Sunday, 14 April 2019

महर्षि वेद व्यास और वाल्मीकि

श्रीमद्रामायणके रचयिता भगवान् वाल्मीकि और महाभारतके रचयिता भगवान् वेदव्यासजीके विषममें जितनी भ्रान्तियाँ हैं ,उतनी अन्य किसी क्रान्तदर्शी महर्षिके विषयमें नहीं ।
मैकालेकी अनौरस संतान वामपंथियोंने भगवान् वाल्मीकि और व्यासजीको किरात-भील-मल्लाह आदि बना दिया है ,जबकि यह शास्त्र विरुद्ध है ,असत्य है ।
आदिकवि भगवान् वाल्मीकि आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकिरामायणमें स्वयंका परिचय देते हैं , वे किसी किरात-दस्यु कुलोत्पन्न नहीं थे ,अपितु ब्रह्मर्षि भृगुके वंशमें उत्पन्न ब्राह्मण थे । रामायणमें भार्गव वाल्मीकिने २४००० श्लोकोंमें श्रीराम उपाख्यान ‘रामायण’ लिखी ऐसा वर्णन है –
“संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्र कम् ! उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना !! ( वाल्मीकिरामायण ७/९४/२५)
महाभारतमें भी आदिकवि वाल्मीकि को भार्गव (भृगुकुलोद्भव) कहा है , और यही भार्गव रामायणके रचनाकार हैं –
“श्लोकश्चापं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना !
आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत !!” (महाभारत १२/५७/४०)
शिवपुराणमें यद्यपि उनको जन्मान्तरका चौर्य वृत्ति करने वाला बताया है तथापि वे भार्गव कुलोत्पन्न थे । भार्गव वंशमें लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण थे ,उन्हीका दूसरा नाम ऋक्ष था । ब्राह्मण होकर भी चौर्य आदि कर्म करते थे और श्रीनारदजीकी सद् प्रेरणासे पुनः तपके द्वारा महर्षि हो गये ।
“भार्गवान्वयसम्भवः !!
लोहजङ्घो द्विजो ह्यासीद् ऋक्षनामोन्तरो हि स: !
ब्राह्मीं वृत्तिं परित्यज्य चोर कर्म समाचरेत् ! नारदेनोपदिष्टस्तु तपोनिष्ठां समाश्रितः !!
इत्यादि वचनोंसे भृंगु वंश में उत्पन्न लोहजगङ्घ ब्राह्मण जिसे ऋक्ष भी कहते थे , ब्राह्मण वृत्ति त्यागकर चोरी करने लगा था , फिर नारदजीकी प्रेरणासे तप करके पुनः ब्रह्मर्षि हो गये । उन्हें किरात-भील कुलोत्पन्न कहना अपराध है । २४ वे त्रेतायुगमें भगवान् श्रीराम हुए तब रामायणकी रचनाकर आदिकवि के रूपमें प्रसिद्ध हुए । विष्णुपुराणमें इन्हीं भृगुकुलोद्भव ऋभु वाल्मीकिको २४ वे द्वापरयुगमें वेदोंका विस्तार करने वाले २४वे व्याजजी कहा है –
“ऋक्षोऽभूद्भार्गववस्तस्माद्वाल्मीकिर्योऽभिधीयते (विष्णु०३/३/१८) । यही भार्गव ऋभु २४ वे व्यासजी पुनः ब्रह्माजीके पुत्र प्राचेतस वाल्मीकि हुए । श्रीमद्वाल्मीकिरामायणमें वाल्मीकि भगवान् श्रीरामचन्द्रको अपना परिचय देते हैं –
“प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन ! (वाल्मीकिरामायण ७/९६/१८)
स्वयं को प्रचेताका दशवाँ पुत्र वाल्मीकि कहा है । ब्रह्मवैवर्तपुराणमें कहा है –
” कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टु: सृष्टिविधौ पुनः !
य: पुत्रश्चेतसो धातु: बभूव मुनिपुङ्गव: !!
तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामह: !
– अर्थात् कल्पान्तरोंके बीतने पर सृष्टाके नवीन सृष्टि विधानमें ब्रह्माके चेतस से जो पुत्र उत्पन्न हुआ , उसे ही ब्रह्माके प्रकृष्ट चित्तसे आविर्भूत होनेके कारण प्रचेता कहा गया है ।
इसीलिए ब्रह्माके चेतससे उत्पन्न दशपुत्रोंमें वाल्मीकि प्राचेतस प्रसिद्ध हुए ।
मनु स्मृतिमें वर्णन है ब्रह्माजीने प्रचेता आदि दश पुत्र उत्पन्न किये –
“अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ! पतीत् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश !! मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलसत्यं पुलहं क्रतुम् ! प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च !! (मनु०१/३४-३५) भगवान् वाल्मीकि जन्मान्तरमें भी ब्राह्मण (भार्गव) थे और आदिकवि वाल्मीकिके जन्ममें भी (प्राचेतस) ब्राह्मण थे !
शिवपुराणमें कहा है प्राचेतस वाल्मीकि ब्रह्माके पुत्रने श्रीमद्रामायणकी रचनाकी ।
” पुरा स्वायम्भुवो ह्यासीत् प्राचेतस महाद्युतिः ! ब्रह्मात्मजस्तु ब्रह्मर्षि तेन रामायणं कृतम् !! ”
महाभारतकार भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासजी भी भील-मल्लाह नहीं वासिष्ठकुलोद्भव थे । व्यासजीकी माता सत्यवती अमावसु पितृकी मानसी कन्या अच्छोदा थीं , जिनका पितृलोकसे पतन होकर मर्त्यलोकमें कुरुवंशी महाराज चैद्योपरिचरवसुकी कन्या मत्स्यगन्धा के रूपमें जन्मी थीं । व्यासजीके पिता महर्षि पराशर भगवान् वसिष्ठके पौत्र और शक्तिके पुत्र थे ।
भगवान् व्यासजीकी माता सत्यवती भीष्मजीसे कहती हैं –
“यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतास्ते भरतर्षभ !
तस्य शुक्रादहं मत्स्याद् धृताकुक्षौ पुरा किला !!
मातरं मे जलाद् धृत्वा दाश: परमधर्मवित् !
मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वे ह्यकल्पयत् !!
(महाभारत आदि पर्व १०४-६)
– भरत श्रेष्ठ ! तुमने महाराज वसुका नाम सुना होगा । पूर्वकालमें मैं उन्हीं के वीर्यसे उत्पन्न हुई थी । मुझे एक मछलीने अपने पेट में धारण किया था(इसीलिये मत्स्यकी गन्ध उनके शरीर से आती थी जिससे उनका नाम मत्स्यगन्धा प्रसिद्ध था ) । एक परम् धर्मज्ञ मल्लाहने जलसे मेरी माताको पकड़ा ,उसके पेट से मुझे निकाला और अपने घर लाकर अपनी पुत्री बनाकर रखा !”
इस वृत्तान्त से माता सत्यवती कुरुवंशी महाराज उपरिचरिवसुकी औरस पुत्री सिद्ध होती हैं , जिन्हें दाशराज मल्लाहने पालके बड़ा किया था ।
इन्हीं मत्स्यगन्धासे महर्षि पराशरने कन्यावस्थामें व्यासजी को उत्पन्न किया था ।
“पराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषि: !
कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः !!” (आदिपर्व०१०४/१४)
भगवान् व्यासजी की माता क्षत्रिय राजा वसुपुत्री थीं और पिता महर्षि पराशर वासिष्ठ ब्राह्मण थे , फिर व्यासजी को मल्लाह ,केवट ,निषाद कहना निरीह मूर्खता ही नहीं ,महान् अपराध भी है ।

