Friday, 10 July 2015

राष्ट्र प्रेम और भक्ति वेद में

यो तो साम्राज्य स्वराज्य राज्य महाराज्य आदि शब्द वैदिक साहित्य की ही देन है परन्तु उनकी सबसे बड़ी देन राष्ट्र शब्द है वैदिक गर्न्थो में राष्ट्र का अत्यधिक उल्लेख है इस शब्द में आर्यो की बड़ी भावना बड़ी मार्मिकता और प्रोज्ज्वल अनुभूति निबद्ध है इस शब्द में देश राज्य जाती और संस्कृति निहित है राष्ट्र के अभ्युदय के लिए आर्य अपना सर्वस देने के लिए तैयार रहते थे और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना प्राण तक का हवन करने को आर्य सदा सन्नद्ध राहते थे उनकी प्रबल अभिलाषा थी वरुण अविचल करे बृहस्पति स्थिर करे इंद्र राष्ट्र को सुदृढ़ करे और अग्निदेव राष्ट्र को अविचल रूप से धारण करे ।

आ राष्ट्रे राजन्यः शूर ऽ इषव्यो ऽतिव्याधी महारथो जायतां [[यजुर्वेद 22/22]]
हमारे राष्ट्र में क्षत्रिय बीर धनुर्धर लक्ष्यभेदी महारथी हो ।
यह आर्यो की उत्कट उत्कण्ठा थी ।
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः[[यजुर्वेद 9/23]]
अपने राष्ट्र में नेता बन कर हम जागरणशील रहे ।
यह दृढ बिस्वास था ।
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति |[[११/5/7/17]]
ब्रह्मचर्य रूप तप के बल से ही राजा राष्ट्र की रक्षा करता है ।
वैदिक साहित्य से लेकर स्मृति रामायण महाभारत पुराण तंत्र तक में राष्ट्र की महता बताई गई है ।
यह कहा जा चूका है की राष्ट्र की रक्षा के लिए आर्य प्राण तक देने को उद्यत रहते थे 


आ त्वाहार्षमन्तरेधि ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलिः ।
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत् ॥१॥
राजन तुम्हे राष्ट्र पति बनाया गया है तुम इस देश के प्रभु हो 
अटल अविचल और स्थिर रहो प्रजा तुम्हे चाहे तुम्हारा राष्ट्र नष्ट न होने पावे ।
इहैवैधि माप च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलिः ।
इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय [[ऋग्वेद १०/१७३/२]]
तुम यही पर्वत के सामान अविचल हो कर रहो राज्यच्युत नही होना इंद्र के सदृश्य निश्चल हो कर रहो यहां राष्ट्रको धारण करो ।
  • अहम् अस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम् |
  • अभीषाढ् अस्मि विश्वाषाढ् आशामाशां विषासहिः [[12/1/54]]
  • मैं अपनि मातृभूमि के लिए और उसके दुख विमोचन के लिए सब प्रकार के कष्ट सहने के लिए तैयार हु 
वे कष्ट चाहे जिस और से आवे जैसे भी आवे मुझे चिन्ता नही ।
  • यद् वदामि मधुमत् तद् वदामि यद् ईक्षे तद् वनन्ति मा |
  •  त्विषीमान् अस्मि जूतिमान् अवान्यान् हन्मि दोधतः ||[[१२/१/५८]]
  • अपनी मातृभूमि के सम्बन्ध में जो कुछ कहता हु उसकी सहायता के लिए है मैं ज्योतिःपूर्ण वर्चस्वशाली और बुद्धियुक्त हो कर मातृभूमि के दोहन करने वाले शत्रुओ का बिनाश करू ।





