकडानल के अनुसार भी सूर्यवंशियों की प्राचीन वासभूमि भी जलाई थी, किन्तु विद्वानों के अनुसार सरस्वती के उद्गम स्थान पर हिमराशि का गलकर समाप्त हो जाने, जलग्रहण क्षेत्र से ही अन्य नदियों के द्वारा सरस्वती के जल का कर्षण कर लिये जाने आदि भौगोलिक कारणों से ख्य्यातिप्राप्त और पुण्यतमा सरस्वती का प्रवाह बहुधा परिवर्तित होता रहता थाlसम्भवतः उद्गम स्थल से सरस्वती का जल यमुना ने ही सबसे अधिक कर्षित किया होगाlइसी कारण यह मान्यता बनी कि प्रयाग में यमुना के साथ ही गुप्त रूप से सरस्वती भी गंगा में मिलती हैlभौगोलिक कारणों से सरस्वती वैदिक काल में ही क्षीण होते-होते सूखने भी लगी थीlफलतः उस समय तक उसका जो धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व कायम हो चुका था वह तो आगे भी मान्य रहा,परन्तु उसका सामाजिक-आर्थिक,आधिभौतिक महत्व घटता गयाlउत्तर वैदिक कालीन साहित्यों में धार्मिक-आध्यात्मिक दृष्टियों से सरस्वती एवं उसके तटवर्ती स्थानों के उल्लेख अंकित हैं,लेकिन आधिभौतिक महत्व के साक्ष्यों का प्रायः अभाव ही हैlलाट्टायानी श्रौतसूत्र में कहा है –
सरस्वती नाम नदी प्रत्यकस्त्रोत प्रवहति, तस्याः प्रागपर भागौसर्वलोके प्रत्यक्षौ ,
मध्यमस्तभागः भूम्यन्तःनिमग्नः प्रवहति,नासौ केनचिद् तद्धिनशनमुच्यते ll
-लाट्टायन श्रौतसूत्र १०/१५/१
अर्थात - सरस्वती पश्चिमोभिमुख हो प्रवाहित होती हैlउसका आरम्भिक एवं अन्तिम भाग सबके लिये दृश्य हैlमध्यभाग पृथ्वी में अन्तर्निहित है जो किसी को भी दिखलाई नहीं पड़ताlलाट्टायन श्रौतसूत्र में उद्धृत इस सन्दर्भ से सरस्वती के लुप्त होने का संकेत मिलता हैlसरस्वती के मरुभूमि में समाहित होने अथवा सूखने के काल के सम्बन्ध में विद्वानों का अनुमान है कि ब्राह्मण ग्रन्थों के काल में रेतीले स्थलों में अन्तर्निहित हो गईlकुछ विद्वान यह भी कहते हैं कि ऐतरेय ब्राह्मण के काल में अथवा उसके पूर्व ही सरस्वती सुख चुकी थीlविज्ञान के अनेकानेक नवीन सोच भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैंlब्राह्मण ग्रन्थों एवं श्रौत सूत्रों से ज्ञात होता है कि सरस्वती के तट पर धार्मिक-आध्यात्मिक कृत्यों का संपादन भी किया जाता है,थाlसरस्वती एवं दृषद्वती (चिनांग)के संगम पर भी अपां नपात इष्टि में पक्वचरू की आहुति देने का विधान भी अंकित हैlकात्यायन श्रौतसूत्र २४/६/६ के अनुसार सरस्वती दृषद्वती का संगम दृशद्वात्याय्यव कहा जाता थाlकात्यायन श्रौतसूत्र के ही २३/१/१२-१३ में अंकित है कि उक्त संगम पर ही अग्निकाम इष्टि भी संपादित होती थीlताण्ड्य ब्राह्मण २५/१६/११-१२ आपस्तम्ब के अनुसार सरस्वती तट पर तीन सारस्वत सत्र मित्र एवं वरुण के सम्मान में, इन्द्र एवं मित्र के सम्मान में, अर्यमा के सम्मान में किये जाते थेl

उद्गम स्थान
