Saturday, 16 August 2014

हिन्दू शब्द विवेचन

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः । । २.२० । ।[[मनुस्मृति]]

कुरुक्षेत्रादी देश समुद्भूत अग्रजन्मा द्वारा ही सम्पूर्ण पृथ्वी के समस्त मानवों को अपना अपना चारित्र्य शिक्षणीय  है ।
जैसे सब भाषाओ का उद्गम स्थान भारती देव वाणी ही है ठीक इसी प्रकार बिभिन्न विद्याओ का आदिम आविष्कारक हिन्दुस्तान ही है इसलिए आज भी ईराक इरान फारस सुदूर टर्की तक के सभी लोग अंको को हिन्द से और गणित विद्या को इल्मे हिन्द्सा  कहते है जिसका तात्पर्य हिन्दुस्तान से आने वाली विद्या कहा जा सकता है ।
सिन्धु संस्कृति के जन्मदाता के लोग स्वय सिन्धु और पश्चात् हिन्दू , इंदु किंवा इंडियन कैसे बन गए यह बात भाषा बिज्ञान से सम्बन्ध रखती है जिसका निरूपण यहाँ किया जाता है ।
वैदिक परिपाटी के अनुसार अनेक शब्द वर्णविपर्यय वर्णागम इत्यादि के कारण बिभिन्न रूपों में उच्चारित होते है ।
ऐसे अनेक शब्द का निर्वाचन  स्वय वेद के ब्राह्मण भाग में विद्यमान है ।
जैसे मानुष शब्द की ब्याख्या करते हुए ऐतरेय ब्राह्मण 3/33  में आता है की ।

मादूषं सन् मानुषमित्याचक्षते

अर्थात --: (मा) मत( दुषम ) दोष युक्त हो    इस अर्थ  में मादुष शब्द का  परोक्ष रूप मानुष बन गया है इसी प्रकार रूद्र शब्द
का विवेचन करते हुए लिखा है


यदरोदित्तद् रुद्रस्य रुद्र्त्वम्

अर्थात --: रोदन करने के कारण रूद्र नाम पड़ा ब्राह्मणोंक्त निर्वचन के इस प्रकार शैली के अनुसार श्री यास्काचार्य ने अपने निरुक्त ग्रन्थ में अनेक ऐसे वैदिक शब्दों का निर्वचन किया है जिनमे सकारादी शब्दों से हकारादी रूप में वर्णन किया है ।कहने की आवश्यकता नही है की वैदिक साहित्य की प्राचीन ब्याख्या शैली को समझने के लिए यही ग्रन्थ इस वक़्त उपलब्द्ध है दुर्भाग्यवस यदि यह भी अपने सहकारी ग्रंथो की तरह लुप्त हो जाता तो आज वेदो को समझना ही कठिन हो जाता  उक्त प्रमाणिक ग्रन्थ में वेद के मन्त्रांश

हरितो न रंह्या:[[ अथर्व २०/३०/४]] की ब्याख्या करते हुए [[निघुंट १/१३]]  में लिखा है की

सरितो हरितो भवन्ति सरस्वत्यो हरस्वत्यः

अर्थात --: हरित यह शब्द उच्चारण भेद से नदी वाचक सरित शब्द ही है ।और इसी भाँती सरस्वती को हरस्वती भी कहते है ।

(क )---इमं में गंगे सरस्वती .........स्तोमं सचत [[ऋग वेद १०/७५/५]]
(ख)---तं ममर्तु दुच्छुना हरस्वती                   [[ ऋग वेद २/२३/६]]
(ग)---यं वहन्ति हरित: सप्त                        [[ अथर्वे १३/२/२५]]
(घ)---श्री श्च ते लक्ष्मीश्च पत्नयै                 [[ यजुर्वेद ३१/२२ ]]
(ङ्)-- ह्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्नयै                [[ कृ 0य0 तैतरीय ३१/१]]
(च)--सिरासन्धि सन्निपाते रोमावर्तोSधिपति [[ सुश्रुत ६/७१]]
(छ )--हीरालोहित वाससः                          [[ अथर्वेद ५/१७/१]]

यहाँ (क) में सरस्वती और (ख) में हरस्वती और (ग) में  ही नदी वाचक शब्द विद्यमान है ।
(घ) श्री और (ङ्) ह्री दोनों ही लक्ष्मिवाचक शब्द प्रत्यक्ष है ।
(च) में सिरा (छ) में हिरा दोनों ही नश नाड़ी किंवा धमनी वाचक शब्द विद्यमान है ।

और अधिक उदाहरण क्या दे कहना न होगा की वेद में सकार में हकार का उच्चारण भी सुतरा अभीष्ट है ।
यह इस प्रघटट् से प्रमाणित है । यहाँ एक से अधिक प्रमाण देने का तात्पर्य यह है की
केवल हरित शब्द मात्र से वर्ण व्यत्यय मात्र से सरित नही समझना चाहिए
किन्तु सरस्वती ,हरस्वति आदि अन्यान्य अनेक शब्द इसी की भाँती साकार के स्थान पर हकार उचारणीय समझना चाहिए लोक में भी यह वैदिक परिपाटी देश भेद से यत्र तत्र सर्वत्र परचलित है
भारतीय भाषाओं के सप्ताह , मास,, और केसरी आदि शब्द  इरानी भाषा भाषी देशो में
हप्ता  , माह , और केहरी रूप में उच्चारित होते है ।अस्व शब्द को फारशी में अस्प और अंग्रेजी में हॉर्स कहा जाता है ।श्री शब्द ही अंग्रेजी में सर बनकर जर्मनी में हर बन गया । मोहन भोग के पर्याय सिरा जहाँ फारस में हरिरा बना ।
कहाँ तक बिस्तार करे यह एक नग्न सत्य है । जिसका कोई  साक्षर अपलाप नही कर सकता की अनेक शब्दों में सकार के स्थान पर हकार का उच्चारण वैदिक काल से ही है । ऐसी स्थिति में सिन्धु शब्द निरुक्त शाश्त्रोक्त वर्ण व्यत्यय से हिन्दु उच्चारित हो रहा है ।वेद के मन्त्र भाग में ऐसे व्यत्यय के अनेक प्रमाण विद्यमान है ।जिनमे हमारी जाती के पूर्व पुर् खाओ को सिन्धु जाती का नेता कह कर स्मरण किया गया है ।

नेता सिन्धुनाम् [[ ऋग वेद ७/५/२]]