Saturday, 13 April 2019

ऐलूष कवष शुद्र नही द्विज थे

महर्षि ऐलूष कवष  ~~~~

'ऐतरेय ब्राह्मण'  में कथा आती है कि भृगु, अंगिरा आदि ऋषियों ने सरस्वती नदी के तट पर यज्ञ आरम्भ किया।

इस यज्ञ में भाग लेने के लिए ऐलूष के पुत्र कवष भी पहुँचे, परन्तु ऋषियों ने उनको जुआरी समझकर उनसे कहा === "(दास्या: पुत्र:) कितव: अब्राह्मण: कथं नो मध्ये अदीक्षिष्ट इति)   ---- अर्थात् 'दासीपुत्र, जुआरी, अब्राह्मण, अदीक्षिष्ट-- हम लोगों के बीच कैसे दीक्षित हो सकता है ?'

ऐसा कहकर उन्होंने यज्ञशाला से बाहर सरस्वती नदी से अत्यंत दूर निर्जन स्थान पर ले जाकर उसे छोड़ दिया, जिससे वह सरस्वती नदी का जल न पी सके और प्यासा ही मर जाये।

वे प्यास से अत्यंत व्याकुल थे और पूर्व जन्म की तपस्या तथा पुण्यकर्म के प्रभाव से ऋग्वेद दशम् मण्डल के तीसवें सूक्त 【वरुण-सूक्त】 का उन्हें ज्ञान था।

उनके वरुण-सूक्त के जप के प्रभाव से वरुण देवता ने उनपर कृपा की।
वरुण जी की कृपा से सरस्वती नदी का जल प्रवाह उनकी ओर बहने लगा, उन्होंने यथेष्ट जल पीकर अपनी प्यास शांत की।

तब देवताओं ने प्रसन्न होकर ऋषियों को कवष की शुद्धि का परिचय दिया।
ऋषियों ने अपने उपास्य देवता के द्वारा कवष की प्रशंसा सुनकर पश्चाताप किया।

ऋषि आपस में कहने लगे कि जिसकी उपास्य देव भी स्तुति करते हैं, वह अनादर तथा निकाले जाने के योग्य नहीं है।
 अतः ऋषियों ने उन्हें बुलाकर यज्ञ में दीक्षित किया।           【ऐतरेय ब्राह्मण-- २,२,१९】

यह तो हुआ उनका जीवन-चरित्र।   
अब आइये आर्यसमाजियों, वामपंथीयों, अंग्रेजों आदि षड्यंत्रकारीयों द्वारा उनके जीवन-चरित्र को लेकर किये गये दुष्प्रचार पर विचार करें ~~~~~~~~~~~~~~~

शंका==  आजकल के सुधारवादी तथा वर्णाश्रम को न मानने वाले मन्त्र में आये हुये 'दास्या: पुत्र:' , 'कितव:' तथा 'अब्राह्मण'  शब्द को देखकर इनको शूद्र कहते हैं।

समाधान==  वेदभाष्यकार श्री सायणाचार्य जी इन तीनों शब्दों को निंदार्थक मानते हैं।
ऐलूष कवष जन्म से ब्राह्मण होने पर भी "जुआ खेलना वर्जित है" , इस बात को नहीं जानते थे। वेदज्ञान से रहित होने से ऋषियों ने 'दास्या: पुत्र:, अब्राह्मण' शब्द से अति कटु वचन कहे (गालियां दी)।

ऋषियों ने 'दास्या: पुत्र:' आदि  उसके जुआरीपन को दूर करने के लिए उसे दण्ड देने तथा सुधार के लिए कटूक्तियां कही।

जैसे माता-पिता अपने उस पुत्र को, जो अधिक खेलता हो, पढ़ाई नहीं करता ;  उसकी निंदा करते हुये माता-पिता अपने पुत्र को सुअर, गधा, बंदर कहकर डांटते है।

तो जैसा वह बालक माता-पिता द्वारा ऐसा कहने पर ही गधा, सुअर नहीं हो जाता ; वैसे ही ऋषियों द्वारा उसे दासीपुत्र तथा अब्राह्मण कहने से वह शूद्र नहीं होता।

'दास्या: पुत्र:'  में अलुक् समास वाला शूद्र का पुत्र अर्थ नहीं है, किन्तु कवष जुआरी की निंदार्थक है।

इसीलिए इसपर भाष्यकार सायणाचार्य जी भाष्य में लिखते हैं---- 'दास्या: पुत्र: इत्युक्ति---- रधिक्षेपार्थ:।'     दासीपुत्र वचन अक्षेपार्थ है, शूद्रापुत्र कहने में इसका तात्पर्य नहीं है।

व्याकरण शास्त्र में 'षष्ट आक्रोशे' 【६,३,२१】  अर्थात् षष्टी विभक्ति आक्रोश अर्थ में आई है। वे ब्राह्मण होने पर भी जुआ खेलते थे, इससे आक्रोशित होकर उन्हें दासीपुत्र कहा गया है।

दासीपुत्र केवल व्याकरण से ही सिद्ध नहीं होता, बल्कि साहित्य में भी गाली के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

महाकवि कालिदास प्रणीत "अभिज्ञानशाकुन्तलं" नाटक के द्वितीय अंक में सेनापति के लिए कहा है कि-----

 'गच्छ ! भो दास्य: पुत्र:। ध्वंसितस्ते उत्साह वृत्तान्त।'

इसी नाटक के तीसरे अंक में भी----

'किमत्र उज्जैन्याम् कोऽपि चोरो नाऽस्ति, य एतद् दास्या: पुत्रं  (स्वर्णभाण्डम्) नापहरति'     इस वाक्य में स्वर्ण के पात्र की दासीपुत्र कहकर निंदा की गई है।

यही शब्द शूद्रक प्रणीत "मृच्छकटिक" नाटक आदि अनेक ग्रन्थों में आया है।

जैसे शास्त्रों में अन्य पशु-पक्षियों की अपेक्षा गाय तथा घोड़ों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है---