सरस्वती का उद्गम स्थान जैमिनीय ब्राह्मण ४/२६/१२ के अनुसार प्लक्ष प्रास्त्रवन, एवं आश्वलायन श्रौतसूत्र १२/६/१ के अनुसर प्लाक्ष प्रस्त्रवन कहा जाता हैlयमुना का उद्गम स्थल प्लाक्षावतरणभी इसके पास ही थाlमहाभारत वनपर्व १२९/१३-१४-२१-२३ से स्पष्ट भाष होता है कि यमुना क्ले उद्गम स्थल प्लाक्षातरण के निकट ही सरस्वती भी प्रवाहित थी, जसी स्थान पर सरस्वती भूमि के गर्त्त में अन्तर्निहित हुई वह ताण्डय ब्राह्मण २५/१०/६ के अनुसार विनशन (सम्प्रति कोलायत, बीकानेर के दक्षिण-पश्चिम-दक्षिण) कहा जाता थाlसरस्वती-प्रवाह के लुप्त होने को विनशन तथा कई बार इसकी धारा पुनः प्रकट हो जाती थी,जिसे उद्भेद कहा जाता थाlसरस्वती प्रवाह के लुप्त हो जाने की स्थिति में सरस्वती के सूखे तट पर विनशन में किसी धार्मिक अनुष्ठन अथवा यज्ञादि के दीक्षा लेने का विधान थाlकात्यायन श्रौतसूत्र में अंकित है कि दीक्षा शुक्ल पक्ष की सप्तमी को होती थीlसरस्वती के लुप्त होने के स्थान विनाशन से प्लक्ष प्रास्त्रवन की दूरी उन दिनों घुड़सवारी के माध्यम से चौवालीस दिनों में पूरी की जाती थीlअनुष्ठान करने वाले प्लक्ष प्रास्त्रवन पहुँच कर ही अनुष्ठान समाप्ति एवं कारपचव देश में प्रवाहित यमुना में (सरस्वती में जल होने पर भी उसमें नहीं) अवभृथ स्नान करने का विधान थाlकात्यायन श्रौतसूत्र १०/१०/१ के अनुसार कुरुक्षेत्र के परीण नामक समुद्रतटीय स्थान पर श्रौतयज्ञ किये जाते थेlआश्वलायन श्रौतसूत्र के अनुसार विनशन से प्रक्षिप्त शय्या की दूरी पर यजमानों के द्वारा एक दिन में व्यतीत किया जाता थाlऐतरेय ब्राह्मण ८/१ की गाथानुसार सरस्वती तट विनशन पर ऋषियों द्वारा सम्पादित सत्र से  जन्म लिये (उत्पन्न) कवष नामक दासीपुत्र को प्यास से तड़प-तड़प कर मर जाने के लिये मरुभूमि में छोड़ दिए जाने पर कवष ने अपां नपात (ऋग्वेद १०/३०) स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर उसके रक्षार्थ सरस्वती उसे घेरते हुए प्रकट हुई उसे परिसरक नाम से जाना जाता हैlमहाभारत वनपर्व ८३/७५ एवं वामन पुराण सरोवर महात्म्य १५/२० में सरक कहा गया हैlमहाराज मनु के समय में सरस्वती एवं दृषद्वती के मध्य का प्रदेश देवकृतयोनि के नाम से जाना जाता हैl

पुराणादि ग्रन्थों में सरस्वती के नदी रूप की अपेक्षा देवतारूप को अत्यधिक महत्व प्रदान करते हुए कहा गया है कि सरस्वती का प्रवाह हालाँकि सूख गया था फिर भी उसका परम्परागत महत्व पौराणिक काल में भी कायम थाlभौगोलिक कारणों से सरस्वती के प्रवाह क्रम में हुए परिवर्तन को पुराणादि ग्रन्थों में शाप तथा वरदान की कथाओं से महिमामण्डित करने के साथ ही धार्मिक स्वरुप प्रदान किया गया हैlसरस्वती तटवर्ती कई स्थानों को तीर्थ रूप में वर्णन करते हुए उनके यात्राओं का जिक्र किया गया हैlमहाभारत में धौम्य पुलस्त्य, पाण्डव