Wednesday, 17 June 2015

वाचस्पति मिश्र जीवन दर्शन

वाचस्पति मिश्र का उदय भारतीय दर्शन के संघर्स और बिकास युग में हुआ था न्याय वैशेषिक सम्प्रदाय का प्रारम्भिक युग सूत्रो और भाष्यों का युग था दिग्नाग का प्रादुर्भाव (पञ्चम शताब्दी )तक यह युग चलता रहा दिग्नाग के उदय के पश्चात न्याय वैशेषिक के साथ महान संघर्ष हुआ यह न्याय वैशेषिक का युग था इसी युग में वाचस्पति मिश्र का आविर्भाव  हुआ यह युग (५ से ११) शताब्दी तक भारतीय का स्वर्ण युग है और वाचस्पति मिश्र इसके जाज्वल्यमान रत्न है जहाँ अनेक विद्वान आचार्यो के काल के बिषय में अटकलों तथा आकलनों का ही सहारा लेना पड़ता है वहां वाचस्पति मिश्र की लोक विश्रुत कृतियों के सामान उनकी तिथि भी स्पस्ट रूप से विदित है सौभाग्य से वाचस्पति मिश्र ने अपने न्याय शुचि निबन्ध ग्रन्थ के अंत में अपनी तिथि इस प्रकार दी है
न्याशुचिनिबंधोsसावकारी सुधियाँ मुदे ।
श्रीवाचस्पतिमिश्रेण वस्वङ्ग कवसुवत्सरे ।।
श्री वचस्पति मिश्र ने वसु (८) अंक (९)  वसु ( ८) अर्थात  ८९८ सम्वत में बुद्धिमानो के मोद के लिए न्यायशुचि निबंध रचा ।
वाचस्पति मिश्र का समय सम्वत ८९८ के लगभग है इसमें संदेह नही ।
वचस्पति मिश्र के  समय आदि पर प्रकाश डालने वाला एक अन्य संकेत भी उपलब्ध है उन्होंने भामती टिका के अंत में लिखा है की यह निबंध उस समय लिखा गया है जब रजा नृग राज्य करते थे वचस्पति मिश्र इन्ही राजा के शासन काल मई विद्यमान थे । वचस्पति मिश्र ने मण्डन मिश्र के विधि विवेक पर न्यायकणिका नाम की ब्याख्या की है ।
वाचस्पति मिश्र का विद्या व्यसन बिशेष रूप से विश्रुत है उनके बिषय में प्रशिद्ध है की वे एक बड़े बिरक्त और सच्चे दार्शनिक थे विवाहित होते हुए भी वे सदा गृहस्त धर्म से पराङ्गमुख रहे और अनवरत रूप से मनन और दार्शनीक साहित्य की सृष्टि में प्रयत्नशील रहे बृद्धाअवस्था आने तक उनकी कोई संतान न हुई तो एक दिन उनकी पत्नी दुखी हो कर वंश की रक्षा और नाम चलाने का ध्यान दिलाया इस पर उन्होंने कहा पुत्र होने पर भी तुम्हारा नाम और वंश चले इसका क्या ठिकाना तुम्हारे नाम को अमर करने के लिए अपनी सवोत्तम कीर्ति वेदान्त भाष्य की टिका का नाम तुम्हारे नाम से रख देता हु तुम्हारा पुत्र सम्भव हो एक या दो पीढ़ी तुम्हारा नाम चलाये परंतु अब तुम्हारा नाम सदा के लिए अमर हो जाएगा कहा जाता है की वेदान्त दर्शन के  शांकरभाष्य की ब्याख्या का नाम भामती टिका इसी आधार पर रखा गया ।
वाचस्पति मिश्र के गुरु त्रिलोचन थे त्रिलोचन न्याय विशेषिक सम्प्रदाय के उच्चकोटि के ब्याख्यता रहे होंगे उनका समय ८०० ई 0 का रहा होगा त्रिलोचन का उल्लेख कई दार्शनिक गर्न्थो में मिलता है परन्तु उनकी कोई कृति उपलब्ध नही है तार्किक रक्षा में दो स्थलो पर त्रिलोचन का उल्लेख किया गया है रत्नकीर्ति ने अपोहसिद्धि तथा क्षणभंग सिद्धि में त्रिलोचन की आलोचना की गई है बौद्धाचार्य मोक्षाकार ने त्रिलोचन का दो स्थलो पर उल्लेख किया है । डा0 गोपीनाथ कविराज ने ठीक ही कहा है की उदयन हमें बतलाते है की उद्योतकर के गर्न्थो का पुनरुद्धार का कार्य  में वाचस्पति मिश्र ने अपने विद्यागुरु त्रिलोचन के आभारी है वाचस्पति मिश्र के इस उक्ति की ब्यख्या करते हुए उदयनाचार्य लिखते है ।
त्रिलोचनोगुरु: सकाशाद उपदेशरषायनम् असादितम् अमुषां
पुनर्नविभावाय दीयते ।।
त्रिलोचन गुरु से साक्षात् उपदेशरूपि रसायन वाचस्पति मिश्र ने प्राप्त कीया वह रसायन इन उद्योतकर की बूढी गायो को फिर से तारुण्य प्राप्त कराने के लिए दिया गया ।
इससे ये स्पस्ट होता है की त्रिलोचन ही वाचस्पति मिश्र के गुरु थे वचस्पति के अद्भुत प्रतिभा का बिकास में उनका पर्याप्त योगदान रहा होगा।
वाचस्पति मिश्र सर्वतंत्र स्वतंत्र विद्यवान के रूप में प्रसिद्धहै वे षड् दर्शन टीकाकार है केवल छः वैदिक दर्शनों में ही नहीं अपितु बौद्ध तथा जैन दर्शनों में भी उनकी अप्रतिहत गति है ।
भामती टिका के अनुशीलन से यह भी विदित होताहै की पाशुपात और पञ्चरात्र इत्यादि की बिचारधारा से भलीभांति परिचित थे ।समस्त दर्शनों पर की गई  ब्याख्या से उनके गंभीर पांडित्य तथा ब्यापक ज्ञान का परिचय मिलता है वे एक निष्पक्ष बिचारक तथा ब्याख्यता थे उनकी यह ब्यक्तिगत बिशेषता थी की वे जिस दर्शन की ब्याख्या करते है उनमे ही तन्मय हो जाते है उनके पक्ष का हृदय से समर्थन करते है इसी हेतु वे न्यायतात्पर्यटिका में एक दृढ नैयायिक सा प्रतीत होते है किन्तु भामती टिका के अनुशीलन से प्रतीत होता है की वे नैयायिक नहीअपितु  बिशुद्ध अद्वैतवादी वेदांती है ।वहां वे अत्यंत उत्शाह के साथ न्याय वैशेषिक आदि का खण्डन करते दृष्टिगोचर होते है ।