परन्तु श्रुति सामान्यमात्रम
सिद्धांत का ज्ञान नही है ।वेद में नद नदी पुरुषो का नाम देखकर यह कल्पना नही की जानी चाहिए की तब तो वेद उन ब्यक्तियों के पीछे बने
बल्कि ये समझना चाहिए की वेद में तादृश शब्द देख कर ही लोक में वैसे ही नाम रखने की परिपाटी प्रचलित हुई इस लिए हम दम ठोक कर यह कहने को उद्दत है की वेद के सिन्धू शब्द
उच्चारण भेद से हिन्दू शब्द प्रसिद्ध  हुआ ।बिशिष्ट स्थलों में सकार के स्थान में हकार का आदेश पाणिनी ब्याकरण और उसके भाष्यकार  और उसके व्याखाताओ को भी अभीष्ट है ।जैसे अस्मद शब्द को प्रथमा एक वचन त्वाहौ सौ [[७/२/९४]] को अह आदेश होता है । लोट् लकार में सर्वत्र सी के जगह ही करने वाला सेहर्य पिच्च [[३/४/८७]]  सूत्र सुप्रसिद्ध है ही इसी प्रकार 'ह' एती [[७/ ४/५२/ ]] सूत्र भी सकार को हकार करता है ।
सकार और हकार दोनों की ही इषद् विवृत और महा प्राण प्रत्यंत भी
सामान है । वर्ण माला में भी ' स' और' ह ' दोनों को एकत्र ही पढ़ा गया है ।प्राकृत भाषा में तो सकार हकार के विपर्यय का बाहुल्य भरा पड़ा ही है ।
अस्मि" युष्माकं" और अस्माक के स्थान में क्रमश: ह्यी "" तुह्यण " अह्याणम  आता है । हिन्दी भाषा के ख्यातनाम कवियों ने भी सकार के स्थान पर हकार का आदर किया है । जैसा की श्री सुर दास जी पाषाण शब्द के जगह पाहन शब्द को जगह दिया है ।यहाँ " स " के स्थान पर " ह " का
"" पाहन पतित बाण नही भेदत रीता कढ़ी निषंग ""
श्री गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी पाहन ते न काठ कठिनाई लिखा है ।राम चरित मानस बालकाण्ड में भगवन श्री रामचन्द्र शारीर सौन्दर्य का वर्णन करते हुए लिखा है ।
"" केहरी कन्ध बाहु बिशाल "
यहाँ कहने की आवश्यकता नही है की यदि गोस्वामी जी उक्त चौपाई में केहरी के स्थान पर केशरी भी रख देते तो वर्णमात्र जन्य छ्न्दोभंग की तनिक भी संभावना नही थी तथापि यहाँ ह्कारोच्चारण को आग्रह पूर्वक अपनाने का यही एक मात्र कारण है की शब्द माधुरी और ओजस्विता की दृष्टि हकार सकार से अधिक उपादेय है ।इस लिए यह कल्पना भी निर्हैतुक नही की जा सकती की संगीत ललित आदि कलाओं के जन्म दाता बीर सिन्धुओ ने उपयुक्त गुणों के कारण ही अपने नाम को हकारोच्चारण को ही प्रधानता दी हो ।जो हो हिन्दु नाम अति प्राचीनतम वैदिक परम्परा का ही परिचायक है इसमें तनिक भी शन्देह नही है ।यहाँ ऐतिहासिक तथ्य भी प्रसंगवस स्पष्ट कर देना अनावश्यक नही की " रामायण " महाभारत और "पपुराण आदि ग्रन्थो के  अनुसार चंद्रवंशी सम्राट ययाती के अन्यतम पुत्र और दैत्य वंशियों राजा वृषपर्वा के दौहित्र " द्र्ह्यु " को पश्चिमोतर राज्य मिला था जिसकी वंश परम्परा में आगे चल कर प्रचेतावन्शीय १०० राजाओं ने पश्चिम देश पर सासन किया ।
यथा ।
मलेच्छाधिपतयोSभवन्  ( श्रीमद्भागवत ९/२३/१६/)
 अर्थात --: पाश्चात्य देश के अप भाषाभाषी लोग शासक हुए आज बाहर पाशच्यात देश के जितनी भी जातियां है वो उन्ही चन्द्रवंशी क्षत्रियो का संतान है जो मनु महाराज के कथन अनुसार ।

शनकेस्तु किर्यालोपादिमाः क्षत्रियजातय ।
वृषलात्वं गतालोके ब्राह्मणानामदर्शनात् ।।( मनु १०/४३)
अर्थात --- अनेक क्षत्रिय जातियां ब्राह्मण लोगो के सम्पर्क में न रहने के कारण धार्मिक किर्याकलाप भूल जाने के शुद्र प्रायः मलेच्छ अप भाषाभाषी बन गई ।चन्द्र शब्द का अन्यतम पर्याय" इन्दु " है सो सिन्धु प्रांत के पश्चिमी  साखा के पूर्व पुरुषा जहां सिन्धु नाम से प्रख्यात हुए वहां अपने चन्द्रवंशी होने के प्रतिक " इन्दु" किंवा तद्पत्य ऐन्देव उपाधि से भी बिस्व बिख्यात हो गए ।उक्त " इन्दु" और ऐन्देव शब्द के विकृत रूप दकारहिन् खारोष्टि भाषा में इन्डो " इंडिया" इंडियन " आदि शब्दों के रूप में परिणित हो गया ।सिन्धु और हिन्दु शब्दों में धकार और दकार के तारतम्य के कारण भी इन्दु शब्द संघटित दकार का अत्यधिक प्रचलन ही कहा जाएगा ।इस लिए हिन्दु शब्द के अवार्चनी होने का भ्रम भी उन्ही महाशय को हो सकता है जो वैदिक वाङ्गमय के अनुशंधानात्मक हिन् है ।
मन्त्र ब्राह्मणातम्क वेद में सकारोपलाक्षित और लिङ्गोपदीष्ट हिन्दू शब्द अनेक अस्थानो में आता है यथा ।
(क) नेता सिन्धुनाम -------------( ऋग वेद ७/५/२)
(ख) सिन्धुपति: क्षत्रियाः----------( ऋग वेद ७/६४/३)
(ग) हिङ्कृणवती दुहामश्विभ्याम -------( ९/१०/५)
(घ)सिन्धोगर्भोशी विद्यतां पुष्पम  ------(अथर्वेद १९/४४/५)
 (ङ) अस्येंदु त्वेषा ्रन्तसिन्धैव -----(अथर्वेद २०/३५/११)
( च) सिन्धो अधिक्षियत-----------------( ऋग वेद १/१२६/१)