और बलराम की तीर्थयात्राएँ भी पुराणों की साक्ष्यता को ही प्रमाणित एवं पुष्ट करती हैlसरस्वती के नदी रूप का वर्णन महभारत वनपर्व अध्याय ८३, ८४, १२९ एवं शल्य पर्व अध्याय ३५-५५, एवं वामन पुराण सरोवर महात्म्य, ब्रह्म पुराण,कूर्म पुराण , पद्म पुराण, वृह्न्नारदीय पुराण, स्कन्द पुराण, वृह्द्धर्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खण्ड) आदि ग्रन्थों में अंकित हैंlमहभारत में पाण्डव तीर्थयात्रा के क्रम में कहा गया है कि यमुना के उद्गम स्थल प्लाक्षवतरण से पुण्यसलिला सरस्वती दिखलाई पडती हैlइससे स्पष्ट पत्ता चलता है कि सरस्वती का उद्गम स्थल प्लक्ष प्रास्त्रवण यमुना के उद्गम स्थल प्लाक्षावतरण के नजदीक ही थीlवामन पुराण सरोवर महात्म्य ११/३ एवं महाभारत वनपर्व ८४/७ एवं शल्य पर्व ५४/११ के अनुसार सरस्वती की उत्पति के सम्बन्ध सौगन्धिक वन के आगे प्लक्ष (पांकड़) वृक्ष की जड़ की बांबी प्लक्ष प्रास्त्रवण से कही गई हैl महाभारत शल्य पर्व ४२/३० एवं वामन पूर्ण सरोवर महात्म्य १९/१३ में सरस्वती को ब्रह्मा की सरोवर से उत्पन्न होना भी कहा हैl

पुराणों में वेदों की भान्ति प्लक्ष प्रास्त्रवण तीर्थरूप में स्वीकृत है लेकिन ब्रह्मा का सरोवर इस रूप में मान्य न हो सका हैlब्रह्म पुराण में सरस्वती नदी को अग्नि ने स्पष्टतः ब्रह्मा की कन्या तान्देवान्कन्या कहा है इसके साथ ही ब्रह्मा ने इसे स्वीकार भी किया हैl(ब्रह्म पुराण १०/२०१, २०३, २०४) l महाभारत शल्य पर्व ३५/७७ एवं वन पर्व ८२/६० के अनुसर ब्रह्मा के सरोवर से उद्भुत पश्चिमाभिमुख हो प्रवाहित होती हुई सरस्वती पश्चिमी समुद्र में जिस स्थान पर मिलती थी,वह सरस्वती समुद्र संगम तीर्थ के नाम से विख्यात थाlब्रह्म पुराण १०१/२१० के अनुसार भी अग्नि को समुद्र तक ले जाने की पौराणिक आख्यान से भी सरस्वती का समुद्र से मिलना सिद्ध होता हैlसरस्वती के द्वारा अग्नि को समुद्र तक पहुँचाये जाने की यह कथा थोड़े अन्तर से ब्रह्मपुराण में भी अंकित है तथा सरस्वती के सूखने का एक कारण अग्नि को समुद्र तक पहुँचाया जाना भी माना गया हैl
ऋग्वेद की भान्ति ही पुराणों में भी सरस्वती को महानदी,हजारों पर्वतों को विदीर्ण करने वाली,सर्व लोगों की माता आदि कहा गया हैlमहाभारत शल्य पर्व ३८/२२ एवं वृहन्नारदीय पुराण १/८४/८० के अनुसार सरस्वती का उद्गम स्थल हिमालय किवां हिमालय का रमणीय शिखर हैlवामन पुराण सरोवर महात्म्य १३/६-८ एवं वृहन्नारदीय पुराण २/६४/१९ मे अंकित है कि सरस्वती पहाड़ों से उत्तर द्वैतवन से होती हुई कुरुक्षेत्र के रन्तुक नामक स्थान से पश्चिमोभिमुख होकर प्रवाहित होती हैlकुरुक्षेत्र में प्रवाहित होने वाली अन्य नदियाँ बरसाती हैं लेकिन सरस्वती में सालों भर जल प्रवाहित रहता हैlविद्वानों के अनुसार कुरुक्षेत्र से