वाचस्पति मिश्र की एक बिशेषता यह है की वे जिस दर्शन की ब्याख्या करना आरम्भ करते है उनके मन्तब्यो के नितांत अनुकूल ही मंगल पाठ होता है ।जैसे न्यायतात्पर्य टीका में उनका उपास्य बिश्वकृत विश्वेशानो तथा विश्वसंहार कारी है सांख्यतत्व कौमुदी में वे सत्वरजस्तमस संविन्ता प्रकृति तथा भोक्ता एवम् मुक्त पुरुष को नमस्कार करते हुए दृष्टिगोचर होते है किन्तु सेस्वर सांख्य अर्थात योग की ब्याख्या करते हुए क्लेशकर्म विपाकाशय से रहित जगत के निर्माता की स्तुति करते है शांकरभाष्य के ब्य्याख्या के आरम्भ में तो वे एक नैष्ठिक अद्वैतवादी वादी वेदांती के सामान उस ब्रह्म को नमस्कार करते है यह समस्त विश्व् ही जिनका विवर्त है ।
वाचस्पति मिश्र में दर्शन सम्बन्धी बहुमुखी प्रतिभा थी अतः भारतीय दर्शन के क्षेत्रो में उनका सर्वतोमुखी देन है सभी वैदिक दार्शनिक सम्प्रदायो पर उन्होंने ने विस्तृत ब्याख्याए लिखी है उनकी ब्याख्ययो और टीकाओं का किसी भी मौलिक गर्न्थो से कम नही है प्रत्येक दार्शनिक सम्प्रदाय में उनकी ब्याख्या प्रमाण मानी जाती है उनकी नवीन उद्भवनाओ के कारण तो उनका महत्व तो और भी बढ़ गया ।जैसा की कहा जा चूका है की वाचस्पति मिश्र की यह विशेषता है की वे जिस दर्शन सम्प्रदाय का विवेचन करते है हृदय से समर्थन करते हुए दिखलाई देते है । उदाहरणार्थ  न्यायतात्पर्य टिका में वे पूर्ण नैयायिक प्रतीत होते है वहां बड़ी स्पस्टता तथा दृढता  से न्याय के सुक्ष्मो को दर्शाते है किन्तु वेदान्त की ब्याख्या करते समय वे पूर्णतः वेदान्ति है मानो शांकर वेदांत उनके नश नश में रमा हो उनके एक एक शब्द से वेदान्त के  सिद्धांतो से ध्वनि निकलती है वे रत्ती भर भी इधर से उधर दिखलाई नही देते इससे उनके सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति विवेक बुद्धि तथा पाण्डित्य का बोध होता है जितना बारीकी से दर्शन के विविध सम्प्रदायो के सिद्धांत का विवेचन उन्होंने किया है इतना अन्य किशी आचार्य ने नही किया इसी से उनके गर्न्थो पर अनेक टीकाएँ हुई है दर्शन के अनेक विद्वानो ने उनके प्रति आदर और सम्मान का भाव प्रकट किया है ।उदयनाचार्य जैसे उद्भट विद्वान उनकी टिका की ब्यख्या करने के पुर्व  सरस्वती माता से प्रार्थना करता है की माता सरस्वती ऐसी सावधान हो की जिससे ये मन और वाणी वाचस्पति के वचनो में स्खलित न हो अन्य विद्वान भी इसी तरह आदर प्रकट करते हुए दिखलाई देते है वैदिक दर्शन के विवेचनो के साथ साथ वाचस्पति मिश्र ने बौद्ध दर्शन का भी विषद विवेचन किया है बौद्ध दर्शन सिद्धान्तों की ऐसी स्पष्ट ब्यख्या की है  जैसी स्वयं बौद्ध दर्शन के आचार्य भी न कर पाये न्यायवार्तिकतात्पर्य टिका तथा न्यायकणिका और भामती आदि में बौद्ध का विस्तृत विवेचन वाचस्पति मिश्र ने किया वस्तुतः ये भारतीय दर्शन के सूर्य है जिनका ब्यापक प्रकाश दर्शन के प्रत्येक क्षेत्र में पड़ा भिन्न भिन्न सम्प्रदाय में उनका मौलिक देन है
शांकरभाष्य के भामती टिका के समाप्ति पर वाचस्पति मिश्र ने स्वयं अपनी रचनाओ की ओर इस प्रकार संकेत किया है
यन्न्यायकणिकातत्वसमीक्षातत्वबिन्दुभि: ।
यन्न्यायसांख्ययोगानां वेदान्तानां निबन्धनै: ।।
इससे उनकी सात रचनाओ का पता चलता है न्यायकणिका तत्वसमीक्षा तत्वबिन्दु न्याय पर लिखी गई ब्याख्या न्यायतात्पर्यटिका सांख्यतत्व कौमुदी तत्ववैशारीदि तथा वेदान्त पर भामती टिका ।
न्यायवार्तिकीतात्पर्य टीका वाचस्पति मिश्र की कीर्तियों में प्रसिद्द और महत्व की दृष्टि से इस ग्रन्थ का स्थान सर्वपरी है यह न्याय शास्त्र का कदाचित् सबसे महत्वपुर्ण ग्रन्थ है । प्राचीन न्याय के सिद्धान्तों का  अंतिम रूप देने का कार्य वाचस्पति मिश्र का रहा है इस कार्य का सम्पादन उन्होंने इसी ग्रन्थ द्वारा किया था यह ग्रन्थ  केवल उद्योतकर के न्यायवार्तिक की ब्याख्या ही नही न्यायशुत्र और वात्स्यायन भाष्य को नवीन जीवन प्रदान करने वाला है ।
न्यावार्तिकतात्पर्य टिका के आदि में विश्वब्यापि पिनाकी की स्तुति कर के तथा धर्म बिज्ञानादियुक्त अक्षपाद को प्रणाम करके इस ग्रन्थ का प्रयोजन इस प्रकार दिया है ।
ग्रन्थ ब्याख्याच्छलेनैव निरिस्ताखिलदुष्णा ।
न्यावर्तिकतात्पर्यटीकाsस्माभी विंधास्तेय ।।
इच्छामि किमपि पुण्यम दुस्तरकुनिबंधपंङ्क मग्नानाम् ।
उद्योतकरगविनामतिजरतीनां समुद्धरणात् ।।
न्यायवार्तिक ब्यवस्था के ब्याज से अखिलदूषणो का निराकरण करने वाली न्यायवार्तिकतात्पर्य टिका हमारे द्वारा रची जायेगी दुस्तर कुनिबन्धो के कीचड़ में फंसी हुई उद्योतकर की प्राचीन उक्ति रुपी अति बूढी गायो का उद्धार करके मैं कुछ पूण्य सञ्चित करना चाहता हु ।उद्योतकर की न्यायवर्तिक की जो प्रतिपक्षियो द्वारा छीछालेदर बिशेषतः उसी के उद्धार के लिए न्यायतात्पर्य टिका लिखा गया न्याय वैशेषिक तथा बौद्ध  दर्शन के संघर्ष में इस ग्रन्थ का महत्व सबसे बढ़ कर है ।