अर्थात (क) सिन्धु का नेता  (ख)सिन्धुपति क्षत्रिय (ग) हिन्कार करती गाय को दुहनेवाला (घ) हे जन तू सिन्धु का गर्भ है अतएव तू तेजश्वी  जनों  का पोषक है (ङ) इनके ही ( इश्वर) के तेज वरदान से सिन्धु लोग विजय होते है (च) सिन्धु देश  में निवास करो ।
उपयुक्त प्रमाणों में समुद्र किंवा नद नदी वाचक सिन्धु शब्द की कल्पना वही लोग कर सकते है जिन्हें की अर्थ प्रकरण लिङ्ग शहचर्य्य बिरोधिता  आदि अर्थ निर्णायक तत्वों का ज्ञान न हो  ।पाठक गण जरा ध्यान पूर्वक मनन करे और देखे की (क) में सिन्धु के नेता का वर्णन किया गया है ।समुद्र नद नदी आदि का तो ब्यक्ति स्वामी हो नही सकता परन्तु नय निति चलाने वाला नेता तो हो नही सकता नेतृत्व में चलने और चलाने की योग्यता केवल चेतनो में ही सम्भव है अतः यहाँ समुद्र शब्द नद नदी का वाचक न हो कर तन्नामक जाती या जनसमूह के वाचक हो सकता है (ख) भाग में स्पस्ट तःसिन्धुपति क्षत्रिय का वर्णन विद्यमान है यह उपाधि राणा प्रताप को हिन्दुपति के रूप में प्राप्त हुई थी  (ग) भाग में हिङ्कृणवती दुहाम् शब्दों में वत्स दर्शन संजात हर्षा एवं प्रसंन्सा सूचक हिं हिं शब्द करती हुई गाय का दोहन करने वाली हिन्दू जाती का निर्वेचन पूर्वक हिं--दू नाम परोक्ष पद्यति से प्रकट कर दिया है । निरुक्तकार यास्क ने वेद की इसी निर्वचन  शैली को ध्यान में रख  कर यह घोषणा की है की ।

स्वरवसम्यान्निर्ब्रूयात् [[ निरुक्त १/३]]

अर्थात -- किसी स्वर या वर्ण व्यंजन का समानता देखकर अमुक शब्द का निर्वचन करना चाहिए ।
यह कहने की आवश्यकता नही है की वैदिक मंत्रो में तादृश शब्दों का शब्दांश या अक्षर मात्र आ जाने पर भी उसका तत्तद् पदार्थो के ग्रहण में बिनियोग सुतरा श्रोतसुत्रो का भी अभिप्रेत है फिर चाहे वो शब्द अर्यन्तर का ही वाचक  क्यों न हो ।जैसे समस्त वैदिक अनुष्ठानो में भी दधि -- दही
अर्पण करते हुए
 दधिक्राव्णों उकारिषम् [[ऋण ४/३९/६]] इत्यादि मन्त्र बोला जाता है यहाँ दधी शब्द दही का अर्थ वाचक नही है वास्तव में यहाँ दधी शब्द ही नही है ।किन्तु दधिक्र शब्द है जिसका अर्थ घोड़ा है  निरुक्य्कार ने शब्द का निर्वचन करते हुए स्पष्ट लिखा है की
दधत् क्रमाती इति दधिक्रा अस्वः निरुक्त [[४/३]] अर्थात --जो सवार के पीठ पर चढ़ते ही कदम बढाने लगता है वह चन्चल पशु इस गुण के कारण दधिक्रा कहा जाता है सो जैसे यहाँ दधिवाचक शब्द की अविद्यमानता में भी केवल शब्दांश मात्र द -- धी वर्णों के लिंग प्रमाण से उक्त मन्त्र का दधी विनियोग विहीत है  ठीक उसी प्रकार हिङकृणवती और दुहाम् मंत्राश में तो लिङ्ग प्रमाण के साथ साथ तदर्थ क8 संगती भी अवाध है ।
अग्नि स्तावक उद् बुद्धस्वाग्ने [[ यजु१५/५४]] मन्त्र का बुध ग्रह की पूजा में जलस्तावक शन्नो देवी [[ऋग १०/९/४]] मन्त्र का शनि के पूजन में विनियोग भी हमारे विवेचन के ही समर्थन है यदी किर्यानिष्ठ उद् बुद्धस्व से  बुध अक्षन शब्द से अक्षत शं मात्र से शनि आदि का वेद में पाणिग्रहण हो सकता है तो फिर हिं - दू   से  हिन्दू क्यों नही । शायद यहाँ यह समझाने की तो आवश्यकता ही नही एक मात्र हिन्दू संस्कृति में ही यज्ञ यागादी सर्वविध इष्टापुर्त सम्बन्धी अनुष्ठानो में सवत्सा गाय का  वत्स पान अविशिष्ट दूध ही ग्राह्य माना जाता है एनी लोग तो केवल दूध मात्र के इच्छुक है फिर चाहे वह पशु को डरा धमका कर अथवा मशीन के द्वारा बलात् क्यों न सुन्ता गया हो परन्तु हिन्दू संस्कृति का यह उद्घोष है की ।
श्राद्धे सप्त पवित्राणी दोहित्रं कुत्पस्तिला: ।
उच्छिष्टं शिवनिर्माल्यं वामनं शव कर्पटम् ।।
न केवल धार्मिक अनुष्ठानो में ही अपितु आयुर्वैदिक उपचारों में भी सवत्सा गाय का दूध ही परिगृहित किया गया है ।
वेद में उक्त भगवदाज्ञा  को देख कर  सिन्धु संस्कृति के प्राचीनतम पुरुषाओ ने अपनाया था  और अपनी इस बिशेषता को अक्षुण बनाए रखने के लिए अपना तादृश नाम ही प्रख्यात कर दिया था ।

 --------[[ तंत्र और पुराण में हिन्दू शब्द  ]]-------

(क)  हिन्दुधर्मप्रलोप्तारो जायन्ते चक्रवर्तीन: हिनञ्च दुषय त्वेव स हिन्दुरुच्यते प्रिये । [[ मेरुतंत्र प्रकाश २२]]
(ख) अवनी यवनै: क्रान्ता हिन्दवो विन्ध्यामा विशन् [[ कलिका पुराण ]]
(ग) हिमालयं सामारभ्य यावदिन्दु सरोवरम । तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते [[बार्ह स्पत्य शास्त्र ]]
(घ)  सप्त सिन्धु स्तथैव च हप्त हिन्दुर्या वनीच [[ भविष्य पुराण ५/३६]]
(ङ) हिनस्ति तपसा पापान् दैहिकान दुष्टमानसान । हेतिभी शत्रुवार्गाश्च स हिन्दुरभिधियते [[ पारिजात हरण नाटक]]














प्रस्तुति ----------:श्री माधवाचार्य

Wednesday, 13 August 2014

अञ्जनि पुत्र हनुमान

त्वं हि देववरिष्ठस्य मारुतस्य महात्मनः । पुत्रस्तस्यैव वेगेन सदृशः कपिकुञ्जर ॥५-१-१२१॥

हे कपी श्रेष्ठ तुम देवताओं में श्रेष्ठ पवन देव के पुत्र हो । हे कपिकुञ्ज वेग में भी तुम पिता के सामान ही हो