'अपशवोवा अन्ये गवाश्वेभ्य:।'  'गौ तथा घोड़ों के अतिरिक्त अन्य सब अपशु है।'

तो जैसे गौ तथा घोड़ों को छोड़कर यहां अन्य सब अपशु नहीं हो जाते, किन्तु इस वचन का तात्पर्य गौ तथा घोड़ों की प्रशंसा में है।
वैसे ही 'अब्राह्मण' निंदार्थक है।

संस्कृत में निषेधात्मक छः अर्थों में कहा गया है---

"तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता।
अप्राशस्त्यं विरोधश्च नञर्थाः षट् प्रकीर्तिताः।।"

अर्थात् समानता, अभाव, सद्चित्र, अल्पनिंदा तथा विरोध, इन छः अर्थों में 'नञ्' कहा जाता है। ~~~

१. तद्सदृश== अब्राह्मण अर्थात् ब्राह्मणेतर स्वभाव वाले, ब्राह्मण की निंदा वाले अर्थ में अब्राह्मण।

२.  अभाव:== अपापम्।

३. तद्भिन्न== घोड़े से अतिरिक्त अनश्व ।

४.  अल्प==  यथा अनुदराकन्या---  बहुत पतली कन्या को अनुदरा कहा गया है।

५. अप्राशस्त्य=  अपशवोवा--- अन्ये गो अश्वेभ्य:।  गौ तथा घोड़े के अतिरिक्त अन्य पशु प्रशंसनीय नहीं है।

६.  विरुद्ध==  अधर्म अथवा अप्रशंसनीय ।

तो प्रशंसा रहित धर्म वाला 'कवष' जुआरी होने के कारण उन्हें अब्राह्मण कहा।

जो ब्राह्मण जन्म पाकर भी खड़े होकर पेशाब करता है, 'नञ्' 【२/२/६】 इस सूत्र के भाष्य में गुणहीन ब्राह्मण का उदहारण देते हुये पतञ्जलि जी ने लिखा है-----

"अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् मूत्रयति अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् भक्षयति"

इसकी व्याख्या करते हुए श्री कैयट लिखते हैं----- 

"तप: श्रुतयोरभावाद् निंदया अत्र अब्राह्मण: शब्द प्रयोग:। तत्र जाति भावे अवयवे समुदाय-- रूपारोपाद् ब्राह्मण शब्द प्रयोग:।'

अर्थात् वहां ब्राह्मण शब्द तपस्या तथा श्रोत्र के अभाव वाले ब्राह्मण में प्रयुक्त हुआ है, वहां पर जाति मात्र अंग में समुदाय के आरोप से ब्राह्मण शब्द प्रयुक्त हुआ है।'
अब्राह्मण के 'नञ्' शब्द के प्रयोग से ब्राह्मण की तपस्या तथा शास्त्रज्ञान की निवृत्ति प्रकट होती है।

कुछ लोग कल्पना करते हैं कि जब याज्ञिक ब्राह्मणों ने कवष को अपमानित करके सरस्वती नदी के उस पार निर्जल एवं निर्जन स्थान पर छोड़ दिया, तब उसने तपस्या करके ऋग्वेद का पूर्णज्ञान प्राप्त किया।
परन्तु उनका यह वचन भी युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि उस स्थान पर कोई भी गुरुकुल नहीं था। और फिर चार-पांच मिनट के अंदर कोई भी व्यक्ति वेद नहीं पढ़ सकता।

उनपर सरस्वती देवी की कृपा हुई तथा उनको चालीस अध्याय वाला "अपोनप्ष्त्रीय सूक्त" का प्रत्यक्ष हुआ।
इस सूक्त के मन्त्रद्रष्टा कवष ऋषि जन्म से ही ब्राह्मण सिद्ध होते हैं, शूद्र नहीं।

देवी-देवताओं की कृपा से जुआ खेलना भी छूट गया। ऋग्वेद 【१०/३४/१३】 में ब्राह्मण के लिए "अक्षौर्मादिव्य:" अर्थात् 'ब्राह्मण के लिए पाशा नहीं खेलना चाहिए' आया है।

शास्त्रज्ञान से रहित कुछलोग इनकी माता का नाम इलुष दासी बताते हुये इन्हें दासीपुत्र कहते हैं।

उनका यह कथन असत्य है, क्योंकि स्त्री का नाम अकारान्त न होकर आकारान्त होता है।
जैसे-- रमा, कृष्णा, सत्या आदि।

वास्तव में इनके पिता का नाम ऐलूष था, उनके पुत्र होने के कारण इन्हें ऐलूष-कवष कहते हैं।

Monday, 1 April 2019

कश्मीर

कश्मीर का भारतीय दृष्टि से खींचा गया एकदम सत्य चित्रण - वहां तैनात मेरे नाते, रिश्तेदार, मित्र, सभी एकमत हैं कि कश्मीर में सेवा एक घुटन भरा अनुभव है, क्योंकि उन्हें भारतीय एलीट वर्ग द्वारा पोषित कश्मीरियों जैसे कृतघ्नों को झेलना ही नहीं पड़ता बल्कि उनके हाथों उत्पीड़ित भी होना पड़ता है। 

"सबसे ज्यादा आजादी कश्मीर में है। किन्तु समाज में झूठी अफवाह कम्युनिस्ट/जेहादी फैला रहे हैं। कश्मीर घाटी पूरे जम्मू कश्मीर राज्य के मात्र 15% क्षेत्रफल का प्रतिनिधित्व करती है, उसमें से भी मात्र 5 % क्षेत्रफल जो कि शहरी आबादी को दर्शाता है सारे अतिवादी आतंकवाद का केंद्र है।

लगभग सारी पत्थरबाजी यहीं पर होती है | जम्मू और लद्दाख क्षेत्र पूर्णतः शांत है और देश के साथ है | इस 5% हिस्से को पूरा कश्मीर समझना JNU/DU के Communist छात्रों की नासमझी के अतिरिक्त कुछ नहीं है |

इसी प्रति-विद्रोही क्षेत्र के कुछ आंकडे प्रस्तुत हैं......