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वाचस्पति मिश्र द्वारा बौद्ध दर्शन का विवेचन
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Wednesday, 15 April 2015

जगत् गुरु शङ्कराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती का दूरदर्शिता



पुरी पीठाधीश्वर जगत गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वतीजी महाराज के अमृत वचन :२०१० दिसम्बर .................

महाभारत में भीष्मजी ने कहा है.....काल राजा का कारण नहीं है.........राजा काल का कारण होता है...जैसा शासक होता है , वैसी स्रष्टि बनती है ,जैसा राजा होता है वैसी प्रजा बनती है.....क्यों आज सब नट - नटी बने जा रहे है...क्यो घूस खोरी बढ़ रही है ,घूसखोर बढ़ रहे है....क्योकि शासन तंत्र भष्ट है.... ६६ राष्ट्र क्रिश्चनतंत्र के अधीन , ५६ राष्ट्र मुस्लिम तंत्र के अधीन ,दो बलवान राष्ट्र चीन व् रूस कम्युनिस्ट तंत्र के अधीन है......और हिन्दुओ की संस्कृति के अनुसार एक भी शासन तंत्र एक भी में राष्ट्र है क्या ? नेपाल में है ? भूटान में है ? भारत में है ? .....इसका मतलब कोई भी संस्कृति तब तक सुरक्षित नहीं रहती जब तक उसके अनुसार संविधान व् शासन तंत्र न हो........पूरा विश्व जिसे धर्मगुरु के रूप में देखता था ...वह है भारत ...श्री दलाई लामा जी ने कहा था , कुछ वर्ष पहले ...भारत व् तिब्बत गुरु शिष्य है.... शिष्य तिब्बत व् गुरु भारत था , है ,व् रहेगा ऐसा दलाई लामाजी ने कहा था....लेकिन एक प्रश्न उठता है कि भारत को विश्वगुरु माना गया परतंत्रता के दिनों में भी तो किसके कारण....आर्य समाजियो के कारण, ऐसा तो नहीं .......जैन सज्जनों के कारण, ऐसा तो नही ....बौद्ध सज्जनों के कारण, ऐसा तो नहीं..... सिक्ख सज्जनों के कारण, ऐसा तो नहीं...सिक्ख तो उपजे ही हिन्दुओ की रक्षा के लिए ...दिशाहीन हो गए आजकल वो अलग बात है....तो किसके कारण ....अरे मनुवादी सनातन धर्मियो के कारण...जिस संस्कृति की रक्षा के लिए राम ,कृष्ण उत्पन्न होते है,जिस मनुवाद को मानकर पृथ्वी टिकी है, पवन टिका है आकाश टिका है ,प्रकाश टिका है ,जल टिका है....जिस मनुवादी सस्कृति को मानने वाले सत्यवादी नरेन्द्र हुए भगवान राम, कृष्ण आदि की उत्पत्ति हुई.....उस सनातन संस्कृति का आजकल विलोप हो रहा है......आपको और हमको अपना आस्तित्व ही चाहिए और विश्व को अपना आस्तित्व चाहिए..जिस रास्ते पर विश्व जा रहा है ,लुप्त होने की स्थिति में है....इसका अर्थ क्या हुआ...अगर विश्व को जीवन चाहिए तो कम से कम भारत , नेपाल , व् भूटान में सनातन संस्कृति के अनुसार संविधान व् शासन तंत्र रहना चाहिए ! आज हमने एक भाव व्यक्त किया...संयुक्त राष्ट्र संघ व् भारतीय शासन तंत्र के प्रति ......अजगर की जाती विलुप्त न हो .....जबकि वह तो व्यक्ति को निगल भी जाता है ...लेकिन विधाता की स्रष्टि में अजगर की उपयोगिता वैज्ञानिक धरातल पर सिद्ध है ,तभी तो अजगर का विलोप न हो , गिद्ध का विलोप न हो ,सर्प का विलोप न हो ,सिंह का विलोप न हो....यह सब प्रयास चल रहा है या नहीं तो क्या भारतीय संस्कृति के अनुसार शासन तंत्र का विलोप हो जाए....यह घोर अन्याय है या नहीं ......विशुद्ध राजतन्त्र ,विशुद्ध शासन तंत्र जिसने विश्व को धर्म राज्य दिया रामराज्य दिया...उसके अनुसार किसी एक देश में तो शासन तंत्र रहने दो ,चलने दो ...जिसको आदर्श मानकर विश्व मौत के गर्त में जाने से बच सके.....रामराज्य जैसा राज्य नही ,रामजी जैसे राजा नही.....दुर्बुद्धि इन नेताओ ने सुप्रीम कोर्ट को लिख कर दिया....राम एतिहासिक पुरुष नही ,अवतार नही ,उपन्यास के पात्र है.....ताकि रामसेतु को विखंडित करवा सके ! विश्व में मानव निर्मित २७०० वर्ष प्राचीन चीन की दिवार है जिसे कम्युनिस्ट राष्ट्र होते हुए भी उसकी रक्षा चाहता है,और यहाँ भगवान राम द्वारा निर्मित साढ़े सत्रह लाख वर्ष प्राचीन धरोहर,लहर को रोकने में समर्थ , होरियम अणु ईधन का भंडार ,सीपी देने में समर्थ ,वनस्पति देने में समर्थ ,रक्षा के लिए कवच और जलचर जीवो का जीवन......