पश्चिमी समुद्र के बीच सरस्वती का प्रवाह रेगिस्तान में खो चुका था,फिर भी अनेकानेक स्थलों पर उपलब्ध उसके अवशेषों को तीर्थों की मान्यता मिल चुकी थीlप्राचीन समय में द्वारावती से कुरुक्षेत्र तक जाने का प्रमुख मार्ग सरस्वती तट के साथ-साथ ही थाlभागवतपुराण में दो बार श्रीकृष्ण के हस्तिनापुर से द्वारिका और दूसरी बार द्वारिका से हस्तिनापुर आने के समय इस मार्ग का वर्णन अंकित हैlबलराम की द्वारिका से कुरुक्षेत्र की तीर्थयात्रा का मार्ग भी यही रहा हैlइन यात्राओं के क्रम में प्रभास तीर्थ, चमसोद्भेद, शिवोद्भेद, नागोद्भेद, शशयान,उद्पान अथवा सरस्वती कूप,विनशन, सुभूमिक अथवा गन्धर्ववती तीर्थ, गर्गस्त्रोत, शंखतीर्थ, द्वैतवन,नागधन्वा, द्वैपायन सरोवर तीर्थ आदि का नाम महाभारत के वनपर्व एवं शल्य पर्व में अंकित हैंlइन तीर्थों में चमसोद्भेद,शिवोद्भेद और नागोद्भेद ऐसे स्थल हैं जहाँ लुप्त सरस्वती पुनः प्रकट हुई थीlविद्वान कहते हैं, सरस्वती का पराचिन मार्ग यही है जो सूख जाने पर भी कतिपय विशिष्टताओं के कारण तीर्थ रूप में मान्य हो गयेlउद्पान अथवा सरस्वती कूपतीर्थ के सम्बन्ध में महाभारत शल्य पर्व ३५/९० के अनुसार वहाँ औषधियाँ (वृक्ष लताओं) की स्निग्धता और भूमि आर्द्रता से सरस्वती का अनुमान होता हैl शल्य पर्व के अध्याय ४२ के अनुसार वशिष्ठोद्वाह (सरस्वती-अरुणा संगम) से सरस्वती तीर्थ (विश्वामित्र आश्रम) तक सरस्वती द्वारा वशिष्ठ को प्रवाहित कर ले जाने से इसके वेगवती होने का प्रमाण मिलता है लेकिन विश्वामित्र के शाप से वशिष्ठोद्वाह में सरस्वती का जल एक वर्ष के लिये अपवित्र एवं रक्तयुक्त हो जाता हैlमहाभारत शल्यपर्व ४३/१६ एवं वामन पुराण (स० म०) १९/३० के अनुसार ऋषियों के वरदान से सरस्वती नदी पुनः पवित्र और शुद्ध हो गईlइसी प्रकार महाभारत शल्य पर्व ४३/६ एवं वमन पुराण सरोवर महात्म्य १९/३० में पश्चिम-दक्षिण अभिमुखी सरस्वती के वैसे ही किसी घटना के कारण नागधन्वा तीर्थ से पूर्वाभिमुख होने की कथा भी अंकित हैlइसे आलंकारिक रूप में नैमिषारण्यवासी ऋषियों पर सरस्वती की कथा के रूप में महाभारत शल्य परत्व ३७/३६-६० में कहा गया हैl

विद्वानों के अनुसार सरस्वती-प्रवाह के किन्हीं भौतिक कारणों के परिणामस्वरुप सूख जाने, दूषित एवं शुद्ध होने की कथाओं को पुराणों में शाप एवं वरदान की कथाओं से महिमामण्डित किया गया हैlब्रह्मपुराण १०१/११ के अनुसार उर्वशी के आग्रह पर ब्रह्मसुता सरस्वती पुरुरवा से मिलीlपुरुरवा के साथ सरस्वती के मेल-जोल और उनके घर आने-जाने की बात ब्रह्मा )पिता को अनुचित लगीlइस पर उन्होंने सरस्वती को महानदी होने का शाप दे दियाlइसी अध्याय के सोलहवें श्लोक में ब्रह्मा के शाप से शाप-मोचन हेतु प्राप्त वरदान के कारण सरस्वती के दृश्य एवं अदृश्य दो रूपों की हो जाने की