1. आबादी और क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे ज्यादा रोजगार इसी कश्मीर क्षेत्र में है। प्रतिव्यक्ति आय भी अन्य बीमारू राज्यों की तुलना में कई गुना ज्यादा है। यहां लगभग हर घर में सरकारी कर्मचारी मिल जायेंगे।

2. यहाँ 68% मुस्लिम (बहुसंख्यक) आबादी होने के बावजूद, अल्पसंख्यक वर्ग का सारा लाभ यहाँ के मुस्लिमों को मिलता है। गैर-मुस्लिमों व शियाओं को सिर्फ जूठन (exceptions) मिलता है|  ट्रान्सफर/पोस्टिंग से लेकर छात्रवृति/अनुदान सबमें सुन्नी मुस्लिमों का कब्ज़ा है ।

3. यहाँ पर अकुशल मजदूर की दिहाड़ी/Daily Wage ₹500 से शुरू होती है। ये इलाका इतने पैसे वाला है कि शायद ही कोई कश्मीरी आपको मजदूरी करता मिलेगा। यहाँ पे मजदुरी यूपी, बिहार, बंगाल के लोग करते हैं। जो हर सड़क चौराहे पर अपने रंग और भाषा के आधार पे साफ़ नज़र आ जायेंगे।

4. सबसे ज्यादा पथराव वाले क्षेत्रो में मकान की कीमत करोडों में होती है। UP, बिहार के अमीरों के जैसे मकान  यहाँ के मध्यम वर्ग वालों / तथाकथित बेरोजगारों के होते  है।

5. यहां की आय का सबसे बड़ा स्रोत केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही असीमित खरबो रूपये की सहायता में किया गया भ्रष्टाचार, सरकारी नॉकरी, अरेबियन देशो और ISI से जिहाद/पथराव के लिए दिया जा रहा पैसा है।

दूसरा स्रोत सेब के बगीचे, आखरोट, केसर, बादाम और पर्यटक हैं।

तीसरा बड़ा स्रोत यहाँ पर उपस्थित फ़ौज(Army/paramiltary) से राशन, सामान, निर्माण कार्यो, इंटेलिजेंस के रूप में प्राप्त हो रहा कमीशन है।

ध्यान देने वाली बात ये है कि फ़ौज के हटते ही लाखो लोग बेरोजगार हो जायेंगे क्योंकि इनकी जीविका फ़ौज पर ही टिकी है।

6. यहाँ इतनी समृद्धि है कि लोगो का सामान्य भोजन गोश्त बन गया है। अन्य मामलों में कश्मीरी आजादी की डींग हांकने के लिए भारतीय संविधान के विशेष प्रावधान धारा 370 पर इतराते नहीं थकते परंतु इसी धारा के कारण Indian Penal Code (IPC) के स्थान पर कश्मीर में लागू "रणवीर पीनल कोड" (RPC, कश्मीर के हिंदु महाराजा द्वारा लागू दंड संहिता) में गौवध का पूर्ण निषेध होने के बावजूद यहाँ खुले आम न केवल गौवध होता है अपितु गौमांस खुले आम चौराहों पर बेचा जाता है |

7. यहाँ के बच्चे इतने आजाद हैं कि इन्हें परीक्षा में मात्र 10 में से मात्र 5 प्रश्न करने होते हैं, परीक्षा देना न देना इनकी इच्छा पर निर्भर रहता है। नौकरी दिलवाने के लिए केंद्र सरकार इन्हे अखिल भारतीय टूर का इंतजाम कराती है, भारी भरकम छात्रवृति देती है।

दिल्ली/मुम्बई के 5 सितारा होटलों में रखके इंटरव्यू करवाती है। DU, JNU, LKO बंगलौर आदि यूनिवर्सिटी में इन्हें स्कॉलरशिप देकर पढ़ाया जाता है।

ये अलग बात है कि ये वहीं से भारत की बर्बादी के नारे लगाते हैं।

8. यहाँ की लड़कियां बहुत ही खूबसूरत हैं। अगर कोई कश्मीरी लड़की गैर मुस्लिम से शादी कर ले तो वहाँ की लोकल पोलिस/जेहादियों की मदद से उसे मार डालने पर उतारू हो जाती है या रिश्ते को किसी भी प्रकार से ख़त्म करने के लिए बाध्य कर दिया जाता है .... जिसके कारण ऐसा दुस्साहस कोई करने की हिम्मत नहीं करता।

9. यहाँ गांव में स्कूल भले ही न हो, किन्तु बड़ी-बड़ी मस्जिदें जरूर मिलेंगी, जहाँ इस्लाम/शांति की जगह सिर्फ फिलिस्तीन, इस्रायल, अमेरिका, सीरिया, बगदादी, काफिर, ISIS, पाकिस्तान, तथाकथित आजादी की ही बातें होती हैं। कश्मीर की मस्जिदें राजनीति का केंद्र बन चुकी हैं।

10. यहाँ पर सरकारी नौकरी में जाति, धर्म और क्षेत्र देख के प्रायः भर्ती की जाती है। जम्मू कश्मीर के लगभग सभी बड़े/छोटे विभागों पर कश्मीरी सुन्नी मुसलमानों का कब्ज़ा है। पूरे जम्मू कश्मीर का लगभग जेहादिकरण हो चुका है। भ्रष्टाचार को ये पूर्णतः जायज मानते है क्योंकि ये पैसा केंद्र सरकार (काफिर देश का जजिया) द्वारा दिया जाता है।

11.कश्मीरी सेना और अर्धसैनिक बलों को कश्मीर से इसलिए हटाना चाहते है...क्योंकि ये दोनों गैरमुस्लिमों का संगठन है। इनका उद्देश्य कश्मीर को पाकिस्तान (Land of Pure) बनाना है। कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के बाद यही आखिरी बाधा है, कश्मीर के इस्लामिक राष्ट्र बनने में।

12. कश्मीरी क्षेत्र में उपस्थित गुरूद्वारे/पुराने मंदिरों की सुरक्षा के लिए पोलिस/पैरामिलिटरी लगायी गयी है। इसके बावजूद जुमे के नमाज के बाद इन मंदिरों पर भी पथराव होता है। यदि मंदिरो से फ़ौज हटा ली जाय तो उसे तुरंत तोड़ दिया जायेगा।

13.यहाँ पर जो कश्मीरी हिंदु वापस लौट के आये थे, उनकी सुरक्षा के लिए भी पोलिस लगायी गयी है, लेकिन उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नही दी गई।

स्थानीय पुलिस सुरक्षा कम, कश्मीर में वापस लौटे हिन्दुओं पर निगरानी ज्यादा रखती है कि कहीं ये हिंदुस्तान के लिए कुछ लिख, बोल या देशभक्ति का काम तो नहीं कर रहे। इन जगहों पर अर्धसैनिक या सेना सुरक्षा के लिए नहीं लगायी जाती क्योंकि इसमें हिन्दू ज़्यादा हो सकते हैं।

14. कश्मीरी पोलिस का लगभग जेहादिकरण हो चूका है। सब पत्थरबाजों से सहानुभूति रखते है और cross agent के रूप में गुप्त सूचनाएं लीक करते है। कश्मीर की जेल ऐयाशी का अड्डा है। घर में आतंकवादियो/अपराधियो को जो सुविधा नहीं मिलती वह जेलो में दी जाती है। इसलिए कश्मीरी अतिवादी न पोलिस से डरते है न ही जेल जाने से। यहाँ तक ये जेलें विभिन्न उग्रवादियों के बीच co-ordination का काम करती है और पत्थरबाज जेलों से निकलने के बाद और उग्र रूप से पथराव में भाग लेते हैं | जिस तरह मक्का मदीना में शैतान को पत्थर मारा जाता है उसी तरह ये मानसिक रूप से विकृत जेहादी ....सेना/अर्धसेनिक बलों पर पथराव कर पुण्य कमाना चाहते हैं | काफिरों का साथ देने के कारण कभी कभी पुलिस भी इसका शिकार बन जाती है |