उस रामसेतु को तोड़ने का अभियान इस देश में चलाया गया....हम उसमे कूदे....बहुत से महानुभावो ने उसमे हिस्सा लिया ,भगवत कृपा से सुब्रमण्यम स्वामी ने मेरी बात मानकर लोअर कोर्ट ,हाई कोर्ट,सुप्रीम कोर्ट तक केस को ले गए और रामसेतु की रक्षा भारत में हो गयी !........एक संकेत.........विश्व में ऐसा कोन सा देश है जिसे अपना उत्कर्ष पसंद नही है .............उसी का नाम भारत है ?जीव का स्वाभाव होता है ....आपको पडोसी का उत्कर्ष पसंद न हो समझ आता है ,भाई को भाई का उत्कर्ष पसंद न हो समझ आता है .......आपको अपना ही उत्कर्ष पसंद न हो ऐसा कोन सा राष्ट्र है विश्व में.. भारत .......जिसके राजनेताओ को भारत का उत्कर्ष पसंद नहीं !! हमने कहा मेधाशक्ति, रक्षाशक्ति, अर्थशक्ति, श्रमशक्ति अरे ,पुरानी भाषा में ब्राह्मण ,क्षत्रिय,वेश्य,व् शुद्र शक्ति इन चारो का दोहन व् दुरूपयोग हो रहा है ,ऐसी परिस्थिति में ये कथा ,कीर्तन ये वार्ता ,सत्संग का क्रम कब तक चलता रहेगा ,आज इस्लामिक राष्ट्र है ,भारत से अलग हुए कौन ....पाकिस्तान व् बांग्लादेश वहा पर ऐसा हो सकता है !तो हमारे यहाँ ही होता रहेगा किसने ठेका लिया है ,यह तो राजनेताओ का बांये हाथ का खेल है कंहा किस तत्व को लाकर हिंदुत्व को विलुप्त कर दें !.........”तो विश्व में सभी को अभयदान देते हुए मानवाधिकार की सीमा में .....संयुक्त राष्ट्र संघ व् पुरे विश्व से अनुरोध करना चाहते है .......अनुरोध न माने तो तो फिर हम ऋषियों की परम्परा से है ,धर्माचार्य है ...विश्व को बता देंगे कि तुम मानने के लिए बाध्य हो .......वो क्या है ...भारतीय संस्कृति के अनुरूप भारत का संविधान व् शासन तंत्र नहीं होगा तो हमारी संस्कृति की रक्षा नहीं होगी !जिसे आप वरदान मान रहे है वह अभिशाप है ......क्या ...वर्तमान शिक्षा पद्धति व् जीविका पद्धति.. मैकाले का अभिशाप ....यदि दस वर्षो तक भारत में वर्तमान शिक्षा पद्धति व् जीविका पद्धति चल गयी तो भारत कुछ भी नहीं रहेगा ,इससे संयुक्त परिवार का विलोप हो जाएगा ,पेट पालने के लिए मनुष्य रह जाएगा ,इसी से भारतीयों का जीवन सार्थक होगा क्या ....श्रीमद भगवत आदि में पतन की पराकाष्ठा का लक्षण क्या है ,वर्णसंकरता , कर्मसंकर्ता....भोतिक वादियों में विकास की पराकाष्ठा क्या है ....वर्णसंकरता ,कर्मसंकरता.......क्या मतलब हुआ किसी की बेटी ले लो किसी को बेटी दे दो....भारतीय नहीं डोक्टर इब्राहीम की थ्योरी के अनुसार भी भविष्य मानवो के शील से रहित हो जाएगा....आज संविधान की द्रष्टि से वर्णसंकरता को उत्कर्ष माना जा रहा है............ आज के प्रवचन का सारांश क्या निकला ...सब विपरीत दिशा की और जा रहे है,समय की सीमा में हमने कम कहा भगवत कृपा से गुरुओ की कृपा से हमारे पास विशाल चिंतन है ,जिससे पूरा विश्व लाभ उठा सकता है ,लेकिन कष्ट की बात यह है कि आज भारत व् पुरे विश्व में हमारे लोगो के ज्ञान विज्ञान से लाभ उठाने की क्षमता नहीं है भारत को ६३ वर्षो में राजनेताओ ने यहाँ तक गिरा दिया है कि न्याय पाने व् न्याय पचाने योग्य नहीं रह गया है .....हिन्दू किसका नाम है भारत में .... न्याय पाने व् पचाने योग्य जो न रह गया है उसका नाम हिन्दू है.....जहा हमारे रामलला का प्राकट्य हुआ,उस भूमि को एक तिहाई इसका एक तिहाई उसका ...यह भी कोई न्याय है ....इसका मतलब कोई भी राजनैतिक दल भारत में शासन करने योग्य नहीं है........दिशाहीन क्रिश्चनतंत्र , दिशाहीन कम्युनिस्टतंत्र , दिशाहीन मुस्लिमतंत्र..के यन्त्र बनकर हिन्दू राजनेता काम कर रहे है .....क्योंकि हिन्दुओ से उनको भय नहीं नहीं रह गया है ....भाजपा की सफलता कोंग्रेस की असफलता ,कोंग्रेस की सफलता भाजपा की असफलता ,दोनों की असफलता मिलीजुली सरकार की सफलता...यह क्या शासन तंत्र है !ऐसी परिस्थिति में सज्जनों हमें अपने आस्तित्व व् आदर्श की रक्षा करनी है तो हमें हमारी संकृति के अनुसार संविधान व् शासन तंत्र चाहिए, चाहिए और चाहिए !!हर हर महादेव!!