अप्सर अप्सरसाम् श्रेष्ठा विख्याता पुंजिकस्थला ।

अंजना इति ॥४-६६-८॥

अप्सराओं में श्रेष्ठ पुञ्जिकस्थली नाम की अप्सरा जिनका दूसरा नाम अन्जना है ।

इससे ये सिद्ध होता है की अञ्जनि पुत्र हनुमान देवयोनि से थे ।

पिता पवन देव और माता अप्सराओं में श्रेष्ठ थी ।

कपि रूपम् परित्यज्य हनुमान् मारुतात्मजः ।

भिक्षु रूपम् ततो भेजे शठबुद्धितया कपिः ॥४-३-२॥

संस्कार क्रम संपन्नाम् अद्भुताम् अविलम्बिताम् ।

उच्चारयति कल्याणीम् वाचम् हृदय हर्षिणीम् ॥४-३-३२॥

हनुमान जी जाते समय अपने वानर रूप को त्याग सन्यासी रूप धारण किया ।

 इससे ये ज्ञात होता है की हनुमान जी एक बेहद ज्ञानवान कपी थे वे ऐसे विद्या के ज्ञाता थे जिससे अपने रूप रंग को अपने इच्छा अनुरूप ढाल लेते थे ।
एवम् उक्त्वा तु हनुमाम् तौ वीरौ राम लक्ष्मणौ ।

वाक्यज्ञो वाक्य कुशलः पुनः न उवाच किंचन ॥४-३-२४॥

तम् अभ्यभाष सौमित्रे सुग्रीव सचिवम् कपिम् ।

वाक्यज्ञम् मधुरैः वाक्यैः स्नेह युक्तम् अरिन्दम ॥४-३-२७॥

न अन् ऋग्वेद विनीतस्य न अ\-\-यजुर्वेद धारिणः ।

न अ\-\-साम वेद विदुषः शक्यम् एवम् विभाषितुम् ॥४-३-२८॥

नूनम् व्यकरणम् कृत्स्नम् अनेन बहुधा श्रुतम् ।

बहु व्याहरता अनेन न किंचित् अप शब्दितम् ॥४-३-२९॥

न मुखे नेत्रयोः च अपि ललाटे च भ्रुवोः तथा ।

अन्येषु अपि च सर्वेषु दोषः संविदितः क्वचित् ॥४-३-३०॥

अविस्तरम् असंदिग्धम् अविलम्बितम् अव्यथम् ।

उरःस्थम् कण्ठगम् वाक्यम् वर्तते मध्यमे स्वरम् ॥४-३-३१॥

अञ्जनि पुत्र हनुमान जी श्री राम चन्द्र से प्रथम भेट में ही मन मोह लिया जिसके प्रत्युतर में भगवन ने लक्ष्मण जी से ये कहा ।

वाक्यज्ञ बीर श्री रामचंद्र और लक्षमण से इस प्रकार वाक्यकुशल हनुमान जी चुप हो गए ।


हे लक्षमण सुग्रीव के वाक्यविशारद सचिव और शत्रुओ के नाश करने वाले इस कपीश्रेष्ठ से तुम मधुर वाणी नीति पूर्वक से तुम बात करो


क्यों की जिस प्रकार की बातचीत इन्होने ने हमसे की है वैसी बातचीत ऋग वेद यजुर्वेद और शामवेद के जाने बिना कोई नही कर सकता ।28


अवस्य ही इन्होने ने सम्पूर्ण ब्याकरण पढ़ा और सुना है क्यों की इन्होने ने जितनी भी बाते कही किन्तु एक भी बात इनके मुख से अशुद्ध नही निकली ।29

इतना ही नही प्रत्युत बोलते समय भी इनके नेत्र ललाट और भौहे तथा शरीर के अन्य अव्यय विकृत को प्राप्त नही हुआ ।30


इन्होने अपने कथन से न ही अन्धाधुन बढ़ाया है और न ही इतना संक्षिप्त ही किया की उनका भाव समझने में भ्रम उत्पन्न हो इन्होने ने अपने कथन को व्यक्त करते समय न ही शीघ्रता ही दिखलाई और न ही विलम्ब किया इनके कहे हुए वचन हृदयस्थ और कंठगत है जो अक्षर जहाँ उठान चाहिए वही उठाया है इनका स्वर भी मध्यम है ।31

इनकी वाणी व्याकरण से संस्कारित क्रम संपन्न और न ही धीमी है न ही तेज ये जो बाते कहते है वो अत्यंत मधुर और गुण युक्त है ।
प्रसन्न मुख वर्णः च व्यक्तम् हृष्टः च भाषते ।
न अनृतम् वक्ष्यते वीरो हनूमान् मारुतात्मजः ॥४-४-३२॥

लक्षमण द्वारा हनुमान की प्रसंसा ।
धीर पवन तनय हर्षित हो प्रसन्न मुख से बातचीत कर रहे है इससे जान पड़ता है की ये कभी झूठ नही बोलते ।

सुग्रीव द्वारा हनुमान की ब्याख्या ।

तेजसा वा अपि ते भूतम् न समम् भुवि विद्यते ।
तत् यथा लभ्यते सीता तत् त्वम् एव अनुचिंतय ॥४-४४-६॥
त्वयि एव हनुमन् अस्ति बलम् बुद्धिः पराक्रमः ।
देश काल अनुवृत्तिः च नयः च नय पण्डित ॥४-४४-७॥
तुम्हारे जैसा तेजस्वी इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नही है अतः तुम ऐसा उधोग करना जिससे सीता का पता लग जाए
हे हनुमन तुममे बल बुद्धि बिक्रम तथा देश और काल का ज्ञान और निति का बिचार पूर्ण रूप से है एवं तुम निति में पण्डित हो ।

वीर वानर लोकस्य सर्व शास्त्र विदाम् वर ।
 ॥४-६६-२॥

जामवंत द्वारा हनुमान जी की व्याख्या

हे समस्त वानर कुल में श्रेष्ठ हनुमान हे सर्व शास्त्रविशारद ।

अप्सर अप्सरसाम् श्रेष्ठा विख्याता पुंजिकस्थला ।
अंजना इति ॥४-६६-८॥
अप्सराओं में श्रेष्ठ पुञ्जिकस्थली नाम की अप्सरा जिनका दूसरा नाम अन्जना है ।

त्वं हि देववरिष्ठस्य मारुतस्य महात्मनः । पुत्रस्तस्यैव वेगेन सदृशः कपिकुञ्जर ॥५-१-१२१॥

फिर तुम देवताओं में श्रेष्ठ पवन देव के पुत्र हो हे कपिकुञ्ज वेग में भी तुम पिता के सामान ही हो ।

विष्णुना प्रेषितो वापि दूतो विजयकाङ्क्षिणा ।

न हि ते वानरं तेजो रूपमात्रं तु वानरम् ।। ५/५०/१०
 रावण द्वारा हनुमान ब्याख्या ।
विजयाकांक्षी विष्णु के दूत बन कर आये हो तो ठीक ठीक कह दो क्यों कइ तुम रूप से तो वानार जान पड़ते हो परन्तु तुम्हारा विक्रम तो वानरों जैसा है नही ।
रावण जैसे त्रिकाल ज्ञाता भी ये समझ चुके थे की ये देव पुत्र ही हो सकता है साधारण वानर हो नही सकता ।