15.⁠यहाँ मात्र 1% जनता द्वारा उर्दू बोले जाने के वावजूद उर्दू को राजभाषा के रूप में मजहबी आधार पे पूरी आबादी के ऊपर थोप दिया गया है।

16. उत्तर प्रदेश में लगभग 60 लाख की आबादी पर एक जिला इलाहाबाद है व्ही ज्यादा बजट लेने के लिए कश्मीर में मात्र 69 लाख आबादी पर 10 जिले बनाये गए है। जिसमे एक जिले गांदरबल की आबादी लगभग 2 लाख और क्षेत्रफल मात्र  260 (10*16) बर्ग KM है जो की UP/बिहार के एक ब्लॉक से भी कम होगी। CM सिर्फ कश्मीर घाटी से बन पाये इसके लिए योजनाबद्ध/पक्षपातपूर्ण तरीके से कश्मीर घाटी में MLA/MLC की सीटों का कोटा ज्यादा है।

17. मात्र 15% क्षेत्रफल होने के वावजूद सारे CM सिर्फ कश्मीर घाटी के बनाये जाते है। लगभग 50% आबादी हिन्दू/शिया/सिख/अन्य के होने के वावजूद आजतक इनमें से कोई CM नहीं बना। इससे बड़ी आजादी/पक्षपात कहीं हो सकता है?

18. यहाँ पर इतनी स्वच्छदंता है कि मात्र 2-3 KM के क्षेत्र में 4 से 5 पुल, करोड़ों के बजट वाले ...नदी/नालो के ऊपर बनाये जाते है, जिससे कि यहाँ की जनता को नदी पार करने के लिए ज्यादा न चलना पड़े। यहाँ इतने छोटे छोटे जिले होने के वावजूद लगभग सभी जिलों में बाईपास बनाया गया है ।

उत्तर प्रदेश के लगभग 2 जिलों की आबादी और क्षेत्रफल वाली कश्मीर घाटी में सैकड़ों करोडों के अनेकों ओवरब्रिज/diversion बने हुए हैं । केंद्र सरकार के अनुदान का ऐसा बंदरबाट/दुरुपयोग पूरे देश में कहीं नहीं होता ।

यहाँ पुलों/सडकों की संख्या देखकर कोई भी आदमी चौंक जायेगा। ये आजादी नहीं ऐय्याशी है।

19.यहाँ विद्यालयों में A फ़ॉर आजादी और I फ़ॉर इस्लाम सिखाया जाता है। हिन्दुओं, सिखों और अन्य हिन्दुस्तानियों के लिए सिर्फ मजहबी जहर भरा जाता है। इनके दिमाग झूठ और अफवाह के जहर से भरे पड़े हुए हैं। टीचर मुख्य रूप से बच्चों के दिमाग में राजनीति और नफरत भरते हैं कि तुम्हारे साथ हिंदुस्तान अन्याय कर रहा है।

20. यहाँ की मीडिया अफवाह और झूठ से भरी पड़ी है। समाचार पत्रों में सिर्फ नकारात्मक खबरें ही छपती हैं जिससे लोग और उत्तेजित हो, प्रदेश सरकार और हिंदुस्तान के खिलाफ जहर उगलते रहें। प्रोपोगेंडा फ़ैलाने की इन्हें पूरी आजादी दे रखी है।

21. यहाँ इंडियन आर्मी, पैरामिलेट्री और पोलिस करोडों रूपये जनता के ऊपर सद्भावना और सिविक एक्शन प्रोग्राम के रूम में खर्च करती है। जिससे जनता का दिल जीत जाए। ये अलग बात है इन्हें पत्थर के अतिरिक्त आज तक कुछ नहीं मिला।

यह देश और प्रदेश का सबसे कम अपराध वाला क्षेत्र है। यहाँ बलात्कार न के बराबर होता है। ऐसा सेना/अर्धसैनिक बलों के दबाव के कारण है और ये सेना को ही  बलात्कारी बताते हैं। इससे ज्यादा और कौन सी आजादी चाहिये।

22. कश्मीर के बारे में Google पर सर्च करने पर आपको सिर्फ प्रोपोगेंडा साइट्स मिलेंगे। यहाँ तक कि विकिपीडिया भी कश्मीरी पंडितों /हिंदुस्तान को अत्याचारी और यहाँ के जेहादियों/अलगाववादियों द्वारा की जा रही ज्यादतियों को जायज ठहराएगी।

किस तरह से कश्मीर का इस्लामीकरण हो रहा है और कश्मीरी हिन्दुओं को किस तरह बलात्कार/लूट के द्वारा पलायन करने पे मजबूर किया गया, इसपे शायद ही कोई आर्टिकल मिले किन्तु इंडियन आर्मी के ऊपर अनेकों झूठी कहानियां -आरोप वाले अनेकों लेख आपको मिल जायेंगे।

23. यहाँ पर मानवाधिकार संगठन आतंकवादी/जेहादी अधिकार संगठन का रूप धारण कर लिए हैं। यदि आप जम्मू /लद्दाख के हैं या आप हिन्दू/सिख/शिया हैं तो आपके अधिकार और बजट के न्यायसंगत बंटवारे के बारे में कोई बात नहीं करेगा। किन्तु यदि आप कश्मीरी सुन्नी हैं और खेत में टट्टी करते समय पानी का लोटा गिर गया,  फिर तो एमनेस्टी इंटरनेशनल/UN और अन्य मानवाधिकारी कुकरमुत्ते अखबार/मीडिया/लेख से पाटकर सरकार को मुवावजा देने के लिए बाध्य कर देंगे। बड़ी घटनाओं के बारे में तो सोचिये ही मत।

24. जहां तक सेना की बात है, तो सेना कहाँ नहीं है? सेना लखनऊ, गोरखपुर, दिल्ली, बंगलोर, जबलपुर, शिलॉन्ग आदि सभी जगह है । देश के हर कोने में है। इसलिए सेना कश्मीर में भी है और AFSPA कानून सिर्फ कागजों में है।