Monday, 6 April 2015

वेद में गाय की महिमा का वर्णन ।



वेदो नारायण साक्षात्
वेद ही नारायण है ऐसा श्रुति वचन है  नारायण सृष्टि के पुर्व भी विद्यमान था है और रहेगा अर्थात वेद भी नित्य ही हुए वेद की हर एक वाणी ईश्वरीय वाणी है और ईश्वर का प्रेम सृष्टि के समस्त जीव के प्रति समभाव से जैसा प्रेम मनुष्य के प्रति वैसा ही प्रेम जीव के प्रति ।जिसका प्रमाण स्वयं ऋग् वेद है ऋग्वेद के मण्डल ६ ये मन्त्र भी आया है ।

चित्पूर्वे जरितार आसुरनेद्या अनवद्या अरिष्टाः ॥४॥  [[ऋग् वेद   ६/१९/४]]

मंत्रार्थ ---- पुर्व काल में स्तोतागण अनिध्य पापरहित अहिंसित थे ।

 तात्पर्य हमारे पुर्वज पापो से रहित हुआ करते थे तथा अहिंसित भी तो भला जीव हत्या कर वो पाप के भागी क्यों बने जैसा की आज प्रायः सनातन धर्म के प्रति  तथाकथित छद्मवेशी चारो ओर ये भ्रम फैला रखे है की वेद में गौ हत्या का प्रमाण मौजूद है ।
जबकि वेद कहता है गाय शाक्षात इंद्र रुपी है और इंद्र की महिमा की महिमा वेद में चहु ओर किया गया है अब वेद स्वयं गौ को इंद्र कहा है तो भला मनुष्यो की भावना गौ के प्रति कैसी होगी ये मुझे कहने की कोई जरुरत नही ।केवल इतना ही नही अपने आने वाली पीढ़ी का भी ख्याल रख ईश्वर से ऐसे संतान की कामना करता है जो  सुन्दर सुसंस्कारित यज्ञ करने वाला और हव्यान्न देने वाला हो ।
य ओजिष्ठ इन्द्र तं सु नो दा मदो वृषन्स्वभिष्टिर्दास्वान् ।[[ऋग् वेद ६/३३/१]]-


इमा या गावः स जनास इंद्र  [[ऋग् वेद /६/२८/५ ]]

 मंत्रार्थ --- हे मनुष्यो यह जो गौए है वह इंद्र है ।
इसी के साथ अगले मन्त्र की ब्यख्या हृदयंगम करने वाली है  ।

आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्सीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे ।

मंत्रार्थ ---  हे गौएँ हमारे घर पर आये हमारा कल्याण करे वे गौशाला में बैठे हमें आनंदित करे । केवल इतना ही नही चोर उसे न चुराए शत्रु उन पर शस्त्रो का प्रहार न करे इस प्रकरण पर भी ऋग् वेद का अगला मन्त्र आप सभी के सामने रख रहा हु ।

न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति ।[[ऋग् वेद ६/२८/३]]

ये गौए नाश नहीं होती चोर भी उसकी हिंसा नहीं करता शत्रु का शस्त्र भी गौ पर आक्रमण न करे ।

मा व स्तेन ईशत माघशंसः परि वो हेती रुद्रस्य वृज्याः ॥[[ ऋग् वेद ६/२८/७]]

मंत्रार्थ --: चोर इनकी चोरी न कर सके ऐसे सुरक्षित स्थान में गौ रहे पापी के अधीन गौएँ न हो बिजली गिर कर गौएँ की मृत्यु न हो ऐसे सुरक्षित स्थान पर गौएँ रहे ।


सं ते वज्रो वर्ततामिन्द्र गव्युः [[ऋग् वेद ६/४१/२]]
मंत्रार्थ ----- हे इंद्र गौओ का रक्षण करने वाला तेरा बज्र शत्रुओ का नाश करे ।






नोट ----लेख अभी अधूरा है ।

Tuesday, 24 March 2015

ऋ शब्द की उत्पति और अर्थ ।

क्रिया धातु 'ऋ' से ऋत शब्द की उत्पत्ति है। ऋ का अर्थ है उदात्त अर्थात ऊर्ध्व गति। 'त' जुड़ने के साथ ही इसमें स्थैतिक भाव आ जाता है - सुसम्बद्ध क्रमिक गति। प्रकृति की चक्रीय गति ऐसी ही है और इसी के साथ जुड़ कर जीने में उत्थान है। इसी भाव के साथ वेदों में विराट प्राकृतिक योजना को ऋत कहा गया। क्रमिक होने के कारण वर्ष भर में होने वाले जलवायु परिवर्तन वर्ष दर वर्ष स्थैतिक हैं। प्रभाव में समान वर्ष के कालखंडों की सर्वनिष्ठ संज्ञा हुई 'ऋतु' । उनका कारक विष्णु अर्थात धरा को तीन पगों से मापने वाला वामन 'ऋत का हिरण्यगर्भ' हुआ और प्रजा का पालक पति प्रथम व्यंजन 'क' कहलाया।

आश्चर्य नहीं कि हर चन्द्र महीने रजस्वला होती स्त्री 'ऋतुमती' कहलायी जिसका सम्बन्ध सृजन की नियत व्यवस्था से होने के कारण यह अनुशासन दिया गया - ऋतुदान अर्थात गर्भधारण को तैयार स्त्री द्वारा संयोग की माँग का निरादर 'अधर्म' है। इसी से आगे बढ़ कर गृह्स्थों के लिये धर्म व्यवस्था बनी - केवल ऋतुस्नान के पश्चात संतानोत्पत्ति हेतु युगनद्ध होने वाले दम्पति ब्रह्मचारियों के तुल्य होते हैं।