प्रस्तुति ---------- शैलेन्द्र सिंह 

Thursday, 24 July 2014

आसुरी प्रवृति

अवटे च अपि माम् राम निक्षिप्य कुशली व्रज । रक्षसाम् गत सत्त्वानाम् एष धर्मः सनातनः ॥३-४-२२॥[[बा0रा0]]

असुरगण का आहार तामसिक कर्म मारकाट और मृत्युपरांत स्थूल सरीर को गड्ढे में दफन होना ऐसा शास्त्र प्रमाण है ।

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥१६- ४॥[[गीता]]


 दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी- ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं॥4॥


Friday, 18 July 2014

महाभारत और वेद वेदाङ्ग

ब्रह्मन्वेदरहस्य च यच्चान्यत्स्थापितं मया।
साङ्गोपनिषदां चैव वेदानां विस्तरक्रिया।।१/६२
इतिहासपुरापानामुन्मेषं निमिषं च यत्।
भूतं भव्यं भविष्यच्च त्रिविधं कालसंज्ञितम्।।१/६३
जरामृत्युभयव्याधिभावाभावविनिश्चयः।
विविधस्य च धर्मस्य ह्याश्रमाणां च लक्षणम्।।१/६४
चातुर्वर्ण्यविधानं च पुराणानां च कृत्स्नशः।
तपसो ब्रह्मचर्यस्य पृथिव्याश्चन्द्रसूर्ययोः।।१/६५
ग्रहनक्षत्रताराणां प्रमाणं च युगैः सह।
ऋचो यजूषि सामानि वेदाध्यात्मं तथैव च।।१/६६[[महाभारत ]]

भावार्थ --:  भगवन वेद व्यास द्वारा
 मैंने इस महा काब्य में सम्पूर्ण वेदों का गुप्तं रहस्य एवं अन्य सब शास्त्रों का सार संकलित कर के स्थापित कर दिया है केवल वेदो का ही नही उसके अङ्ग और उपनिषदों का भी बिस्तार इसमें निरूपण किया है ।इस ग्रन्थ में इतिहास एवं पुराण का मन्थन कर के उसका परस्त रूप प्रकट किया है भुत भविष्य एवं बर्तमान कालीन इन तीनो संज्ञाओं का वर्णन हुआ है इस ग्रन्थ में बुढापा भय रोग मृत्यु और पदार्थोका सत्यवत मिथ्यात्व का बिशेष रूप से निश्चय किया गया है तथा अधिकारी भेद से भिन्न भिन्न प्रकार के धर्मो का निरूपण किया गया है । ब्राहमण क्षत्रिय वैश्य शुद्र इन चारो वर्णों के कर्मो का बिधान पुराणों का सम्पूर्ण मूल तत्व भी प्रकट हुआ है तपस्या एवं ब्रह्मचर्य के स्वरुप अनुष्ठान एवं फलो का विवरण पृथ्वी चंद्रमा सूर्य गृह नक्षत्र तारा सत्ययुग त्रेता युग द्वापर युग कलयुग इन सब के परिणाम और प्रमाण ऋग वेद साम वेद यजुर्वेद और इनके अध्यात्मिक अभिपार्य अध्यात्मशास्त्र का इस ग्रन्थ में बिस्तार से वर्णन किया गया है ।

ज्ञानाञ्जनशलाकाभिर्बुद्धिनेत्रोत्सवः कृतः'।।
धर्मार्थकाम्मोक्षार्थे समासव्याकीर्तनै:
त्वया भारतसूर्येण नृणां विनिहतं तमः।।
पुराणपूर्णचन्द्रेण श्रुतिज्योत्स्नाप्रकाशिना।
नृणां कुमुदसौम्यानां कृतं बुद्धिप्रसादनम्।।
इतिहासप्रदीपेन मोहावरणघातिना।
लोकगर्भगृहं कृत्स्नं यथावत्संप्रकाशितम्।
संग्रहाध्यायबीजो वै पौलोमास्तीकमूलवान्।
संभवस्कन्धविस्तारः सभापर्वविटङ्कवान्।।
आरण्यपर्वरूपाढ्यो विराटोद्योगसारवान्।
भीष्मपर्वमहाशाखो द्रोणपर्वपलाशवान्।।
कर्णपर्वसितैः पुष्पैः शल्यपर्वसुगन्धिभिः।
स्त्रीपर्वैषीकविश्रामः शान्तिपर्वमहाफलः।।
अश्वमेधामृतसस्त्वाश्रमस्थानसंश्रयः।
मौसलश्रुतिसंक्षेपः शिष्टद्विजनिषेवितः।।
सर्वेषां कविमुख्यानामुपजीव्यो भविष्यति।
पर्जन्यइव भूतानामक्षयो भारद्रुमः।।[[महाभारत आदिपर्व--८४-९२]]


Thursday, 17 July 2014

बृक्ष पूजन

कुछ मुर्खाधिपतियो का कहना है की नदी एवं बृक्ष पूजन महाभारत युद्ध [[ द्वापर युग ]] के बाद ऐसी प्रथा का चलन हुआ था ।
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परन्तु सत्य तो ये है की त्रेता युग से भी पूर्व में भी नदी पूजन बृक्ष पूजन का बिधान था जिसका प्रमाण बाल्मीकि रामायण द्वारा प्रमाणित है ।जबकि इस युग में महर्षि बिस्वामित्र महर्षि वशिष्ठ जी जैसे ऋषि महर्षि भी इस धरा धाम पर उपस्थित थे
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यानि त्वत्तीरवासीनि दैवतानि च सन्ति हि । तानि सर्वाणि यक्ष्यामि तीर्थान्यायतनानि च ॥२-५२-९०॥

माता सीता द्वारा ---
जो देवता आप के तट पर रहते है तथा प्रयाग आदि जो जो तीर्थ काशी आदि प्रसिद्द देव स्थान है उनकी मै पूजा करुँगी ।

पुत्रः दशरथस्य अयम् महा राजस्य धीमतः ।
निदेशम् पालयतु एनम् गन्गे त्वद् अभिरक्षितः ॥२-५२-८३॥
चतुर् दश हि वर्षाणि समग्राणि उष्य कानने ।
भ्रात्रा सह मया चैव पुनः प्रत्यागमिष्यति ॥२-५२-८४॥
ततः त्वाम् देवि सुभगे क्षेमेण पुनर् आगता ।
यक्ष्ये प्रमुदिता गन्गे सर्व काम समृद्धये ॥२-५२-८५॥

माता सीता द्वारा -----

हे गंगे बुद्धिमान राजाधिराज दशरथ जी के यह पुत्र श्री राम चन्द्र जी आप से रक्षित हो अपने पिता की आज्ञा का पालन करे ।
यदि ये पुरे चौदह वर्ष वनवास पुरे कर अपने भाई लक्ष्मण सहित मेरे साथ लौट आवेंगे तो हे देवी हे सुभगे मै सकुशल लौट कर आप की पूजा करुँगी हे गंगे आप सब मनोरथ को पूर्ण करने वाली है ।