छोटी छोटी बातों पर कश्मीरी पुलिस, अर्धसेना/आर्मी के खिलाफ FIR दर्ज कर अलगाववादियों को खुश करती है। AFSPA के तहत सेना को मिले अधिकार सिर्फ कागजों में हैं। बिना यहाँ की स्थानीय पुलिस को सूचित किये या बताये कोई भी search आपरेशन नहीं किये जाते। जिसका पूरा लाभ आतंकवादी उठाते हैं , क्योंकि कश्मीर पुलिस में बैठे जेहादी अधिकतर सूचनाएं लीक कर आतंकवादियो को भगा देते हैं।

पुलिस और यहाँ के न्यायधीशों की शह पाकर लडके सेना/अर्धसेना की गाड़ियों पर पथराव करते हैं। न्यायधीश इनके, पुलिस इनकी, सरकार इनकी, कानून इनका, मीडिया इनका और इन्हीं के बीच सेना/अर्धसेना के जवान सिर्फ बदनाम/प्रताडित किये जाते हैं।

25. मेरा JNU और DU के छात्रों से निवेदन है कि वे  अपनी कम्युनिष्टि पुस्तकों व NSUI/AISA/AISF/SFI/DSU के छात्रों के साथ आकार यहाँ कुछ दिन गुजारें और फिर बताएं कि क्या इससे ज्यादा आजादी/ऐय्याशी हिंदुस्तान में और कहीं है ?

 कश्मीर न केवल पूर्णतः आजाद प्रदेश है अपितु इसने केंद्र सरकार को ब्लैकमेल कर अपना गुलाम बना,  नाजायज रूप से अवैध धन वसूली का एक स्थायी जरिया बना लिया है। अगर इनकी आजादी का मतलब अलग इस्लामी राष्ट्र है तो भारतीय सरकार ऐसा कभी नहीं होने देगी |

कृपया इस सन्देश को JNU/DU तक पहुँचायें।

कभी-कभी यह ख़याल आता है कि अगर केंद्र में सत्ता-परिवर्तन न होता तो कैसे पता चलता कि देश-द्रोह और आतंक की जडें कहाँ-कहाँ और किस-किस रूप में फैल चुकी हैं?

कूछ लोग दाल की कीमत ही देखते रह गये और गद्दारों ने देश और जान की कीमत कौड़ियों में लगा दी!"

[साभार - Gp Singh ji, रिटायर्ड पैरामिलट्री अधिकारी] वाया बसेरा देव जी

Monday, 22 October 2018

रावण वध एवं श्रीराम राज्यभिषेख

महाभारत में जिस प्रकार पाण्डवो का 13 वर्ष वनवास अधिक मास को लेकर जोड़ा गया था यह बिराट पर्व के भीष्मवाक्य से सिद्ध है इसी तरह श्रीरामचन्द्र जी का 14 वर्ष का वनवास भी अधिकमास को लेकर ही पूरा हुआ था इस तरह अमान्त मान से कृष्णचतुर्दशी में पुर्णिमान्त मान से कार्तिक कृष्ण षष्ठी में १४ वर्षो की पूर्ति होती है अन्यथा चैत्रमास की शुक्ल दशमी के आरम्भ होकर १४ वर्ष की समाप्ति षष्ठी को नही रह सकती थी पतन्तु अधिकमास की गड़ना से ११ दिन कम छः मास की वृद्धि हो जाती तभी १४ वर्ष की पूर्ति षष्ठी को हो सकती है अतः १२ वर्ष के पूरे होने पर १३ वे वर्ष के कुछ समय बीतने पर फाल्गुन अष्टमी को सीता हरण हुआ था १४ वे वर्ष के कुछ दिन बीतने पर श्रीराम जी लङ्का के समीप पहुंचे  थे|

#वर्तते_दशमो_मासो_द्वौ_तु_शेषौ_प्लवङ्गम (वा0 रा0 ५/३७/८)

दर्शयामास वैदेह्याः स्वरूपमरिमर्दनः(वा0रा ५/३७/३३)

इस सितोक्ति के अनुसार सावन मान से सव्हरण दिन से १० मास बीत चुकने पर सीता हनुमान का सम्वाद हुआ था #पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता
इस रामोक्ति के अनुसार पौष शुक्ल के चतुर्दशी या पूर्णिमा को श्रीरामजी त्रिकुट के शिखर पर आयें थे |

हनुमान का लङ्का में प्रवेश काल :-

हिमव्यपायेन च शितरश्मीरभ्युत्थितो नैकसहस्त्ररश्मि:(वा0रा ५/१६/३१)
द्वौ मासो रक्षितव्यौ मे योSवाधिस्ते मया कृत: (वा0 रा0 ५/२०/८)
इन वाक्यो से प्रतीत होता है कि हनुमान जब लङ्का में प्रवेश किया था तब शरद ऋतु का आगमन हो चुका था मार्गशीर्ष दशमी के बाद ही हनुमान का लङ्का मे प्रवेश का स्पष्ट प्रमाण है
अन्यत्र मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को राम को प्रस्थान कहा गया है पौषपूर्णिमा को राम त्रिकुट आये थे उसके १५ दिन सेनानिवेस दूतप्रेषण आदि में बीत गयें तब युद्ध आरम्भ हुआ तब से लेकर श्रावण अभय अमान्त पर्यंत लङ्कापुर के बाहर दोनों दोनों सेनाओ का युद्ध हुआ ।
इंद्रजीत वध अनन्तर यह कहा गया है की तुम आज कृष्पक्ष चतुर्दशी अभ्युत्थान करके अमावस्या में ही शत्रुबिजय के लिए गमन करो ।
इंद्रजीत का वध तीन दिनों में हुआ था दशमी के चौथे प्रहर से लेकर त्रयोदशी के चौथे प्रहर के अवधि में इंद्रजीत का वध हुआ था |
रावण का निर्गमन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था
उसके बाद ही रावण वध और इसके अनन्तर आदित्य को स्थिरप्रभ होना कहा गया है इससे प्रतीत होता है कि रावण का वध दिन में ही हुआ

इसी पक्ष का समर्थन कालिका पुराण से होता है ।

रामस्यानुग्रहार्थाय रावणस्य वधाय च।।

रात्रावेव महादेवी ब्रह्मणा बोधिता पुरा।
ततस्तु त्यक्तनिद्रा सा नन्दायामाश्विने सिते।।

जगाम नगरीं लङ्कां यत्रासीद्राघवः पुरा।
तत्र गत्वा महादेवी तदा तौ रामरावणौ।।

युद्धं नियोजयामास स्वयमन्तर्हिताम्बिका।
रक्षसां वानराणां च जग्ध्वा सा मांसशोणिते ।।

रामरावणयोर्युद्धं सप्ताहं सा न्ययोजयत्।
व्यतीते सप्तमे रात्रौ नव्यां रावणं ततः।।

रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी।
यावत्तयोः स्वयं देवी युद्धकेलिमुदैक्षत।।