आयुर्वेद का ऋतु अनुसार आहार विहार हो या ग्रामीण उक्तियाँ - चइते चना, बइसाखे बेल ..., सबमें ऋत अनुकूलन द्वारा जीवन को सुखी और परिवेश को गतिशील बनाये रखने का भाव ही छिपा हुआ है। ऋत को समान धर्मी अंग्रेजी शब्द Rhythm से समझा जा सकता है - लय। निश्चित योजना और क्रम की ध्वनि जो ग्राह्य भी हो, संगीत का सृजन करती है। लयबद्ध गायन विराट ऋत से अनुकूलन है। देवताओं के आच्छादन 'छन्द' की वार्णिक और मात्रिक सुव्यवस्था भी ऋतपथ है।
अंग्रेजी ritual भी इसी ऋत से आ रहा है। धार्मिक कर्मकांडों में भी एक सुनिश्चित क्रम और लय द्वारा इसी ऋत का अनुसरण किया जाता है। 'रीति रिवाज' यहीं से आते हैं। लैटिन ritus परम्परा से जुड़ता है। परम्परा है क्या - एक निश्चित विधि से बारम्बार किये काम की परिपाटी जो कि जनमानस में पैठ कर घर बना लेती है।

कभी सोचा कि 'कर्मकांड' में 'कर्म' शब्द क्यों है? कर्म जो करणीय है वह ऋत का अनुकरण है। कर्मकांडों के दौरान ऋत व्यवहार को act किया जाता है। Rit-ual और Act-ual का भेद तो समझ में आ गया कि नहीं? smile emoticon

साभार- गिरिजेश राव ब्लॉग

Sunday, 22 March 2015

वेद और पुराण

इतिहासस्य स वै सपुराणस्य च गाथानां च नाराशासिनां स पिर्य धाम भवति य एवम् वेद [[ अथर्वेद १५/६/१/१२]]

अर्थ ---: इतिहास पुराण और गाथा नारांशंसी के पिर्य धाम होते है

मध्याहुतयो ह वा एतादेवानांयदनुशासनानी विद्या वाकोवाक्यमितिहासः पुराणं गाथा नराशंस्य: य एवम् विद्वाननुशासनानि विद्या वकोवाक्यमितिहास पुराणं गाथा नाराशंसिरित्यहरह: स्वाध्यायमधीते [[ शतपथ ११/३/८/८]]

अर्थ ----: शास्त्र देवताओ के मध्य आहुति है देव विद्या ब्रह्म विद्या आदिक विद्याएँ उत्तर प्रत्यूतर रूप ग्रन्थ इतिहास पुराण गाथा और नाराशंसी ये शास्त्र है जो इनका नित्यप्रति स्वध्याय करता है वह मानो देवताओ के लिए आहुति देता है

एवमिमे सर्वे वेदा निर्मितास्सकल्पा सरहस्या: सब्राह्मणा सोपनिषत्का: सेतिहासा: सांव्यख्याता:सपुराणा:सस्वरा:ससंस्काराः सनिरुक्ता: सानुशासना सानुमार्जना: सवाकोवाक्या [[गोपथब्राह्मण पूर्वभाग ,प्रपाठक 2]]

अर्थ ---: कल्प रहस्य ब्राह्मण उपनिषद इतिहास पुराण अनवाख्यात स्वर संस्कार निरुक्त अनुशासन और वाकोवाक्य समस्त वेद परमेश्वर से निर्मित है ||

ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह |
उच्छिष्टाज् जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः |[[अथर्वेद ११/१/२४]]

अर्थ---:ऋग् शाम छन्द तथा यजु के साथ पुराण और द्युलोक में रहने वाले दिविश्रित समस्त देवगण उत्पन्न हुवे ||

अरेऽस्य महतो'भूत'स्य नि'श्वसितम्एत'द्य'दृग्वेदो' यजुर्वेद' सामवेदो'ऽथर्वाङ्गिर' सइतिहास'पुराण'विद्या' उपनिष'दः श्लो'काः सू'त्राण्यनुव्याख्या' नानिव्याख्या' ननिदत्त'म्हुत' माशित' पायित' मय'चलोक'प'रश्चलोक' स'र्वाणि च भूता'न्यस्यै' वै'ता'नि स'र्वाणि नि'श्वसितानि [[ बृह 0 ऊ 0 ४/५/११]]

अर्थ ---: उस परब्रह्म नारायण के निश्वास से ऋग् वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्वेद इतिहास पुराण विद्या उपनिषद श्लोक सूत्र व्यख्यान यज्ञ हवन किया हुआ खिलाया हुआ पिलाया हुआ यह लोक पर लोक समस्त भुत है ||

पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः ।
वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश । [[याज्ञ 0 स्मृति 0 १.३ ]]

अर्थ ---: पुराण न्याय मीमांशा धर्म शास्त्र और छः अङ्गों सहित चार वेद ये चौदह विद्या धर्म के स्थान है ।

इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेद [[ छान्दोग्य ७/१/४ ]]

अर्थ ---: इतिहास पुराण ही पांचवा वेद है
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Thursday, 11 September 2014