नमस्तेऽन्तु महावृक्ष पारयेन्मे पतिर्वतम् ।
कौसल्याम् चैव पश्येयम् सुमित्राम् च यशस्विनीम् ॥२-५५-२५॥
इति सीताञ्जलिम् कृत्वा पर्यगच्छद्वनस्पतिम् ।

अवलोक्य ततः सीतामायाचन्तीमनिन्दिताम् ॥२-५५-२६॥
दयिताम् च विधेयम् च रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।

माता सीता द्वारा -----

हे महाबृक्षे मै आप को प्रणाम करती हु आप मेरे पति का व्रत पूरा कीजिये जिससे मै अपनी यस्स्वनि कौशल्या और सुमित्रा के दर्शन कर सकू ।
यह प्रार्थना कर हाथ जोड़े हुए सीता जी ने वट बृक्ष की परिकर्मा की
-----||●जय श्री राम ●||-----

Friday, 6 June 2014

वर्णा श्रम धर्म रहस्य

सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक्पृथक् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे । । १.२१ । ।

परमात्मा ने सब चीजो के नाम और कर्म पृथक पृथक जैसे  सृष्टि के पहले था वेद द्वारा संसार में प्रकट किया ।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः [[गीता ४/१३]]

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिंयान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादों वी सृजाम्यहम्९- ७॥


प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नम-वशं प्रकृतेर्वशात् ॥९- ८॥[[गीता]]

ब्राह्मण ' क्षत्रिय वैश्य और शुद्र इन चारो वर्णों का समूह गुण और कर्म के बिभाग पूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है ।

! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ॥7॥

अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ॥8॥


यं तु कर्मणि यस्मिन्स न्ययुङ्क्त प्रथमं प्रभुः ।
स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः । । १.२८ । ।[[ मनुस्मृति ]]


भावार्थ --: परमात्मा में जिस जिस प्राणी को सृष्टि के आदि में जिस जिस कर्म में लगाया था  वह आज तक वैसे ही कर्म करता है । मनुष्य के अतिरिक्त सब भोग योनि कहलाती है ।


ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥१२॥[ऋग वेद १०/९०/१२

मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने ।
तृतीयं यज्ञदीक्षायां द्विजस्य श्रुतिचोदनात् । । २.१६९ । ।[[ मनुस्मृति]]


भावार्थ--: वेद में ब्राह्मण के तीन जन्म लिखे है
पहला जन्म माता के गर्भ से दूसरा जन्म यज्ञो पवित से तीसरा जन्म यज्ञ करने से ||


नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते । । २.३० । ।[[मनुस्मृति]]


जन्म से ग्यारहवे या बारहवे दिन नाम करण करना चाहिए  यदि इस दिन न हो सके तो उत्तम  तिथि  नक्षत्र

तथा दिन में करना चाहिए ||

गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् ।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः । । २.३६ । ।[ मनुस्मृति]
गर्भाधान तिथि अथवा जन्म तिथि से आधवे ग्यारहवे वा बारहवे वर्ष में वर्ण क्रमानुसार ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य का उपनयन संस्कार करना चाहिए

क्षत्रम् ब्रह्ममुखम् च आसीत् वैश्याः क्षत्रम् अनुव्रताः ।

शूद्राः स्व धर्म निरताः त्रीन् वर्णान् उपचारिणः ॥१-६-१९॥ [ रामायण]


वहां के क्षत्रिय गण ब्राह्मणों के आज्ञाकारी  वैश्य गण क्षत्रिय के अनुवर्ती (अर्थात कहने पर चलने वाला )और शुद्र गण अपने वर्णा धर्म अनुसार ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य जाती के लोगो के सेवा करने वाले थे ||


स्वकर्मनिर्ताश्चासन् सर्वे वर्णा नाराधिप ।
एवं तदा नरव्याघ्र  धर्मो न हृस्ते कचित् ।।[[ महाभारत १/६४/२४]]


ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यः शुद्राश्चैव  स्वकर्मसु ।।[[ महाभारत १/४९/१०]]

भावार्थ --- ब्राह्मण .क्षत्रिय .वैश्य .शुद्र सभी अपने वर्णोंश्रमोचित कर्म में संलग्न और प्रसन्नचित रहते थे ।

यहाँ इस प्रमाण की पुष्टि हो रही है की कलयुग में भी वर्णाश्रम धर्म का पालन शास्त्र अनुकूल ही होता रहा है और महाराज परीक्षित के समय सभी वर्ण अपने अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन कर प्रसन्न चित रहते थे ।

ज्ञायमानो ह वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणवाँ जायते ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्य: प्रजया पितृभ्य एष वा अनृणो य: पुत्री यज्वा ब्रह्मचारिवासी।
तैत्तिरीय संहिता 6.3.10.5 ।