तावत् तु सप्तरात्राणि सैव देवैः सुपूजिता।

निहते रावणे वीरे नवम्यां सकलैः सुरैः।।
विशेषपूजां दुर्गायाश्चक्रे लोकपितामहः।

राम के अनुग्रहार्थ और रावण के वधार्थ ब्रह्मा द्वारा प्रबोधित देवी लङ्का में आयी और सात दिन तक राम रावण का युद्ध हुआ नवमी के दिन राम ने रावण का वध किया सब देवताओ तथा ब्रह्मा द्वारा ८ दिन तक दुर्गा पाठ होती रही ।
ऐसे रावण का वध का स्पष्ट प्रमाण इतिहास पुराणादि में आश्विन मास के शुक्लपक्ष नवमी ही ठहरता है न कि फाल्गुन मास ??
सर्ग १२३ के अंत मे पुष्पक द्वारा अयोध्या के पास पहुंचने का उल्लेख किया गया है किन्तु सर्ग १२४ में वनवास की समाप्ति पर श्रीरामचन्द्र का भारद्वाज मुनि के आश्रम में पहुचने का उल्लेख है
पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः ।
भरद्वाजश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ।।

 लङ्का में राम  ने बीभीषण से दुर्गम मार्ग का उल्लेख किया था भारद्वाज आश्रम में राम ने मुनि से यह वरदान मांगा था कि मार्ग में सभी बृक्ष अकाल मे फलदार हो यहाँ श्रीरामचन्द्र जी को यह वरदान वानरों के लिए मांगा था
आक्षेपकर्ता के अनुसार यदि पदयात्र होती तो लङ्का से अयोध्या पहुंचने में कम से कम एक मास का समय अपेक्षित होता इस प्रसंग में स्पष्ट ही पुष्पक यात्रा की संगति होती है ||
वनवास की अवधि पूर्ण होने पर भारद्वाज मुनि के आश्रम में ही कपिश्रेष्ठ हनुमान को आज्ञा देते है कि वानरराज हनुमान तुम अतिशिघ्र अयोध्या का समाचार लो कि वहाँ सब कुशल मंगल तो है न और वहाँ राजा भरत को मेरे आगमन की सूचना दो ।
श्रीरामचन्द्र जी का अयोध्या आगमन कार्तिक मास ही ठहरता है चैत्र मास नही ।

Wednesday, 19 September 2018

पञ्चरात्र आगम

-------------------- #पञ्चरात्र_आगम ------------------------

भारतीय संस्कृति निगमागम मूलक है इस संस्कृति का आधार जिस तरह निगम है उसी तरह आगम भी है ! अनादि सम्प्रदाय सिद्ध गुरु शिष्य परम्परा क्रमागत शास्त्र सन्दर्भ आगम शब्द से अभिहित होता है पदवाक्य प्रमाणज्ञ भगवान भर्तुहरी ने महाभाष्य पष्पाशाह्रिक में निर्दिष्ट आगम:खल्वपि  इस प्रतीक की व्यख्या करते हुए उस आगम को श्रुति लक्षण तथा स्मृति लक्षण होना कहा है वाचस्पति मिश्र के अनुसार

 #आगच्छन्ति_बुद्धिमारोहन्ति_यस्मात् #अभ्युदयनि:#श्रेयसोपाया: #स: #आगम
अर्थात :- जिससे अभ्युदय (लौकिक कल्याण )तथा नि:श्रेयस (मोक्ष) के उपाय बुद्धि में आते हो उसे आगम कहते है निष्कर्ष रूप में अभ्युद तथा निःश्रेयस के उपायों का प्रतिपादित शास्त्र आगमशास्त्र है ।इस साधना के अंतर्गत क्रिया प्रधान अनुष्ठानों का स्थान महत्वपूर्ण होता है वराहितन्त्र में अधोलिखित रूप में आगम का लक्षण निर्देश किया है ।

#सृष्टिश्च_प्रलयश्चैव_देवतानां_यथार्चनम
साधनं चैव सर्वेषां पुरश्चरणमेव च
षट्कर्मसाधनं चैव ध्यानयोगश्चतुर्विध
सप्तभीलक्षणैयुक्तमागम तद्विदुर्बुधा:
अर्थात जिस शास्त्र में यह सात बिषय प्रतिपादित हो उसे आगम शास्त्र कहते है |
कई ऐसे तथाकथित विद्वान भी है जो यह कहते है कि पञ्चरात्र  अवैदिक मत है
पञ्चरात्र आगम को अवैदिक कहने वाले कम से कम शास्त्रमर्यादा का भी ख्याल रख लेते तो यूँ आक्षेप न लगाते इतिहास ,पुराणादि अयाख्यानों में पञ्चरात्र सिद्धांत को वेदोक्त धर्म ही माना है न कि उसे अवैदिक कहा ??

#त्रयीसांख्यवेदांतयोगाः #पुराणं_तथा_पञ्चरात्रं_प्रभो_धर्मशास्त्रम्  (स्कंद पुराण वैष्णव खण्ड)

पुराणादि से लेकर महाभारत तक ऐतिहासिक ग्रन्थो ने भी पञ्चरात्र को वेदोक्त धर्म ही माना है |
ऋक यजु साम की तरह पञ्चरात्र भी  नारायण के श्रीमुख से ही उद्गीत हुआ है ।

#इदंमहोपनिषदंचतुर्वेदसमन्वितम्।
#सांख्ययोगकृतंतेन_पञ्चरात्रानुशब्दितम्।।
#नारायंणमुखोदीतं (महाभारत मोक्षधर्मपर्व )

#पाञ्चरात्रस्य_कृत्स्नस्य_वक्ता_तु_भगवान्स्वयम् (महाभारत शांतिपर्व ३५९/६८)

पञ्चरात्र सिद्धान्त का प्रचार प्रसार स्वयं देवऋषि नारद,  शाण्डिल्य ऋषि से लेकर पाण्डवो ने किया

#श्रुत्वैतदाख्यानवरं_धर्मराड्‌जनमेजय।
#भ्रातरश्चास्य_ते_सर्वे_नारायणपराभवन्।।(महाभारत मोक्षधर्म पर्व)

क्षत्रियशिरोमणि उपरिचर नरेश सम्पूर्ण ऐश्वर्य से युक्त थे  उनके शाशनकाल में नित यज्ञ का प्रयोजन होता था जिस कारण उनके घर पर पञ्चरात्र शास्त्र के मुख्य विद्वान सदा निवास करते थे ।

#काम्यनैमित्तिका राजन्यज्ञियाः परमक्रियाः।
सर्वाः सात्वतमास्थाय विधिं चक्रे समाहितः।।
पाञ्चरात्रविदो मुख्यास्तस्य गेहे महात्मनः। (महाभारत मोक्षधर्म पर्व)

ऐसे में पञ्चरात्र आगम को अवैदिक कहने का साहस वही कर सकते है जिन्होंने श्रुति ,इतिहास,पुराणादि का मुख तक देखा न हो |
पञ्चरात्र सिद्धान्त का प्रचार सम्पूर्ण भारतवर्ष में वयाप्त था इसका प्रमाण स्वयं महाभारत ही करता है ।