माता सत्यवती ।

इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेतो मे न भवेदिति।
ऋतुश्च तस्याः पत्न्या मे न मोघः स्यादिति प्रभुः।।
संचिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुनःपुनः।
अमोघत्वं च विज्ञाय रेतसो राजसत्तमः।।
शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्या प्रसमीक्ष्य वै।
अभिमन्त्र्याथ तच्छुक्रमारात्तिष्ठन्तमाशुगम्।।
सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो गत्वा श्येनं ततोऽब्रवीत्।
मत्प्रियार्थमिदं सौम्य शुक्रं मम गृहं नय।।
गिरिकायाः प्रयच्छाशु तस्या ह्यार्तवमद्य वै।
गृहीत्वा तत्तदा श्येनस्तूर्णमुत्पत्य वेगवान्।।
जवं परममास्थाय प्रदुद्राव विहंगमः।
तमपश्यदथायान्तं श्येनं श्येनस्तथाऽपरः।।
अभ्यद्रवच्च तं सद्यो दृष्ट्वैवामिषशङ्कया।
तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ संप्रचक्रतुः।।
युद्ध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि।
तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद्वराप्सरा।।
मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनाचरी।
श्येनपादपरिभ्रष्टं तद्वीर्यमथ वासवम्।।
जग्राह तरसोपेत्य साऽद्रिका मत्स्यरूपिणी।
कदाचिदपि मत्सीं तां बबन्धुर्मत्स्यजीविनः।
मासे च दशमे प्राप्ते तदा भरतसत्तम।।
उज्जह्रुरुदरात्तस्याः स्त्रीं पुमांसं च मानुषौ।।
आश्चर्यभूतं तद्गत्वा राज्ञेऽथ प्रत्यवेदयन्।
काये मत्स्या इमौ राजन्संभूतौ मानुषाविति।।
तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा।
स मत्स्यो नाम राजासीद्धार्मिकः सत्यसङ्गरः।।
साऽप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यत।
या पुरोक्ता भगवता तिर्यग्योनिगता शुभा।।
मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि।
ततः साजनयित्वा तौ विशस्ता मत्स्यघातिभिः।।
संत्यज्य मत्स्यरूपं सा दिव्यं रूपमवाप्य च।
सिद्धर्षिचारणपथं जगामाथ वराप्सराः।।
सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी।
राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति।।
रूपसत्वसमायुक्ता सर्वैः समुदिता गुणैः।
सा तु सत्यवती नाम मत्स्यघात्यभिसंश्रयात्।। [[महाभारत १/६३/५१-से ६८प्रयन्त ]]

भावार्थ -----उन्होंने बिचार किया की मेरा ये स्खलित बीर्य ब्यर्थ न हो साथ ही मेरी पत्नी गिरिका का ऋतुकाल भी ब्यर्थ न जाए इस प्रकार बारम्बार बिचार कर के राजाओं में श्रेष्ठ वसु नु सबीर्य को अमोघ बनाने का ही निश्चय की तदन्तर रानी के पास अपना बीर्य भेजने का उपयुक्त समय को देख उन्होंने ने उस बीर्य को पुत्रउत्पति कारक मंत्रो द्वारा अभिमन्त्रित किया ।राजा वसु धर्म और अर्थ के सूक्ष्मतत्व को जानने वाले थे ।उन्होंने अपने समीप बैठे हुए श्येन पक्षी [[ बाज ]] के पास जा कर कहा हे सौम्य तुम मेरे पिर्य करने के लिए मेरा यह बीर्य मेरा घर लेकर जाओ और महारानी गिरिका को सिघ्र दे आओ क्यों की आज ही उनका ऋतुकाल है बाज वह बीर्य लेकर बड़े वेग से लेकर तुरंत वहां लेकर उड़ गया ।वह आकाशचारी पक्षी सर्वोत्तम वेग का आश्रय ले उड़ा जा रहा था इतने में ही एक दुसरे बाज ने उसे आते हुए देखा उस बाज ने मांस होने की आशंका से उस बाज पर टूट पड़ा फिर वे दोनों पक्षी आकाश में ही एक दुसरे से युद्ध करने लगा इतने में ही वह बीर्य यमुना जी के जल में गिर पड़ा अद्रिका नाम से बिख्यात एक सुन्दरी अप्सरा ब्रह्मा जी के श्राप से मछली हो कर वही जमुना जी के जल में रहती थी बाज के पंजे से छुट कर गिरे हुए वसुसम्बन्धी उस बीर्य को मतस्य रूप धारिणी अद्रिका ने वेग पूर्वक आकर उस बीर्य को निगल लिया ।तत्पश्चात दसवां मॉस आने पर मतस्य जीवी मल्लाह ने उस मछली को जाल में बाँध लिया और उसके उदर को चिर कर एक कन्या और एक पुरुष निकाला यह आश्चर्य जनक घटना देख कर मछेरो ने राजा के पास जाकर  निवेदन किया  -- महाराज मछली के पेट से ये दो मनुष्य बालक उत्पन्न हुए ।मछेरो की बात सुन कर राजा उपरिचर ने उस समय उन दो बालको में से जो पुत्र था उसे स्वय ग्रहण किया इधर क्षण भर में मत्यस्य रुपी अप्सरा अद्रिका ब्रह्मा के शाप से मुक्त हो गया ।उन जुड़वी संतानों में जो कन्या थी मछली की पुत्री होने से मछली की गंध उस कन्या के सरीर से आती थी अतः राजा ने उस कन्या को मल्लाह के हाथो में सौप दिया ।और कह दिया की यह तुम्हारी पुत्री हो कर रहे ।वह रूप और सत्व गुण संपन्न थी इस लिए उनका नाम सत्यवती पड़ा ।मछेरो के आश्रय स्थान में रहने के कारण पवित्र मुस्कान वाली मतस्य गन्धा के नाम से बिख्यात हुई ।
अतः मातुल पक्ष से देव योनि और पितृ पक्ष से क्षत्रिय योनि की हुई ।
परन्तु