कथा हैlब्रह्मवैवर्त पुराण में अंकित है कि देवी सरस्वती को गंगा के शाप के कारण नदी रूप में अवतरित होना पद थाlमहाभारत शल्य पर्व ३७/१-२ में विनशन तीर्थ के वर्णन में सरस्वती-प्रवाह के सूखने का कारण दुष्कर्म परायण शूद्रों और आभीरों के प्रति द्वेष की कथा अंकित हैlशान्ति पर्व १८५/१५ में सरस्वती के चारों वर्णों के लिये एकमात्र देवी कहा गया हैlमहाभारत में ही अन्यत्र सरस्वती के सूखने का कारण उतथ्य ऋषि का शाप भी कहा हैlमहाभारत पुराणादि ग्रन्थों में ऋषियोंके आह्वान पर विभिन्न स्थानों पर सरस्वती के प्रकट होने की कथा कही गई हैlइसके साथ ही विविध स्थानों प्रकट उन छोटी नदी-कल्याओं को सरस्वती नदी की पवित्रता, महता आदि के साथ जोड़ा गया हैlमहाभारत शल्य पर्व अध्याय ३८ एवं वामन पुराण सरोवर महात्म्य अध्याय १६ में ब्रह्मा के आह्वान पर पुष्कर में सुप्रभा,सत्रयाजी मुनियों के कहने पर नैमिशारण्य में कांचनाक्षी, गय के आह्वान पर गया में विशाला, उद्दालक आदि ऋषियों के आह्वान पर उत्तर कोशल में मनोरमा, कुरु के आह्वान पर कुरुक्षेत्र में सुरेणु तथा दक्ष के आह्वान पर गंगाद्वार, वाशिष्ठ के आह्वान पर कुरुक्षेत्र में ओधवती तथा ब्रह्मा के आह्वान पर हिमालय में विमलोदका नाम से सरस्वती के प्रकट होने की कथा अंकित हैlमंकणक ऋषि ने उपर्युक्त सातों सरस्वतियों (नदियों) को कुरुक्षेत्र में आह्वान कर जिस स्थान पर स्थापित किया था वह सप्त सरस्वती तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हैl

वैदिक साहित्यों में अंकित सरस्वती नदी को पौराणिक काल में सूख जाने के पश्चात पुराणादि ग्रन्थों में अनेकानेक स्थानों पर पुण्यसलिला एवं सरित्श्रेष्ठ कहते हुए अत्यन्त महता प्रदान की गई है तथा पुराणों में ही सरस्वती के देवी रूप में मान्यता भी पूर्णता को प्राप्त होती हैlअनेक ऋषियों के स्तुति इसके प्रमाण ही हैंlमहाभारत शल्य पर्व अध्याय ४२ एवं वामन पुराण सरोवर महात्म्य अध्याय १९ में वशिष्ठ ऋषि सरस्वती नदी को स्तुति करते हुए उसे पुष्टि,कीर्ति, धृत्ति, बुद्धि, उमा,वाणी और स्वाहा,क्षमा, कान्ति,स्वधा आदि जगत् को अपने अधीन रखने वाली एवं सभी प्राणियों में चार रूपों- परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी में निवास करने वाली कहा हैlयह स्तुति सरस्वती को नदी रूप की अपेक्षा देवता रूप को ही महिमामण्डित करता हैl
वेद-पुराणादि ग्रन्थों में अंकित इन वर्णनों से कतिपय विद्वानों के अनुसार सरस्वती मूलतः नदी थी जो हिमालय से निकलकर  पश्चिमी समुद्र में जा मिलती थीlकालान्तर में भौगोलिक कारणों से सरस्वती सूख गई फिर भी उसकी दृश्य भौतिक नदी रूप से होने वाले अनगिनत लाभों को देखते हुए वैदिक एवं पौराणिक श्लोकों में उसे नदीतमे और अम्बितमे ही नहीं देवितमे भी स्वीकार किया गया है