#सात्वतो_धर्मोव्याप्य_लोकानवस्थित: (महाभारत मोक्षधर्म पर्व )

भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य ने श्रीभाष्य में उक्त कथन (पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य )को उद्भूत करते हुए पञ्चरात्र वक्ता नारायण का परिचय इस प्रकार दिया है #वेदवेद्यश्च परब्रह्मभूतो नारायण....अतो वेदान्तवेद्य परब्रह्म भूतो नारायण:स्वयमेव  पञ्चरात्रस्य वक्तेति तत्स्वरूपतदुपासनाभिधायी ततंत्रमिति च तस्मिन्नितरतंत्र समान्यम न केनचिद्भावयितुं शक्यं (श्रीभाष्य)

-----#श्रीनारायण_हरि:--------

Thursday, 5 April 2018

महर्षि वाल्मीकि जन्मना ब्राह्मण थे

#महर्षि_वाल्मीकि_जयंती_बिशेष
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मैकाले के अनौरस सन्तान वामपंथियों ने महर्षि वाल्मीकि को किरात,भील,मल्लाह,शुद्र तक बना डाला मिथ्या प्रचार कर लोगो मे भ्रम उतपन्न किया है जबकि यह असत्य और शास्त्र विरुद्ध है ।
महर्षि वाल्मीकि को सास्त्रो में आदिकवि बताया गया है महर्षि वाल्मीकि ने श्रीमद्वाल्मीकिरामायण  में अपना परिचय देते हुए कहते है कि मैं भृगुकुल वंश उतपन्न ब्राह्मण हुँ

सन्निबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विशत्सहस्रकम् ।
उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ।। ७.९४.२६ ।।
इस महाकाब्य में इलोपख्यान २४ सहस्त्र श्लोक है और सौ उपाख्यान है जिसे भृगुवंशीय महर्षि वाल्मीकि जी ने बनाया है ।

महाभारत में भी वाल्मीकि को भार्गव (भृगुकुलोद्भव )
कहा गया है और यही रामायण के रचनाकार है ।

श्लोकद्वयं पुरा गीतं भार्गवेण महात्मना।
आख्याते राजचरिते नृपतिं प्रति भारत।।(महा० शान्तिपर्व १२/५६/४०)

शिवपुराण में यद्यपि उन्हें जन्मांतर का चौर्य बृती करनेवाला बताया तथापि वे भार्गवकुलोतपन्न थे भार्गववंश में लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण थे उन्ही का दूसरा नाम ऋक्ष था ब्राह्मण हो कर भी चौर्य आदि का काम करते थे और श्रीनारद जी की सद्प्रेरणा  पुनः तप के द्वारा महर्षि हो गये  !
इसके अलावा विष्णुपुराण में भी इन्हें भृगुकुलोद्भव ऋक्ष हुए जो  वाल्मीकि कहलाये ।

ऋक्षोऽभूद्भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽबिधीयते ।(विष्णु पुराण ३/३/१८)

श्रीमदवाल्मीकि रामायण में वाल्मीकि अपना परिचय देते हुए कहते है

प्रचेतसो ऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन ।।(वा० रा ७.९६.१९ ।)
मैं प्रचेतस का दसवां पुत्र वाल्मीकि हुँ ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है

कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टुः सृष्टि विधौ पुनः ।।
यः पुत्रश्चेतसो धातुर्बभूव मुनिपुंगवः ।।
तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामहः ।।१/२२/ १-३ ।।

अर्थात कल्पनान्तरो के बीतने पर सृष्टा के नवीन सृष्टि विधान में ब्रह्मा के चेतस से जो पुत्र उतपन्न हुआ उसे ही ब्रह्मा के प्रकृष्ट चित से उतपन्न होने के कारण प्रचेता कहा गया ।
इस लिए ब्रह्मा के चेत से उतपन्न दस पुत्रो में वाल्मीकि प्रचेतस प्रसिद्ध हुए ।
मनुस्मृति में वर्णन है ब्रह्मा जी ने प्रचेता आदि दस पुत्र उतपन्न किये ।

अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ।
पतीन्प्रजानां असृजं महर्षीनादितो दश । । १.३४ । ।
मरीचिं अत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदं एव च । । १.३५ । ।

भगवन जन्मांतर से ही ब्राह्मण थे शुद्र नही

गुरु लक्षण

#गुरु_लक्षण

एतद्‍देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
    स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा:॥(मनुस्मृति)
जो अग्रजन्मा है उसी से पृथ्वी के सभी मानव अपना आचार बिचार सीखें ।

ब्राह्मण सभी वर्णो में।अग्रजन्मा है
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् (ऋग्वेद)
उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्येष्ठ्याद्ब्रह्मणश्चैव धारणात् ।
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १.९३ )

वेदादि शास्त्रो में ब्राह्मण को मुख कहा गया है !
वाक् और बुद्धि  ही अंग प्रत्यंग से लेकर साम्राज्य तक का शाशन करता है यह दृष्टान्त जगत में देखा जाता है जिस कारण किस वर्ण का क्या आचरण है यह ब्राह्मण से ही जानना चाहिए क्यो ?
क्योकि
वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः (मनुस्मृति १०.३ )
उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।(मनुस्मृति )
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यां अधिजायते ।(मनुस्मृति)
पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः।।(महाभारत -- आदिपर्व ८१/२०)

ब्राह्मण स्वयं धर्म स्वरूप है ।
जिस कारण श्रुतिस्मृति आदि ग्रन्थों में ब्राह्मण के सानिध्य में ही  अध्ययन अध्यापन और आचार बिचार की शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया गया है

गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः(महाभारत आदिपर्व १/२८/३५)
अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः ।
प्रब्रूयाद्ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः । ।
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्त्युपायान्यथाविधि ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् । । (मनुस्मृति १०/१-२)
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् (श्रीमद्भागवतगीता १८- ४२ )
वृत्त्यर्थं याजयेदज्वान्यानन्यानध्यापयेत् तथा ।
कुर्यात् प्रतिग्रहादानं गुर्वर्थं न्यायतो द्रिजः (विष्णु पुराण ३/२३ )
सास्त्रज्ञा नित्य है और सास्त्रज्ञा मानने वाला ही ईश्वर का आराधना करता है सास्त्र द्रोही नही विष्णुपुराण का उद्घोष है अब उसे न मान मनमाना आचरण को ही धर्म मान ले तो उससे बड़ी और मूर्खता क्या ।

वर्णास्वमेषु ये धर्माः शास्त्रोक्ता नृपसत्तम ।
तेषु तिष्ठन् नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ।(विष्णु पुराण ३/ १९ )