Thursday, 3 April 2014

।। भगवान् वेदव्यास ब्राह्मण है शुद्र नही ।।

भगवान् व्यास ब्राह्मण हैं, शूद्र नहीं–

भगवान् कृष्णद्वैपायन व्यास महर्षि परासर के द्वारा माँ सत्यवती से उत्पन्न हुए | इन्हें शास्त्रनाभिज्ञ कुछ लोग शूद्र कहते हैं | उनका कहना है कि नाविक की कन्या ( शूद्रकन्या ) सत्यवती थीं | अतः उनसे महर्षि परासर द्वारा उत्पन्न व्यास जी शूद्र हुए | इन लोगों से एक प्रश्न है कि जब शूद्र और ब्राह्मण दोनों से व्यास जी समुत्पन्न हैं तो आप मातृपक्ष को ध्यान में रखकर उन्हें शूद्र ही क्यों मान रहे हैं ? पितृपक्ष को देखकर उन्हें ब्राह्मण क्यों नही कहते ? केवल अपना उल्लू सीधा करना है न | निष्पक्ष तो माता पिता पर जब ध्यान देगा तो उसे संदेह होगा कि व्यास जी को ब्राह्मण माना जाय या शूद्र ? किन्तु दुराग्रही अपनी मानसिकता थोपेगा कि वे शूद्र ही थे | वस्तुतः उन्हें शूद्र इसलिए मानना कि वे शूद्रकन्या से उत्पन्न हुए थे –यह मात्र भ्रान्ति ही है | क्योंकि माँ सत्यवती शूद्रकन्या थीं ही नही | केवल कैवर्त द्वारा उनका पालन किया गया था | उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा जी के शाप से मीनभाव को प्राप्त अद्रिका नामक एक श्रेष्ठ अप्सरा जो यमुना में मछलीरूप में निवास कर रही थी, के उदर से हुई थी, जिसमे कारण चेदि देश के परम प्रतापी महाराज उपरिचर वसु का वीर्य था — तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद्वराप्सराः | मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनेचरी || श्येनपादपरिभ्रष्टं तद्वीर्यमथ वासवम् |जग्राह तरसोपेत्य साSद्रिका मत्स्यरूपिणी || — महाभारत,आदिपर्व,अंशावतरणपर्व, ६३/५८-५९-६०, उपरिचर वसु के वीर्य के प्रभाव से १०वे मास इसके उदर से एक बालक और बालिका को मत्स्यजीवियों ने निकाला और महाराज उपरिचर से इस रहस्य को बतलाया | तो उन्होंने बालक को ले लिया जिसका नाम मत्स्य रखा और वह बाद में राजा बना – “ तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा | स मत्स्यो नाम राजाSSसीद्धार्मिकः सत्यसंगरः ||–वहीं ६३, व्यास जी की माँ शूद्रकन्या नही — और जो कन्या थी उसके शरीर से मछली की गंध निकलती थी,उसे महाराज ने मछुवारे को दे दिया जिसका नाम सत्यवती पड़ा— “ सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यगन्धिनी | राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति ||–६७, दाश—कैवर्ते दाशधीवरौ—अमरकोष१/१०/१५, ध्यातव्य है कि यह कन्या भी एक प्रतापी क्षत्रियराजा के वीर्य द्वारा मत्स्यरूपिणी एक श्रेष्ठ अप्सरा से जन्मी है | अतः बीज के प्रभाव को देखते हुए इसे क्षत्राणी ही कहा जा सकता है, शूद्र नही | ( “ यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोSभवन् | पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते ||–मनुस्मृति—१०/७२, “ बीजयोन्योर्मध्ये बीजोत्कृष्टा जातिः प्रधानम् ”—मन्वर्थमुक्तावली, बीज और योनि के मध्य में उत्कृष्ट बीज वाली जाति ही प्रधान है इसीलिये तिर्यग योनि से समुत्पन्न लोग भी ऋषि हुए हैं और पूजित होने के साथ श्रेष्ठ भी माने गए | ) क्या किसी बालक या बालिका का किसी अन्य जातीय व्यक्ति से पालन हो तो उसकी जाति बदल जायेगी ? माता सत्यवती की उत्पत्ति में किसी शूद्र या शूद्रा के रज अथवा वीर्य का कोई सम्बन्ध ही नही, ऐसी स्थिति में केवल पालन करने मात्र से उन्हें शूद्र कहकर व्यास जी को शूद्र मानना केवल प्रज्ञापराध नही तो और क्या है ? विजातीय संसर्ग से सांकर्यदोष —सांकर्य दोष २ प्रकार का होता है |१-अनुलोम संकर ,२- प्रतिलोम संकर | अनुलोमसंकर—उच्च वर्ण के पुरुष का निम्न वर्ण की कन्या के साथ विवाह विहित है –मनुस्मृति-३/१३, अतः इनसे उत्पन्न संतानें अनुलोम संकर की परिधि में हैं | जैसे ब्राह्मण से क्षत्रिय कन्या द्वारा उत्पन्न संतान निषाद,क्षत्रिय से वैश्यकन्या द्वारा उत्पन्न माहिष्य तथा शूद्रकन्या से उत्पन्न उग्र कही जाती है | इस प्रकार ब्राह्मण द्वारा ३, क्षत्रिय से २ तथा वैश्य से १ कुल मिलाकर अनुलोम संकर संताने ६ प्रकार की हुईं | प्रतिलोम संकर –चूंकि निम्न वर्ण के पुरुष के साथ उच्च वर्ण की कन्या का विवाह शास्त्रानुमोदित नही है इसलिए शूद्र से ब्राह्मण ,क्षत्रिय और वैश्य की कन्या में उत्पन्न संतानें क्रमशः चांडाल, क्षत्ता और अयोगव कही जाती हैं—शूद्रादायोगवः क्षत्ता चाण्डालश्चाधमो नृणाम् | वैश्यराजन्यविप्रासु जायन्ते वर्णसङ्कराः ||–मनुस्मृति -१०/१२, ऐसे ही व्यभिचारजन्य संतानें,सगोत्रादि विवाह से समुत्पन्न त्तथा विहित उपनयन संस्कार से रहित व्रात्य संज्ञक संतानें भी वर्ण संकर कही जाती हैं | –अपने अपने वर्ण की विवाहिता कन्या से उत्पन्न संतानें ही अपने अपने वर्ण की होती हैं, अन्यनहीं | सांकर्य के अपवाद महर्षिगण — उन ब्रह्मर्षियों की संतानों पर भी सांकर्य का प्रभाव नही पड़ता जो अपनी उत्कृष्ट तपश्चर्या से अलौकिक शक्ति सम्पन्न हो चुके हैं | अत एव महर्षि विभांडक का अमोघ वीर्य जिसे मृगी पी गयी थी—से समुत्पन्न ऋष्यश्रृंग ब्राह्मण ही हुए, उनके लिये विप्रेन्द्र शब्द प्रयुक्त हुआ है – “नान्यं जानाति विप्रेन्द्रो नित्यं पित्रनुवर्तनात् |–वाल्मीकि रामायण,बा.का.९/५, ब्रह्मर्षि भृगु की पौलोमी नामक पत्नी जो पुलोम दानव की कन्या थीं, उनसे उत्पन्न च्यवन ब्राह्मण ही हुए –पप्रच्छ च्यवनं विप्रं लवणस्य यथाबलम् |–वा.रा.उ.का.६७/१, यहाँ माँ दानवकन्या है फिर भी मात्र पिता में ब्राह्मणत्व होने के कारण ही च्यवन में ब्राह्मणत्व आया | अब क्षत्रियकन्याओं में ब्रह्मर्षियों द्वारा उत्पन्न संतानें वर्ण संकर न होकर ब्राह्मण ही हुईं –इस तथ्य को सप्रमाण प्रस्तुत किया जा रहा है | राजर्षि कुशनाभनन्दन गाधि (वा.रा.बा.का.३२/११,) की सत्यवती नामक कन्या से ब्रह्मर्षि ऋचीक का विवाह हुआ— गाधिश्च सत्यवतीं कन्यामजनयत् | तां च भार्गव ऋचीको वव्रे |—तामृचीकः कन्यामुपयेमे | अनन्तरं च सा जमदग्निमजीजनत् |–विष्णु महापुराण ४/७/१२-१३-१४-१६-३२, यहाँ माता क्षत्रिया और पिता ब्राह्मण हैं | फिर भी इन दोनों से समुत्पन्न जमदग्नि ब्राह्मण ही हुए, वर्ण संकर नही | यदि जमदग्नि जी ब्राह्मण नही होते तो उनसे उत्पन्न परशुराम जी ब्राह्मण कैसे होते ? इक्ष्वाकुवंशी महाराज रेणु की क्षत्रियकन्या रेणुका जो जमदग्नि की पत्नी थीं उनसे प्रादुर्भूत परशुराम जी ब्राह्मण ही हुए, वर्णसंकर नही — “ जमदग्निरिक्ष्वाकुवंशोद्भवस्य रेणोस्तनयां रेणुकामुपयेमे | तस्यां चाशेषक्षत्रहन्तारं नारायणांशं जमदग्निरजीजनत् ”—विष्णुमहापुराण ४/७/३५-३६, इन परशुराम जी के लिये ब्राह्मण शब्द स्पष्टतया प्रयुक्त हुआ है— “ क्षत्ररोषात् प्रशान्तस्त्वं ब्राह्मणश्च महातपाः ”—वा.रा. बा.का,७५/६, यहाँ सत्यवादी महाराज दशरथ ने परशुराम जी को महातपस्वी ब्राह्मण बतलाया है | अतः सिद्ध होता है कि असीम शक्ति सम्पन्न ब्रह्मर्षियों से ब्राह्मण पुत्र की समुत्पत्ति हेतु ब्राह्मणकन्या अनिवार्य नही है | वे दानव या क्षत्रिय की कन्या से भी ब्राह्मण संतान उत्पन्न कर सकते हैं | इसीलिये भगवान मनु भी वीर्य को स्त्रीरूपी क्षेत्र से अधिक महत्त्व देते हुए कहते हैं — “ यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोSभवन् | पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते ||–मनुस्मृति—१०/७२, “ बीजयोन्योर्मध्ये बीजोत्कृष्टा जातिः प्रधानम् ”—मन्वर्थमुक्तावली, बीज और योनि के मध्य में उत्कृष्ट बीज वाली जाति ही प्रधान है इसीलिये तिर्यग योनि से समुत्पन्न लोग भी ऋषि हुए हैं और पूजित होने के साथ श्रेष्ठ भी माने गए | श्रेष्ठता का तात्पर्य उनके ब्राह्मणत्व– ख्यापन में है | जिसे सप्रमाण अभी प्रस्तुत किया जा चुका हैं | अतः इन साक्ष्यों के आधार पर ब्रह्मर्षि परासर द्वारा माता सत्यवती से समुत्पन्न भगवान् कृष्णद्वैपायन व्यास ब्राह्मण ही हैं, शूद्र नही | भागवत महापुराण का साक्ष्य— महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ऋत्विक ब्राह्मणों के वरण का जब समय आया तो उन्होंने वेदवादी ब्राह्मणों का वरण किया जिनमें भगवान् व्यास का उल्लेख द्वैपायन शब्द से सुस्पष्ट किया गया है— “ इत्युक्त्वा यज्ञिये काले वव्रे युक्तान् स ऋत्विजः |कृष्णानुमोदितः पार्थो ब्राह्मणान् वेदवादिनः || द्वैपायनो भरद्वाजः सुमन्तुर्गौतमोSसितः |–भा.पु.१०/७४/६-७, यहाँ भगवान् कृष्णद्वैपायन का नाम सबसे पहले उल्लिखित है | ( यहाँ द्वैपायन शब्द कृष्णद्वैपायन का वाचक है | इसके पूर्वपद कृष्ण का “ विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः ”—इस वार्तिक से लोप हो गया है | ) इतना ही नही ,जब भगवान् श्रीकृष्ण विदेहनगरी में पधारते हैं,उस समय उनके साथ कृष्णद्वैपायनव्यास तथा उनके पुत्र स्वयं शुकदेव जी भी हैं |इसका उल्लेख स्वयं शुकदेव ही कर रहे हैं — “ आरुह्य साकं मुनिभिर्विदेहान् प्रययौ प्रभुः || नारदो वामदेवोSत्रिः कृष्णो रामोSसितोSरुणिः | अहं बृहस्पतिः कण्वो मैत्रेयश्च्यवनादयः ||–भागवत महापुराण,१०/८६/१७-१८, यहाँ कृष्णः शब्द कृष्णद्वैपायन का वाचक है | उसके उत्तरपद द्वैपायन का “ विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः ”—इस वार्तिक से लोप हो गया है | यहाँ अहं शब्द से शुकदेव जी ने अपना उल्लेख किया है | इन सबको यहाँ द्विज कहा गया है – न्यमन्त्रयेतां दाशार्हमातिथ्येन सह द्विजैः | मैथिलः श्रुतदेवश्च युगपत् संहताञ्जली ||–भा.पु.१०/८६/२५, क्या इससे कृष्ण द्वैपायन व्यास ओर उनके पुत्र का ब्राह्मणत्व स्पष्ट नही हो रहा है ? भगवान् वेदव्यास शूद्र होते तो उनके पुत्र शुकदेव और स्वयं उनको यहाँ द्विज क्यों कहा जाता ? इतने पर भी व्यास जी को शूद्र कहने वालों तुम्हे संतोष न हो रहा हो तो अब इससे संतोष अवश्य हो जायेगा | सुनो—जब भगवान् श्रीकृष्ण मिथिला में विप्र श्रुतदेव के यहाँ ऋषियों सहित पधारे हैं | तब श्रुतदेव से कहते हैं कि ब्राह्मण इस लोक में जन्म से ही सभी प्राणियों से श्रेष्ठ होता है | इस पर भी यदि उसमे तपश्चर्या, विद्या, संतोष, मेरी उपासना हो तब तो कहना ही क्या ?— “ ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान्सर्वेषां प्राणिनामिह | तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः ||–भागवत महापुराण,१०/८६/५३, जो लोग “ जन्मना जायते शूद्रः –” ऐसा प्रलाप करते हैं वे इस प्रमाण से समझने की चेष्टा करें कि ब्राहमणत्व जाति जन्म से ही आती है | इसके बाद ३ श्लोकों मे विप्रों की महिमा का विशद वर्णन करने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं अपने श्रीमुख से कृष्णद्वैपायन व्यास ओर शुकदेव आदि को उद्देश्य करके श्रुतदेव से कहते हैं कि हे विप्र ! इसलिये तुम इन ब्रह्मर्षियों को मेरा ही स्वरूप समझकर अर्चना करो — “ तस्माद् ब्रह्मऋषीनेतान् ब्रह्मन् श्रद्धयार्चय |–भागवत महापुराण,१०/८६/५७, यहां कृष्णद्वैपायन व्यास उनके पुत्र शुकदेव आदि को ब्रह्मर्षि कहा गया है | अतः इस भग्वद्वचन से विरुद्ध व्यास जी को शूद्र कहने वाले कितने प्रामाणिक हैं ?-–इसका निश्चय सुधी जन स्वयं करें | इसी प्रकार अन्य ऋषियों के विषय में भी समझना चाहिए, जिन्हें वेदमंत्र–द्रष्टा बतलाते हुए आज शूद्र कहा जा रहा है |

साभार ---: आचार्य सियाराम दास नैयायिक